h n

‘आंबेडकर की नजर में गांधी और गांधीवाद’ पुस्तक के लोकार्पण कार्यक्रम में उठा दलितों के जमीन पर अधिकार का सवाल

गत 25 जून, 2022 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में फारवर्ड प्रेस द्वारा हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘आंबेडकर की नजर में गांधी और गांधीवाद’ का लोकार्पण किया गया। इस मौके पर दलितों के भूमि अधिकार के संबंध में एक विचार गोष्ठी का आयोजन भी हुआ। बता रहे हैं इमानुद्दीन

“मुझे इतिहास का विद्यार्थी होने का नाते यह जानकर दुख होता है कि उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमों में डॉ. आंबेडकर के साहित्य को शामिल नहीं किया गया। जबकि गांधी जी के बारे में हमारे यहां ज्यादा चर्चा होती है। यह एक बहुत बड़ा विरोधाभास है।” ये बातें गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर के इतिहास विभाग के प्रो. चंद्रभूषण अंकुर ने फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित ‘आंबेडकर की नजर में गांधी और गांधीवाद’ के लोकार्पण कार्यक्रम में कही। यह कर्यक्रम स्थानीय सामाजिक संगठन आंबेडकर जनमोर्चा के तत्वावधान में गत 25 जून, 2022 को गोरखपुर के गोकुल अतिथि भवन में आयोजित किया गया। इस अवसर पर ‘दलित समाज जमीन से वंचित क्यों?’ विषय पर विचार गोष्ठी का आयोजित की गई। 

इस मौके पर अपने संबोधन में प्रो. अंकुर ने कहा कि जब गांधी जी को बतलाया गया कि डॉ. आंबेडकर अछूत जाति से हैं तो उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि “मैं तो उनके विद्वता को देखकर ब्राह्मण समझ रहा था। यह बात मुझे पहले क्यों नहीं बतलाई गयी।” फिर उन्होंने जमीन के सवाल पर अपना वक्तव्य रखते हुए कहा कि भारत में जमीन का सवाल 1950 से उठाया जाना प्रारंभ हुआ। वामदलों ने इस मुद्दे को लेकर तीव्र आंदोलन भी चलाया था। कांग्रेस के विनोबा भावे ने भी भूदान यज्ञ नामक आंदोलन चलाया। नक्सलबाड़ी में तो यह प्रश्न और भी ज्यादा ज्वलंत हो गया था। अपने संबोधन में प्रो. अंकुर ने इस सवाल पर विस्तार से जानकारी दी कि आखिर क्या कारण है कि आगे चलकर यह मुद्दा धीरे-धीरे कमजोर पड़ता गया।

वहीं बतौर मुख्य वक्ता ‘आंबेडकर की नजर में गांधी और गांधीवाद’ के संपादकद्वय डॉ. सिद्धार्थ और प्रो. अलख निरंजन ने भी आयोजन में शिरकत किया। अपने संबोधन में डॉ. सिद्धार्थ ने कहा कि ब्राह्मणवाद की सबसे ज्यादा सशक्त एवं मजबूती से जिसने रक्षा की है तो वे गांधी हैं। इतिहास के संदर्भ में देखें तो शंकराचार्य, तुलसीदास के बाद गांधी का ही नाम आता है। जबकि डॉ. आंबेडकर ने कहा था कि मैं गांधी को कभी भी महात्मा मानने के लिए तैयार नहीं हूं। उन्होंने यह भी कहा कि यह पुस्तक गांधी की आलोचना नहीं, बल्कि ब्राह्मणवाद की आलोचना है। 

उन्होंने ‘दलित समाज जमीन से वंचित क्यों?’ विषय पर बोलते हुए कहा कि बाबासाहब जमीन के सवाल को सदैव महत्वपूर्ण मानते रहें। जब उन्हें लगा कि संविधान सभा में उन्हें जाने नहीं दिया जाएगा तो उन्होंने दलित समाज के लिए एक संविधान ‘राज्य और अल्पसंख्यक’ लिखा। उसमें उन्होंने खेती की जमीनों को सरकारी घोषित करने को कहा और खेती को उद्योग घोषित किया। चाहे वह सवर्ण हो या दलित सभी को खेतों में समान रूप से श्रम करने को कहा। काम के अनुसार उसे अधिकार मिलेंगे। अगर ऐसा संभव होता तो यह समाज कितना उन्नत होता कल्पना नहीं की जा सकती थी। उन्होंने कहा कि दुनिया के चीन, जापान जैसे कई देशों में जमीन का सवाल हल हो गया, वह समाज कितना तरक्की कर गया, यह आज हम सभी जानते हैं। भारत में 57.3 प्रतिशत दलितों के पास धूर भर भी खेती नहीं है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में जितनी जमीनें खाली है अगर उसे बांटा जाए तो सभी भूमिहीन परिवारों को 3 एकड़ जमीन आसानी से मिल जाएगी। 

पुस्तक का लोकार्पण करते अतिथिगण। (बाएं से) ऋषि कुमार (संचालक), सीमा गौतम, अलख निरंजन, चंद्रभूषण अंकुर, डॉ. सिद्धार्थ, महेश कुमार, श्रवण निराला और अधिवक्ता बृजेश्वर निषाद

इस मौके पर डॉ. अलख निरंजन ने कहा कि अगर ब्राह्मणवाद को समग्रता में समझ कायम करनी है तो ‘ ‘आंबेडकर की नजर में गांधी और गांधीवाद’ के पढ़े बगैर समझ कायम नहीं की जा सकती। इस पुस्तक में गांधी से जुड़े आंबेडकर के विचारों को संकलित कर एक पुस्तक का रूप दिया गया है। जमीन के सवाल पर अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि बाबासाहेब ने कहा था कि खेती उद्योग की तरह करो। आज सरकार के पास हमें देने के लिए पर्याप्त जमीनें हैं, हम यह नहीं कहते कि आप हमें मुफ्त में जमीनें दें, हमें उसी आधार पर जमीन चाहिए जैसे आपने राजे-रजवाड़ों से जमीन लेने के एवज में प्रिवी पर्स दिया था। आज के समय में सरकार लोगों को मकान बनाने के लिए जो पैसा दे रही है उससे ठीक से घर नहीं बना पाता है। अगर हम आज जमीन का सवाल नहीं उठाएंगे तो हमारे हाथ से आरक्षण भी छीनन लिया जाएगा। 

इस अवसर पर अंबेडकर जनमोर्चा के मुख्य संयोजक श्रवण निराला ने कहा कि आज भी दलित समाज के बहन-बेटियों को जमीन न होने के कारण उन्हें सवर्णों के यहां खेतों में मजदूरी करना पड़ता है। उनके साथ बलात्कार की घटनाएं भी होती हैं, लेकिन वे डर के मारे या जिंदगी की यह नियति मानकर वे सबकुछ झेलती रहती हैं। हमारा समाज का स्वाभिमान जमीन न होने के कारण गिरा रहता है। इसलिए इस समस्या का हल नितांत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि हमने 26 जनवरी को संविधान दिवस के अवसर पर जमीन के मुद्दे पर एक बड़ा आंदोलन करने का ऐलान किया है। इस बीच हम अपने लोगों को जागरूक करने का कार्य करेंगे। 

वहीं सामाजिक कार्यकर्ता सीमा गौतम ने श्रवण निराला की बातों को आगे बढ़ाते हुए कहा कि दलित समाज के पास जमीन न होने का सबसे ज्यादा जो दंश झेलती हैं वे दलित समाज की महिलाएं होती हैं। उन्हें मजबूरन ब्राह्मणवादियों के खेतों में काम करना पड़ता है, वे उन्हें हर तरह की यातनाएं देते हैं। एडवोकेट बृजेश्वर निषाद ने कहा कि जमीन के मुद्दे को हमें जनमानस में ले जाना होगा। अगर ये मुद्दा हल कर लिया गया तो हमारे ज्यादातर समस्याओं के हल हो जाएंगे। 

लखनऊ से आए सामाजिक चिंतक महेश कुमार ने फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित ‘आंबेडबर की नजर में गांधी और गांधीवाद’ पाठकों के लिए महत्वपूर्ण बताया। अंबेडकर जनमोर्चा के मुख्य संयोजक श्रवण निराला को जमीन के सवाल पर विचार गोष्ठी एवं उनकी कार्ययोजना के लिए प्रशंसा की।

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

मिस कैथरीन मेयो की बहुचर्चित कृति : मदर इंडिया

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

लेखक के बारे में

इमानुद्दीन

संबंधित आलेख

‘बाबा साहब की किताबों पर प्रतिबंध के खिलाफ लड़ने और जीतनेवाले महान योद्धा थे ललई सिंह यादव’
बाबा साहब की किताब ‘सम्मान के लिए धर्म परिवर्तन करें’ और ‘जाति का विनाश’ को जब तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने जब्त कर लिया तब...
जननायक को भारत रत्न का सम्मान देकर स्वयं सम्मानित हुई भारत सरकार
17 फरवरी, 1988 को ठाकुर जी का जब निधन हुआ तब उनके समान प्रतिष्ठा और समाज पर पकड़ रखनेवाला तथा सामाजिक न्याय की राजनीति...
जगदेव प्रसाद की नजर में केवल सांप्रदायिक हिंसा-घृणा तक सीमित नहीं रहा जनसंघ और आरएसएस
जगदेव प्रसाद हिंदू-मुसलमान के बायनरी में नहीं फंसते हैं। वह ऊंची जात बनाम शोषित वर्ग के बायनरी में एक वर्गीय राजनीति गढ़ने की पहल...
समाजिक न्याय के सांस्कृतिक पुरोधा भिखारी ठाकुर को अब भी नहीं मिल रहा समुचित सम्मान
प्रेमचंद के इस प्रसिद्ध वक्तव्य कि “संस्कृति राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है” को आधार बनाएं तो यह कहा जा सकता है कि...
गुरु घासीदास की सतनाम क्रांति के दो सौ साल बाद
गुरु घासीदास जातिवाद और अछूत प्रथा के जड़-मूल से उन्मूलन के पक्षधर थे। वे मूर्ति पूजा, मंदिर और भक्ति को भी ख़ारिज करते थे।...