हिंदी पट्टी में दलित, ओबीसी राजनीति करने वाले दल क्यों कमज़ोर पड़ रहे हैं?

दरअसल उत्तर प्रदेश और बिहार में सभ्य, शांत, और सौम्य राजनीति करके सत्ता पाना तक़रीबन नामुमकिन है। इसकी एक वजह जातियों की गोलबंधी और एक दूसरे पर अपनी दबंगई साबित करने की होड़ भी है। ऐसे में दलित और पिछड़े अपने नेता तक न सिर्फ सीधी पहुंच रखने की उम्मीद में समर्थन करते हैं बल्कि चाहते हैं कि उनका नेता, उनके हिस्से की लड़ाई लड़े और उनके हिस्से के संघर्ष करे। सैयद जै़ग़म मुर्तजा का विश्लेषण

हिंदी पट्टी में दलित, और पिछड़ों की राजनीति करने वाले तमाम दल एक-एक कर सत्ता की दौड़ से बाहर होते जा रहे हैं। समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल जैसी तमाम पार्टियां सत्ता विरोधी रूझान और लोगों में तमाम तरह की नाराज़गी के बावजूद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को सत्ता से बेदख़ल नहीं कर पा रही हैं। अक्सर जब चुनाव नतीजे आते हैं तो पता लगता है कि जीत के क़रीब आकर यह पार्टियां फिसल गईं। इसकी क्या वजहें सकती हैं?

भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में जो तमाम बातें बताई जाती हैं उनमें, मज़बूत संगठन, आरएसएस का सहयोग, बूथ स्तर तक के कार्यकर्ता की शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच और भाजपा नेताओं की अपने समर्थकों के लिए सहज उपलब्धता शामिल हैं। आमतौर पर यह तमाम गुण देश में समाजवादी, सर्वहारा और दलित राजनीति करने वाले दलों की पहचान हुए करते थे। कांग्रेस के प्रभुत्व को ख़त्म कर पाने में तमाम समाजवादी दल, और दलित राजनीति करने वाली पार्टियां इसलिए भी कामयाब हुईं कि निचले स्तर के कार्यकर्ता का कांग्रेस नेतृत्व से संपर्क कट गया, नेता आराम तलब हो गए, समय पर कार्यकर्ता को पार्टी का सहयोग नहीं मिला और सबसे बड़ी बात, कि वक़्त पड़ने पर कांग्रेस पार्टी अपने कार्यकर्ताओं की रक्षा नहीं कर पाई।

इसके उलट लालू, मुलायम, कांशीराम, अजीत सिंह, जैसे नेताओं की पहचान यही थी कि उन तक मामूली से मामूली कार्यकर्ता पहुंच सकता था। मुलायम हर ज़िले में दस-पांच कार्यकर्ताओं को नाम से पुकारते थे। लालू अपने कार्यकर्ता के लिए हर समय न सिर्फ उपलब्ध थे बल्कि परेशानी के हालात में तुरंत मिलने पहुंच जाते थे। अजीत सिंह के बंगले का किसी ने दरवाज़ा बंद होते नहीं देखा और उनका विरोधी भी पहले से समय लिया बिना उनके घर और दफ्तर में दाख़िल हो सकता था। कांशीराम सर्व-सुलभ थे। इस कारण इन नेताओं के समर्थक अपने आपको बेहद सशक्त महसूस करते थे। इसका नतीजा यह था कि कार्यकर्ता भी अपने नेता की एक आवाज़ पर हर वक़्त उपलब्ध था। 

तेजस्वी यादव, अखिलेश यादव, मायावती और जयंत चौधरी की तस्वीर

अब ज़रा इन दलों का मौजूदा चरित्र देखिए। जयंत चौधरी और अखिलेश तक उनके समर्थकों की वैसी पहुंच नहीं है जैसी अजीत सिंह या मुलायम सिंह यादव तक थी। यही हाल तेजस्वी यादव का भी है। मायावती से तो कार्यकर्ता की शिकायत ही यही है कि मायावती अपने महल से निकलती नहीं और उनके महल के दरवाज़े जनता के लिए खुलते नहीं। 

मसला सिर्फ इन बातों तक सीमित नहीं है। तमाम राजनीतिक दल अपने मूल चरित्र से हटकर राजनीति करने का ख़मियाज़ा भुगत रहे हैं। यह दल जबतक अपनी जड़ों की तरफ नहीं लौटेंगे, इनका सत्ता में वापस लौट पाना किसी भी लिहाज़ से आसान नहीं है।

दरअसल उत्तर प्रदेश और बिहार में सभ्य, शांत, और सौम्य राजनीति करके सत्ता पाना तक़रीबन नामुमकिन है। इसकी एक वजह जातियों की गोलबंधी और एक दूसरे पर अपनी दबंगई साबित करने की होड़ भी है। ऐसे में दलित और पिछड़े अपने नेता तक न सिर्फ सीधी पहुंच रखने की उम्मीद में समर्थन करते हैं बल्कि चाहते हैं कि उनका नेता, उनके हिस्से की लड़ाई लड़े और उनके हिस्से के संघर्ष करे। ऐसे में अगर समाजवादी पार्टी जैसा दल मध्यम वर्ग को लुभाने और टीवी पर सौम्य दिखने की राजनीति करेगा तो उसका मूल वोटर दिल से समर्थन नहीं कर पाएगा।

बिहार में पिछड़ों को अपने नेता में लालू जैसी दबंग और संघर्षशील राजनीति चाहिए। उत्तर प्रदेश का दलित सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय सुनेगा तो फिर वोट नहीं करेगा। उसको तिलक, तराज़ू और तलवार वाला ही नारा लुभाता है। उसको सवर्ण के समान मूछ रखने, घोड़ी चढ़ने का सम्मान चाहिए न अपनी पार्टी में किसी सवर्ण नेता की मुंशीगीरी। इसी तरह समाजवादी पार्टी का मूल चरित्र “हल्ला बोल” टाइप नारे और अभियान हैं। अगर पार्टी अध्यक्ष ट्विटर और टीवी पर सौम्य दिखने के फेर में सड़क से दूर होगा और पार्टी नेता अपने पर्चे छिनवाएंगे तो उनके समर्थक दल बदल लेंगे।

उत्तर प्रदेश और बिहार में जिस तरह कांग्रेस संजय गांधी ब्रांड राजनीति से किनारा करने के बाद इतिहास बन गई, वही हश्र आरजेडी, आरएलडी, बीएसपी और समाजवादी पार्टी का हुआ है। तेजस्वी, अखिलेश, जयंत चौधरी, मायावती अपने वोटर और समर्थक की महत्वाकांक्षा समझ नहीं पा रहे हैं। उनका वोटर उत्पीड़ित समूह है। उसको हिसाब बराबर करने वाला नेता चाहिए। अगर उनका नेता समय पर ग़ायब रहे, सड़क पर संघर्ष करता न दिखे, लाठी डंडे न खा सके, न लाठी डंडे चला सके तो समर्थक उस पार्टी में ही चला जाएगा जो उसका उत्पीड़न कर रही है।

मतलब साफ है, यूपी-बिहार में राजनीति करनी है तो घर से बूथ तक अपने वोटर को सुरक्षा दीजिए। वोट पड़ने के बाद वोटर को दबंगों के क़हर और प्रशासन के उत्पीड़न से बचाइए। बूथ से लेकर गिनती तक अपने वोट की रक्षा कीजिए। अगर उत्पीड़न या बेईमानी की शिकायत मिले तो तुरंत मौक़े पर पहुंच कर कार्यकर्ता का मनोबल बढ़ाइए। हारें या जीतें, अपने वोटर के साथ दिखिए। अगर यह सब नहीं कर सकते हैं तो फिर अपनी पार्टी का कांग्रेस और बीएसपी जैसा हश्र करने के लिए तैयार रहिए। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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