हर धर्म के वंचित-पसमांदा तबकों के लिए एक राष्ट्रीय आरक्षण नीति आवश्यक : कांचा इलैया शेपर्ड

‘आज देश में सरकारें देश चलाने के बदले साजिशें रच रही हैं ताकि कैसे बहुसंख्यक वर्ग, जिसमें पिछड़े, दलित, आदिवासी, पसमांदा मुसलमान, दलित ईसाई सब शामिल हैं, को शासन-प्रशासन से अलग रखा जाय। इसके लिए मौजूदा केंद्र सरकार जिस तेज़ी से सरकारी संस्थानों को प्राइवेट हाथों में सौंप रही है, उससे निजी क्षेत्रों में आरक्षण लागू किया जाना और भी ज़्यादा ज़रूरी हो गया है।’ पढ़ें, यह खबर

बीते 30 जून, 2022 को बिहार की राजधानी पटना का रवींद्र भवन सभागार दलित-बहुजन-पसमांदा समाज के लोगों से खचाखच भरा था। मौका था स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक रहे अब्दुल कय्यूम अंसारी और परमवीर चक्र विजेता अबुल हमीद की जयंती का। इस मौके पर देश के जाने-माने बहुजन चिंतक प्रो. कांचा इलैया शेपर्ड ने लोगों को अपने समाज की समस्याओं यथा अपर्याप्त प्रतिनिधित्व, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि के सवालों को लेकर अपनी बात रखने के लिए आह्वान किया। 

कांचा ने कहा कि आज देश में सरकारें देश चलाने के बदले साजिशें रच रही हैं ताकि कैसे बहुसंख्यक वर्ग, जिसमें पिछड़े, दलित, आदिवासी, पसमांदा मुसलमान, दलित ईसाई सब शामिल हैं, को शासन-प्रशासन से अलग रखा जाय। इसके लिए मौजूदा केंद्र सरकार जिस तेज़ी से सरकारी संस्थानों को प्राइवेट हाथों में सौंप रही है, उससे निजी क्षेत्रों में आरक्षण लागू किया जाना और भी ज़्यादा ज़रूरी हो गया है। उन्होंने यह भी कहा कि इसके लिए हर धर्म के वंचित-पसमांदा तबकों को लेकर एक राष्ट्रीय आरक्षण नीति का होना समय की मांग है तथा इसके लिए सभी को मिलकर सामूहिक पहल करनी ही होगी।

यह आयोजन बिहार के नौ सामाजिक संगठनों द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। इन संगठनों में ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज की बिहार इकाई, राष्ट्रीय अति पिछड़ा संघर्घ मोर्चा, सामाजिक न्याय आंदोलन बिहार, बहुजन भागीदारी आंदोलन बिहार, बहुजन चौपाल, जनक्रांति मोर्चा, सफाईकर्मी जनक्रांति परिषद, एक कौम फाउंडेशन, पिछड़ा पसमांदा मंच आदि शामिल रहे। आयोजन के दौरान लगभग सभी वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि जाति आधारित गणना को सही ढंग से संपन्न कराने तथा आबादी के हिसाब से हर स्तर पर भागीदारी के लिए राज्य व्यापी जागरुकता अभियान चलाया जाय।

कार्यक्रम के दौरान प्रो. कांचा इलैया शेपर्ड, अली अनवर व अन्य (तस्वीर साभार : नागेंद्र प्रसाद राय)

अपने संबोधन में पूर्व सांसद सह ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष अली अनवर ने कहा कि देश भर के राजनीतिक माहौल में सांप्रदायिक राजनीति अपने स्तर पर लगातार फैल रही है, जिससे सामाजिक न्याय और उससे जुड़े मुद्दे छुपते हुए नज़र आ रहे हैं। इसी चिंतन को आगे बढाने और सामाजिक न्याय को दोबारा से आमजन का मुद्दा बनाने की कोशिश को ध्यान में रखते हुए कई पसमांदा समाज के संगठनों का संयुक्त सम्मेलन का आयोजन किया गया है। आगे उन्होंने कहा कि यहां मौजूद सभी संगठन सांप्रदायिकता के खिलाफ हैं और किसी भी राजनीतिक दल को ये वहम नहीं पालना चाहिए कि हमारा समाज उन्हें आंख मूंद कर समर्थन करेगा, जो दल हमें नज़रअंदाज़ करेगा हमारा समाज भी उन्हें नज़र से उतारना बखूबी जानता है।

इस मौके पर विधान पार्षद प्रो. रामबली चंद्रवंशी ने कहा कि अपर्याप्त भागीदारी का मामला बेहद महत्वपूर्ण मामला है और यह केवल किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा कि अति पिछड़ा वर्ग की कम हिस्सेदारी भी बेहद चिंताजनक है। इसलिए आवश्यक है कि एक सामूहिक मोर्चा बने जो भारत की धर्मनिरपेक्षता में यकीन रखे और अपर्याप्त भागीदारी के अलावा शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास आदि के सवालों को लेकर जमीनी संघर्ष करे। सामाजिक न्याय आंदोलन, बिहार के संयोजक रिंकू यादव ने इस मौके पर कहा कि आज हमारे पास दो तरह की चुनौतियां हैं। एक चुनौती संविधान बचाने की है और दूसरी चुनौती जितनी जिसकी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी को लागू कराने की है। उन्होंने कहा कि आज सांप्रदायिकता की आग में देश को केवल इसलिए झोंका जा रहा है ताकि आम आदमी बुनियादी सवाल ना उठाए। इस अवसर पर ईं. हरिकेश्वर राम, सेवानिव‍ृत्त भारतीय प्रशासनिक अधिकारी तपेन्द्र कुशवाहा आदि चिंतक भी इस सम्मेलन में शामिल हुए और सभी ने अपने विचार रखें।

बहरहाल, अब्दुल कय्यूम अंसारी और शहीद अबुल हमीद की जयंती के मौके पर आयोजित इस कार्यक्रम का महत्व इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि हाल ही में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जाति आधारित जनगणना में मुस्लिम समाज की भी जाति आधारित जनगणना करने का ऐलान किया है। इसके कारण फिर एक बार मुस्लिम समाज के भीतर चल रही पसमांदा समाज की जद्दोजहद सामने आ गयी है। अब जब जाति आधारित जनगणना मुस्लिमों के भीतर भी की जाएगी तो उसके बाद इस बात के प्रमाण सामने आएंगे कि मुस्लिम समाज के ऊंचे तबके के लोगों के लिए ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उतनी उसकी भागीदारी’ वाला सवाल महत्वपूर्ण क्यों नहीं था? 

(संपादन : नवल/अनिल, इनपुट : असद शेख)


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