आरक्षण हमारा नैसर्गिक हक : रामअवधेश सिंह

‘जयप्रकाश नारायण मौन क्यों हैं? जब उनके नाम से आरक्षण का विरोध हुआ, आर्थिक आधार की वकालत की गयी। सामाजिक और शैक्षणिक आधार पर पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण को लेकर आंदोलन काफी आगे बढ़ चुका है, तो फिर वे मौन क्यों है? कारण क्या है? शायद वे भी हतप्रभ हैं।’ पढ़ें, भूतपूर्व सांसद रामअवधेश सिंह द्वारा 23 मार्च, 1978 को प्रकाशित व संपादित पत्रिका ‘बदलाव’ के प्रवेशांक का संपादकीय आलेख

रामअवधेश सिंह (18 जून, 1937 – 20 जुलाई, 2020) पर विशेष

बिहार में सरकारी नौकरियों में पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण प्राप्त करने का जो आंदोलन चल रहा है, उसके विरोध में सारे प्रेस क्यों है, उसके विरोध में सारे द्विज नेता क्यों हैं, यह बहुत गहरा सवाल है। अबतक के जितने आंदोलन सरकार विरोधी या सर कार-समर्थक उत्तर भारत में हुआ करते थे, उनके अगुजा द्विज ही हुआ करते थे। द्विजों का नेतृत्व सरकार के विरोध में भी पनपता था और सरकार के पक्ष में भी पनपता था और दोनों पक्ष के खिलाड़ी नायक द्विज ही हुआ करते थे। संयोग से पहली दफा उत्तर भारत में राजसत्ता के बदलाव की पहली लड़ाई का नेतृत्व द्विजों के हाथों से निकलकर शूद्रों के हाथों में आ गया है, यही उनको कचोटता है, सालता है। वे आज हतप्रभ हैं। वे सोचते हैं, काश! इनके आंदोलन का नेतृत्व भी हम ही लोग करते! लेकिन गये। जब जनता पार्टी के चुनाव घोषणापत्र में वादा है, संविधान में आरक्षण की व्यवस्था है, सुप्रीम कोर्ट का निर्णय है तो फिर इसको तो लागू होना ही था। होना ही था तो द्विजों के नेतृत्व में आंदोलन और संघर्ष छिड़ता तो पुनः राजसत्ता पर एकाधिकार जमाने का उन्हें मौका मिलता और गैर द्विजों को, शूद्रों को, पिछड़ी जातियों को एक बार पुनः भरमाने का अवसर मिल जाता। लेकिन जब शूद्र-नेतृत्व आगे उभरा और फिर हवा गर्मा गयी, तब ये सोचने लगे कि आखिर क्या करें? अब विरोधी पक्ष का ही वे नेतृत्व कर रहे हैं। ये लाचारी में आरक्षण विरोध का ही नेतृत्व कर रहे हैं। इनके मन में थोड़ी थोड़ी टीस है कि आरक्षण-समर्थन का नेतृत्व हम नहीं कर पाये।

उत्तर भारत में यह पहला मौका है जब कि सत्ता का संघर्ष कारगर रूप से बिहार में शुरू हुआ है और इसका असर उत्तर प्रदेश में, मध्य प्रदेश में, बंगाल में, राजस्थान में और आसाम में भी पड़ने वाला है। द्विजों का राजसत्ता में एकाधिकार टूटने वाला है और पूरी राज्य सत्ता गैर द्विजों के हाथ में आने वाली है।

आरक्षण प्राप्त करने के आंदोलन और संघर्ष के गर्भ से कई चीजें निकलने वाली हैं। संविधान में न केवल संशोधन करने से काम चलेगा, बल्कि संविधान का परिवर्तन करना पड़ेगा। अभी तक का जो भारत का संविधान बना है, निर्वाचित संविधान सभा के जरिये नहीं बल्कि मनोनीत संविधान सभा (कस्टीच्यूएंट एसेंबली) के द्वारा बना है। उस मनोनीत संविधान सभा में कुछ-एक अपवाद को छोड़कर सारे लोग अभिजात वर्ग के थे उनके मन में जाने-अनजाने संस्कारगत यह बात जरूर बैठी होगी कि समय के सरकने के साथ इस देश की दलित जातियों से नेतृत्व उभरकर अभिजात वर्ग के शोषण और दमन के खिलाफ खड़ा होकर संघर्ष के जरिए राज्य सत्ता पर कब्जा ना कर ले, इसलिए पूरे संविधान को इस ढंग से बनाया है कि दाव-पेंच पर उनके हाथों से राज्य सत्ता कैद की जा सके। राज्य सत्ता और आर्थिक सत्ता के विकेंद्रीकरण के अगुआ महात्मा गांधी की भी बात नहीं मानी गई। योजना आयोग, आईपीएस और आईएएस कैडर की अफसरों के जरिए दिल्ली की हुकूमत का दबाव राज्यों पर सर्वग्राही शक्ति की तरह बना हुआ है। संसद की सर्वोच्चता के नाम पर भारतीय कैबिनेट का अधिनायकवाद चलता है और कैबिनेट में भी एक-दो-तीन का। कभी-कभी तो एक आदमी का ही वास्तव में राज्य सत्ता पर अधिकार हो जाता है। संविधान के ढांचे में परिवर्तन करके संसदीय प्रणाली की जगह पर अध्यक्षीय प्रणाली और राजसत्ता के प्रधान का चुनाव जनता को ही करना हो तो निश्चय ही शोषित, दलित वर्ग का राजसत्ता के प्रधान के रूप में चुन लिया जाएगा और तब सही माने में आर्थिक और सामाजिक रूप से शोषितों और दलितों का कुछ भला हो सकता है। राज्य-मशीनरी पर काबिज द्विजों की संख्या घट सकती है और गैरद्विजों की हिस्सेदारी बढ़ सकती है।

रामअवधेश सिंह (18 जून, 1937 – 20 जुलाई, 2020)

अभी राज्यपाल के अभिभाषण में 26 फीसदी आरक्षण को लागू करने का ऐलान बिहार विधानसभा में होने के बाद अभिजात वर्गों के लड़कों द्वारा तोड़-फोड़ करने, रेलों और बसों को रोकने, यूनिवर्सिटी और कालेजों को बंद करवाने जुलूस और प्रदर्शन करने का कोई बुरा लक्षण नहीं, बल्कि बहुत विरोध करेंगे। जितना वह विरोध करेंगे उससे दसगुना तेज गति से अबतक के शोषित और दलित इकट्ठे होंगे। इनकी [द्विज वर्गों की] यह छटपटाहट क्रांति की प्रसव पीड़ा है। क्रांति गर्भ में है और बाहर आनेवाली है। अभिजात वर्गों के प्रेस गृह युद्ध या वर्ग संघर्ष और वर्ण संघर्ष आदि बातें बोलकर समाज में दहशत पैदा करना चाहते हैं। गृह युद्ध या वर्ग संघर्ष से हम घबराते नहीं। हम उनका स्वागत करते हैं। इन सबका लाभ अंततोगत्वा अब तक शोषित और दलितों को ही मिलने वाला है। हर गृह युद्ध मूलतः प्रतिगामी होता है। गृह युद्ध अभिजात वर्ग का तख्ता पलटता है, राजसत्ता या समाज सत्ता पर से उनका एकाधिकार उठाता है और हिस्सेदारों की हिस्सेदारी को बढ़ाता है। इसलिए अबतक के लोग जो हिस्सा हार चुके थे, उन्हें घबराने की जरूरत नहीं है। उन्हें इसका स्वागत करना चाहिए।

जयप्रकाश नारायण मौन क्यों हैं? जब उनके नाम से आरक्षण का विरोध हुआ, आर्थिक आधार की वकालत की गयी। सामाजिक और शैक्षणिक आधार पर पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण को लेकर आंदोलन काफी आगे बढ़ चुका है, तो फिर वे मौन क्यों है? कारण क्या है? शायद वे भी हतप्रभ हैं। उन्होंने सोचा होगा कि उनकी स्थिति पैगंबर की हो गयी है। संविधान से ऊपर हो गये हैं। अगर वे थोड़ी जीभ हिला देंगे तो संविधान में दी गयी व्यवस्था या चुनाव घोषणापत्र में किये गये वादे या सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी ताक पर रख दिया जाएगा और बिहार के मुख्यमंत्री उनकी इच्छा के सामने झुक जाएंगे। लेकिन श्री कर्पूरी ठाकुर ने भी अपने संकल्प और आम अवाम की भावना के साथ खड़े होकर यह बता दिया कि संविधान सबसे बड़ा है। चुनाव घोषणापत्र के प्रति वे वफादार हैं। आदमी चाहे जितना बड़ा हो, लेकिन संविधान से बड़ा नहीं है। घोषणापत्र के प्रति वफादारी ज्यादा होनी चाहिए, न कि किसी एक व्यक्ति के प्रति।

जयप्रकाशजी भी समझ नहीं पाते कि क्या करें। उन्होंने सोचा होगा कि अपनी रक्षावाहिनी और अन्य युवा संगठनों के जरिये बिहार सरकार को पुन: धमकी देकर 26 फीसदी आरक्षण को लागू होने से रोक दिया जाएगा। उनकी सोच सोच ही रही, तब तक गैर द्विजों का आंदोलन तेज हो गया। सारे बिहार में फैल गया। अब वे भीष्म पितामह की तरह अनैतिक मौन धारण किये हुए हैं। उनको साफ-साफ बोलना चाहिए कि वे द्विजों समर्थन में खड़े रहेंगे या गैर द्विजों के समर्थन में।

गांधी मैदान में 12 मार्च, 1978 को जो घटना घटी, वह सर्वथा निंदनीय है। जो ‘जयप्रकाश जिन्दाबाद’ नारा लगा रहे थे, वही जगजीवन राम मुर्दाबाद नारा लगा रहे थे और उन्हीं लड़कों ने पुनः जयप्रकाश पर रोड़े-पत्थर भी फेंके।

अगर बिहार के मुख्यमंत्री श्री कर्पूरी ठाकुर की जगह पर कोई द्विज होता तो इतनी हुल्लड़बाजी नहीं होती। आरक्षण भी दिया जाता और उसका श्रेय बिहार के मुख्यमंत्री को समेट कर जाता।

द्विज मुख्यमंत्री होने पर या तो आरक्षण नहीं होता या होता तो बिना चिल्ल-पों के हो जाता। या कुछ नौटंकी करके छोटे-मोटे आंदोलन करके आरक्षण दे दिया जाता। आज अभिजात वर्गों की छाती कसक रही है। आरक्षण तो मिला ही, साथ ही सूबे की राजनीति और उसका नेतृत्व हमेशा-हमेशा के लिए द्विजों के हाथ से निकल गया।

(बदलाव, वर्ष 1 अंक 1 23 मार्च 1978 से साभार)

(प्रस्तुति : अरुण नारायण, संपादन : नवल)


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