h n

दलितों ओर पिछड़ों के लिए आरक्षित पद लगातार ख़ाली क्यों पड़े हैं?

हाल ही में कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय मामलों से जुड़ी संसदीय स्थायी समिति ने अपनी 112वीं रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट के मुताबिक़ परेशानी न सिर्फ केंद्रीय विभागों में आरक्षित पदों के बैकलॉग की है, बल्कि दिक़्क़त यह है कि सरकार इस तरफ ध्यान भी नहीं दे रही है। सरकार के पास ख़ाली पड़े पदों का हिसाब रखने का कोई तंत्र या एजेंसी नहीं है। बता रहे हैं सैयद ज़ैगम मुर्तज़ा

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से जुड़े लोग इन दिनों दावा करते हैं कि देश को दलित और पिछड़े चला रहे हैं। इस दावे की एक वजह संवैधानिक पदों पर बैठे ओबीसी की तादाद और विधायिका उनकी संख्या है। हालांकि इस बात का जवाब किसी के पास नहीं है कि दलित राष्ट्रपति और केंद्रीय मंत्रिमंडल में प्रधानमंत्री समेत तमाम ओबीसी नेता होने के बावजूद आरक्षण की वयवस्था क्योंकर ग़ैर-प्रासंगिक होती जा रही है और क्यों रिक्त पड़े आरक्षित पद भरे नहीं जा रहे हैं?

सरकारी आंकड़े कह रहे हैं कि केंद्रीय सेवाओं में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, और पिछड़ों के लिए आरक्षित कुल पदों में आधे से अधिक ख़ाली पड़े हैं और उनपर वाजिब हक़दारों की नियुक्ति नहीं की जा रही है। यही हाल केंद्रीय विश्विविद्यालयों और उन स्वायत्त संस्थानों में हैं, जो केंद्रीय भर्ती नियमों का पालन करते हैं। वर्ष 2021 के आख़िर में सरकार ने माना था कि केंद्रीय विश्वविद्यालयो में कुल आरक्षित पदों में से लगभग पचास फीसद ख़ाली पड़े हैं। तब एक लिखित प्रश्न के जवाब में सरकार ने संसद में कहा कि देश के 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति के कुल 5737 पद स्वीकृत हैं, जिनमें से 2389 पद ख़ाली पड़े हैं। इस तरह अनुसूचित जनजाति के स्वीकृत 3097 पदों में से 1199 ख़ाली हैं। अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए स्वीकृत 7815 पदों में से 4251 पर नियुक्तियां नहीं की गई हैं। इसके अलावा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विवि दिल्ली में अनुसूचित जाति के 380 में से 157, अनुसूचित जनजाति के 180 में से 88 और ओबीसी के कुल 346 में से 231 पद ख़ाली हैं। अगर इन आंकड़ों को देखें तो आरक्षण व्यवस्था की न सिर्फ लगातार अनदेखी की जा रही है, बल्कि इसका तक़रीबन मखौल उड़ाया जा रहा है।

पूरा आर्टिकल यहां पढें : दलितों ओर पिछड़ों के लिए आरक्षित पद लगातार ख़ाली क्यों पड़े हैं?

लेखक के बारे में

सैयद ज़ैग़म मुर्तज़ा

उत्तर प्रदेश के अमरोहा ज़िले में जन्मे सैयद ज़ैग़़म मुर्तज़ा ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से लोक प्रशासन और मॉस कम्यूनिकेशन में परास्नातक किया है। वे फिल्हाल दिल्ली में बतौर स्वतंत्र पत्रकार कार्य कर रहे हैं। उनके लेख विभिन्न समाचार पत्र, पत्रिका और न्यूज़ पोर्टलों पर प्रकाशित होते रहे हैं।

संबंधित आलेख

बिहार : 65 प्रतिशत आरक्षण पर हाई कोर्ट की रोक, विपक्षी दलों की सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की मांग
राजद के राज्यसभा सदस्य प्रो. मनोज झा और भाकपा माले के राष्ट्रीय महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में...
किसानों की नायिका बनाम आरएसएस की नायिका
आरएसएस व भाजपा नेतृत्व की मानसिकता, जिसमें विरोध प्रदर्शन कर रहे किसानों को खालिस्तानी बताना शामिल है, के चलते ही कंगना रनौत की इतनी...
जानिए, मोदी के माथे पर हार का ठीकरा क्यों फोड़ रहा आरएसएस?
इंडिया गठबंधन भले ही सरकार बनाने में कामयाब नहीं हुआ हो, लेकिन उसके एजेंडे की जीत हुई है। सामाजिक न्याय और संविधान बचाने के...
अमेरिका के विश्वविद्यालयों में हिंदू पाठ्यक्रम के मायने
यदि हिंदू दर्शन, जिसे वेदांतवादी दर्शन का नाम भी दिया जाता है, भारत की सरहदों से बाहर पहुंचाया जाता है तो हमें इसके विरुद्ध...
लाला हरदयाल का दृष्टि दोष (संदर्भ : भगत सिंह के दस्तावेज)
ऐसा क्या कारण था कि भारतीय समाज-व्यवस्था को जितनी गहराई से पेरियार रामासामी नायकर और डॉ. आंबेडकर जैसे दलित-बहुजन विचारकों ने समझा, उतनी गहराई...