अग्निपथ योजना : हुकूमत की राष्ट्रवादी भूलभुलैया?

सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि एक फौजी को जंग के लिए तैयार करने में चार से पांच साल लगते हैं। ‘अग्निपथ’ योजना में केवल छह महीने के प्रशिक्षण का ही प्रावधान है। इस तरह कम अनुभव वाला फौजी सेना के आधुनिकीकरण में कैसे मददगार होगा? सवाल उठा रहे हैं ओमप्रकाश कश्यप

शक्ति-केंद्रों पर सवार हो जाने के बाद स्वार्थी सत्ताएं लोगों के दिमाग पर कब्जा करने में लग जाती हैं। जनता को भरमाने के लिए वे स्थापित अवधारणाओं को ही बदल देती हैं। जैसे बुद्ध का अभिप्राय प्रबुद्ध व्यक्ति से है। किंतु जनमानस में बुद्ध और उनके धर्म की छवियों के विरुपण के लिए नया शब्द रचा गया– ‘बुद्धू’; यानी मूर्ख। ऐसा ही एक शब्द है– अराजकता, जिससे अराजकतावाद बना है। करीब ढाई हजार वर्ष पुराना दर्शन, जो ऐसे समाज की रूपरेखा बनाता है, जिसके नागरिक सामूहिक विवेक, सहयोग और सर्वकल्याण की भावना के अनुसार आचरण करते हों। मगर वर्चस्ववादियों ने, अराजकता का अर्थ कर दिया– तोड़-फोड़, अशांति, कानून के फेल हो जाने की स्थिति, कुल मिलाकर जंगलराज। 

भाषा को राजनीति का औजार बनाने की जितनी कोशिशें बीते 8 वर्षों में हुई हैं, वैसी पहले कभी नहीं हुईं। इसका अंदाजा ‘नमामि गंगे’, आयुष्मान भारत, उज्जवला योजना, अमृत योजना, मातृभूमि योजना (उत्तर प्रदेश सरकार) जैसे नामों से लगाया जा सकता है। ऊपर से भले ही ये साधारण नजर आएं, असल में ये सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर, वर्तमान शासकों के समाज को गोलबंद करने के षड्यंत्र का हिस्सा हैं। अफरातफरी में लागू की गई योजना ‘अग्निपथ’ तथा इसके ‘अग्निवीरों’ का नामकरण भी इसी कूटनीति का हिस्सा है। 

इस योजना के द्वारा फौज में ठेका-प्रथा लागू कर दी गई है। आगे से जो सैनिक भर्ती होंगे, सरकार उन्हें आवश्यक सैन्य प्रशिक्षण देगी। वे चार वर्षों तक सेवा देंगे। इस बीच उन्हें निश्चित मानदेय मिलेगा। उसमें न तो महंगाई भत्ता शामिल होगा और ना ही स्वास्थ्य बीमा। नौकरी खत्म होने पर वे न तो पेंशन के हकदार होंगे, न ग्रेचुटी और ना ही सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाली किसी अन्य सुविधा के। नौकरी के दौरान बीमार पड़ जाने पर सेना के अस्पताल में उनका इलाज हो सकेगा, यह भी तय नहीं है। चार साल बाद उनमें से तीन-चौथाई बाहर कर दिए जाएंगे। बाकी को सेना के स्थायी कैडर में रख लिया जाएगा। सरकार का कहना है कि बाहर किए गए लोग अपनी मर्जी का कोई भी रोजगार करने को स्वतंत्र होंगे। कुछ योजनाओं में उनके चयन को प्राथमिकता दी जाएगी। 

सेना के आधुनिकीकरण का तर्क महज छलावा

केंद्र सरकार का दावा है कि इससे सेना के आधुनिकीकरण में मदद मिलेगी। कैसे मदद मिलेगी, यह साफ नहीं है। सरकार द्वारा अभी तक प्रस्तुत इस योजना की रूप-रेखा से इसकी कोई संभावना नहीं बनती है। सेवाकाल में कटौती प्रशासनिक मसला है। सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि एक फौजी को जंग के लिए तैयार करने में चार से पांच साल लगते हैं। ‘अग्निपथ’ योजना में केवल छह महीने के प्रशिक्षण का ही प्रावधान है। इस तरह कम अनुभव वाला फौजी सेना के आधुनिकीकरण में कैसे मददगार होगा? 

रेंजीमेंट प्रणाली में खामियां हैं तो संसद में चर्चा कीजिए 

दरअसल, सेना की भर्ती एक गंभीर मसला है। आजादी से पहले का जिक्र न भी करें, तो भी बीते 75 वर्षों से भारत में रेजीमेंट सिस्टम चला आ रहा है। प्रत्येक रेजीमेंट की अलग वेषभूषा, अलग नारा और अलग युद्ध-शैली है। इस प्रणाली में निस्संदेह कुछ कमजोरियां हो सकती हैं। समय के अनुसार हर नीति की समीक्षा जरूरी होती है। सेना में भर्ती की प्रक्रिया भी अपवाद नहीं है। लेकिन इतने अरसे से चली आ रही व्यवस्था को बदलने के लिए उसके हर पहलू पर विचार करना जरूरी है। मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है, इसलिए सरकार को पार्टी हित, वर्गीय हित से ऊपर उठकर सोचना चाहिए। यदि सरकार ‘अग्निपथ’ को सचमुच कारगर और युगांतरकारी योजना मानती है; और उसे अपने ऊपर भरोसा है तो योजना को लागू करने से पहले, संसद में विधिवत चर्चा होनी चाहिए थी। आवश्यकता पड़ने पर विशेष सत्र भी बुलाया जा सकता था। सरकार का दोनों सदनों में बहुमत है। इसलिए उसे चिंता करने की भी जरूरत नहीं थी। फिर भी योजना को कैबिनेट फैसले के तहत पिछले दरवाजे से थोपा गया? अब वह विपक्ष की मांग पर मामले को संसदीय समिति के पास भेजने से भी कतरा रही है। सवाल उठता है कि आखिर क्यों?

इस बारे में पंजाब के गवर्नर रह चुके रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल बी.के.एन. छिब्बर की टिप्पणी किसी भी राजनीतिक बयान से ज्यादा प्रासंगिक है। दैनिक भास्कर, चंडीगढ़, में प्रकाशित इस टिप्पणी को ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए। छिब्बर साहब का मानना है– “किसी भी दूसरे देश या यूरोपियन देशों की तुलना करते हुए यहां के युवाओं के लिए ऐसी योजना बनाना ठीक नहीं है। कम्पलसरी मिल्ट्री सर्विस का हमारे मुल्क में कोई उदाहरण नहीं है। हमारे पास रेजीमेंटल सिस्टम है। इससे हर अफसर और जवान को मिल्ट्री करियर या सर्विस के दौरान और बाद में पूरी तरह से संतोष मिलता है। हमारा रेजीमेंटल सिस्टम यूनिक और पूरी तरह से संतोषजनक है। युद्ध या शांति के दौरान हमारी सेना का काम उदाहरण देने लायक है तो वह इस सिस्टम की वजह से ही है। इसे कायम रखने के लिए सेना में लंबी सर्विस जरूरी है।”1 

छिब्बर साहब आगे कहते हैं– “भारतीय सेना रोजाना आतंकवादियों के साथ बखूबी सामना कर रही है। दूसरे देशों की आर्मी के पास हमसे अच्छी मिसाइल, गन, हथियार और एयरक्राफ्ट हो सकते हैं। लेकिन ग्राउंड वार जीतना आसान नहीं है। हमारी सेना हर परिस्थिति में बेहरतीन रिजल्ट देने की क्षमता रखती है। हमें सेना की इस क्षमता के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए।”

क्या कहते हैं युवा?

यह तो थी वरिष्ठ सैन्य-नौकरशाह की बात, जिसका एक-एक शब्द ‘अग्निपथ’ पर सवाल उठाता है। अब हम उस गांव लोगों के विचार जानने की कोशिश करते हैं जिसके लोग पीढ़ियों से सेना में भर्ती होते आए हैं। जहां वुजुर्गों की देखा-देखी युवा पीढ़ी सालों-साल फौज में भर्ती के लिए तैयारी कर रही होती है। गांव का असली नाम है शहीदपुर, जो बिगड़कर सैदपुर हो चुका है। शहीदपुर नाम भी यूं ही नहीं पड़ा। दिल्ली से 85 किलोमीटर दूर, बुलंदशहर जिले का यह छोटा-सा गांव देश को दस हजार से ज्यादा सैनिक दे चुका है। फिर वर्ष 1971 की भारत-पाकिस्तान जंग हो या 1999 में कारगिल की लड़ाई, गांव ने हमेशा शहीदी की परंपरा निभाई है। अग्निपथ योजना को गांव वाले सरकार द्वारा जल्दबाजी में लिया गया फैसला बताते हैं। वर्ष 1971 की जंग में वीरता पुरस्कार जीतने वाले सूबेदार स्वरूप सिंह का कहना है कि नौकरी से चार साल बाद आने वाले 75 प्रतिशत लोग आखिर क्या करेंगे? क्या समाज में उन्हें अराजकता फैलाने के लिए छोड़ दिया जाएगा? इसी गांव के, बीते 5 वर्षों से सेना में भर्ती की तैयारी में जुटे विकास का कहना है कि अग्निवीर नहीं, हम तो ‘कर्मवीर’ बनना चाहते हैं। 

राजनाथ सिंह, रक्षा मंत्री, भारत सरकार

सेना का राजनीतिकरण लोकतंत्र के लिए खतरा

बीते शुक्रवार, 17 जून को तीनों सैन्य प्रमुखों ने ‘अग्निपथ’ के समर्थन में सार्वजनिक बयान दिया। रक्षामंत्री, गृहमंत्री और सरकार के प्रवक्ता सरकार के फैसले का समर्थन करें, इसमें बुराई नहीं है। व्यक्तिगत और प्रशासनिक स्तर पर तीनों सैन्य प्रमुख भी उसके समर्थक हो सकते हैं। किंतु ‘अग्निपथ’ के समर्थन में सार्वजनिक बयान देकर, जल्दी ही भर्ती शुरू करने की घोषणा करना, खासकर ऐसे समय जब योजना का विरोध किया जा रहा है – क्या स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा मानी जाएगी? क्या सरकार नागरिकों से ऊपर होती है! क्या जन-भावनाओं का ध्यान रखना उसकी जिम्मेदारी नहीं है! सेना का राजनीतिक इस्तेमाल लोकतंत्र के लिए बहुत ही भयावह है। यह दर्शाता है कि अपनी नाकामी छिपाने के लिए सरकार, सैन्य प्रमुखों को बीच में लाकर बेहद खतरनाक खेल खेल रही है।

चार वर्ष बाद रंगरूटों के भविष्य का सवाल

सरकार का कहना है कि चार साल की सेवानिवृत होनेवाले जवानों के हाथ में 11.65 लाख रुपये की जमा राशि रहेगी। उससे वे कोई व्यापार कर सकते हैं। अगर वे ऐसा कर पाएं तो अच्छी बात है। लेकिन सेना में जाते कौन हैं? वे जो साधारण परिवारों से आते हैं। उनमें भी 80 फीसदी गांव के लड़के, जो परिस्थितिवश ज्यादा पढ़ नहीं पाते। व्यापार करने की योग्यता उनमें से बहुत कम युवकों में होती है। यदि कोई कोशिश भी करे तो ग्रामीण परिवेश और संसाधनों के अभाव में सफलता की संभावना घट जाती है। ऊपर से जिम्मेदारियों का दबाव। छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई, शादी-विवाह और बूढ़े मां-बाप की देखभाल, इतने दबावों के बीच ‘सम्मान-निधि’ कितने समय तक टिक पाएगी, कहना मुश्किल है। कुछ सरकार समर्थकों का कहना है कि चार साल की ‘अग्निवीरी’, गार्ड की नौकरी करने से तो अच्छी रहेगी। उनकी समझ पर बलिहारी। लोग गार्ड या ऐसी ही मामूली नौकरी खुशी से नहीं करते। ना ही देश-भक्ति का आह्वान उन्हें विवश करता है। मजबूरी उनसे ऐसा कराती है। उन्हें उम्मीद होती है कि सरकार उनके लिए कुछ अच्छा करेगी। अब सरकार ऐसी योजना लाए, जिसमें चार वर्ष के बाद उन्हें दुबारा उसी जगह लौटना पड़े, तो उसकी कौन सराहना करेगा! ऐसे में आम आदमी पार्टी के संजय सिंह का यह कहना एकदम सही है कि यह योजना प्राइवेट कंपनियों के लिए गार्ड उपलब्ध कराने को लाई गई है। इस बयान में हैल्परों, चपरासियों, कूरियर बॉय वगैरह को भी जोड़ा जा सकता है। बीते आठ वर्षों के दौरान सरकार के हर फैसले ने सिद्ध किया है कि उसे इस देश के पूंजीपतियों और बड़े लोगों की चिंता कहीं ज्यादा है। इस अवधि में बड़े पूंजीपतियों की सकल संपत्ति में 400-500 प्रतिशत की वृद्धि, दूसरी ओर छोटे उद्यमियों की बरबादी, सुरसामुखी महंगाई और बढ़ती बेरोजगारी आदि इसकी पुष्टि करती है। बीते दिनों यह भी सुनने में आया कि सरकार आगामी जुलाई से नए श्रम कानून लागू करना चाहती है। यदि यह सच है तो संभव है कि अग्निपथ योजना की तरह नए श्रम कानून भी चुपके से थोप दिए जाएं। यह बहुत डरावनी संभावना है।

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योजना का आर्थिक पक्ष 

सरकार ने हालांकि योजना के आर्थिक पक्ष को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की है। कदाचित जरूरत भी नहीं थी। परंतु यही ऐसा मामला है, जिसके बारे में सरकार ने निश्चित रूप से सोचा होगा। इस समय 14 लाख सैनिक और करीब 25 लाख पेंशनर हैं। उनके वेतन, पेंशन आदि के रूप में सरकार के हर साल लगभग 2.84 लाख करोड़ रुपये खर्च होते हैं। सरकार इसी खर्च को कम करना चाहती है। इसके लिए न तो उसे सेना पर पड़ने वाले बुरे असर की चिंता है और ना ही उन युवाओं के भविष्य की, जिन्हें चार वर्ष नौकरी करने के बाद फिर बेरोजगारों की कतार में खड़ा होना पड़ सकता है। न ही उसने सरकारी खर्च करने के लिए सांसदों, विधायकों की मोटी पेंशन और भत्तों को कम करने के विकल्प पर विचार किया है। निशाना बनाया भी है तो बेरोजगारी के शिकार उन युवाओं को, जो रोजगार के लिए सेना में भर्ती की उम्मीद लगाए होते हैं।

क्या यह संघ की दूरगामी योजना का हिस्सा है? 

थोड़ा इतिहास में झांककर देखते हैं। 1925 का जर्मनी। हिटलर नाजी प्रोपगेंडा में लगा हुआ था। वह बार-बार वारसा-संधि की याद दिलाता। उसके भाषण प्रथम विश्वयुद्ध से आहत जर्मन नागरिकों को उद्वेलित कर रहे थे। उन्हीं दिनों उसके स्वयं-सेवकों ने मिलकर ‘सॉल शुल्ज’ (एसएस) नामक एक संगठन बनाया था। आरंभ में उसका इरादा नाजी पार्टी की बैठकों के दौरान सुरक्षा प्रदान करना था। उसी वर्ष हेनरिख हिमलर, उसमें शामिल हो गया। हिटलर की नस्लवादी नीति के समर्थक हिमलर ने जर्मनी की जनता का आह्वान करते हुए कहा था– “उन सभी जर्मनों को जो गोला-बारूद का इस्तेमाल करना चाहते हैं, एसएस में शामिल हो जाना चाहिए। साधारण नागरिकों को इसकी जरूरत नहीं है, इसलिए कि उनकी बंदूकें राष्ट्र की सेवा के लिए नहीं दनदनातीं।” 

हिमलर के नेतृत्व में सॉल शुल्ज विरोधियों पर नजर रखने, पार्टी की आंतरिक सुरक्षा से लेकर आतंक फैलाने वाली संस्था में ढल गया। उसके दो विभाग थे। पहला ‘ऑल्जेमेइन एसएस’ (साधारण एसएस) और दूसरा, वॉफेन एसएस (हथियारबंद एसएस)। वॉफेन के सदस्यों को जर्मन सेना में प्रशिक्षण दिया गया था। ऑल्जेमेइन एसएस का मुख्य ध्येय हिटलर की नस्लवादी नीति को लागू करना था, जबकि वॉफेन एसएस नाजी पार्टी की दमनात्मक कार्यवाहियों का संचालन करती थी। दूसरे विश्वयुद्ध (1939-45) के दौरान सॉल शुल्ज की शाखाओं ने करीब 2 करोड़ निर्दोष लोगों को, जिनमें 60 लाख यहूदी थे, मौत के घाट उतार दिया था। 

कुछ वर्षों के दौरान भारत में हेनरिख हिमलर की मानसिकता वाले नेताओं की संख्या तेजी से बढ़ी है। कल्पना कीजिए कि संघ की मानसिकता वाले यदि पांच प्रतिशत युवक भी हर साल ‘अग्निवीर’ के रूप में प्रशिक्षण प्राप्त वापस उसी में लौट आते हैं, तो जो लोग संघ को जानते हैं, जिन्हें उसकी सांप्रदायिक सोच का अंदाजा है, जिन्हें सरकार और आरएसएस के अंदरूनी संबंधों की जानकारी है; और बीते आठ वर्षों का घटनाक्रम जिनकी स्मृति में है – वे अग्निपथ योजना के छिपे खतरे को आसानी से समझ सकते हैं। 

जरूरत निकट भविष्य के घटनाक्रम पर नजर रखने, उसके मूल में निहित सरकार की भावनाओं को समझने और सजग रहने की है। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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