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‘सियासत’ नहीं, सांस्कृतिक आंदोलन छेड़ें, तभी मिलेगी मुकम्मल जीत

लालू प्रसाद और मुलायम सिंह यादव जैसे समाजवादी नेताओं के नेतृत्व में उन राज्यों में ओबीसी बड़े पैमाने पर संगठित हुए। फलस्वरूप वहां वे सत्ता में भी आए। परंतु बिहार और उत्तर प्रदेश की यह जागृति केवल राजनीतिक जागृति थी, वह सांस्कृतिक आंदोलन के अभाव में दूरगामी नहीं हो सकी। बता रहे हैं श्रावण देवरे

बहस-तलब

इन दिनों जातिगत जनगणना के मुद्दे पर कुछ राज्यों के नेता कुछ अधिक आक्रामक हो गए हैं तो कुछ राज्यों के नेता सक्रिय होते हुए दिख रहे हैं। हालांकि इससे पहले 2009 से 2011 के दरमियान संसद में भी इस मुद्दे पर गर्म बहसें हुई थीं, लेकिन वर्तमान में इस मुद्दे पर संसद को शांत किया जा चुका है। लेकिन यह भी देखा जा रहा है कि सच दबाने के लिए एक रास्ता बंद करने पर दस दरवाजे और खुलते जाते हैं। मसलन, बिहार में जातिगत जनगणना का मुद्दा जोर पकड़ रहा है। यह इसके बावजूद कि केंद्र व बिहार में सत्तासीन भाजपा कई बार खुलकर जातिगत जनगणना के मामले में खलनायक की भूमिका में नजर आयी है।

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लेखक के बारे में

श्रवण देवरे

अपने कॉलेज के दिनों में 1978 से प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े श्रवण देवरे 1982 में मंडल कमीशन के आंदोलन में सक्रिय हुए। वे महाराष्ट्र ओबीसी संगठन उपाध्यक्ष निर्वाचित हुए। उन्होंने 1999 में ओबीसी कर्मचारियों और अधिकारियों का ओबीसी सेवा संघ का गठन किया तथा इस संगठन के संस्थापक सदस्य और महासचिव रहे। ओबीसी के विविध मुद्दों पर अब तक 15 किताबें प्राकशित है।

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