पुस्तक समीक्षा : आंबेडकर का चिंतन गांधी की आलोचना का तीसरा स्कूल

गांधी और गांधीवाद पर डॉ. आंबेडकर की आलोचना को जानना इसलिए भी जरूरी है कि आंबेडकर-विचार के बिना गांधी और गांधीवाद का कोई भी अध्ययन पूरा नहीं हो सकता, वह अधूरा ही रहेगा। क्योंकि गांधी के असली रूप को केवल डॉ. आंबेडकर ही देख सकते थे, जो हिंदू समाज-व्यवस्था में अंतिम पायदान के व्यक्ति थे। बता रहे हैं कंवल भारती

आंबेडकर-गांधी विवाद इसलिए प्रासंगिक नहीं है, कि आज न आंबेडकर हैं और न गांधी, तो जख्म क्यों कुरेदे जाएँ? यह विवाद जख्म कुरेदने से सम्बन्धित नहीं है, बल्कि यह विचारधारा का विवाद है। और यह विवाद इसलिए प्रासंगिक है, क्योंकि आंबेडकर और गांधी दो व्यक्ति न होकर, दो अलग-अलग विचारधाराएँ हैं। आंबेडकर आधुनिकता के और गांधी पुरातनवाद के प्रतीक हैं। दूसरे शब्दों में, आंबेडकर का विचार स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व पर आधारित नए भारत का निर्माण का है, जबकि गांधी का विचार रामराज्य-आधारित हिंदुत्व के पुनरुत्थान का है।

फारवर्ड प्रेस से हाल में प्रकाशित ‘आंबेडकर की नजर में गांधी और गांधीवाद’ पुस्तक, जिसके संपादक डॉ. सिद्धार्थ और डॉ. अलख निरंजन हैं, पाठकों के सामने निस्संदेह गांधीवाद के उस यथार्थ को प्रकट करती है, जिसे गांधी के आलोचकों और इतिहासकारों ने पूरी तरह उपेक्षित किया है। यह भारत के आधुनिक इतिहास से ओझल एक जरूरी अध्याय को उपलब्ध कराती है, जिसे पढ़ना प्रत्येक जागरूक व्यक्ति के लिए जरूरी है।

यह पुस्तक इसलिए भी प्रासंगिक है कि गांधी का विचार एक वाद के रूप में गांधी के समय में ही स्थापित हो गया था। आज भी अनेक गांधीवादी संस्थान और विचारक गांधीवाद के प्रसार में सक्रिय हैं। इसलिए यह जानना जरूरी है कि गांधीवाद क्या है, और दलित वर्गों के विकास में उसकी प्रासंगिकता क्या है? और अगर हम गांधीवाद को डॉ. आंबेडकर की दृष्टि से देखेंगे, तो यह ज्यादा दिलचस्प होगा।

सवाल उठाया जा सकता है कि डॉ. आंबेडकर की दृष्टि से ही गांधीवाद को क्यों देखा और समझा जाए? सवाल वाजिब है, पर ऐसा करना तीन कारणों से जरूरी है।

पहला कारण यह है कि गांधीवाद को परखने की असली कसौटी स्वयं गांधी के अनुसार यही है कि समाज के अंतिम व्यक्ति के लिए उसकी उपयोगिता क्या है? इसलिए इस हिसाब से भी अंतिम व्यक्ति के प्रतिनिधि के रूप में आंबेडकर का विचार जानना जरूरी है।

दूसरा कारण यह है कि, आज की नई पीढ़ी के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि आखिर वह कौन सा मुद्दा था, जिसने भारतीय राजनीति में आंबेडकर-गांधी-विवाद को पैदा किया था? इस मुद्दे को जाने बगैर भारत के राजनीतिक इतिहास को भी ठीक से नहीं समझा जा सकता।

तीसरा कारण अहम है, और वह यह कि आंबेडकर का विचार भारतीय चिंतन का तीसरा स्कूल है। अभी तक केवल वामपंथी और दक्षिणपंथी आलोचकों की नजर से ही गांधी और गांधीवाद पर चर्चा होती रही है। हालाँकि ये दोनों आलोचनाएं भी गांधीवाद का विरोध कम और समर्थन ज्यादा करती हैं। समाजवादी आलोचना में जयप्रकाश नारायण गांधीवाद को पूंजीवाद का संरक्षक दर्शन मानकर उसकी कटु आलोचना जरूर करते हैं, परन्तु बाद में उन्हें भी शांति, डॉ. राम मनोहार लोहिया की तरह, गांधीवाद और सर्वोदय में ही मिलती है। मार्क्सवाद से मानववाद की ओर गए एम. एन. राय अलबत्ता गांधी के तीखे आलोचक थे। 1942 में मार्क्सवादी नेता पी. सी. जोशी ने गांधीवाद की आलोचना करते हुए उसे नकारात्मक पद्धति का नाम दिया था। किन्तु इस आलोचना से भी गांधी उतने नहीं खुलते, जितने आंबेडकर की आलोचना से खुलते हैं। क्योंकि आंबेडकर का चिंतन गांधी की आलोचना का तीसरा स्कूल है।

समीक्षित पुस्तक का आवरण पृष्ठ

असल में आधुनिक भारतीय चिंतन पर ब्राह्मण बुद्धिजीवियों का वर्चस्व होने के कारण उन्होंने डॉ. आंबेडकर का नाम न राजनीतिक विचारकों की सूची में जोड़ा है, न समाजशास्त्री चिंतकों की सूची में शामिल किया है और न अर्थशास्त्र के आलोचकों में उनकी गणना की है। इसलिए किसी भी इतिहासकार ने गांधीवाद की आलोचना में डॉ. आंबेडकर की आलोचना का कोई उल्लेख नहीं किया है। वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों इतिहासकारों ने गांधी के संदर्भ में डॉ. आंबेडकर की आलोचना को लगभग पूरी तरह गायब कर दिया है। इसलिए, गांधी और गांधीवाद पर डॉ. आंबेडकर की आलोचना को जानना इसलिए भी जरूरी है कि आंबेडकर-विचार के बिना गांधी और गांधीवाद का कोई भी अध्ययन पूरा नहीं हो सकता, वह अधूरा ही रहेगा। क्योंकि गांधी के असली रूप को केवल डॉ. आंबेडकर ही देख सकते थे, जो हिंदू समाज-व्यवस्था में अंतिम पायदान के व्यक्ति थे। इस सम्बन्ध में डॉ. आंबेडकर का 26 फरवरी 1955 को बीबीसी, लंदन को दिया गया साक्षात्कार देखा जाना चाहिए। इस साक्षात्कार में गांधी के बारे में डॉ. आंबेडकर ने अपने अनुभवों को साझा किया है। वह कहते हैं–

“जब भी मैं उनसे मिला, एक प्रतिपक्ष की हैसियत से मिला। मुझे लगता है कि ज्यादातर अन्य लोगों की तुलना में मैं उन्हें बेहतर जानता हूँ, क्योंकि उन्होंने मेरे ही सामने अपने असली जहरीले दांत खोले थे। मैं उस आदमी के भीतर तक झांक सकता था। आप जानते ही हैं कि आम तौर पर अन्य लोग उनके सामने भक्तों की तरह जाते थे। ऐसे लोग उनका बाहरी रूप देखने के अलावा कुछ भी नहीं देख पाते थे। बाहरी तौर पर उन्होंने अपना बाना महात्मा का बना रखा था। लेकिन मैं उन्हें इंसान के तौर पर देखता था, बिल्कुल उनके असली रूप में। इसलिए आप यह कह सकते हैं कि मैं उनसे जुड़े अन्य सभी लोगों की तुलना में उन्हें ज्यादा बेहतर तरीके से समझता था।” (आंबेडकर की नजर में गांधी और गांधीवाद, संपादक : डॉ. सिद्धार्थ व डॉ. अलख निरंजन, फारवर्ड प्रेस, पृष्ठ सं. 153)

साक्षात्कारकर्ता ने प्रश्न किया, “क्या आपको नहीं लगता कि गांधी ने बुनियादी परिवर्तन किया था?” आंबेडकर ने इसका जो उत्तर दिया, उसकी तरफ आज तक किसी बुद्धिजीवी और शोधकर्ता का ध्यान नहीं गया। उनका उत्तर था कि गांधी ने कुछ भी बुनियादी परिवर्तन नहीं किया–

“वे दो अखबार निकालते थे, एक अंग्रेजी में ‘हरिजन’, जो पहले ‘यंग इंडिया’ था, और गुजराती में एक अलग अखबार ‘हरिजन बन्धु’। अगर आप इन दोनों अख़बारों को पढ़ें तो देखेंगे कि मिस्टर गांधी लोगों को कैसे धोखा दे रहे थे। अंग्रेजी अखबार में, उन्होंने खुद को जाति-व्यवस्था और अस्पृश्यता के विरोधी के रूप में पेश किया, और लोकतान्त्रिक दिखने का ढोंग किया। लेकिन अगर आप उनकी गुजराती पत्रिका पढ़ें, तो वह आपको ज्यादा रूढ़िवादी दिखेंगे, वहाँ वह जाति-व्यवस्था, वर्णाश्रम-धर्म और उन सभी रूढ़िवादी हठधर्मिताओं का समर्थन करते रहे हैं, जिन्होंने युगों-युगों से भारत को दबाए रखा है।” (वही)

आगे आंबेडकर ने कहा कि गांधी की सभी जीवनियाँ उनके ‘हरिजन’ और ‘यंग इंडिया’ अख़बारों पर ही आधारित हैं, कोई भी जीवनी उनके गुजराती लेखन पर आधारित नहीं है। उन्होंने कहा कि किसी बुद्धिजीवी ने भी गांधी के गुजराती अखबार का अध्ययन करने का प्रयास नहीं किया, जो सात खंडों में संकलित है।

इस प्रश्न पर कि क्या गांधी ने अस्पृश्यता और जातिभेद को खत्म करने की दिशा में कोई काम किया, आंबेडकर ने कहा कि गांधी ने इस दिशा में कोई काम नहीं किया। उन्होंने कहा कि वह सुधारक नहीं थे, बल्कि पूरी तरह रूढ़िवादी हिंदू थे। वे अस्पृश्यता-विरोध की सारी बातें केवल दलितों को कांग्रेस से जोड़ने के मकसद से करते थे। उन्होंने कहा कि वह गैरीसन की तरह नहीं थे, जिसने नीग्रों की मुक्ति के लिए संघर्ष किया था।

आंबेडकर ने कहा कि गांधी महात्मा नहीं थे, बल्कि राजनेता थे। उनकी दृष्टि में गांधी नैतिकता के लिहाज से भी महात्मा की पदवी के लायक नहीं थे।

पूना-पैक्ट

भारत की राजनीति में गांधी और आंबेडकर के बीच सबसे पहला और ऐतिहासिक विवाद दलितों के राजनीतिक अधिकारों के प्रश्न पर हुआ था। यह विवाद पूना-पैक्ट के रूप में इतिहास में दर्ज है, लेकिन विडम्बना यह है कि भारत के राजनीतिक इतिहास के विद्यार्थी इस विवाद को नहीं जानते, और इसलिए नहीं जानते, क्योंकि इतिहासकारों ने इस विवाद को अपने लेखन का विषय ही नहीं बनाया। असल में इसी विवाद में आंबेडकर ने गांधी के असली जहरीले दांत देखे थे। इसी विवाद से उन्होंने गांधी को उनके वास्तविक रूप से पहचाना था, जो दलित-पिछड़ी जातियों के उत्थान के विरोधी थे।

इस विवाद का जन्म दूसरे दशक में अंग्रेजों की भारत को स्वतंत्रता देकर जाने की घोषणा से शुरू होता है। वे जाने से पहले भारत के भावी संविधान में भारत के विभिन्न संप्रदायों के राजनीतिक अधिकारों को सुनिश्चित करना चाहते थे, ताकि कोई भी यह आरोप न लगा सके कि उसके साथ न्याय नहीं हुआ। इसके लिए सभी प्रतिनिधियों से वार्ता करने के लिए लन्दन में गोलमेज सम्मेलन रखा गया था। लेकिन मसला यह था कि यह आज़ादी सिर्फ दो समुदायों – हिंदुओं और मुसलमानों – को मिलने जा रही थी। इसमें दलितों की स्थिति क्या होगी, यह स्पष्ट नहीं था। अगर आज़ादी के बाद देश की सत्ता इन्हीं दो समुदायों के हाथों में आती, तो दलितों को कोई राजनीतिक भागीदारी नहीं मिलती। उन्हें हमेशा की तरह हिंदुओं के रहमोकरम पर ही रहने के लिए छोड़ देना था। आंबेडकर इस स्थिति के लिए तैयार नहीं थे, उन्होंने कहा कि अगर हम अभी नहीं चेते, तो फिर हमें कभी कुछ नहीं मिलेगा। इधर देश भर के दलित संगठन अंग्रेजों से भारत न छोड़ने के लिए प्रस्ताव पास कर, सरकार को भेज रहे थे। ऐसा ही एक प्रस्ताव, जो मद्रास की ‘आदि द्रविड़ जनसभा’ ने पारित किया था, कैथरीन मेयो ने ‘मदर इंडिया’ में उद्धृत किया है, जो इस प्रकार था–

“हिंदुओं की जाति-व्यवस्था हमें अछूतों के रूप में कलंकित करती है। हमारा सामाजिक और आर्थिक उत्थान ब्रिटिश सरकार के आने से शुरू हुआ है और उसी के कारण जारी है। भारत में हमसे सिर्फ अंग्रेज अधिकारी, व्यापारी और ईसाई मिशनरी ही प्रेम करते हैं और बदले में हम भी उनसे प्रेम करते हैं। अत: हम लोग स्वराज के प्रबल विरोधी हैं। हम अपने रक्त की अंतिम बूंद तक अंग्रेजों को भारत की सत्ता हिंदुओं के हाथों में सौंपे जाने के प्रयास के खिलाफ लड़ेंगे। क्योंकि जिन हिदुओं ने अतीत में हम पर जुल्म किया, और आज भी कर रहे हैं, वे सत्ता पाने के बाद भी हम पर जुल्म करेंगे। अंग्रेजों के कानून ही हमारे रक्षक हैं।” (मदर इंडिया, कैथरीन मेयो, अनुवाद : कंवल भारती, फारवर्ड प्रेस, पृष्ठ 151) 

इसमें जरा भी संदेह नहीं कि अंग्रेजों से पहले किसी ने भी दलितों के दुखों की तरफ ध्यान नहीं दिया था। ये अंग्रेज ही थे, जिन्होंने दलितों के प्रति सहानुभूति दिखाई थी, और अस्पृश्यता के विरुद्ध क़ानून बनाकर उनके लिए शिक्षा के दरवाजे खोले थे। ध्यान रहे कि 1857 का ग़दर अंग्रेजों के इन्हीं सुधारों के खिलाफ उच्च वर्गों के हिंदू-मुसलमानों का विद्रोह था।

दलितों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व तभी मिल सकता था, जब दलित वर्ग राजनीति का तीसरा ध्रुव बनता, क्योंकि हिंदू और मुस्लिम ये दो स्पष्ट ध्रुव पहले ही थे। डॉ. आंबेडकर ने यही किया। उन्होंने दलित वर्ग को राजनीति का तीसरा ध्रुव और पक्षकार बनाया और गोलमेज सम्मेलन में दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन-पद्धति की मांग की। उन्होंने गोलमेज सम्मेलन में आरम्भ में ही दलितों के बारे में बताते हुए कहा कि दलित वर्ग ब्रिटिश भारत की एक बटा पांच आबादी है। यह उतनी ही बड़ी आबादी है, जितनी बड़ी इंग्लॅण्ड या फ़्रांस की है। लेकिन उसकी स्थिति सर्फों (कृषि-दास) और गुलामों से भी बदतर है। उन्होंने कहा कि दलित वर्ग ऐसे लोगों का समूह है, जो मुसलमानों से भिन्न और अलग है। हालाँकि दलितों को हिंदू माना जाता है, पर वे हिंदू समाज के अंग नहीं हैं। उन्होंने कहा कि इस सम्मेलन का इस सच्चाई से अवगत होना जरूरी है।   

सम्मेलनों की अगली बैठकों में आंबेडकर ने अपनी पृथक निर्वाचन की मांग के औचित्य, आवश्यकता और महत्व को जोरदार तरीके से स्पष्ट किया, और अंग्रेज प्रतिनिधियों की सभी शंकाओं का समाधान किया। फलत: ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने 17 अगस्त 1932 को अपने निर्णय में दलित वर्गों की मांग को स्वीकार कर लिया।

गांधी उस समय पूना की यरवदा जेल में बंदी थे। वह जेल में ही दलितों की मांगों को स्वीकार करने के खिलाफ आमरण अनशन पर बैठ गए। पूरे देश में हाहाकार मच गया। पूरे देश का गगन-मंडल गांधी के जयजयकार और आंबेडकर मुर्दाबाद के नारों से गूँज गया। गांधी ने दलीलें दीं कि इस निर्णय से हिन्दूसमाज विघटित हो जायेगा। जबकि ऐसा कुछ नहीं था। यह केवल पृथक निर्वाचन पद्धति का मामला था, जिसमें दलित प्रतिनिधियों का चुनाव दलितों के वोटों से किया जाना था। किन्तु गांधी संयुक्त निर्वाचन-पद्धति के अंतर्गत ही दलित प्रतिनिधियों का निर्वाचन चाहते थे। अनशन से जब गांधी की तबियत बिगड़ने लगी और हिंदू डाक्टरों ने उनकी स्थिति चिंताजनक बता दी, तो परिणाम यह हुआ कि एक तरफ तमाम हिंदू नेता आंबेडकर को मनाने की कोशिशें करने लगे, और दूसरी तरफ हिंदुओं द्वारा आंबेडकर को जान से मरने के धमकी भरे पत्र आंबेडकर को भेजे जाने लगे। इस पर आंबेडकर ने एक लंबा लेख ‘गांधी का उपवास’ नाम से लिखा है, जो उनकी रचनावली में शामिल है। आंबेडकर ने गांधी की सभी आशंकाओं का खंडन किया, पर आत्महत्या करने का जो दांव गांधी ने खेला था, उसके आगे आंबेडकर को बेबस होना पड़ा, क्योंकि गांधी का यह दांव बहुत बड़ा था। इसमें अगर गांधी मर जाते, तो आंबेडकर को उनका हत्यारा साबित कर दिया जाता, और हिंदुओं द्वारा न सिर्फ दलितों का भारी कत्लेआम किया जाता, बल्कि आंबेडकर की भी हत्या कर दी जाती। यह बहुत बड़ा हिंदू चक्रव्यूह था, जिससे निकलने का एक ही रास्ता था, आंबेडकर द्वारा दलित-हितों की बलि चढ़ाना। अत: आंबेडकर ने गांधी के साथ-साथ दलितों के भी कत्लेआम को रोकने के लिए गांधी के आगे झुकना पड़ा। संयुक्त निर्वाचन पद्धति के पक्ष में गांधी के अनुसार समझौता-पत्र तैयार हुआ, जिस पर 24 सितम्बर 1932 को पूना में ही दोनों पक्षों के नेताओं ने हस्ताक्षर किए। ध्यान रहे कि इस पर गांधी ने हस्ताक्षर नहीं किए थे, हालाँकि वह उसके सूत्रधार थे।

आज उसी पूना-पैक्ट के कारण विधान-मंडलों और संसद के दलित प्रतिनिधि दलितों के हित में आवाज नहीं उठाते, क्योंकि वे संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्र में दलितों के वोटों के नहीं, बल्कि सवर्णों के वोटों से जीत हासिल करते हैं।

हरिजन सेवक संघ

पूना-पैक्ट के बाद पूरे देश के गांधीवादी हिंदू नेताओं ने छुआछूत खत्म करने के संकल्प लिए, और गांधी ने दलितों को नया हरिजन नाम देकर उनके उत्थान के लिए ‘हरिजन सेवक संघ’ की स्थापना की। लेकिन उनके अछूतोद्धार का मतलब था दलितों को गांधीवादी बनाना और कांग्रेस पार्टी से जोड़ना। संघ की जिले-जिले में शाखाएं खोली गईं, पर किसी भी दलित को किसी भी शाखा का अध्यक्ष नहीं बनाया गया, यहाँ तक कि प्रधान शाखा का भी नहीं। उसके सारे प्रबंध-संचालक सवर्ण हिंदू थे, जिनमें अधिकांश ब्राह्मण थे। उनकी सारी योजनाएं दलितों के पार्टी हिंदू समाज को नहीं बदल सकीं – न दलितों का उत्थान हुआ और न छुआछूत खत्म हुई। आंबेडकर ने हरिजन सेवक संघ की तुलना भागवत कथा की पात्रा पूतना से की थी। उन्होंने लिखा है कि संघ अछूतों के लिए वही है, जो कृष्ण के लिए पूतना थी, जिसे कंस ने उन्हें मारने के लिए भेजा था। आंबेडकर के अनुसार जब दलितों ने संघ को दलितों को सौंपने की मांग की, तो गांधी ने धूर्त व्यक्ति की तरह इस मांग को अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कहा कि हरिजन सेवक संघ हिंदुओं में छुआछूत के पाप का प्रायश्चित करने का माध्यम है, और इसे चलाने का चंदा हिंदुओं से मिलता है, दलितों से नहीं, इसलिए संघ के संचालन में दलितों को कोई स्थान नहीं मिल सकता। आंबेडकर ने लिखा है कि गांधी की अस्वीकृति बर्दाश्त की जा सकती है, पर उनके तर्क इतने अपमानजनक हैं कि कोई भी स्वाभिमानी व्यक्ति इस संघ से वास्ता रखने से इनकार कर देगा। आंबेडकर ने कहा कि असली कारण यह है कि गांधी संघ के संचालन में इसलिए दलितों को सौंपना नहीं चाहते थे, क्योंकि ऐसा करने से गांधी का नियंत्रण खत्म हो जाता, और दलित वर्ग हिंदुओं की कृपा पर निर्भर रहना बंद कर देता। यह गांधी के उस प्रयोजन के विरुद्ध होता, जिसके तहत वह दलितों को हिंदू धर्म के शिकंजे में कसकर रखना चाहते थे।

गांधीवाद

गांधीवाद क्या है? और दलित वर्गों के उत्थान या विकास में उसका क्या योगदान है? इस दृष्टि से आंबेडकर ने गांधीवाद की भी आलोचनात्मक पड़ताल की है। यह आलोचना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि अनेक गांधीवादी इसे मार्क्सवाद का विकल्प तक मानते हैं। क्या गांधीवाद सचमुच मार्क्सवाद का विकल्प है? आइए, इसे आंबेडकर की दृष्टि से देखते हैं।

आंबेडकर लिखते हैं कि कुछ गांधीवादी गांधीवाद की ऐसी धारणा से अभिभूत रहते हैं, जो पूर्णतया काल्पनिक है। इस धारणा के अनुसार गांधीवाद का अर्थ है पुन: गांव की ओर लौटना, और गांवों को आत्मनिर्भर बनाना। आंबेडकर का मत है कि इस धारणा से गांधीवाद केवल क्षेत्रवाद बनकर रह जाता है। गांवों को आत्मनिर्भर बनाने का मतलब है, गांवों में वर्णव्यवस्था का अनुशासन कायम करना। महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने गांधी की इस धारणा को “गुहा मानव की ओर” कहकर मजेदार चुटकी ली थी। उन्होंने अपनी ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’ किताब में लिखा है, “यदि आप गुहा मानव की ओर लौटना चाहते हैं, तो पहले गुहा मानव बनिए। ऐसे जंगल में जाइए, जहाँ सेठ-सेठानियाँ क्या, आज की सभ्यता का जरा भी चिन्ह न हो।” (आंबेडकर की नजर में गांधी और गांधीवाद, संपादक : डॉ. सिद्धार्थ व डॉ. अलख निरंजन, फारवर्ड प्रेस, पृष्ठ 44)

आंबेडकर लिखते हैं कि गांधी का मत था कि वर्णव्यवस्था जीविकोपार्जन से संबद्ध है। कोई एक वर्ण का व्यक्ति दूसरे वर्ण का ज्ञान या कला सीख सकता है, पर जहाँ तक जीविका का संबंध है, उसे अपने वर्ण का वंशानुगत पेशा ही अपनाना चाहिए। यही गांधी का ग्रामीण आदर्श था। आंबेडकर कहते हैं कि यदि किसी ने गांधी की पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ का अध्ययन किया है, तो उसे मालूम होगा कि वह आधुनिक सभ्यता के विरुद्ध थे। उन्होंने ‘यंग इंडिया’ में लिखा था कि यदि भारत आधुनिक सभ्यता का त्याग कर दे, तो उसे लाभ ही होगा। इसका मतलब यह है कि जो भी ज्ञान-विज्ञान, स्वतंत्रता, समानता और लोकतंत्र की अवधारणाएं हैं, वे सब आधुनिक सभ्यता की देन हैं, जिनको त्यागने से ही भारत का भला है। दूसरे शब्दों में गांधी प्राचीन धर्म-सभ्यता चाहते थे, जिसमें सभी व्यक्ति अपने वर्ण के अनुसार ही कर्म करें। इस तरह गांधी धर्म-तन्त्र या राजतन्त्र के समर्थक थे, जिसमें सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक नेतृत्व ब्राह्मणों और द्विजों के हाथों में रहे, और शूद्र जातियां दास-कर्म करती हुई सेवक बनी रहें। इस वाहियात व्यवस्था का उपहास उड़ाते हुए आंबेडकर ने कहा था कि “गांधी जन्म से बनिया हैं। उनके पूर्वजों ने व्यापार छोड़कर दीवान का पद स्वीकार कर लिया था, जो ब्राह्मण का पेशा है। अपने स्वयं के जीवन में जब पेशा चुनने का अवसर आया, तो उन्होंने तराजू को छोड़कर कानून को चुना। फिर कानून को छोड़कर आधे संत और आधे राजनीतिक बन गए। उन्होंने व्यापार को कभी हाथ तक नहीं लगाया।” (वही, पृष्ठ 142)

आंबेडकर ने गांधीवाद की आर्थिक समीक्षा करते हुए लिखा कि यह कहना कि मशीनों और कारखानों के आ जाने से लाखों मजदूर बेकार हो जायेंगे, और बड़े-बड़े नगरों के विकास से धुआँ, धुल, शोरगुल, गन्दी बस्तियां, वेश्यावृत्ति, अस्वाभाविक जीवन-शैली और शारीरिक बीमारियाँ पैदा होंगी, पुराना घिसापिटा तर्क है। उन्होंने कहा कि गांधीवाद का यह विचार आदिम युग का है, जिसका मतलब है प्रकृति की ओर लौटना। उन्होंने कहा कि गांधीवाद का आर्थिक दर्शन बुरी तरह से भ्रामक है। ये बुराइयां मशीनों और आधुनिक सभ्यता के कारण नहीं हैं, बल्कि ऐसे गलत सामाजिक संगठन के कारण हैं, जिसने निजी संपत्ति और व्यक्तिगत लाभ की खोज को ही परम पवित्र लक्ष्य बना दिया है। यदि मशीनों और सभ्यता से सभी लोगों को लाभ नहीं पहुंचा है, तो इसकी दोष मशीनें और आधुनिक सभ्यता नहीं हैं। इसके लिए जरूरी है सामाजिक ढांचे में परिवर्तन करना, ताकि मशीनों से हुआ लाभ मुट्ठीभर व्यक्तियों के हाथों में सीमित न रहकर सर्वसाधारण तक पहुंच सके। (वही, पृष्ठ 85)

आंबेडकर ने कहा कि गांधी मशीनों का विरोध इसलिए करते थे कि लोगों को आत्मिक उन्नति के लिए जरा भी फुर्सत न मिले। प्राचीन व्यवस्था में ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों को अपने वर्ण-कर्म में आत्मिक उन्नति के लिए फुर्सत ही फुर्सत थी, लेकिन यह फुर्सत शूद्र जातियों को दिनभर कठोर काम करते रहने के कारण प्राप्त नहीं थी। आंबेडकर ने कहा कि यह फुर्सत कठिन श्रम के समय को कम करके ही प्राप्त हो सकती है। और इसके लिए मशीन से बेहतर और कोई तरीका नहीं है। उन्होंने कहा कि जो चीज मनुष्य और पशु में अंतर करती है, वह संस्कृति है। इसलिए सिर्फ मशीन और आधुनिक सभ्यता ही मनुष्य को पाशविक जीवन से मुक्ति दिला सकती है। इसी से निश्चिन्तता मिलेगी और एक सुसंस्कृत जीवन संभव होगा। (वही, पृष्ठ 86)

इस तरह आंबेडकर ने बताया कि गांधीवाद के आर्थिक दर्शन में मशीनों और आधुनिक सभ्यता के विरोध में कठोर श्रम पर निर्भर दलित-पिछड़ी जातियों को आत्मिक उन्नति से वंचित करने की सोची-समझी चाल है। इसलिए आंबेडकर ने कहा कि गांधीवाद उन लोगों का प्रिय दर्शन है, जो लोकतंत्र में विश्वास नहीं करते। उन्होंने कहा कि गांधीवाद उन लोगों का दर्शन है, जो मशीनों और आधुनिक सभ्यता का विरोध करके मुट्ठीभर लोगों के जीवन को ही सुसंस्कृत बनाकर ही संतुष्ट होते हैं और शेष बहुसंख्यक जनता को कठोर परिश्रम के साथ खटने के लिए छोड़ देते हैं। उन्होंने कहा कि एक लोकतान्त्रिक समाज में अधिक से अधिक मशीनीकरण तथा अधिक से अधिक सभ्यता का विकास होना चाहिए, जबकि गांधीवाद में साधारण मनुष्य को नाममात्र की मजदूरी के लिए लगातार कठिन परिश्रम करते रहना और पशुवत बने रहना होगा। उन्होंने कहा कि गांधीवाद में जो प्रकृति की ओर वापसी की पुकार है, उसका अर्थ बहुसंख्यक जनता को नग्नावस्था, मलिनता, निर्धनता और अज्ञान की ओर वापस ले जाना है। (वही, पृष्ठ 86-87)

डॉ. आंबेडकर ने गांधीवाद का विश्लेषण बहुत विस्तार से किया है। वह इतना स्पष्ट और तार्किक है कि जो भी उसे पढ़ेगा, उसके सामने गांधीवाद की वे तमाम छिपी हुई परतें उधड़ती चली जाएँगी, और लोकतंत्र के विनाश की तमाम साजिशें उजागर हो जाएँगी। उनका कहना है कि जो लोग भी गांधीवाद का अध्ययन करेंगे, वे लोकतंत्र के पक्ष में और पूंजीवाद के विरोध में गांधी के मतिभ्रमों से धोखा नहीं खायेंगे। वे इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि गांधीवाद किसी भी अर्थ में क्रांतिकारी मत की श्रेणी में नहीं आता है। वह भारत के समाधिस्थ अतीत को पुनर्जीवित और पुन: सक्रिय करने का दर्शन है। (वही, पृष्ठ 94)

समीक्षित पुस्तक : आंबेडकर की नजर में गांधी और गांधीवाद

लेखक : डॉ. बी. आर. आंबेडकर

संपादक : डॉ. सिद्धार्थ व डॉ. अलख निरंजन

प्रकाशक : फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली

मूल्य : 200 रुपए (अजिल्द), 400 रुपए (सजिल्द)

(संपादन : नवल/अनिल)


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