डॉ. रामविलास शर्मा की ‘कुदृष्टि’

हम भी चाहते हैं कि वर्ग के आधार पर संगठित हों गरीब लोग, पर होते क्यों नहीं? आप धर्म को मजबूत करते रहें, रामचरितमानस को आदर्श बताते रहें और दलित-बहुजनों से कहें कि वे वर्ग के आधार पर संगठित हों। रामविलास जी सिर्फ बेवकूफ बना सकते थे, और वह उन्होंने बनाया। पढ़ें, कंवल भारती की यह समालोचना

डॉ. रामविलास शर्मा की एक किताब है– ‘परंपरा का मूल्यांकन’। उसके शुरु में ही वे लिखते है, “जो लोग साहित्य में युग-परिवर्तन करना चाहते हैं, जो लकीर के फकीर नहीं हैं, जो रूढियां तोड़कर क्रांतिकारी साहित्य रचना चाहते हैं, उनके लिये साहित्य की परंपरा का ज्ञान सबसे ज्यादा आवश्यक है।” निस्संदेह परंपरा या इतिहास का ज्ञान साहित्य-रचना, खासकर आलोचना-कर्म के लिये बहुत आवश्यक है। ऐसे कई आलोचक हैं, जिन्होंने इतिहास को जाने बगैर आलोचना-कर्म किया है, जैसे रामचन्द्र शुक्ल और बाबू श्यामसुन्दर दास; इससे उनकी स्थिति कई जगह हास्यास्पद हो गयी है। उदाहरण के लिये कबीर की एक साखी है– “मीठा खॉण मधुकरी भाँति भाँति को नाज/दावा किस ही का नहीं, बिन बिलाइति बड़ राज। बाबू श्यामसुन्दर दास कबीर ग्रंथावली में इसका अर्थ करते हुए लिखते हैं, ईसाई धर्म का उनके (कबीर के) समय तक देश मे प्रवेश नहीं हुआ था, पर बिलाइत का नाम उनकी साखी में एक स्थान पर अवश्य आता है– बिन बिलाइत बड़ राज।’ यह निश्चयात्मक रूप से नहीं कहा जा सकता कि बिलाइत से उनका यूरोप के किसी देश से अभिप्राय था अथवा केवल विदेश से।यदि बाबू जी ने इतिहास पढ़ा होता, तो उनकी आलोचना में यह हास्यास्पद स्थिति पैदा नहीं होती। उन्हें मालूम हो जाता कि वली के प्रभुत्व वाले क्षेत्र को विलायत कहा जाता था। वली अरबी का शब्द है, जिसका अर्थ है, ईश्वर का मित्र या ऋषि। इसी वली शब्द से विलायत शब्द बना है। आचार्य शुक्ल के आलोचना-कर्म में तो इतिहास की अज्ञानता इतनी ज्यादा है कि यदि यहां मैं उनकी चर्चा करने लगा, तो रामविलास जी पीछे छूट जाएंगे। अब देखना यह है कि स्वयं रामविलास जी ने अपने आलोचना-कर्म में इतिहास और परंपरा का मूल्यांकन किस तरह किया है।

डॉ. रामविलास शर्मा के लेखों का संग्रह परंपरा का मूल्यांकन में कबीर पर उनका कोई लेख शामिल नहीं है। मेरी सीमित जानकारी के अनुसार उन्होंने शायद कबीर पर कोई स्वतंत्र लेख लिखा भी नहीं है। उन्होंने मीरा पर भी कोई काम नहीं किया है। इसका मतलब है कि उन्होंने 15वीं सदी की दलित और स्त्री संतों की पूरी परंपरा को नजरअंदाज किया है। लेकिन तुलसीदास पर उनके तीन लेख इस पुस्तक में मौजूद हैं। तुलसीदास उनके प्रिय कवि हैं। निराला पर भी उन्होंने काफी काम किया और अद्भुत संयोग है कि तुलसीदस निराला के भी प्रिय कवि है। रामविलास जी ने कबीर पर काम क्यों नहीं किया? यह एक स्वाभाविक सवाल है, कोई दवाब का सवाल नहीं है कि कबीर पर लिखना ही था या जो कबीर पर नहीं लिखेगा, वह लेखक नहीं हो सकता। लेकिन रामविलास जी के संदर्भ में यह सवाल इसलिये जेहन में आता है, क्योंकि यह सीमा-रेखा उन्होंने पहले ही खींच दी है कि जो लोग साहित्य में युग-परिवर्तन करना चाहते हैं, उनके लिये परंपरा का ज्ञान सबसे ज्यादा आवश्यक है। रामविलास जी ऐसे ही लेखक हैं, जो युग-परिवर्तन करना चाहते हैं। फिर वे ‘परंपरा के मूल्यांकन’ में कबीर की उपेक्षा कैसे कर सकते हैं? क्या उनके लिये युग-परिवर्तन की दृष्टि से कबीर का ज्ञान गैर-जरूरी था? क्या कबीर को उपेक्षित करके और तुलसी को स्वीकार करके युग-परिवर्तन किया जा सकता है? लेकिन रामविलास जी ने ‘परंपरा का मूल्यांकन’ तुलसीदास को स्थापित करने के उद्देश्य से ही किया है। वे जानते थे कि कबीर ब्राह्मण को न गुरु स्वीकार करते हैं और ना सर्वोच्च मानते है, जबकि तुलसीदास के यहां ब्राह्मण गुरु भी है, श्रेष्ठ भी है और सर्वोच्य भी है। कबीर की ज्ञान-परंपरा वेद-विरोधी है, जबकि तुलसी वैदिक परंपरा के कवि हैं। कबीर के यहां वर्ण व्यवस्था का खंडन है, पर तुलसीदास वर्ण व्यवस्था के प्रतिष्ठापक हैं। रामविलास जी जानते थे कि यदि कबीर को स्वीकार किया, तो तुलसीदास को खारिज करना अनिवार्य हो जायगा। कबीर और तुलसीदास साथ-साथ नहीं चल सकते। इसलिये उन्होंने कबीर को खारिज किया और तुलसी को स्वीकार किया। उन्होंने तुलसी को कबीर से बड़ा और युगप्रवर्तक साबित करने के लिये ज्ञान की पूरी परंपरा को उलट-पुलट कर दिया। तुलसी की भक्ति में वे लिखते हैं, तुलसी को निकाल कर हिंदी साहित्य की परंपरा से संबंध जोड़ना असंभव है। उनके जीते-जी किसी ने भी उनसे यह पूछने का साहस नहीं किया कि क्या कबीर को निकाल कर हिंदी साहित्य की परंपरा से संबंध जोड़ना संभव है? वे तुलसी के संदर्भ में ही आगे लिखते हैं– इस परंपरा में जो कुछ मूल्यवान है, जो कुछ महत्वपूर्ण है, जो कुछ सदा के लिये संग्रह करने योग्य है, वह तुलसी में सुरक्षित है और बहुत बड़ी मात्रा में सुरक्षित है। यह तथ्य तुलसी की अपराजेय प्रतिभा का द्योतक है कि उन्हें त्यागकर कोई भी युग-प्रवर्तक कवि हो नही सकता। यहां यह स्पष्ट दिखायी दे रहा है कि रामविलास जी ने तुलसी को बड़ा साबित करने के लिये परंपरा का कितना गलत मूल्यांकन किया है।

दरअसल, हिंदी में कबीर और तुलसी के जितने भी ब्राह्मण आलोचक हैं, जिनमें हजारीप्रसाद द्विवेदी भी शामिल हैं, कबीर के साथ उतने सहज बिल्कुल नहीं हैं, जितने सहज वे तुलसी के साथ दिखायी देते हैं। कबीर के यहां प्रवेश करते ही वहां उनका सामना वेद, ब्राह्मण और वर्ण व्यवस्था के खंडन से होता है, और उनके अंदर हाहाकार मच जाता है। इस मुठभेड़ में उनके अंदर का ब्राह्मण पराजित होने लगता है, जिससे वे सहज नहीं रह पाते। तब उनके सामने दो ही स्थितियां होती हैं– या तो वे कबीर को स्वीकार करें या खारिज करें। अधिकांश ब्राह्मण आलोचकों ने बीच का रास्ता चुना। उन्होंने कबीर को न स्वीकार किया और न खारिज किया, बल्कि उन्हें रहस्यवादी बनाकर और वेदांत के अद्वैतवाद से जोड़कर उनकी सारी क्रांति-चेतना को ठंडा कर दिया। रामचन्द्र शुक्ल जैसे कुछ आलोचकों ने तो कबीर को नीच-गंवार कहकर अपनी भड़ास निकाली और सीधे तुलसीदास की शरण में जाकर ही अपने हाहाकार को शांत किया। रामविलास जी की भी यही स्थिति है। वे पहले से ही तुलसी की शरण में हैं। उनकी दृष्टि में कबीर बहुत बड़े भक्त हैं”, लेकिन तुलसीदास ज्ञानी कवि हैं, इतने बड़े ज्ञानी कि उनके समान दूसरा कोई नहीं है। यह है रामविलास जी का परंपरा का मूल्यांकन, जिसमें ज्ञान की परंपरा ही उलट गयी है। इस परंपरा को उलटने के लिये उन्होंने भक्त को संत और संत को भक्त बना दिया। तुलसीदास भक्त हैं, वर्णवादी हैं, तो उन्हें रामविलास जी ने संत बना दिया और वह भी जनवादी संत। कबीर संत हैं, जनवादी हैं, तो उन्हें भक्त बना दिया। परंपरा का मूल्यांकन में ही एक लेख है– तुलसी साहित्य के सामंत-विरोधी मूल्य। यह लेख स्वयं इस बात का प्रमाण है कि रामविलास जी ने तुलसीदास को जनवादी बनाने में कितनी मेहनत की है। उन्होंने वे सारी विशेषताएं, जो कबीर पर लागू होती हैं, तुलसीदास पर लागू कर दी हैं। तुलसीदास को सबसे बड़ा ज्ञानी और क्रांतिकारी कवि साबित करने में उन्होंने संत और भक्त की ज्ञान-परंपरा को भी उलट दिया। इसके लिये उन्होंने संत की उस परंपरा को ध्वस्त किया, जिसमें कबीर आते हैं। संतों की दो परंपराएं रही हैं। पहली परंपरा के संत वेद और ब्राह्मण की गुलामी से मुक्त हैं, जबकि दूसरी परंपरा के संतों को वेदों की गुलामी में रहना तब भी अनिवार्य था और आज भी अनिवार्य है। स्वयं तुलसीदास ने मानस में संत के लक्षणों में बिप्र पद प्रेमा और द्विज पद प्रीति धर्म जनयित्री को अनिवार्य माना है। रामविलास जी ने इन दोनों परंपराओं को ऐसा गड्ड-मड्ड किया कि जो अवैदिक थे, वे भी वैदिक हो गये और उनमें भी तुलसीदास सबसे बड़े संत हो गये। उन्होंने तुलसीदास को युगांतरकारी बनाने के लिये संत की भ्रष्ट परिभाषा गढ़ी। यह भ्रष्ट परिभाषा उनके लेख संत-साहित्य के अध्ययन की समस्याएं में देखी जा सकती है। निर्गुण और सगुण संतों की परंपराएं अलग-अलग हैं, उनके अध्ययन में समस्या तभी आ सकती है, जब निर्गुण को सगुण और सगुण को निर्गुण की दृष्टि से देखा जायगा। रामविलास जी जानते थे कि यदि निर्गुण संत-परंपरा का अध्ययन निर्गुण की दृष्टि से किया जायगा, तो युगान्तरकारी संत का खिताब तुलसी को नहीं, कबीर को मिलेगा। इसलिये उन्होंने संत साहित्य के अध्ययन की काल्पनिक समस्या खड़ी की और उसे वे उस निष्कर्ष पर ले गए, जहां कबीर निर्भीक और उद्दंड हैं तथा तुलसी, सूर और जायसी प्रेम, करुणा और मानव-मात्र की समानता के कवि हैं। इनमें भी तुलसी के काव्य में सामंत-विरोधी मूल्य विद्यमान हैं। उन्होंने किस तरह इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा है, इसे शुरू से अंत तक उनके लेख संत-साहित्य के अध्ययन की समस्याएं में देखा जा सकता है। इस छोटे से आलेख में ज्यादा उद्धरण नहीं दिये जा सकते। फिर भी मैं एक उद्धरण यहां जरूर देना चाहूंगा। संत कौन थे’, इसे स्थापित करते हुए वे एक जगह लिखते हैं– संत-साहित्य भारतीय जीवन की परिस्थितियों से पैदा हुआ था। उसका स्रोत बौद्ध धर्म या इस्लाम में, या हिन्दू धर्म में ढूंढ़ना सही नहीं है। इन धर्मों का उस पर असर है, लेकिन वे उसके मूल स्रोत नहीं हैं। मलिक मुहम्मद जायसी कुरान के भाष्यकार नहीं हैं, न कबीर और न दादू त्रिपिटकाचार्य हैं, न सूर और तुलसी वेद, गीता या मनुस्मृति के टीकाकार हैं। संत-साहित्य की अपनी विशेषताएं हैं, जो मूलतः किसी प्राचीन धर्म ग्रंथ पर निर्भर नहीं हैं।

डॉ. रामविलस शर्मा (10 अक्टूबर, 1912-30 मई, 2000)

ऊपर से देखने में यह परिभाषा कितनी सुंदर लगती है। पर, यह सुंदर है नहीं। इस परिभाषा को गढ़ने का रामविलास जी का एक ही मकसद था कि वे तुलसीदास की मनुवादी छवि को धोना चाहते थे। इसलिये उन्होंने निर्गुण-सगुण दोनों धाराओं के संतों को एक ही धारा में गड्ड-मड्ड कर दिया। यहां इतिहास की भी उन्होंने अनदेखी की है, बल्कि कहना तो यह सही होगा कि यहां उनका प्रछन्न हिन्दुत्व उजागर हुआ है। इतिहास का सच यह है कि भारतीय जीवन की जिन परिस्थितियों का जिक्र रामविलास जी करते हैं, उन्हें इस्लाम ने ही पैदा किया था। कबीर, रैदास और दादू को पैदा करने वाला इस्लाम ही है। यदि भारत में इस्लाम न आता, तो शायद ही कबीर, रैदास और दादू पैदा होते। ब्राह्मण-श्रेष्ठता और वर्ण व्यवस्था के खिलाफ दलित दलित-बहुजन संतोंकी निर्गुण-क्रांति की प्रतिक्रांति में ही ब्राह्मण संतों ने सगुण-भक्ति की धारा चलायी थी। चाहे रामानंद हों, बल्लभाचार्य हों, अष्ठछाप के कवि हों और चाहे तुलसीदास हों, इन सभी ने निर्गुण की आंधी में वेद, पुराण, स्मृति और वर्ण व्यवस्था को बचाने का ही काम किया था। इन सगुण कवियों का सारा काव्य ब्राह्मणवाद की रक्षा और स्थापना का ही काव्य है। रामविलास जी की हिन्दूवादी व्याख्याएं इस सत्य को मिटा नहीं सकतीं। एक और जगह वे कबीर और तुलसी को गड्ड-मड्ड करते हुए लिखते हैं– जनता में सबसे पीड़ित वर्ग स्त्रियों और अछूतों का था। इसलिये इनकी ओर तुलसी जैसे कवि की सहानुभूति होना स्वाभाविक था” तुलसीदास स्त्रियों और अछूतों के हित-चिंतक कवि थे, इससे बड़ा झूठ क्या हो सकता है? उनके मूल्यांकन में तुलसी की यह विशेषता है कि उन्होंने अन्याय का सक्रिय विरोध करने के लिये राम का आदर्श चरित्र रखा। यह रामविलास जी की ही मूल्यांकन की सोची-समझी योजना है कि उन्होंने इस बात पर परदा डाल दिया कि तुलसी ने राम के भगवत्स्वरूप को स्थापित किया है। रामविलास जी यह कैसे भूल गये कि राम राजा थे और उन्हीं के शासन को रामराज्य कहा जाता है। जब राम आदर्श हैं तो रामराज्य को भी आदर्श मानना होगा। यह एक म्यान में दो तलवारें रखने की कितनी फूहड़ कोशिश है। जिस मुंह से रामविलास जी समाजवाद की बात करते हैं, उसी मुंह से वे रामराज्य का समर्थन कैसे कर सकते हैं?

अपने लेख परंपरा का मूल्यांकन में रामविलास जी यह निष्कर्ष देते हैं कि समाजवादी संस्कृति पुरानी संस्कृति से नाता नहीं तोड़ती। इसका क्या मतलब है? क्या समाजवादी संस्कृति को सामंतवादी संस्कृति से संबंध बनाये रखना चाहिए? इसका सीधा मतलब है कि समाजवाद के मानने वालों को वर्ण व्यवस्था में भी अपना विश्वास बनाये रखना चाहिए। क्या यह समाजवाद को हिन्दुत्व से जोड़ने की साजिश नहीं है? किसी को यह साजिश नहीं भी लग सकती है, पर दलित-बहुजन चिंतकों को तो लगती हैं। और इसी का नतीजा है कि समाजवादी विफल हो रहे हैं और पुनरुत्थानवादी शक्तियां कामयाब हो रही हैं। यदि विचार और साहित्य के क्षेत्र में ऐसा हो रहा है, तो इसका काफी कुछ श्रेय रामविलास शर्मा के प्रछन्न हिन्दुत्व को भी जाता है। इसीलिये वे कबीर को बहुसंख्यक पीड़ित जनता का कवि नहीं मानते, तुलसी को मानते हैं। हिंदी जाति के सांस्कृतिक इतिहास की रूपरेखा में वे लिखते हैं– भारत की बहुसंख्यक पीड़ित किसान जनता की वेदना, सुखी जीवन के लिये संघर्ष करने की उसकी क्षमता भारतीय साहित्य में, सर्वाधिक तुलसीदास के काव्य में अभिव्यक्त हुई है। इसी में आगे वे यह भी जोड़ते हैं कि “तुलसी का रामचरितमानस संसार का अनुपम धार्मिक काव्य है। 

धार्मिक’ शब्द रेखांकित करने योग्य है। रामचरितमानस धार्मिक ग्रंथ है, वह भी हिन्दुओं का। अतः कहना न होगा कि रामविलास जी का यह हिन्दू एजेंडा समाजवादी विचारधारा के लिये कितना घातक है। तुलसी का धार्मिक एजेंडा क्या है और जिस परंपरा को रामविलास जी उपेक्षित करते हैं, उसमें समाजवादी चिंतन क्या है? यहां इन दो परंपराओं का अंतर जानना जरूरी है। कबीर-रैदास के समाजवादी चिन्तन का सौन्दर्यशास्त्र है– बाभन को मत पूजिए जो हो गुन से हीन/पूजिए चरन चंडाल के जो हो ग्यान प्रबीन। इसी की प्रतिक्रांति में तुलसी ने धर्माज्ञा जारी की– पूजिए बिप्र सील गुन हीना/नाहीं सूद्र गुन ग्यान प्रबीना। यह कितना दुखद है कि रामविलास जी यहां समाजवाद के साथ नहीं खडे़ हैं, बल्कि तुलसी के ब्राह्मणवादी सौन्दर्यशास्त्र के साथ खड़े हैं।

तुलसी की भक्ति में रामविलास जी लिखते हैं– तुलसी के राम दीन-बन्धु हैं। तुलसी की भक्ति का सामाजिक उत्पीड़न से घनिष्ठ सम्बन्ध है। वह राजाओं, सामंतों, धनी लोगों के सामने हाथ पसारने वालों में आत्म-सम्मान का भाव जाग्रत करते हैं। उनसे कहते हैं, राम से मांगो, वह सब कुछ देगा, मनुष्य के आगे हाथ मत फैलाओ। राम का भरोसा होने से उन्हें मनुष्य की दासता से मुक्ति मिल जाती है। यह कौन सी समाजवादी विचारधारा है रामविलास जी की, जो मनुष्य को संघर्ष करने से रोककर राम से मांगो और उसी के भरोसे रहने को कह रही है? यदि राम में ही मनुष्य की दासता से मुक्ति है, तब तो किसी भी संघर्ष की जरूरत नहीं है, न व्यवस्था से लड़ने की जरूरत है और न पूंजीजीवाद को कोसने की जरूरत है। बस राम की भक्ति से ही मनुष्य को रोटी, कपड़ा, मकान सब कुछ मिल जाएगा। गाय और ब्राह्मण की रक्षा के लिये अवतार लेने वाले राम की भक्ति का आदर्श क्या समाजवाद का रास्ता हो सकता है? लेकिन रामविलास जी ऐसा ही मानते हैं। वे तुलसी साहित्य के सामंत-विरोधी मूल्य लेख में लिखते हैं– तुलसी की भक्ति जनता के लिये अफीम नहीं थी। वह जनजागरण का एक साधन थी। रामविलास जी यह जानते थे कि मार्क्स ने धर्म को अफीम कहा है। कोई तुलसी की राम-भक्ति में अफीम का सवाल न खड़ा कर दे, इसलिये उन्होंने पहले ही कह दिया कि तुलसी की भक्ति जनता के लिये अफीम नहीं है। फिर तो रामचरितमानस का अखंड पाठ करने वाले लोग भी समाजवादी धारा के ही लोग माने जायेंगे। फिर किस जनजागरण की बात रामविलास जी कर रहे हैं?

दरअसल, रामविलास जी का परंपरा-मूल्यांकन परंपरा के बहाने समाजवाद के नाम पर हिन्दुत्व को स्थापित करने की कोशिश है। इतिहास में ब्राह्मणवाद और वर्णव्यवस्था के विरुद्ध प्रतिरोध की जो धारा है, रामविलास जी इतिहास की उस धारा की तरफ देखते तक नहीं हैं। डॉ. आंबेडकर ने अपने समय के कम्युनिस्टों को चेतावनी दी थी कि यदि वे ब्राह्मणवाद के विरुद्ध नहीं लड़ेंगे, तो मजदूरों में एकता स्थापित नहीं कर सकेंगे। लेकिन भारत के कम्युनिस्ट अपना ही राग अलापते रहे कि जब पूंजीवादी आएगा, वर्गसंघर्ष होगा, तो जातियां अपने आप समाप्त हो जाएंगीं। और जातियां आज तक समाप्त नहीं हुईं। रामविलास शर्मा भी ऐसे ही तथाकथित समाजवादी विचारकों में थे, जिन्हें दलित आंदोलन और दलित साहित्य बिल्कुल पसंद नहीं था। उदाहरण के लिये मैं उनके कुछ साक्षात्कारों का जिक्र यहां करूंगा। इन साक्षात्कारों का संपादन अजय तिवारी ने आज के सवाल और मार्क्सवाद नाम से किया है। उसमें एक साक्षात्कार का शीर्षक है– सौन्दर्यशास्त्र नहीं बदलता, सौंदर्यबोध बदलता है। इसमें बातचीत अजय तिवारी ने ही की है। अजय तिवारी ने बहुत अच्छे सवाल रामविलास जी से पूछे हैं और उन्हें दलित चेतना पर खूब कुरेदा है। इसी संदर्भ में रामविलास जी कहते हैं कि सौन्दर्यशास्त्र नही बदलता, सौंदर्यबोध बदलता है। यह एक मार्क्सवादी चिंतक की सोच है, जिसका यह मूल सिद्धांत है कि सब कुछ परिवर्तनशील है, कुछ भी स्थिर नहीं है, वह कह रहा है कि सौंदर्यशास्त्र नहीं बदलता। ऐसे लोग समाज में क्या परिवर्तन लायेंगे, जो देखने की अपनी कसौटी नहीं बदल सकते? अजय तिवारी बहुत सही सवाल उठाते हैं कि निराला के लिये आपने नये सौंदर्यशास्त्र की आवश्यकता महसूस की, नागार्जुन के लिये की, क्या कबीर के लिये नये सौंदर्यशास्त्र की आवश्यकता नहीं हो सकती?” लेकिन रामविलास जी इस सवाल का कितना हास्यास्पद जवाब देते हैं, आप भी पढ़ें– और शायद यह बात कि कबीर अपने अनुभव से ही ऐसी बातें लिख सकते थे, तो शेक्सपीयर ने हत्यारों का चित्रण किया है, इसका मतलब यह होगा कि वे हत्यारों के बीच जाकर रहे थे या खुद हत्याएं की थीं। अब यह रामविलास जी का वैसा ही जवाब है, जैसा नामवर सिंह दलित साहित्य के विरोध में कहते हैं कि क्या घोड़े पर लिखने के लिये घोड़ा बनना होगा? दलित चिंतन को नकारने के लिये इनके पास ढंग के तर्क भी नहीं हैं, भौंडे कुतर्क ही इनके पास हैं। इसी जवाब में रामविलास जी आगे कहते हैं– जाति प्रथा को मिटाने का अस्त्र जाति प्रथा नहीं है, उसको मिटाने का अस्त्र वर्ग है। इसलिये वर्ग के आधार पर संगठित होना चाहिए, न कि जाति के आधार पर। हम भी चाहते हैं कि वर्ग के आधार पर संगठित हों गरीब लोग, पर होते क्यों नहीं? आप धर्म को मजबूत करते रहें, रामचरितमानस को आदर्श बताते रहें और दलित-बहुजनों से कहें कि वे वर्ग के आधार पर संगठित हों। रामविलास जी सिर्फ बेवकूफ बना सकते थे, और वह उन्होंने बनाया।

अजय तिवारी पूछते हैं– क्या जाति के आधार पर उत्पीड़न नहीं होता? रामविलास जी जवाब देते हैं– जाति के आधार पर जो उत्पीड़न होता है, वह गौण है।अजय तिवारी इसका प्रतिरोध कर सकते थे, पर नहीं किया, क्योंकि वे भी ब्राह्मण हैं। अगर साक्षात्कार लेने वाला कोई दलित-बहुजन होता, तो प्रतिरोध में कहता कि गाली ब्राह्मण के नाम की नहीं दी जाती, भंगी-चमार के नाम की दी जाती है। सामाजिक बेइज्जती ब्राह्मण की नहीं होती, दलित-बहुजनों की होती है। ब्राह्मण को बड़ी इज्जत के साथ किराये का मकान मिल जाता है, दलित-बहुजनों को नहीं मिलता। दलित को सामाजिक बेइज्जती अखरती है, गरीबी नहीं।

रामविलास जी किस कदर घोर दलित-विरोधी थे, इसका उदाहरण भी इसी साक्षात्कार में मिलता है। अजय तिवारी रामविलास जी से असहमत होते हुए बड़ा अच्छा सवाल उठाते हैं– दलितों को शिक्षा-संस्कृति से दूर रखा गया है। और आज भी बहुत दूर तक वह स्थिति है, क्योंकि वह ढांचा बना हुआ है और पूंजीवाद ने उन समस्याओं को हल नहीं किया … तो शिक्षा-संस्कृति से जुडे़ हुए लोगों की जो कला होती है, वह शिक्षा-संस्कृति से वंचित लोगों की कला तो नहीं हो सकती। यानी, कबीर और रैदास का मूल्यांकन जो शिक्षा-संस्कृति से दूर रखे गये हैं और तुलसीदास वगैरह का मूल्यांकन जो शिक्षा-संस्कृति का लाभ उठाते रहे हैं, दोनों का मूल्यांकन एक ही कसौटी पर कैसे होगा? तब तो निश्चित रूप से तुलसीदास बड़े कवि होंगे?” मुझे हैरत होती है, यह देखकर कि रामविलास जी ने इस महत्वपूर्ण सवाल का जवाब नहीं दिया। उन्होंने कहा– इन कवियों को छोड़ दो। कुछ देर के लिये राजनैतिक नेताओं पर दृष्टिपात करो। तो यह उनका जवाब था, जो जवाब था ही नहीं। सच यह है कि उनके पास जवाब था ही नहीं। सो उन्होंने उसे उपेक्षित कर दिया। उनका ब्राह्मणवाद कबीर-रैदास को कैसे स्वीकार कर सकता था? लेकिन उसके जवाब से असंतुष्ट अजय तिवारी फिर सवाल करते हैं– “तुलसीदास ने तो दलितों की या शूद्रों की बहुत निंदा की है। इतनी की है कि शुक्ल जी को भी ये बातें खटकी हैं। हालांकि अजय तिवारी ने रामविलास जी की मनोदशा का चित्रण नहीं किया है, पर मैं महसूस कर सकता हूं कि रामविलास जी इस सवाल पर तिलमिला गए होंगे। यदि वे इस सवाल का जवाब देते, तो फंस जाते। इसलिये उन्होंने इस सवाल का कोई जवाब नहीं दिया, घाघ राजनेताओं की तरह वे विषय से ही हट गए। वे अजय तिवारी के सवालों के जवाब में ही एक अन्य जगह कहते हैं कि कबीर उतने बड़े कवि नहीं हैं, जितने तुलसीदास हैं। वे कहते हैं, (यह) वेदांत का असर है कि एक ही भूमि पर कबीरदास, तुलसीदास, सूरदास खड़े दिखाई देते हैं। यह है उनका परंपरा-मूल्यांकन कि उन्होंने कबीर को भी वेदांती बना दिया। और वेदांत की दृष्टि से सचमुच तुलसी बड़े हैं, क्योंकि कबीर तो उस भूमि पर हैं ही नहीं।

एक और साक्षात्कार है– परंपरा अतीत का पुनर्जागरण नहीं, अतीत से प्रगति है। यह भी अजय तिवारी से रामविलास शर्मा की बातचीत है। इसमें अजय तिवारी अतीत-मोह से ग्रस्त रामविलास जी से बहुत सटीक प्रश्न पूछते हैं– लेकिन वेदांत और भक्ति की तरफ लौटना तो पीछे लौटना है। इस सवाल का जवाब रामविलास जी ने इतना बचकाना दिया है कि उनकी बुद्धि पर तरस आता है। वे जवाब देते हैं– इसके लिये हम लोग जिम्मेदार हैं। भारत का जनवादी आंदोलन जिम्मेदार है। यह जवाब नहीं है। जवाब यह होना चाहिए कि इसके लिये हमारी ब्राह्मणवादी मानसिकता जिम्मेदार है। पर, रामविलास जी यह जवाब नहीं दे सकते थे, क्योंकि वे वेद और ब्राह्मणवाद के खूंटे से बंधे हुए थे। काश वे मुक्त होते! यही कारण है कि वे ढेर सारी किताबें लिखने के बावजूद कोई कालजयी कृति हिन्दी संसार को नहीं दे सके, जबकि वेद और ब्राह्मणवाद से मुक्त राहुल सांकृत्यायन की दर्जन भर कालजयी कृतियां आज भी जनता का मार्ग प्रशस्त करती हैं।

(संपादन : नवल/अनिल)


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