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आदिवासियों के असूचीकरण की साजिश

प्रो. वर्जिनियस खाखा के मुताबिक, असूचीकरण एक ऐसा तरीका है जिससे अनुसूचित जनजातीय क्षेत्र को आबादी के आधार पर घटाया जा सकेगा। इसका अर्थ यह हुआ कि पंचायत (एक्सटेंशन टू शेड्यूल्ड एरिया) एक्ट 1996 (पेसा) और वन अधिकार क़ानून, 2006 ऐसे क्षेत्रों में अपने आप ही निरस्त हो जाएगा। बता रहे हैं गोल्डी एम. जार्ज

गत 5 जून, 2022 को छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिला मुख्यालय के सामने जनजाति सुरक्षा मंच के बैनर तले एक प्रदर्शन किया गया। यह प्रदर्शन ईसाई आदिवासियों के असूचीकरण (डी-लिस्टिंग) के समर्थन में आयोजित था। इस आयोजन में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता पूर्व सांसद नंदकुमार साय, पूर्व राज्यसभा सांसद रामविचार नेताम, प्रदेश के पूर्व कैबिनेट मंत्री गणेश राम भगत सहित कई आदिवासी नेता सम्मिलित हुए। इस सम्मेलन के बाद पूरे प्रदेश के आदिवासियों के बीच धर्मांतरण, घर-वापसी और असूचीकरण के मामले को लेकर तनाव की स्थिति पैदा हुई है।

बताते चलें कि हिंदूवादी संगठन धर्मांतरित आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी अलग करने की मांग कर रहा है। और ऐसा पिछले दो-तीन महीनों से मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, झारखंड, आदि  आदिवासी बहुल प्रदेश या इलाकों में किया जा रहा है। इसके लिए  जनजातीय सुरक्षा मंच का गठन किया गया है। 

बलरामपुर की रैली महज एक अकेला आयोजन नहीं था। विगत कुछ महीनों में ऐसे ही आयोजन देश के कई आदिवासी प्रदेशों में हुए, जिसमें भी यही नारा लग रहा था। इसमें प्रमुखतः मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान, झारखंड,आदि प्रदेशों में देखा गया है। वैसे ओडिशा में आदिवासी ईसाईयों पर हमला लगभग ढाई दशक से चलते आ रहा हैं।

जाहिर तौर पर इस अभियान के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का हाथ है।  हालांकि वह इसका श्रेय कांग्रेस के पूर्व सांसद व मंत्री रहे कार्तिक उरांव को देता है। आरएसएस के झारखंड प्रदेश के सह प्रांत प्रचार प्रमुख संजय कुमार आजाद की मानें तो उरांव हमेशा हिंदुत्व के पक्षधर रहे और धर्मांतरित आदिवासियों को आरक्षण देने का विरोध करते रहे। कार्तिक उरांव तीन बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए थे। जीवन के अंतिम समय में वे नागरिक उड्डयन एवं संचार मंत्री थे। आजाद आगे कहते हैं कि आदिवासी हिंदू हैं और हिंदू संस्कृति के वे अभिन्न हिस्सा हैं। इस तरह से कई आदिवासी महापुरुषों के नाम पर संघ परिवार इस अभियान को हवा दे रही है। 

आरएसएस के राजनीतिक इकाई भाजपा के अलावा उसके अन्य सारे संगठन भी इस पूरे अभियान में लगे हैं। संघ परिवार पहले से कहता रहा है कि भारत में रहने वाले सभी हिंदू हैं, या फिर वे लोग जो हिंदू नहीं हैं हिंदू संस्कृति को पूर्णतः आत्मसात कर लें। गोलवलकर अपनी किताब “मी, ऑर ऑवर नेशनलहुड डिफाइंड” में कहते हैं कि “जो भी खुद को हिंदू नहीं कहता या खुद को हिंदू संस्कृति का हिस्स नहीं मानता, उन्हें भारत में रहने का कोई हक़ नहीं है।” हिंदू राष्ट्रवाद का यही आधार है और इसी आधार पर ही आज आदिवासियों को भी गैर-आदिवासी घोषित करने का मुहिम चलाई जा रही है। 

क्या होगा असूचीकरण का परिणाम?

संघ परिवार के द्वारा यह प्रचारित किया जाता है कि जो आदिवासी ईसाई बने हैं, उन्हें बरगला-फुसलाकर, पैसा और लालच देकर ईसाई बनाया गया है। इस प्रकार वे लोग दुगना लाभ पाते हैं। पहला ईसाई होने का और दूसरा अनुसूचित जनजाति के तहत आरक्षण का। जबकि 2014 में भारत सरकार द्वारा स्थापित वर्जीनियस खाखा कमेटी की रपट के अनुसार आदिवासियों की स्थिति जस का तस है। हालांकि आदिवासी इलाकों में ईसाई संस्थानों के कारण कुछ लोगों की शिक्षा और स्वास्थ्य की व्यवस्था में गुणात्मक और संख्यात्मक परिवर्तन जरूर हुआ है, पर सांस्कृतिक परिवर्तन उनके बीच नहीं हुआ है।

असूचीकरण (डी-लिस्टिंग) के विरोध में रैली की तस्वीर

प्रो. वर्जिनियस खाखा के मुताबिक, असूचीकरण एक ऐसा तरीका है जिससे अनुसूचित जनजातीय क्षेत्र को आबादी के आधार पर घटाया जा सकेगा। इसका अर्थ यह हुआ कि पंचायत (एक्सटेंशन टू शेड्यूल्ड एरिया) एक्ट 1996 (पेसा) और वन अधिकार क़ानून, 2006 ऐसे क्षेत्रों में अपने आप ही निरस्त हो जाएगा। यदि इस आधार पर बांटने की प्रक्रिया जारी रही तो आने वाले दिनों में केवल झारखंड के ही आधे से अधिक हिस्से को अनुसूचित क्षेत्र से असूचीकरण के आधार पर सामान्य क्षेत्र के रूप में घोषित किया जायेगा। यदि भारत के पांचवी अनुसूची के अंतर्गत आनेवाले क्षेत्र में ऐसा हुआ तो फिर उत्तर-पूर्व के छठी अनुसूची वाले राज्यों में भी इनका यही रवैया होगा। यह सारा कारनामा सरकार के इशारों पर जनजाति सुरक्षा मंच द्वारा किया जा रहा है जो आदिवासियों के बीच भ्रम फैला रहा है।

संघ परिवार का यह षड्यंत्र लंबे समय से जारी है कि किस तरह से आदिवासी क्षेत्र को घटाया जाये ताकि वहां से भी सामान्य वर्ग के लोग चुनाव लड़ें और जीत कर आएं। असूचीकरण की मांग इस षडयंत्र का हिस्सा है।

विरोध में आदिवासी संगठन

असूचीकरण के खिलाफ छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में ईसाई आदिवासी महासभा ने भी  जून 11, 2022 को एक महारैली की। संगठन के पदाधिकारियों के अनुसार जनजाति सुरक्षा मंच के द्वारा की जा रही सार्वजनिक प्रदर्शन और मांग अनुचित है। इस रैली में धर्मान्तरित आदिवासियों को जनजाति सूची से बाहर करना संविधान विरोधी करार दिया गया। 

वहीं इस मामले में जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) के संस्थापक और मध्य प्रदेश के विधायक हीरालाल अलावा कहते हैं कि “असूचीकरण का पूरा मुद्दा फ़र्ज़ी है। इसके ज़रिए आरएसएस आदिवासियों के आरक्षण को समाप्त करने की साज़िश कर रही है। अगर वाकई में आरएसएस के लोग ऐसा चाहते हैं तो उन्हें यह पूर्वोत्तर भारत में शुरू करना चाहिए, जहां 90 प्रतिशत से अधिक आदिवासी अपना धर्म ईसाई धर्म को मानते हैं।”

वे कहते हैं कि “यह भी सच है कि आदिवासियों की अपना संस्कृति और धर्म है, पर 1961 के बाद के हर जनगणना में उन्हें स्वाभाविक रीति से हिंदू मानकर चलने लगे। जिन जिन समुदायों का बाहरी हिंदू समुदायों से संपर्क बनने लगा, वे धीरे धीरे हिंदू रीति-रिवाजों को मानने लगे हैं। सवाल है कि क्या ऐसे हिंदू रीति-रिवाज मानने वाले आदिवासी समुदायों या परिवारों को भी आरक्षण के लाभ से वंचित किया जाएगा? यह आरएसएस-बीजेपी का एक राजनीतिक पैंतरा के सिवाय और कुछ नहीं है।”

दूसरी ओर भारतीय ट्राइबल पार्टी के एक नेता वेलाराम घोघरा ने आरएसएस के जनजाति सुरक्षा मंच की ओर से असूचीकरण की मांग का पुरजोर विरोध करने के साथ-साथ जनगणना प्रपत्र में आदिवासियों के लिए पृथक धर्मकोड को बहाल करने की मांग उठाई है।

क्या कहता है संविधान?

भारतीय संविधान में आरक्षण का आधार धर्म नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक आधार पर पिछड़ेपन। संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति में नोटिफाइड किया गया है। नोटिफिकेशन में स्पष्ट कहा गया है कि आदिवासी किसी भी धर्म से संबंधित नहीं है। यानी आदिवासी न ईसाई, न मुस्लिम, न हिन्दू और न सिख। इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय व अलग-अलग राज्यों के उच्च न्यायालय भी कई आदेश दे चुके हैं। इन आदेशों के अनुसार आदिवासी लोग सभी धर्मों का सम्मान भी करते हैं, और वे अपने इच्छा के अनुरूप किसी भी धर्म को मान सकते हैं। लेकिन आदिवासी समुदाय और उनकी संस्कृति प्रकृति और पूर्वजों की उपासना से अभिन्न रूप से जुड़ीं हैं।

सामान्य तौर पर गैर-अनुसूचित क्षेत्रों में मान्य कई क़ानून अनुसूचित क्षेत्र में मान्य नहीं है। संविधान के आधार पर जयस जैसे संगठन का मानना है कि कुछ धार्मिक संगठन लगातार आदिवासियों में भय फैला रहे हैं। संगठन के पदाधिकारियों के अनुसार आदिवासियों में धर्मांतरण को मुद्दा बना कर समाज में विभाजन पैदा किया जा रहा है। 

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में अधिवक्ता आशीष बेक के अनुसार, आदिवासियों के बीच यह सवाल कभी नहीं उठता है, जब उनकी पहचान हिंदू धर्म से संबंधित होती है। कहने के लिए तो उनकी पहचान आदिवासी की है, पर वास्तव में हिंदू की ही है, क्योंकि हर किसी के जाति प्रमाण पत्र में हिंदू ही लिखा जाता है। यही वजह है कि जैसे ही हिंदू के अलावा और किसी धर्म के होने की बात कही जाती है, तब हिंदू राष्ट्र के प्रचारकों में खलबली मचने लगती है।

भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) के राजस्थान प्रदेश के प्रवक्ता देवेन्द्र कटारा बताते हैं कि अगर असूचीकरण किया जाता है तो संविधान के अनुच्छेद 244 का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। इससे आदिवासियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था खत्म हो जाएगी। इतना ही नहीं, आदिवासियों के लिए आरक्षित लोकसभा व विधानसभा सीट खत्म होने के साथ कई प्रकार के नुकसान होंगे।

ईसाई आदिवासी महासभा के अध्यक्ष मुन्ना टोप्पो के मुताबिक संविधान के अनुच्छेद 342 और 342 (1) के आधार पर हर राज्य ने अपनी सूची निर्धारित की है। इस आधार पर 1950 में जारी अनुसूचित जनजाति अध्यादेश (सूची) मूलतः 1931 में तैयार की गयी आदिम जनजातियां (प्रिमिटिव ट्राइब्स) तथा भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत की गई पिछड़ी जनजातियां (बैकवर्ड ट्राइब्स) की सूची पर आधारित है। इसे तैयार करते समय भौगोलिक अलगाव, विशिष्ट जीवन शैली, आदिम अर्थ प्रणाली, रूढ़ी व परंपरायें, विलक्षण रीति-रिवाज, प्रथागत कानून, जनजातीय भाषा का प्रयोग, युवा गृह आदि लक्षणों को ध्यान में रखा गया था। क्या इसे इतनी आसानी से बदला जा सकता है?

इस संदर्भ में पीयूसीएल, छत्तीसगढ़ के प्रदेश अध्यक्ष डिग्री प्रसाद चौहान एक और महत्वपूर्ण पहलु की ओर इशारा करते हैं। उनका कहना है कि धार्मिक अल्पसंख्यकों को देश के संविधान में समानता के अधिकार के तहत सुरक्षा प्राप्त है। अनुच्छेद-14 एवं अनुच्छेद-16 उन्हें देश के कानूनों के तहत समान सुरक्षा की गारंटी देता है तथा धार्मिक आधारों पर उनके साथ किसी तरह के भेदभाव का निषेध करता है। लेकिन देश के कई राज्यों में धार्मिक स्वतंत्रता कानून उसके नाम के विपरीत व्यक्ति को एक धर्म से दूसरे धर्म में दीक्षित करने पर रोक लगाने हेतु लागू किये गए हैं। यह कानून जितने सरल और हानिरहित लगते हैं, वास्तविकता में उतने हैं नहीं। जहां इस कानून की आड़ में अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित और अपमानित करने की अद्भुत संभावनाएं हैं। वहीं दूसरी ओर, घर वापसी अथवा मूल धर्म में वापसी जैसे धर्म उन्मादी व कट्टरपंथी कृत्यों को इन कानूनों के दायरे से बाहर रखा गया है।

क्या है धर्मांतरण के बहस का असली कारण?

असूचीकरण का मामला धर्मांतरण के सवाल से उत्पन्न हुआ है। हाल ही में बस्तर संभाग के विगत 3 सालों में हुए कुछ 300 से अधिक धर्मांतरण संबंधित घटनाओं का अध्यायन किया गया। इसमें से कुछ 40 मामलों में विस्तृत केस स्टडी भी किया गया। संघ परिवार के विभिन्न संगठनों के द्वारा हमेशा यह आरोप लगाया जाता है कि धर्मान्तरण तरह-तरह के दबाव, प्रलोभन, लालच, जोर-जबरदस्ती, पैसा देकर, धमकाकर किया जाता है। 

जबकि सच इसके विपरीत है। इस संदर्भ में एक और घटना ध्यान देने योग्य हैविगत 1 अक्टूबर, 2021 को प्रदेश के सरगुजा जिले में सर्व सनातन हिंदू रक्षा मंच ने धर्मान्तरण के खिलाफ एक विशाल विरोध रैली का आयोजन किया था। यह आदिवासी हिंदुओं के ईसाई धर्म के प्रति बढती आस्था के खिलाफ था। इसमें मुख्य वक्ता स्वामी परमानंद थे। रैली में आये हुए लोगों को संबोधित करते हुए वह कहते हैं, “मैं ईसाइयों और मुसलमानों के लिए अच्छी भाषा बोल सकता हूं, पर इनको यही भाषा समझ आती है। धर्म की रक्षा भगवान का काम है और यही हमारा काम भी है। हम किसके लिए कुल्हाड़ी रखते हैं? जो धर्मान्तरण करने आता है, उसकी मुंडी काटो। अब तुम कहोगे कि मैं संत होते हुए भी नफरत फैला रहा हूं। लेकिन कभी-कभी आग भी लगानी पड़ती है। मैं तुम्हें बता रहा हूं; जो कोई भी आपके घर, गली, मोहल्ले, गांव में आता है, उन्हें माफ नहीं करना।”

वह आगे ईसाईयों को सही रास्ते पर लाने का ‘रोको, टोको और ठोको’ का फॉर्मूला भी देते हैं। परमानंद महाराज ऊंचे स्वर में बोलते हैं, “पहले उन्हें (ईसाइयों को) मित्र की तरह समझाओ। उन्हें ‘रोको’ और अगर नहीं माने तो ‘ठोको’। मैं उनसे पूछता हूं जो इस धर्म (ईसाई) में चले गए, समुद्र छोड़कर कुएं में क्यों चले गए? इन्हें ‘रोको’, फिर टोको (विरोध) और ठोको।’

बहरहाल, संवैधानिक रूप से भारतीय राजनीति और धर्म के बीच के संबंध को धर्मनिरपेक्षता द्वारा परिभाषित किया गया है। हालांकि, भारत की धर्मनिरपेक्ष पहचान अपनी बहसों से रहित नहीं है, जिनमें से कम से कम भारतीय सामाजिक ताने-बाने में जाति व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियां सबसे ऊपर हैं। आदिवासी संदर्भ से अनगिनत बुनियादी सवाल उठते हैंं, पर इसपर कोई बहस नहीं है। लेकिन भारत को अनिवार्य रूप से हिंदू राष्ट्र घोषित कर पूरे समाज को नई रीति के जातिगत गुलामी की ओर धकेलना की तैयारी स्पष्टता से दिख जरूर रही है

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

गोल्डी एम जार्ज

गोल्डी एम. जॉर्ज फॉरवर्ड प्रेस के सलाहकार संपादक है. वे टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज से पीएचडी हैं और लम्बे समय से अंग्रेजी और हिंदी में समाचारपत्रों और वेबसाइटों में लेखन करते रहे हैं. लगभग तीन दशकों से वे ज़मीनी दलित और आदिवासी आंदोलनों से जुड़े रहे हैं

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