धर्म राज्य की स्थापना के नाम पर ब्राह्मण राज्य की आहट

भागवत के शब्दों में भी इसकी आहट प्रतिध्वनित हो रही हैं कि जो संस्था और व्यक्ति धर्म और राष्ट्र के उत्थान में कार्यरत हैं, संघ उनका सहयोगी हैं। इसका संदेश बहुत साफ़ हैं कि या तो उनके द्वारा गढ़ी गई परिभाषाओं के धर्म व राष्ट्र के उत्थान में लगें, अन्यथा पतन के लिए तैयार रहें। बता रहे हैं भंवर मेघवंशी

देश में दक्षिणपंथी धारा के व्यक्तियों और समूहों के लोगों की ज़हर उगलती हुई ज़ुबानें निरंतर लंबी होती जा रही हैं। कहीं चिंतन बैठकें चल रही हैं तो कहीं धर्म संसदें, सब तरफ़ अराजकतापूर्ण भाषा में देश के संविधान, क़ानून और व्यवस्था की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। निर्वाचन की राजनीति में लगातार मिल रही सफलताओं से उत्साहित सांप्रदायिक तत्व पूरी तरह से निरंकुश हो चुके हैं। वे अब भारतीय राष्ट्र राज्य को चुनौती दे रहे हैं। संविधान को ललकार रहे हैं और देश को धार्मिक राष्ट्र राज्य बनाने को आतुर हो चले हैं।

ताज़ा उदाहरण बीते 16-17 अप्रैल को मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कथित बुद्धिजीवियों की संस्था प्रज्ञा प्रवाह द्वारा आयोजित दो दिवसीय चिंतन बैठक का है, जिसमें संघ प्रमुख मोहन भागवत, एकात्म मानववाद के अध्येयता महेश चंद्र शर्मा और संघ के पूर्व प्रवक्ता राम माधव सहित अनेक लोगों ने भाग लिया। इस तथाकथित चिंतन बैठक में व्यक्त अपने विचारों में वक्ताओं ने भारत के भविष्य पर मंडरा रहे ख़तरों का सीधा सीधा संकेत दे दिया हैं।

चिंतन बैठक में बोलते हुए मोहन भागवत ने कहा कि “संघ किसी का प्रतिस्पर्धी नहीं है, बल्कि धर्म और राष्ट्र के उत्थान हेतु कार्यरत व्यक्तियों तथा संस्थाओं का सहयोगी है।” बाहर से देखने में उनके वक्तव्य में ऐसा कुछ भी खोज पाना संभव नहीं हैं, जिसे ख़तरनाक कहा जा सके, लेकिन इस वक्तव्य के निहितार्थ बहुत गहरे हैं। मोहन भागवत के शब्दों में साफ़ चेतावनी है कि आरएसएस केवल उन्हीं का सहयोगी है जो उसकी परिभाषा के धर्म और राष्ट्र के उत्थान हेतु कार्यरत हैं। उनसे इतर विचार के राष्ट्र व धर्म के विचारों और व्यक्तियों के प्रति इसका भाव सहयोग का नहीं हैं, बल्कि मिटा देने का है। जैसा कि केंद्र सरकार में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की भूमिका निभा रहे अजित डोभाल ने हाल ही में कहा था कि अब लड़ाई भारत की सिविल सोसायटी से हैं। इस लड़ाई का आग़ाज़ गृह मंत्रालय काफ़ी पहले कर चुका है। भारत में मानव अधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता और अन्य उत्पीड़ित समुदायों के अधिकारों के लिए कार्यरत संस्थाओं पर लगाम कसी जा चुकी हैं। उनके एफसीआरए या तो रद्द कर दिए गए हैं अथवा नवीनीकरण के नाम पर अटका दिए गए हैं। इस तरह धीरे-धीरे भारत के सेकुलर नागरिक समाज को नष्ट किया जा रहा हैं।

भोपाल में दो दिवसीय कार्यक्रम के दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत व अन्य

भागवत के शब्दों में भी इसी की आहट प्रतिध्वनित हो रही हैं कि जो संस्था और व्यक्ति धर्म और राष्ट्र के उत्थान में कार्यरत हैं, संघ उनका सहयोगी हैं। इसका संदेश बहुत साफ़ हैं कि या तो उनके द्वारा गढ़ी गई परिभाषाओं के धर्म व राष्ट्र के उत्थान में लगें, अन्यथा पतन के लिए तैयार रहें। 

प्रज्ञा प्रवाह की चिंतन बैठक में एकात्म मानव दर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान के अध्यक्ष महेश चंद्र शर्मा ने जो बातें कहीं, वे तो और भी ख़तरनाक हैं। घुमावदार और मधुर शब्दों का घोल बनाकर जिस प्रकार की जलेबी तैयार की जा रही हैं, वह भ्रमित करने के लिए पर्याप्त हैं। शर्मा कहते हैं कि “हमारा राष्ट्रवाद भौगोलिक न हो कर भू सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है।” अब उनके इस कथन में ब्राह्मणवादी वर्चस्व और साम्राज्यवाद के सारे लक्षण मौजूद हैं। सब जानते हैं कि संघ का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद साफ़ तौर पर हिंदू राष्ट्रवाद हैं, जिसका साफ़ मतलब ब्राह्मण राष्ट्रवाद ही हैं, लेकिन इसे भौगोलिक राष्ट्र न कह कर भू सांस्कृतिक राष्ट्र कहने की बाज़ीगरी सिर्फ़ आरएसएस और उसके आनुषंगिक संगठन ही कर सकते हैं, जो वो कर रहे हैं। दरअसल इस नई शब्दावली के ज़रिए संघ ब्राह्मणी साम्राज्यवाद के बीज बो रहा है और अपनी सांस्कृतिक वर्चस्ववाद को प्रस्थापित करने में लगा हुआ है।

महेश शर्मा आगे कहते हैं कि “विश्व की राजनैतिक राष्ट्र रचना का मानवीकरण होना है तो इसका हिंदूकरण होना आवश्यक है।” किसी भी वैश्विक रचना का मानवीकरण होने की आवश्यक शर्त हिंदूकरण होना अपने आप में बहुत ही हास्यास्पद कहा जा सकता है। हक़ीक़त तो यह हैं कि विश्व भर के हिंदुओं का मानवीकरण होना बहुत आवश्यक हैं, क्योंकि वे सर्वश्रेष्ठ होने के दंभ और छुआछूत, भेदभाव तथा शोषण के अमानवीय दुश्चक्र में बुरी तरह से उलझे हुए हैं। इसलिए विश्व के मानवीकरण की संभावना हिंदुकरण में निहित नहीं हैं, बल्कि हिंदुओं का मानवीकरण ज़रूर वैश्विक विचार कर सकते हैं।

महेश शर्मा अपने वक्तव्य में ढके छिपे तरीक़े से संविधान में बदलाव की वकालत करने से भी नहीं चूकते, जब वे कहते हैं कि “संविधान का बहिष्कार नहीं, पुरस्कार भी नहीं, बल्कि परिष्कार होना चाहिये।” उभरती बहुजन चेतना के मद्देनज़र संघ संविधान का बहिष्कार करने की हिम्मत तो अभी भी नहीं जुटा पाया हैं, लेकिन “पुरस्कार भी नहीं” कहकर नकार तो रहा ही है, पर उसके मन में संविधान के परिष्कार की अदम्य इच्छा हैं, यह संविधान संशोधन और संविधान को बदल देने की क़वायद ही है।

एकात्म मानववाद के अध्येता महेश चंद्र शर्मा यहीं नहीं रुकते बल्कि भारत जैसे विशाल धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की वर्तमान व्यवस्था को अभारतीय मानते हैं, जैसा गोलवलकर भी मानते थे और अधिकांश संघी बुद्धिजीवी मानते हैं कि लोकतंत्र की अवधारणा पश्चिमी सोच पर केंद्रित हैं और उसमें भारतीयता के तत्व मौजूद नहीं हैं। इसलिए शर्मा कहते हैं कि “लोकतंत्र का भारतीयकरण करते हुये हमें धर्म राज्य स्थापित करने की दिशा में प्रयत्न करने चाहिये”।

लोकतंत्र के भारतीयकरण का सीधा मतलब हिंदुकरण हैं और धर्मनिरपेक्ष भारतीय राष्ट्र को बदलकर धर्म राज्य स्थापित कर देना है। देश के संवैधानिक चरित्र में बदलाव करके हिंदू राष्ट्र की आड़ में ब्राह्मण वर्चस्व वाले राष्ट्र की नींव रखने की तरफ़ आरएसएस तेज़ी से कदम बढ़ा रहा है। उसने दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को धर्म की ध्वजा पकड़ा दी है और मुसलमान को शत्रु राष्ट्र के रूप में चिन्हित कर लिया है, वह भारतीयकरण के नाम पर खुल्लमखुला हिंदुकरण पर उतारू हैं, जो ब्राह्मणवादी राष्ट्र होगा और जिसका संविधान मनुस्मृति जैसी दक़ियानूसी किताब होगी। यह ख़तरा बहुत साफ़ नज़र आने लगा है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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