सपा गठबंधन : जाट बहुल इलाके में रह गयी एक आंच की कसर

कहा जा सकता है कि पश्चिम में जाट आंदोलन का फायदा गठबंधन को हुआ है। कम से कम मुसलमान और जाटों के बीच दूरी मिटाने में गठबंधन बहुत हद तक कामयाब रहा है। यह आगे के लिए मज़बूत बुनियाद है लेकिन गठबंधन को आगे के लिए बड़ी तैयारियां करनी होंगी। बता रहे हैं सैयद जै़गम मुर्तजा

पश्चिम उत्तर प्रदेश के दोआब में हार समाजवादी गठबंधन के लिए बड़ी चिंता का सबब है। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि इस क्षेत्र में जाट, और मुसलमान आबादी ठीक-ठाक है लेकिन समाजवादी पार्टी की गठबंधन साझीदार इलाक़े में आशा के मुताबिक़ प्रदर्शन नहीं कर पाई। इसकी तमाम वजहें हैं लेकिन एक बड़ा कारण दलित और पिछड़ी जातियों के बीच अविश्वास का माहौल भी है। पहले दो चरण की 113 सीटों पर भाजपा की शानदार जीत के बाद सवाल उठ रहा है कि जाट वोट आख़िर किधर गया?

उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने के लिए पहले चरण की 58 सीट समाजवादी पार्टी-आरएलडी गठबंधन के लिए काफी अहम थीं। इसकी एक वजह इस इलाक़े में जाट और मुसलमान मतदाताओं की प्रभावी संख्या के अलावा साल भर चले किसान आंदोलन से तैयार की गई ज़मीन भी थी। गठबंधन को पूरा भरोसा था कि 2013 के दंगों के ज़ख़्म भुलाकर मुसलमान और जाट साथ आएंगे और कम से कम आरएलडी उम्मीदवारों को पूरा समर्थन देंगे। हालांकि ऐसा होता दिखा भी, लेकिन जब चुनाव नतीजे आए तो गठबंधन के लिए निराशा भरे थे। इसकी वजह थी कि 2017 और 2019 से बेहतर प्रदर्शन करने के बावजूद गठबंधन के उम्मीदवार ज़्यादातर सीटों पर नज़दीक़ी मुक़ाबले में हार गए।

पहले चरण में मुज़फ्फरनगर से लेकर आगरा के बीच जिन 58 विधान सभा सीटों पर चुनाव हुआ उनमें भाजपा को 46 पर जीत हासिल हुई है। इससे भी ज़्यादा चौंकाने वाली बात है कि बसपा इस इलाक़े में मज़बूत जनाधार होने के बावजूद इस इलाक़े से पूरी तरह साफ हो गई। तमाम सीटों पर बसपा के उम्मीदवार मुख्य मुक़ाबले में भी नज़र नहीं आए। लेकिन इसके बावजूद आगरा, अलीगढ़, ग़ाज़ियाबाद, मेरठ, और मुज़फ्फरनगरमें बसपा उम्मीदवार सिर्फ गठबंधन उम्मीदवारों को हराने में मदद करते नज़र आए। पहले चरण की 58 सीटों में महज़ 12 और दूसरे चरण की 55 सीट में महज़ 27 पर जीत मिलने से गठबंधन की जीत सरकार बनाने की उम्मीदों को गहरा धक्का लगा। इसके बाद अब सवाल उठ रहा है कि जाट बाहुल इलाक़े में गठबंधन की हार की क्या वजहें हैं। क्या जाटों ने गठबंधन को उस तरह वोट नहीं किया, जिस तरह करना चाहिए था? 

जयंत चौधरी और अखिलेश यादव की तस्वीर

इस मसले में एक बात मान लेना ज़रूरी है कि मुसलमान, दलित, पिछड़ों की राजनीति करने वाले दल और उनके समर्थक अपने नॅरेटीव तैयार करने की बजाय तुरंत मीडिया पर उछाले गए राजनीतिक जुमले तुरंत लपक लेते हैं। अगर हर विधानसभा सीट का हिसाब-किताब किया जाए तो जाट ही नहीं यादव, कुर्मी, राजभर, पासी समेत तमाम पिछड़ों से जुड़े वोटर बड़ी तादाद में गठंबधन की तरफ गए हैं। इसका एक सबूत गठबंधन को मिले क़रीब 38 फीसदी वोट हैं। 2012 में समाजवादी पार्टी को लगभग 29 फीसदी वोट मिले थे और राज्य में उसकी बहुमत की सरकार बनी थी। यूपी में मुसलमान, यादव की कुल संख्या मिलकर भी किसी दल तो 38 फीसदी वोट नहीं दिला सकती। ज़ाहिर है, अगर गठबंधन को इतना वोट मिला है तो कई जातियां, समूह या लोग भाजपा या बसपा छोड़कर उसकी तरफ आए हैं।

बसपा के वोटर के मन में जाट, गूजर या यादव जातियों के सत्ता में आने को लेकर तमाम तरह के डर फैलाए गए, जिन्होंने दलित मतदाताओं को भाजपा की तरफ धकेल दिया। पश्चिम यूपी में राशन का थैला इतना बड़ा मुद्दा नहीं था जितना मुसलमान, जाट या यादवों के सत्ता में आने पर पट्टे की ज़मीन छिनने का डर।

सवाल यह है कि जाट बहुल इलाक़ों, ख़ासकर मथुरा, हाथरस, बिजनौर, बुलंदशहर या अलीगढ़ में समाजवादी पार्टी या आरएलड़ी का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक़ क्यों नहीं रहा। शामली, मुज़फ्फरनगर, और अमरोहा में गठबंधन को अच्छा ख़ासा वोट मिला है। जिन सीटों पर गठबंधन हारा भी है, उनमें बुलंदशहर ज़िला छोड़ दें तो अधिकतर पर हार-जीत का फासला पांच सौ, हज़ार या दो हज़ार वोटों के आसपास है। गठबंधन की परेशानी यह रही है कि जिन इलाक़ों में जाट-मुसलमान, जाट-मुसलमान या जाट-कुर्मी वोट के दम पर जीत मिलना मुश्किल था वहां गठबंधन उम्मीदवार अन्य जातियों में अपनी पैठ नहीं बना पाए। मथुरा, हाथरस, अलीगढ़, आगरा और बुलंदशहर में कुछ ऐसा ही हुआ है। इस समस्या का हल गठबंधन के नेताओं ख़ासकर आरएलडी को खोजना चाहिए।

टिकट वितरण और उससे जन्मा असंतोष भी गठबंधन की हार की एक वजह है। जहां-जहां किसी मज़बूत उम्मीदवार का टिकट कटा, वहीं पर बसपा या एमआईएम ने उसे लपककर इस स्थिति में पहुंचा दिया कि वह गठबंधन को हरा सके। बसपा ने क़रीब 122 सीटों पर मुसलमान या यादव उम्मीदवार उतारे थे। इनको बसपा का कैडर वोट भी नहीं मिला, लेकिन मुसलमान और यादव वोटरों में बंटवारे का फायदा भाजपा को मिल गया। बसपा के वोटर के मन में जाट, गूजर या यादव जातियों के सत्ता में आने को लेकर तमाम तरह के डर फैलाए गए, जिन्होंने दलित मतदाताओं को भाजपा की तरफ धकेल दिया। पश्चिम यूपी में राशन का थैला इतना बड़ा मुद्दा नहीं था जितना मुसलमान, जाट या यादवों के सत्ता में आने पर पट्टे की ज़मीन छिनने का डर।

दलित ही नहीं तमाम ग़ैर-जाट, ग़ैर-यादव, ग़ैर-कुर्मी जातियों का भाजपा के साथ ध्रुवीकरण हुआ। इसके पीछे कथित जंगलराज का डर और समाज में प्रभुत्व रखने वाली इन जातियों के सत्ता में आने का बाद बढ़ने वाले प्रभाव को लेकर तमाम तरह की शंकाएं लोगों के मन में थीं। इससे यह हुआ कि भाजपा अपने 2017 या 2019 में अपने साथ जुड़ी जातियों के छिटकने के बावजूद अपना वोट बढ़ाने में कामयाब रही है। यह तब हुआ है कि राज्य में मतदान प्रतिशत घटा और शहरी सीटों पर वोटरों में पहले जैसा जोश नहीं दिखा। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि गठबंधन हर उस सीट पर सफल रहा, जहां जाट और मुसलमान मिलकर आराम से जीत सकते थे। 

2013 के दंगों के ज़ख़्म भुलाकर मुसलमानों ने हर उस सीट पर जाट उम्मीदवारों को वोट दिया जहां वह सीट जिताने की हालत में थे। हालांकि बसपा और एमआईएम के मुसलमान उम्मीदवारों में कई जगह नुक़सान किया लेकिन फिर भी आंकड़े बता रहे हैं कि 80 प्रतिशत से ज़्यादा मुसलमान गठबंधन की तरफ गए हैं। इसका एक उदाहरण नौगावां सीट है जहां जाट वोटर तीस हज़ार से भी कम हैं ,लेकिन गठबंधन उम्मीदवार समरपाल सिंह एक लाख से ज़्यादा वोट पाकर जीते। इस सीट पर बसपा का मुसलमान उम्मीदवार भी था। लेकिन बाग़पत में अहमद हमीद की हार से जाट मतदाताओं की आरएलडी के प्रतिबद्धता को लेकर सवाल उठते हैं, क्योंकि इस सीट पर भाजपा के जाट उम्मीदवार की जीत हुई है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि गठबंधन अच्छा लड़ा लेकिन फिर भी ज़मीन पर कुछ कमियां रह गई है। तक़रीबन ख़त्म मान ली गई आरएलडी को इस चुनाव में आठ सीटें मिली हैं, जबकि समाजवादी पार्टी के जाट उम्मीदवार भी चुनाव जीते हैं। कई उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे हैं। कहा जा सकता है कि पश्चिम में जाट आंदोलन का फायदा गठबंधन को हुआ है। कम से कम मुसलमान और जाटों के बीच दूरी मिटाने में गठबंधन बहुत हद तक कामयाब रहा है। यह आगे के लिए मज़बूत बुनियाद है लेकिन गठबंधन को आगे के लिए बड़ी तैयारियां करनी होंगी। 

जाट, यादव औऱ गूजरों को पश्चिम यूपी में तमाम जातियों के साथ नए सामाजिक गठबंधन करने होंगे, और उनके भय दूर करने होंगे। इसके अलावा तय करना होगा कि गठबंधन सिर्फ सतही न हो बल्कि वोटरों के बीच भी हो। दूसरे, टिकट वितरण में गठबंधन में शामिल लोगों की पंचायत या स्थानीय समूहों से चर्चा करके आपसी विवाद समय रहते ख़त्म करने होंगे। टिकट वितरण में जिन जातियों का वोट लिया जाना है, उनकी नाराज़गी या पसंद का ख़्याल ज़रूरी है। इसके अलावा दलित लगातार समाजवादी गठबंधन से दूर रहा है। यादव और जाट नेताओं को धरातल पर उतारकर इन जातियों के साथ संवाद क़ायम करके दूरियां ख़त्म करने पर काम करना होगा।

(संपादन : नवल/अनिल)


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