बहुजन साप्ताहिकी : केंद्र सरकार ने फिर कहा, जातिगत जनगणना का कोई प्रस्ताव नहीं

इस सप्ताह पढ़ें जातिगत जनगणना से जुड़ी एक खबर के अलावा झारखंड जिले के गुमला जिले की खबर, जिसमें डायन प्रथा के नाम पर दो आदिवासी महिलाओं की 9 वर्ष पूर्व हत्या के मामले में 19 आरोपियों को निचली अदालत ने कसूरवार माना है। इनमें आधी से अधिक महिलाएं हैं। साथ ही, अन्य सम-सामयिक खबरें भी

एक बार फिर भारत सरकार ने जातिगत जनगणना के सवाल पर हाथ खड़े कर दिये हैं। बीते 25 जुलाई, 2022 को लोकसभा में एक सवाल के जवाब में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने कहा कि देश में जातिगत जनगणना कराने का केंद्र सरकार के पास कोई प्रस्ताव नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि वर्ष 2011 में हुए सामाजिक और आर्थिक जनगणना की रपट भी सरकार जारी नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि इस रपट में जाति के अलावा सभी तरह के आंकड़े जारी किये जा चुके हैं। इनमें एससी और एसटी से संबंधित आंकड़े शामिल हैं। वहीं एक दूसरा सवाल कि देश में जनगणना में विलंब हो रहा है तो क्या इसका प्रभाव नीतियों के निर्धारण पर नहीं पड़ेगा, के जवाब में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री ने कहा कि वर्ष 2011 में हुए जनगणना में वर्ष 2036 तक के जनसंख्या संबंधी अनुमान दर्ज हैं। उन्होंने नीतियों के निर्धारण पर किसी तरह का प्रभाव पड़ने से इंकार किया।

मध्य प्रदेश में पढ़ने से रोका तो दलित छात्रा ने मामला कराया दर्ज

घटना मध्य प्रदेश के शाजापुर जिले की है। बीते 23 जुलाई, 2022 को वहां बावलियाखेड़ी नामक गांव के दलित परिवार की छात्रा को गांव के ऊंची जातियों के लोगों ने स्कूल जाने से रोका। घटना के समय छात्रा अपने स्कूल जा रही थी। आरोपियों ने उसका बस्ता छीनकर फेंक दिया और उसे धमकी दी कि अगर वह स्कूल गयी तो इसका अंजाम बुरा होगा। छात्रा ने साहस किया और घर पर आकर उसने इस घटना की जानकारी अपने परिजनों को दी। इसके बाद परिजनों ने छात्रा को साथ ले जाकर मामले की शिकायत दर्ज करवाई। स्थानीय पुलिस अधिकारी ने मामले की पुष्टि करते हुए बताया है आरोपियों ने न केवल दलित समुदाय की, बल्कि अपनी जातियों की लड़कियाें को भी स्कूल जाने से रोक रखा है। इस मामले में आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है।

नौ साल बाद डायन प्रथा के 19 आरोपियों की दोषसिद्धि, दो आदिवासी महिलाओं की हुई थी हत्या

मामला 9 साल पुराना है। 11 जून, 2013 को झारखंड के गुमला जिले के भरनो प्रखंड के करंज थाना क्षेत्र के करौंदाजोर टुकटोली नामक गांव में दो आदिवासी महिलाओं ब्रिजेनिया इंदवार और इगनेसिया इंदवार की हत्या उसके ही गांव के लोगों ने डायन के आरोप में पीट-पीटकर कर दी थी। गत 28 जुलाई को जिले के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश दुर्गेश चंद्र अवस्थी ने इस मामले में 19 आरोपियों को कसूरवार घोषित किया। इनमें आधी से अधिक महिलाएं शामिल हैं। अदालत अब इस मामले सभी को आगामी 3 अगस्त को सजा सुनाएगी। जिन आरोपियों को कसूरवार ठहराया गया है, उनमें भलेरिया इंदवार, इमिलिय इंदवार, करिया देवी, जरलदीता इंदवार, मंगरी देवी, ख्रीस्टीना इंदवार, चिंतामणि देवी, विनिता इंदवार, ज्योति इंदवार, मालती इंदवार, गब्रेला इंदवार, रिजिता इंदवार, मोनिका इंदवार और सुशीला इंदवार आदि शामिल हैं।

बिहार के नवगछिया में बहुजन दावेदारी सम्मेलन आयोजित

गत 26 जुलाई, 2022 को राष्ट्रीय सामाजिक न्याय दिवस के मौके पर सामाजिक न्याय आंदोलन (बिहार), बिहार फुले-आंबेडकर युवा मंच और बहुजन स्टूडेंट्स यूनियन (बिहार) के संयुक्त तत्वावधान में बिहार के नवगछिया के बिहारी धर्मशाला में बहुजन दावेदारी सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस मौके पर फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली द्वारा प्रकशित पुस्तक “आंबेडकर की नजर में गांधी और गांधीवाद” का लोकार्पण किया गया।

अपने संबोधन में चर्चित बहुजन बुद्धिजीवी डॉ. विलक्षण रविदास ने कहा कि वर्ण-जाति के आधार पर बहुजन अन्याय व वंचना के शिकार हुए हैं और यह अभी भी वह जारी है। इसे खत्म करने का सवाल ही सामाजिक न्याय का सवाल है। उन्होंने कहा कि 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद सामाजिक न्याय पर हमलों और सामाजिक न्याय के मोर्चे से हासिल उपलब्धिओं को खत्म करने का नया दौर शुरु हुआ है। सत्ता-शासन, संपत्ति-संसाधनों, सम्मान, शिक्षा व अन्य क्षेत्रों में बहुजनों के पास जो कुछ है, जो भी हासिल उपलब्धियां हैं, अंतिम तौर पर छीन लेने की मुहिम चल रही है। मुसलमानों को निशाने पर लेकर सांप्रदायिकता के खाद-पानी के जरिए हिंदू पहचान को उभारने के साथ ही मनुवादी वर्चस्व व कॉरपोरेट कब्जा मुहिम को आगे बढ़ाया जा रहा है। 

नवगछिया में आयोजित बहुजन दावेदारी सम्मेलन के दौरान फारवर्ड प्रेस द्वरा प्रकाशित किताब ‘आंबेडकर की नजर में गांधी और गांधीवाद’ का लोकार्पण

सामाजिक कार्यकर्ता ई. हरिकेश्वर राम ने इस अवसर पर कहा कि आज भी एससी, एसटी व ओबीसी हर क्षेत्र में पीछे हैं। नौकरशाही, न्यायपालिका, मीडिया, शिक्षा, धन-धरती में हमारी समुचित हिस्सेदारी नहीं है। केंद्र सरकार की नौकरियों में एससी, एसटी और ओबीसी का प्रतिनिधित्व और आरक्षित पदों पर रिक्तियां बहुत ही चिंताजनक है। एससी, एसटी और ओबीसी के लिए क्रमशः 15 फीसदी, 7.5 फीसदी और 27 फीसदी आरक्षण होने के बावजूद भी ग्रुप-ए में एससी का प्रतिनिधित्व सिर्फ 12.86 फीसदी, एसटी का 5.64 फीसदी और ओबीसी का 16.88 फीसदी है।

सामाजिक न्याय आंदोलन (बिहार) के गौतम कुमार प्रीतम ने कहा कि 26 जुलाई 1902 भारत के इतिहास में वह दिन है जब भारत में सामाजिक न्याय की औपचारिक शुरुआत हुई थी। आधुनिक आरक्षण व्यवस्था की शुरूआत शाहूजी महाराज ने 1902 में की थी। उन्होंने 26 जुलाई को ही सरकारी आदेश निकालकर अपनी रियासत के 50 प्रतिशत प्रशासनिक पदों को दलितों-आदिवासियों व पिछड़ों के लिए आरक्षित किया था। इसलिए आज के दिन को हम राष्ट्रीय सामाजिक न्याय दिवस के रूप में मनाते हैं।

सामाजिक न्याय आंदोलन (बिहार) के संयोजक रिंकु यादव ने कहा कि अडानी-अंबानी की संपत्ति बढ़ रही है तो गरीबी रेखा से नीचे की तादाद बढ़ रही है। पिछले 8 साल में 14 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे चले गये हैं। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत मुफ्त राशन योजना के 80 करोड़ लाभार्थी बनकर जीवन गुजार रहे हैं और सरकार कुछ अनाज देकर अपना पीठ थपथपा रही है। 

इस मौके पर बिहार फुले-अंबेडकर युवा मंच के प्रभारी अजय कुमार राम और बहुजन स्टूडेंट्स यूनियन के सचिव अनुपम आशीष, फुले-अंबेडकर युवा मंच के अखिलेश रमण और बहुजन स्टूडेंट्स यूनियन के पांडव शर्मा आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किये। सम्मेलन की अध्यक्षता पूर्व मुखिया रवीन्द्र कुमार दास ने की। 

(संपादन : अनिल)


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