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बस्तर में बच्चों के हाथ लगे ‘सरकारी बम’, उठ रहे सवाल

अपनी ट्वीट में बेला भाटिया ने लिखा कि दंतेवाड़ा नगर के बाहरी इलाके में अवस्थित चूडिटिकरा-मांझीपदर के आंगनबाड़ी के बच्चे खिलौना समझ कर ‘आग्नेयास्त्र’ ले आए। उन्होंने आगे लिखा कि स्थानीय निवासी पूरे दिन विस्फोटकों की आवाज सुनने की बात कर रहे हैं। इस घटना की जानकारी दे रहे हैं मनीष भट्ट मनु

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में एक बड़ी दुर्घटना होते-होते रह गयी। दरअसल हुआ यह कि दंतेवाड़ा की शहरी सीमा के पास कथित तौर पर बच्चों को जिंदा बम मिलने से वे इसे लेकर आंगनबाड़ी आ गए।

हालांकि पुलिस ने न केवल मिलने वाले बम के हानिकारक होने से इंकार किया वरन् इस बात का भी खंडन किया है कि इन्हें बच्चे अपने साथ लेकर आंगनबाड़ी आए थे।

इस पूरी घटना ने तूल तब पकड़ा जब मानवाधिकार कार्यकर्ता रहीं बेला भाटिया ने एक ट्वीट किया। अपनी ट्वीट में उन्होंने लिखा कि दंतेवाड़ा नगर के बाहरी इलाके में अवस्थित चूडिटिकरा-मांझीपदर के आंगनबाड़ी के बच्चे खिलौना समझ कर ‘आग्नेयास्त्र’ ले आए। उन्होंने आगे लिखा कि स्थानीय निवासी पूरे दिन विस्फोटकों की आवाज सुनने की बात कर रहे हैं। यदि यह सुरक्षा बलों का किसी प्रकार कोई अभ्यास है तो प्रशासन को इसे स्पष्ट करना चाहिए।

आंगनबाड़ी केंद्र में बम, जिन्हें बच्चे खिलौना समझकर उठा लाए थे

ट्वीट के बाद पुलिस प्रशासन हरकत में आया और उसने सबसे पहले यह स्पष्टीकरण जारी किया कि कथित आग्नेयास्त्र कोई हानिकारक हथियार न होकर पैरा बम है, जिसका इस्तेमाल सुरक्षाबल के जवान खोज अभियान के दौरान रोशनी के लिए करते हैं। इस संबंध में दंतेवाड़ा जिले के पुलिस अधीक्षक सिद्धार्थ तिवारी ने मीडिया कर्मियों को बताया कि बीते 29 अप्रैल, 2022 को पैरा बम की सूचना गांव वालों की तरफ से मिली थी। इसके बाद बम डिस्पोजल स्कावड के साथ पुलिस बल को स्थल के लिए रवाना किया गया। जांच के बाद पता चजा कि वहां कुल चार एक्सपायर्ड पैरा बम थे, जिन्हें जब्त कर नष्ट कर दिया गया है। यह बम गांव के नजदीक खेतों में कहां से आए, इस मामले की जांच की जा रही है। जांच के लिए एक टीम भी गठित की गई है। पूरी जांच होने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है। 

सिद्धार्थ तिवारी ने आगे कहा कि पैरा बम खतरनाक नहीं होते हैं। जबकि पुलिस के विपरीत आग्नेयास्त्र के जानकार दूसरी ही राय रखते हैं। उनके अनुसार यदि बच्चों के हाथ आए पैरा बम थे तो सबसे पहले इस बात की जांच होनी चाहिए की पैरा बम बस्तर जैसे इलाके – जहां पेड़ों और झाड़ियों की बहुलता है – कहां से आए? उनके अनुसार ऐसे रोशनी करने वाले बम उन इलाकों में ही कामयाब हो सकते हैं, जहां खुला मैदान हो। वे पुलिस के इस दावे को भी गलत बतलाते हैं कि पैरा बम खतरनाक नहीं होते। इनकी तुलना अनार बम से करते हुए वे कहते हैं कि भले ही इन बमों से विस्फोट नहीं होता हो मगर इनकी क्षमता इतनी तो होती ही है कि किसी बस्ती में आग लगा सके।

बहरहाल, सच्चाई चाहे जो भी हो पुलिस प्रशासन को यह स्पष्ट करना ही होगा कि आखिर चार पैरा बम जिला मुख्यालय के नजदीक लावारिस हालत में कैसे पहुंचे। यदि यह सुरक्षा बलों की लापरवाही का नतीजा है तो फिर नक्सल विरोधी पूरी कवायद पर ही प्रश्न चिन्ह लग जाता है कि जो बल अपने हथियारों को लेकर ही इतने लापरवाह हों, उन पर कोई भरोसा करे भी तो कैसे। और यदि इसे नक्सली साजिश करार दिया जाए तो भी कठघरे में सुरक्षा बल ही हैं कि जिला मुख्यालय के इतने करीब यदि वे चाहते तो बेहद आसानी से एक्सपायर्ड पैरा बम की जगह कुछ और भी रख सकते थे।

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

मनीष भट्ट मनु

घुमक्कड़ पत्रकार के रूप में भोपाल निवासी मनीष भट्ट मनु हिंदी दैनिक ‘देशबंधु’ से लंबे समय तक संबद्ध रहे हैं। आदिवासी विषयों पर इनके आलेख व रपटें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे हैं।

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