महुआ डाबर : सामने आया साहसी पसमांदा मुसलमानों का एक गुमशुदा गांव

महुआ डाबर पहुंचे बुनकरों में कुछ ऐसे भी थे, जिनके पूर्वजों के हाथ अंग्रेजों ने काट डाले थे। उनके मन में अंग्रेजों के प्रति आक्रोश था। इसलिए 1857 में विद्रोह की चिंगारी जब महुआ डाबर पहुंची तो उनका खून भी उबलने लगा। बुनकरों ने छापामार दल का गठन किया, जिसमें पिरई खां और जाकिर अली जैसे बहादुर बुनकर शामिल थे। बता रहे हैं ओमप्रकाश कश्यप

आदमी कहीं चला जाए, कितना भी कमा ले, खुशियों की चाहे जितनी बरसात हो, यदि वह अपनी जड़ों से अनजान है तो चैन नहीं मिलता। कसक बनी ही रहती है। जड़ों की खोज का सिलसिला कभी-कभी ऐसी स्थिति में ला खड़ा करता है, जो उम्मीद से एकदम परे हो। कभी-कभी तो चमत्कार की तरह महुआ डाबर जैसा पूरा गांव धरती के गर्भ से बाहर निकल आता है।

इस महत्वपूर्ण मगर गुमशुदा कहानी की शुरुआत 1994 में 65 वर्षीय अब्दुल लतीफ अंसारी नामक व्यापारी से होती है। करीब डेढ़ सौ साल पहले उनके पूर्वजों को अपना जमा-जमाया धंधा छोड़कर पलायन करना पड़ा था। अहमदाबाद, पुणे जैसे नगरों-उपनगरों में भटकते हुए वे मुंबई पहुंचे थे। वहां उन्होंने अपना धंधा जमाया। धीरे-धीरे खाते-पीते व्यापारी बन गए। अब्दुल लतीफ को विरासत में जहां पूर्वजों का जमा-जमाया व्यापार मिला, धन-दौलत मिली – साथ में वे कहानियां भी मिलीं, जिन्हें उनके पूर्वज अकथ पीड़ा के साथ सुनाया करते थे। उन्हें सुनते-सुनते महुआ डाबर नाम का वह गांव कैसा था? कहां था? देश की आजादी के पहले संग्राम में उनके पुरखों की हिस्सेदारी की बात कितनी सच है? यह जानने की उनकी उत्कंठा लगातार बढ़ती गई। आखिरकार वे उस गांव की तलाश में जुट गए, जो सरकारी रिकार्ड और नक्शों से भी कभी का गायब हो चुका था–

“मैं अपने पूर्वजों के गांव को खोजने की जिद ठाने हुए था। मुझे पुरखों के इस दावे की हकीकत का पता लगाना था, जिसमें उनका कहना था कि 1857 के सैन्य विद्रोह के बाद, आरंभ हुए अंग्रेजी दमन के कारण उन्हें अपना गांव छोड़ना पड़ा था।”[1]

वे आगे कहते हैं, “मुझे अपनी शुरुआत शून्य से करनी थी। बस्ती जिले के नक्शे पर उस गांव का कहीं अता-पता न था।”[2] आखिरकार 8 फरवरी, 1994 को, पूर्वजों के ठिकाने को खोजने का जुनून उन्हें जिले के बहादुरपुर प्रखंड तक ले गया। आगे वे जिस स्थान पर पहुंचे, वहां गेहूं, मटर और अरहर की फसलें लहलहा रही थीं। महुआ डाबर के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं थी। खोज के दौरान गेहूं की लहलाती फसल के बीच दो जली हुई मस्जिदों के अवशेष दिखाई पड़े। फिर उन्होंने बहादुरपुर से दो किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित उस टीले को भी खोज निकाला, जो जले हुए घरों के मलबे के साथ, अतीत की किसी आबाद बस्ती की ओर संकेत करता था। मगर प्रशासन को खुदाई के लिए तैयार करने के लिए कुछ और सबूतों की आवश्यकता थी। वे बस्ती जिले के अधिकारियों से मिले। स्थानीय पुस्तकालयों की खाक छानी। थानों में जाकर मौजूद रिकार्ड को खंगाला। उन सुबूतों के साथ वे बस्ती के जिला अधिकारियों से मिले। उनके बार-बार आग्रह और साक्ष्यों को देखकर जिलाधिकारी एक समिति के गठन को तैयार हो गए। खोज का सिलसिला कमजोर न पड़े, इसके लिए अब्दुल लतीफ ने व्यापार को अपने बेटों के हवाले कर, बस्ती को दूसरा ठिकाना बना लिया। धीरे-धीरे बात आगे बढ़ी। साक्ष्य मिलने लगे।

पता चला कि 1865 तक बस्ती जिले का इलाका गोरखपुर जिले में आता था। इसलिए तत्संबंधी सभी दस्तावेज गोरखपुर जिले के कलेक्टर के कार्यालय से प्राप्त होंगे। खोज के दौरान उन्हें कलावरी थाने में एक उल्लेख मिला, जिसमें उस महुआ डाबर के उजाड़ने और दुबारा न बसने देने के निर्देश थे। अंग्रेज अफ़सर सार्जेन्ट बुशर का वह पत्र प्राप्त हुआ, जिसमें महुआ डाबर गांव का उल्लेख मनोरमा नदी (घाघरा नदी की उपशाखा) के किनारे बताया गया था। ईस्ट इंडिया कंपनी के एक दस्तावेज से पता चला कि फ्रांसिस बुकनेन ने 1800-1801 की यात्रा में महुआ डाबर का उल्लेख करते हुए बताया था कि वह छोटा-सा कस्बा था, जिसमें खपरैल की छत वाले लगभग 200 घर थे। उनमें से कुछ पक्के घर भी थे।[3] जिलाधिकारी द्वारा गठित समिति आखिरकार बस्ती जिले का 1813 का नक्शा खोजने में कामयाब हो गई, जिसमें महुआ डाबर को दर्शाया गया था। उसके बाद सब कुछ अनुकूल होता चला गया।

अपने गांव महुआ डाबर में मस्जिद के अवशेष के परिसर में अब्दुल लतीफ अंसारी

राज्य और केंद्र सरकार की मंजूरी आने के बाद 14 जून 2010 से खुदाई का काम आरंभ हुआ। देखते ही देखते एक जमींदोज गांव इतिहास के पन्नों पर उबरने लगा। अगले पंद्रह दिनों तक दर्जनों मजदूर और पुरातत्वविद खुदाई के काम में जुटे रहे। सफलता करीब आने लगी। कुआं, लाखौरी ईंटों से बनी दीवारें, छज्जे, नालियां, लकड़ी के जले टुकड़े, राख, मिट्टी के बर्तन, ईस्ट इंडिया कंपनी के 1835 के सिक्के, कुछ पुराने सिक्के, मिट्टी के खिलौने और हड्डियां प्राप्त हुई हैं, जो बताती हैं कि कुछ वर्ष पहले वहां एक भरा-पूरा संपन्न गांव रहा होगा।

क्या हुआ था वहां?

कहानी अठारहवीं शताब्दी के साथ शुरू होती है। भारत में पांव जमा लेने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी जमकर मुनाफा कमाना चाहती थी। वस्त्र उद्योग उस समय का सबसे लाभदायक उद्योग था। इसलिए उसका तेजी से मशीनीकरण किया गया था। इस काम में बाधक बने थे गांव-गांव बसे बुनकर, रंगरेज जैसे कारीगर। वे स्थानीय निवासियों से जरूरी कपास या सूत खरीदकर गांव के लोगों वस्त्र-संबंधी जरूरतों की पूर्ति करते थे। कंपनी ने कारीगरों का दमन करना आरंभ दिया। मुर्शिदाबाद, ढाका जैसे शहरों में बुनकरों के हाथ काट डाले गए। जिन कारीगरों की वस्त्र-कला की दुनिया-भर में पहचान थी, जिनके हाथों की बुनी मलमल दुनिया-भर में नाम कमाती थी – वे कारीगर आए दिन के अत्याचार और दमन के कारण पलायन को मजबूर हो गए। उनीसवीं शताब्दी की शुरुआत के आसपास, पलायन के लिए मजबूर बुनकरों के बीस सदस्यों का ऐसा ही एक कारवां, मुर्शिदाबाद और नादिया जैसे शहरों से चलकर भटकता हुआ अवध की धरती पर पहुंचा। वहां के जमींदार ने उन्हें महुआ डाबर में शरण दी। मेहनती और कारीगर लोग थे। उनका हुनर बोलता था। कुछ ही अरसे में उन्होंने दयनीयता को पीछे छोड़ दिया। उनकी कला के बल पर महुआ डाबर कस्बे के रूप में उभरने लगा। उनके बनाए वस्त्र न केवल बस्ती और गोरखपुर के बाजारों में, बल्कि नेपाल तक भी धड़ल्ले से बेचे जाते थे।

महुआ डाबर पहुंचे बुनकरों में कुछ ऐसे भी थे, जिनके पूर्वजों के हाथ अंग्रेजों ने काट डाले थे। उनके मन में अंग्रेजों के प्रति आक्रोश था। इसलिए 1857 में विद्रोह की चिंगारी जब महुआ डाबर पहुंची तो उनका खून भी उबलने लगा। बुनकरों ने छापामार दल का गठन किया, जिसमें पिरई खां और जाकिर अली जैसे बहादुर बुनकर शामिल थे।

सैन्य-विद्रोह की चिंगारी

सैन्य विद्रोह की शुरुआत 10 मई, 1857 को मेरठ से हुई थी। जल्दी ही दिल्ली से लेकर कानपुर, लखनऊ, झांसी आदि क्षेत्र उसके प्रभाव में आने लगे। उनकी देखा-देखी फैजाबाद में 22वीं नैटिव इन्फैंट्री ने 8 जून, 1857 को विद्रोह का बिगुल फूंक दिया। फैजाबाद पर कब्जा करने के बाद उन्होंने वहां मौजूद अंग्रेज सैन्य अधिकारियों को अपने अधिकार में ले लिया। किंतु एक रात कैद रखने के बाद उन्होंने अंग्रेजों को वहां से चले जाने को कहा। साथ ही, उन्होंने अंग्रेज सिपाहियों की यात्रा का इंतजाम करने के साथ-साथ उन्हें अपने हथियार भी साथ ले जाने की अनुमति दे दी।

अगले दिन यानी 9 जून, 1857 की सुबह 22 अंग्रेज सैन्य अधिकारी घाघरा नदी के रास्ते दीनापुर (वर्तमान में, दानापुर, पटना) छावनी जाने के लिए चार नावों पर सवार होकर निकल पड़े। जब वे बेगमगंज के करीब से गुजर रहे थे, तब उनका सामना आजमगढ़ की 17वीं नैटिव इन्फेंट्री के विद्रोही सैनिकों से हुआ। उस लड़ाई में जान बचाकर भाग रहे अंग्रेजों की दो नावें डुबा दी गईं। फैजाबाद के सुपरिटेंडेंट कमीश्नर कर्नल गोल्डने, सार्जेंट मेजर मैथ्यू और ब्राइट उस संघर्ष में मारे गए। जबकि मिल, करी और पारसन ने खुद को बचाने के लिए नदी में छलांग लगा दी और वे भी डूबकर मर गए।

सन् 1813 में बुकनैन द्वाारा सर्वेक्षण के आधार पर मार्टिन की किताब “हिस्ट्री” में संकलित नक्शा, जिसमें महुआ डाबर गांव शामिल दिखाया गया है

बाकी बचे अंग्रेज सैन्य अधिकारी बचते-बचाते 10 जून, 1857 को कप्तानगंज (बस्ती) पहुंचे। वहां के तहसीलदार ने उनका स्वागत किया। बताया कि बस्ती में विद्रोही सैनिकों ने डेरा डाला हुआ है। इसलिए उनका वहां जाना सुरक्षित नहीं है। उन्होंने सैनिकों को गोरखपुर जाने की सलाह दी। तहसीलदार ने रास्ता दिखाने के लिए एक जमादार के अलावा पांच खच्चर, सुरक्षा के लिए तीन बंदूकची और रास्ते के खर्च के लिए पचास रुपए भी दिए।

तहसीलदार के कहे अनुसार अंग्रेज अधिकारियों का कारवां आगे बढ़ गया। करीब 13 किलोमीटर की यात्रा के बाद वे महुआ डाबर पहुंचे। वहां साथ चल रहे बंदूकचियों में से एक ने कहा कि वे उस गांव में कुछ देर के लिए आराम कर सकते हैं। इतना कहकर वह सुरक्षित ठिकाने और खाने-पीने की चीजों का प्रबंध करने के लिए आगे बढ़ गया। उसके बाद की घटना का वर्णन प्रत्यक्षदर्शी सार्जेंट बुशर ने अपने बयान में किया था, उसके अनुसार–

“हम आगे बढ़ गए। कुछ भी संदेहास्पद नहीं था। हमें अपनी सुरक्षा का भरोसा हो चला था। जैसे ही हम गांव के पास पहुंचे, वह बंदूकची हमें फिर दिखाई दिया। वह दो अन्य व्यक्तियों से बात कर रहा था। उसके पास पहुंचते ही हम भय से कांप उठे। पूरा गांव हथियारों के साथ तैयार था। बिना कोई टिप्पणी किए हम तीन सिपाहियों के पीछे-पीछे चुपचाप आगे बढ़ते गए। गांव के पार होते ही हमें एक नाला दिखाई पड़ा। नाला बहुत गहरा नहीं था। हम उसमें पार जाने के लिए उतर पड़े। अचानक गांववालों ने बंदूक और तलवार से हमपर हमला बोल दिया। यह देख हमने जल्दी से जल्दी नाला पार करने की कोशिश की। लेफ्टिनेंट लिंडसे हमलावरों की पकड़ में आ गए। उन्होंने उन्हें वहीं टुकड़े-टुकड़े कर दिया।

जैसे ही हम नाले के दूसरे सिरे पर पहुंचे, गुस्साए गांववाले हम पर टूट पड़े। उन्होंने हमला करके हमारे दल के पांच सदस्यों को मौत के घाट उतार दिया। मैं और लेफ्टिनेंट कॉटली वहां से भागने में कामयाब हो गए। लेकिन भीड़ हमारे पीछे थी। लगभग 300 मीटर तक दौड़ने के बाद कॉटली की हिम्मत जवाब दे गई। वे जमीन पर गिर पड़े। हमलावरों ने उन्हें भी टुकड़े-टुकड़े कर दिया।”[4]

सार्जेंट बुशर किसी तरह खुद को बचाने में कामयाब हो गया। उसने एक गांव में शरण ली, जहां से उसे विलियम पेपे, डिप्टी मजिस्ट्रेट ने सुरक्षित बाहर निकाल लिया। अंग्रेजी दस्तावेजों में महुआ डाबर के क्रांतिकारियों के मुखिया के रूप में जाफ़िर अली का नाम दिया गया है, जबकि दैनिक जागरण सहित दूसरे अखबारों के में पिरई खान को महुआ डाबर की गुरिल्ला टुकड़ी का मुखिया बताया गया है। अखबार के अनुसार–

“10 जून, 1857 को अंग्रेजी सेना के लेफ्टिनेंट लिंडसे, लेफ्टिनेंट थामस, लेफ्टिनेंट इंग्लिश, लेफ्टिनेंट रिची, सार्जेन्ट एडवर्ड, लेफ्टिनेंट काकल व सार्जेंट बुशर फैजाबाद से बिहार के दानापुर (पटना) जा रहे थे। इधर पिरई खां के नेतृत्व में उनके गुरिल्ला क्रांतिकारी साथियों ने अंग्रेजी सेना के कुख्‍यात अफसरों की घेराबंदी करके तब तक मारा, जब तक उनकी मौत नहीं हो गई। अंग्रेजी सेना के छह अफसरों के मौत के बाद सार्जेंट बुशर घायल अवस्था में किसी तरह से अपनी जान बचाकर भाग निकला और अंग्रेजी हुकूमत के उच्च अधिकारियों को सारी घटना की जानकारी दी।”[5]

महुआ डाबर : नरसंहार का शिकार दूसरा जलियांवाला बाग

महुआ डाबर के निवासियों पर छह अंग्रेज सैन्य अधिकारियों की हत्या का आरोप था। ग्रामीणों के असंगठित होने के कारण अंग्रेजों ने शीघ्र ही उस घटनाक्रम पर काबू पर लिया। उसके बाद डिप्टी मजिस्ट्रेट विलियम पेपे के नेतृत्व में ग्रामीणों के दमन की शुरुआत हुई। महुआ डाबर को पूरी तरह से मिटा देने के आदेश उसे गोरखपुर के कार्यकारी कमिश्नर डब्ल्यू. विनयार्डे की ओर से प्राप्त हुए थे। 15 जून, 1857 को लिखे गए पत्र में पेपे को ‘मजिस्ट्रेट’ की शक्तियां और अधिकार देते हुए विनयार्ड ने लिखा था कि वह 12वीं अनियमित घुड़सवार सेना की एक टुकड़ी के साथ तुरंत बस्ती के उन क्षेत्रों में जाए, जहां विद्रोही सिर उठाए हुए हैं। बस्ती थाने से पुलिसबल, मुंशिफ तथा कुछ मजदूरों को लेकर महुआ डाबर के लिए प्रस्थान करे, जहां पांच अंग्रेजों की बेरहमी से हत्या की गई है। पत्र में गांव को “पूरी तरह जलाने और नष्ट कर देने के लिए आवश्यक बारूद ले जाने” का भी निर्देश था। आगे हर संभव मदद का भरोसा दिलाते हुए लिखा था कि महुआ डाबर पूरी तरह जला देने का भरोसा हो जाने के बाद ही उस गतिविधि को अंजाम दे। पत्र में पूरे गांव की संपत्ति, जिसमें जानवरों और फसल को कुर्क कर लेने की भी सूचना थी। विनयार्ड ने लिखा था कि उसे यह सुनकर खुशी होगी कि महुआ डाबर को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया गया है, और किसी भी मकान का एक भी पत्थर सही-सलामत नहीं बचा है।[6]

विलियम पेपे को जैसा आदेश मिला था, उसने वैसा ही किया। यह बात पेपे द्वारा 22 जून, 1859 को लॉर्ड केनिंग, गवर्नर जनरल और उच्च अधिकारियों को भेजे गए पत्र द्वारा प्रमाणित होती है। पत्र में उसने लिखा था– “3 जुलाई, 1857 को मैंने महुआ डाबर नाम के बड़े गांव को पूरी तरह नष्ट कर दिया है, जहां 22वीं देशी पैदल सेना के अधिकारियों की हत्या की गई थी।” यही नहीं, पत्र में पेपे ने 26 जून को इसी इलाके के ही सौंसीपुर (संसारपुर) गांव को भी आग लगा देने का उल्लेख किया था, जहां के किसान विद्रोही सैनिकों को मदद पहुंचा रहे थे।

उस समय महुआ डाबर की आबादी पांच हजार से ऊपर थी। वह भरा-पूरा संपन्न गांव था। आग लगाने से पहले वहां भीषण कत्लेआम मचाया गया था। लोगों की गिरफ्तारियां की गई थीं। विद्रोह में हिस्सा लेने वाले गुलजार खान, निहाल खान, घीसा खान, बदलू खान को 18 फरवरी 1858 को फांसी पर लटका दिया गया। ये सभी महुआ डाबर के निवासी थे। इनके अलावा भैंरोंपुर के गुलाम खान, बखीरा के बाबू को भी फांसी की सजा दी गई। जाफिर अली, जिसे महुआ डाबर विद्रोह का प्रमुख सूत्रधार बताया है, उपर्युक्त घटनाक्रम के बाद मक्का चला गया था। यात्रा से लौटते ही उसे भी गिरफ्तार कर लिया, जिसे बाद में फांसी दे दी गई।

गौरतलब है कि 1857 के विद्रोह में देशी सैनिकों का साथ देने वालों में अकेले महुआ डाबर के लोग शामिल नहीं थे, अपितु अमोधा की रानी ताहोरी कुमारी, नागर के राजा उदयप्रताप सिंह, अथ्दमा के राजा शिवगुलाम सिंह, तिल्जा के शेख वली मोहम्मद आदि अनेक सेनानी शामिल थे। शेख गुलाम मोहम्मद को उनके साथियों शेख सुल्तान, शेख तालिब, अब्दुल बहाव और बुझारत के साथ वलीबाग में इसलिए फांसी दे दी गई थी कि उन्होंने बस्ती के तहसीलदार को उस समय मार डाला जब वह स्वाधीनता सेनानियों की संपत्ति को कुर्क करने की धमकी दे रहा था।[7] समाचार के अनुसार अंग्रेजों ने तिल्जा गांव का भी वही हश्र किया था, जो महुआ डाबर का किया था।

अब्दुल लतीफ अंसारी को, जिन्हें महुआ डाबर के इतिहास के दबे सच को दुनिया के सामने लाने का श्रेय हासिल है। पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम द्वारा सम्मानित किया गया।

संदर्भ :

[1] ‘द टेलीग्राफ’, 8 दिसंबर, 2008

[2] वही

[3] ए गजेटियर ऑफ टेरीटरीज अंडर दि गवर्नमेंट ऑफ ईस्ट इंडिया कंपनी, खंड 3, एडवर्ड थॉरंटन, 1854, पृष्ठ 877

[4] मॉर्निंग क्रोनीकल, लंदन, 30 सितंबर, 1857

[5] दैनिक जागरण, आजादी की समरगाथा में अमर हो गई महुआ डाबर की शहादत, 13 अगस्त 2021

[6] विनयार्ड का विलियम पेपे को संबोधित पत्र दिनांक 15 जून, 1857

[7] याद करो कुर्बानी, हिंदुस्तान, दिनांक 26 जनवरी, 2018

(संपादन : नवल/अनिल)


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