सामाजिक न्याय की राजनीति के दिखावे

संसद में उच्च जातियों का वर्चस्व 1977 के चुनावों के बाद से ही घटने लगा था। वर्तमान में भी एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों के सांसदों की कुल संख्या उच्च जाति के सांसदों की संख्या से अधिक है। फिर आखिर क्या कारण है जो सरकार आरक्षण, श्रम और सामाजिक न्याय के अन्य मुद्दों पर मनमानी करने में आसानी से कामयाब हो जाती हैं? बता रहे हैं ओमप्रकाश कश्यप

बीते दिनों कांग्रेस के उदयपुर शिविर के दौरान पहले खबर चली थी कि पार्टी दलितों और पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के लिए संगठन स्तर पर 50 फीसदी स्थान सुरक्षित रखेगी। महिलाओं के लिए लोकसभा और विधानसभाओं में 33 फीसदी सीटें आरक्षित करने की घोषणा तो पार्टी 2019 के चुनावी घोषणापत्र में ही कर चुकी थी। शिविर की शुरुआत से पहले यह भी खबर थी कि पार्टी महिलाओं को दिए जाने वाले पदों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ी जातियों की महिलाओं को आनुपातिक प्रतिनिधित्व भी देगी। सामाजिक न्याय की दृष्टि से ये दोनों ही खबरें उत्साहजनक थीं। किंतु शिविर के समापन के बाद सामने आए, ‘उदयपुर नव संकल्प’ में इनमें से एक भी प्रस्ताव की मंजूरी का उल्लेख नहीं है। 

उम्मीदवारी में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण दिए जाने के फैसले में भी कुछ नया नहीं है। राज्यसभा पहले ही इस प्रस्ताव को स्वीकृति दे चुकी है। फिलहाल यह लोकसभा में लंबित है। समाजवादी पार्टी, बहुजन समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल जैसी पार्टियां महिला आरक्षण में दलित-पिछड़े समुदायों की महिलाओं को आनुपातिक प्रतिनिधित्व देने की मांग अरसे से करती आ रही हैं। यदि कांग्रेस आरक्षण में आरक्षण देने की न्यायसंगत मांग को अपने प्रस्ताव में शामिल कर लेती तो निश्चय ही वह साहस-भरा कदम होता। सरकार पर लोकसभा में अरसे से लंबित विधेयक को पास करने का दबाव बढ़ जाता। अब लगता है कि एक के बाद एक पराजय झेलने के बाद भी वह बड़े फैसले करने को तैयार ही नहीं है। 

यह स्थिति तब है जब 2014 के आम चुनावों के बाद कांग्रेस की राजनीतिक प्रतिष्ठा का बुरी तरह क्षरण हुआ है। उसके नेताओं का आत्मविश्वास डगमगाया है। दुबारा सत्ता में लौटने के लिए बड़े नीतिगत निर्णय लेना उसकी मजबूरी बन चुकी है। बावजूद इसके उदयपुर शिविर से कोई खास परिणाम न निकलने का मतलब है कि कांग्रेस का शिखर नेतृत्व या तो बड़े फैसले लेने का साहस खो चुका है; अथवा समाजार्थिक स्तर पर ही ऐसी स्थितियां बन चुकी हैं, जिससे परंपरागत राजनीति करते आए दल, बड़े परिवर्तनकारी निर्णय लेने का साहस नहीं जुटा पाते हैं। 

दलितों और पिछड़ों की संगठन स्तर पर हिस्सेदारी के मायने

इसी तरह दलितों और पिछड़ों को संगठन में 50 फीसदी जगह देने का प्रस्ताव भी टाल दिया गया। सिर्फ यही प्रस्ताव स्वीकृत हो जाता तो मान लेते कि कांग्रेस अपना कायाकल्प करने का मन बना चुकी है। राजनीतिक दल में संगठन स्तर के पदों की क्या अहमियत होती है, इसे चुनाव के दिनों में आसानी से देखा-समझा जाता है। उन दिनों पार्टी का बड़े से बड़ा नेता संगठन स्तर के नेताओं से मिलने को लालायित होता है। जरूरत पड़ने पर सिफारिश कराता है और प्रलोभन भी देता है। लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने, संगठन बनाने या संगठन की मदद से अपनी बात पार्टी और सरकार में बैठे अधिकारियों तक पहुंचाने का काम उसके कार्यकर्ता ही करते हैं। किसी भी नेता का जनाधार उसकी लोकप्रियता से आंका जा सकता है। जबकि उसकी सफलता पार्टी कार्यकर्ताओं की विश्वसनीयता पर निर्भर होती है। विधायक या एमपी बन जाने के बाद जहां नेता आमतौर पर जनता से कट जाते हैं, वहीं संगठन स्तर के नेताओं को सदैव जनता के बीच रहकर काम करना पड़ता है।

प्रचलित राजनीतिक धाराओं को समाज के हाशिये के लोगों तक पहुंचाकर उनमें अधिकार चेतना पैदा करने का श्रेय भी पार्टी कार्यकर्ताओं को ही जाता है। संगठन स्तर पर आनुपातिक प्रतिनिधित्व के अभाव में शिखर पर बैठे नेता, जातिवादी पूर्वाग्रहों के कारण, निचले वर्गों के ऐसे नेताओं को आगे बढ़ने का अवसर देते हैं, जिनका अपना कोई स्वतंत्र व्यक्तित्व न हो। जो संसद या विधायिका में जाकर शीर्ष नेताओं के हाथों की कठपुतली की तरह काम कर सकें। इससे उनके जनप्रतिनिधि चुने जाने का उद्देश्य ही खत्म हो जाता है।

यदि संगठन के स्तर पर शूद्रातिशूद्र और दलित वर्गों के पर्याप्त कार्यकर्ता होंगे तो इन वर्गों से आने वाले जनप्रतिनिधियों के आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। चुनावी जीत की खातिर उन्हें दूसरे वर्गों के नेताओं-कार्यकर्ताओं के सहारे नहीं रहना पड़ेगा। इसी तरह यह संगठन के स्तर पर सभी वर्गों के कार्यकर्ताओं की पर्याप्त संख्या होगी तो वेअपने वर्ग के ऐसे उम्मीदवारों को चुनावों में उतारने को प्राथमिकता देंगे जो उनके अपने हितों के अनुसार काम कर सकें। इससे उन नेताओं का संसद पहुंचना थम सकता है, जो पार्टी के बड़े नेताओं की अनुकंपा पर टिकट प्राप्त कर लेते हैं; और जीत के बाद उनके हाथों की कठपुतली बने रहते हैं। इससे उनके जनप्रतिनिधि चुने जाने का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। यह दलित-पिछड़ों सहित महिलाओं पर भी समान रूप से लागू है। 

कांग्रेस और अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे अन्य राजनीतिक दलों को समझना चाहिए कि तुष्टिकरण और दिखावे की राजनीति के दिन लद चुके हैं। राजनीतिक दलों का जिन मुद्दों पर विश्वास है, उनके समर्थन में उन्हें खुलकर आना ही पड़ेगा। जैसे भाजपा खुलकर सांप्रदायिकता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति करती है; सामाजिक न्याय की पैरोकार शक्तियों को भी खुलकर मैदान में उतरना पड़ेगा। यहां यह जान लेना जरूरी है कि जो काम आज भाजपा डंके की चोट कर रही है, उससे पहले दबे-ढंके अंदाज में कांग्रेस किया करती थी। बढ़ी चुनौतियों के बीच अब वह खुद को उदार तो दिखाना चाहती है। लेकिन उदारता को जमीनी आकार देने के लिए जो राजनीतिक बदलाव जरूरी हैं, वह उन्हें करने को तैयार ही नहीं है। कांग्रेस की परंपरा तथा उसके राजनीतिक संस्कार कदाचित उसे इसकी अनुमति ही नहीं देते।

संसद भवन परिसर में डॉ. बी.आर. आंबेडकर की आदमकद प्रतिमा

संसद में महिलाओं की भागीदारी : आधी आबादी को न्याय

लोकतांत्रिक चेतना के फैलाव के चलते आजादी के बाद, संसद और विधानसभाओं में दलितों और पिछड़ों के आनुपातिक प्रतिनिधित्व में काफी सुधार हुआ है। लेकिन आजादी के 75 वर्ष बाद भी देश की आधी आबादी यानी महिलाओं की संसद में मौजूदगी 15 फीसदी से भी कम है। यह तब है जब देश में संविधान लागू होने के साथ ही महिलाओं को समान मताधिकार दे दिया गया था। बावजूद इसके, राज्य निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार, आजादी के बाद हुए पहले चुनावों (1952) में 489 लोकसभा सीटों पर मात्र 22 (4.50 फीसदी) महिला सांसद निर्वाचित हुई थीं। आजादी के बाद स्त्रियों के शैक्षिक अनुपात में सुधार हुआ। उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता में भी वृद्धि हुई। फिर भी इसके 16वीं लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या 543 सीटों में मात्र 61 (11.2 फीसदी) थी। सत्रहवीं लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या में पुनः वृद्धि हुई, तथापि मात्र 78 महिलाएं (14.4 फीसदी) ही संसद तक पहुंच सकीं।

इसका मतलब यह नहीं कि महिलाओं में राजनीतिक चेतना का अभाव है। या वे स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाने को उत्सुक नहीं हैं। आंकड़ों के अनुसार तीसरी लोकसभा के चुनावों में 63.3 फीसदी पुरुषों के मुकाबले, 46.6 फीसदी महिलाओं ने मतदान प्रक्रिया में हिस्सा लिया था, जबकि 16वीं लोकसभा के चुनावों में 67.1 फीसदी पुरुषों के मुकाबले, 65.6 फीसदी महिलाएं मतदान प्रक्रिया में हिस्सा लेने निकली थीं। वहीं वर्ष 2019 में तो उत्साहजनक हिस्सेदारी दिखाते हुए उन्होंने पुरुषों को भी पीछे छोड़ दिया था। उस वर्ष 67.01 फीसदी पुरुष मतदाताओं के मुकाबले, 67.18 फीसदी महिला मतदाताओं ने मताधिकार का प्रयोग किया था। इसके बावजूद संसद और विधायिकाओं में उनका कम अनुपात, समाज और नेताओं की रूढ़िवादी मानसिकता को दर्शाता है। कांग्रेस या कोई भी दल इस दिशा में ईमानदारी से काम करे तो उसे इसका दूरगामी लाभ मिल सकता है।

जातिभेद के शिकार वर्ग और राजनीति

अब हम राजनीतिक दलों में दलित और पिछड़ों की संगठन-स्तर पर भागीदारी पर विचार करेंगे। भारत में जनप्रतिनिधित्व प्रणाली अंग्रेजों ने लागू की थी। यह फ्रांसीसियों की जनप्रतिनिधित्व प्रणाली से अलग थी। फ्रांसीसी कानून के अनुसार निर्वाचित व्यक्ति क्षेत्र या समुदाय विशेष का प्रतिनिधि न होकर, पूरे देश का प्रतिनिधि माना जाता था। वह प्रणाली इतनी विचित्र थी कि जब अल्सासे लौरीन नामक फ्रांस का पूर्वी हिस्सा, जर्मनी के कब्जे में चला गया तो वहां से जीतने वाले सदस्य खुद को ‘राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व’ का अंग बताकर वर्षों तक बहस में उलझे रहे। ब्रिटिश प्रणाली में निर्वाचित, निर्वाचक का प्रतिनिधि होता था। सन् 1906 में भारत में लोकतांत्रिक सरकार बनने की शुरुआत इसी प्रणाली के जरिए हुई थी। आगे चलकर विभिन्न सामाजिक समूहों की मांग को देखते हुए अंग्रेजों ने सामुदायिक प्रतिनिधित्व को जगह दी। उसके बाद केंद्रीय और राज्य विधान मंडलों में मुस्लिम, सिख, गैर-ब्राह्मण, मराठा, दलित, भारतीय ईसाई, आंग्ल-ईसाइयों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में, प्रतिनिधित्व का अवसर मिलने लगा। नतीजा यह हुआ कि ब्राह्मण जो लगभग सभी प्रमुख पदों पर छाए रहते थे, उनका वर्चस्व तेजी से घटने लगा।

यही कारण है कि आरक्षण लागू होने के साथ ही कांग्रेस और ब्राह्मणों ने उस प्रणाली का विरोध करना आरंभ कर दिया था। आगे चलकर पूना समझौते के दौरान, गांधी, जनमत के दबाव तथा पिछड़ों की उदासीनता के चलते, सामुदायिक आरक्षण को – मात्र अनुसूचित जातियों और जनजातियों के आरक्षण तक सीमित कर दिया गया। अल्पसंख्यक और पिछड़ी जातियां उसकी परिसीमा के बाहर ढकेल दी गईं। अल्पसंख्यकों को आरक्षण न देने का तर्क तो साफ था। सरकार का कहना था कि पाकिस्तान बनने के बाद देश में मुस्लिमों को अलग से प्रतिनिधित्व देने की आवश्यकता नहीं है। जबकि पिछड़ी जातियों को आरक्षण से बाहर कर देने का उसके पास कोई तर्क नहीं था। पूना समझौते की शर्तों के अनुसार 1952 के पहले चुनावों में, लोकसभा की कुल 489 सीटों में से अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति को क्रमशः 72 और 26 (कुल मिलाकर 20.04 फीसदी) सीटें आरक्षित की गई थीं। वर्तमान में 543 लोकसभा सीटों में से 131 सीटें (24.13 फीसदी) अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए सुरक्षित हैं।

आजादी के बाद लोकतांत्रिक चेतना के फैलाव के चलते संसद और विधानसभाओं में दलितों और पिछड़ों के आनुपातिक प्रतिनिधित्व में काफी सुधार हुआ है। इसे हिंदी पट्टी में हुए चुनावों में ब्राह्मण और ब्राह्मणेत्तर जातियों के निर्वाचित प्रतिनिधियों की नीचे दी गई संख्या से भी परखा जा सकता है। 

लोकसभा में प्रतिनिधित्व (सभी आंकड़े प्रतिशत में)

वर्षउच्च जातियांमध्य जातियांअन्य पिछड़ा वर्गअनुसूचित जातिअनुसूचित जनजाति
19526414.4515.765.42
195758.601.435.2418.106.90
196254.901.887.9819.727.04
196755.502.759.6418.357.80
197153.904.1110.1018.267.31
197748.206.6413.3017.707.08
198040.885.3313.7417.787.56
198446.905.3111.1017.267.52
198938.208.0020.8717.787.56
199137.115.4322.6018.108.14
199635.307.5324.8018.147.52
199834.708.9023.6018.207.60
199935.407.9024.0018.607.50
2004337.1025.3017.808.40

(स्रोत: राइज ऑफ प्बेलियंस : दि चेंजिंग फेस ऑफ इंडियन असेंबली, क्रिस्टोफर जेफरलेट, राउटलेज, पृष्ठ 7)

हम देख सकते हैं कि अनुसूचित जातियों/जनजातियों, जिनके लिए सविधान लागू होने के साथ ही आरक्षण की व्यवस्था लागू हो चुकी थी, उनका संसद और विधायिकाओं में निश्चित प्रतिनिधित्व बना हुआ है। जबकि अन्य पिछड़ी जातियों को जिन्हें उनके अपने भरोसे छोड़ दिया गया था, उनकी संसद में मौजूदगी का ग्राफ धीरे-धीरे बढ़ा। इसका सीधा असर उच्च जातियों के प्रतिनिधित्व पर पड़ा और हिंदी प्रदेशों में संसद में उच्च जातियों का वर्चस्व 1952 में 64 फीसदी से घटकर 2004 में लगभग 33 फीसदी तक रह गया। दूसरी ओर पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व इसी अवधि में अन्य पिछड़ा वर्ग का प्रतिनिधित्व 4.45 फीसदी से बढ़कर 25.3 फीसदी तक पहुंच गया। उसके बाद इस पर ब्रेक लग गया। ऐसा केवल मोदी और भाजपा के आने के बाद शुरू नहीं हुआ, बल्कि इसकी शुरुआत 2009 में कांग्रेस के शासनकाल में ही हो चुकी थी। आगे हिंदी पट्टी के 199 लोकसभा सदस्यों की संसद में जातिवार संख्या को दर्शाया गया है–

लोकसभा में हिस्सेदारी (सांसदों की संख्या)

जाति और समुदाय2004200920142019
उच्च जातियां73969588
मध्य जातियां16131614
अन्य पिछड़ा वर्ग59455253

(स्रोत : सोशल प्रोफाइल ऑफ दि इंडियन नेशनल एंड प्रोबिंशियल इलेक्टिड रिप्रिजेंटेटिव्स, क्रिस्टोफर जेफरलोट, ‘इन हिंदी हर्टलेंड, अपर कॉस्ट डोमीनेट न्यू लोकसभा, इंडियन एक्सप्रेस, 27 मई 2019) 

उपरोक्त आंकड़ों से पता चलता है कि 2004 में संसद में हिंदी प्रदेशों के उच्च जातियों तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के क्रमशः 73 और 59 जनप्रतिनिधि थे। जबकि 2009 में उच्च जाति के 96 सदस्य लोकसभा पहुंचे थे। जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों की संख्या गिरकर मात्र 45 पर सिमट चुकी थी। सनद रहे कि 2004 और 2009 में कांग्रेस के बहुमत वाली संयुक्त मोर्चा की सरकार थी। अगर इन दोनों चुनावों में कांग्रेस के सांसदों की संख्या को देखा जाए तो आसानी से उसकी राजनीति को समझा जा सकता है। 2004 में कांग्रेस को 145 तथा भाजपा को 138 सीटें मिली थीं। जबकि 2009 में कांग्रेस की सीटों की संख्या बढ़कर 206 हो चुकी थी, जबकि भाजपा गिरकर 116 सीटों पर सिमट चुकी थी। इस अवधि में उच्च जाति के सांसदों की संख्या में वृद्धि से साफ है कि दुबारा सत्ता में लौटने के लिए कांग्रेस ने, भाजपा के मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए उच्च जातियों को जमकर टिकट बांटे थे।

संसद में दलित-पिछड़ों की संख्या बढ़ी, शक्ति नहीं 

हिंदी पट्टी के उपर्युक्त आंकड़ों के अनुसार संसद में उच्च जातियों का वर्चस्व 1977 के चुनावों के बाद से ही घटने लगा था। इस बीच जहां अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों की संख्या लगभग स्थिर थी, वहीं अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों की संख्या थोड़े उतार-चढ़ाव के साथ वृद्धि की ओर अग्रसर थी। फिलहाल इन तीनों वर्गों के सांसदों की कुल संख्या उच्च जाति के सांसदों की संख्या से अधिक है। फिर आखिर क्या कारण है जो सरकार आरक्षण, श्रम और सामाजिक न्याय के अन्य मुद्दों पर मनमानी करने में आसानी से कामयाब हो जाती हैं? कैसे सामाजिक न्याय की भावना का गला घोंट दिया जाता है? इसके दो कारण हैं। पहला राजनीतिक चेतना के अभाव में आरक्षित वर्गों के प्रायः कमजोर और समझौतापरस्त नेता ही संसद और विधायिकाओं तक पहुंच पाते हैं। चुनावों में उन्हें अपने वर्गों के मतों के अलावा उच्च जातियों के वोटों कि भी जरूरत पड़ती है, जिसके लिए शीर्ष जाति के नेताओं पर उनकी निर्भरता बनी रहती है। इस कारण वे संसद में और बाहर, उच्च जातियों के नेताओं की मनमानी सहने को विवश होते हैं। 

दूसरी बात यह कि संसद के कामकाज को आसानी से निपटाने और मंत्रालयों की मदद के लिए सरकार ने अनेक समितियों का गठन किया है। वर्तमान में 24 स्टेंडिंग समितियां और 3 वित्त समितियां हैं, इनमें सामाजिक न्याय जैसी कुल आठ समितियों को छोड़कर किसी में भी, अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों की संख्या तो जाने दीजिए, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों का भी वाजिब प्रतिनिधित्व नहीं है। इस कारण दलित और पिछड़े वर्ग के विधायक संसद में होकर भी क़ानून बनने की प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं कर पाते हैं।

इसलिए सामाजिक अन्याय के शिकार रहे लोग यदि अपने नेताओं से अपने हक में आवाज उठाने की अपेक्षा करते हैं, तो उन्हें भी अपने नेताओं को भरोसा दिलाना होगा कि वे भी अपने प्रतिनिधियों के साथ खड़े हैं। बकौल अरस्तु, अच्छी जनता ही अच्छी सरकार चुन सकती है। अच्छी और जिम्मेदार सरकार के लिए आवश्यक है कि सामाजिक अन्याय और उत्पीड़न के शिकार रहे वर्गों में वर्गीय चेतना को उभारा जाए। विभिन्न राजनीतिक दलों में संगठन के स्तर पर पिछड़े और दलित वर्गों को उपयुक्त प्रतिनिधित्व देने की मांग इसका एक जरिया हो सकती है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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