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बगावत हिंदुत्व के बजाय ओबीसी के मुद्दे पर क्यों नहीं?

‘नंगे से खुदा डरे’ इस आधार पर मविआ सरकार में अजीत पवार का महत्व बढ़ गया। वित्तमंत्री और उपमुख्यमंत्री के दोनों महत्वपूर्ण पद इसीलिए उनको मिले। अजीत पवार नाराज हुए तो वे किसी दिन अचानक भोर में उठकर फड़णवीस के द्वार पर जा बैठेंगे। इसी एकमात्र दहशत के कारण मविआ के विधायक मुंह बंद करके सब कुछ सहन कर रहे थे। बता रहे हैं श्रावण देवरे

वर्ष 2019 में अजीत पवार के साथ भोर में किया गया शपथ ग्रहण का षड्यंत्र फेल होने के बाद आगे के नये षड्यंत्र की जिम्मेदारी फड़णवीस ने अजीत पवार के ऊपर ही डाली। महाविकास आघाड़ी (मविआ) सरकार के लिए एक से डेढ़ वर्ष या ज्यादा से ज्यादा दो वर्ष में फड़णवीस और अजीत पवार दोनों ऐसी परिस्थिति का निर्माण करें ताकि शिवसेना विधायक अपने आप फड़णवीस की शरण में चले जाएं। बाहर से फड़णवीस ने ईडी और सीबीआई का दबाव बनाकर काम शुरू किया और मविआ सरकार के अंदर से अजीत पवार ने शिवसेना विधायकों के साथ अपमानजनक व्यवहार करके उन्हें बगावत के लिए प्रेरित किया। इस प्रकार का यह षड्यंत्रकारी एजेंडा था। अजीत पवार जाति से मराठा सामंतशाह होने के कारण शिवसेना विधायकों का अपमान करने में कहीं भी कम नहीं पड़ेंगे, इसका भरोसा पेशवाई ब्राह्मण फड़णवीस को था।

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लेखक के बारे में

श्रावण देवरे

अपने कॉलेज के दिनों में 1978 से प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े श्रावण देवरे 1982 में मंडल कमीशन के आंदोलन में सक्रिय हुए। वे महाराष्ट्र ओबीसी संगठन उपाध्यक्ष निर्वाचित हुए। उन्होंने 1999 में ओबीसी कर्मचारियों और अधिकारियों का ओबीसी सेवा संघ का गठन किया तथा इस संगठन के संस्थापक सदस्य और महासचिव रहे। ओबीसी के विविध मुद्दों पर अब तक 15 किताबें प्राकशित है।

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