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आरएसएस का बनावटी भोलापन 

मोहन भागवत ने तीसरी भ्रांति यह फैलायी कि भारत अहिंसा का पुजारी है, दुर्बलता का नहीं, जबकि सच यह है कि वैदिक काल से लेकर आज तक भारत में हिंसा ही मुख्य तत्व रहा है। अहिंसा बहुत थोड़े समय के लिए, केवल अशोक के शासनकाल में स्थापित हुई, उसके बाद, ब्राह्मण साम्राज्य कायम होने के बाद, भारत में हिंसा ही उनके धर्म और राज्य का मुख्य सिद्धांत रहा है। बता रहे हैं कंवल भारती

गत 14 अगस्त, 2022 को आज़ादी के तथाकथित अमृत महोत्सव की पूर्व संध्या पर दो भ्रांतियां आरएसएस और उसकी राजनीतिक पार्टी भाजपा के मंचों से एक साथ बोले गए। आरएसएस के सरसंघसंचालक मोहन भागवत ने मुंबई में और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राजधानी दिल्ली में खुलकर भ्रांतियां फैलायीं। मोहन भागवत ने पहली भ्रांति यह फैलायी कि दुनिया विविधता के प्रबंधन के लिए भारत की ओर देख रही है। उन्होंने कहा कि भारत जिस तरीके से विविधता को समेटे हुए है, उसके लिए दुनिया उसकी सराहना करती है।

दूसरी भ्रांति, मोहन भागवत ने जाति और वर्णव्यवस्था की आलोचना करते हुए बोला कि “ऐसी कई ऐतिहासिक घटनाएं हुई हैं, जो हमें कभी नहीं बताई गईं और न ही सही तरीके से सिखाई गईं। जिस स्थान पर संस्कृत व्याकरण का जन्म हुआ, वह भारत में नहीं है। क्या हमने कभी एक सवाल पूछा? हम पहले ही अपने ज्ञान को भूल गए थे, बाद में विदेशी आक्रमणकारियों ने हमारी भूमि पर कब्जा कर लिया। हममें मतभेद पैदा करने के लिए अनावश्यक रूप से जातियों की खाई बनाई गई, जबकि वर्णव्यवस्था काम के लिए बनाई गई व्यवस्था थी।”

तीसरी भ्रांति, मोहन भागवत ने यह फैलायी कि भारत अहिंसा का पुजारी है, दुर्बलता का नहीं।

असल में होता यह है कि जब ये लोग भ्रांति फैलाते हैं तो अपने समर्थकों के बीच में बोलते हैं, और बोलकर साफ़ निकल जाते हैं। उनके समर्थक न उनसे सवाल करते हैं और न सवाल करना जानते हैं। उनका ज्ञान भी इतना नहीं होता कि वे उनके झूठ को पकड़ सकें।

मोहन भागवत की पहली भ्रांति पर विचार करते हैं। वैसे यह अकेले केवल मोहन भागवत का ही झूठ नहीं है, बल्कि आरएसएस और भाजपा के सभी नेता इसी तरह का राग अलापते हैं। यह झूठ और भ्रांति है कि “दुनिया विविधता के प्रबंधन के लिए भारत की ओर देख रही है, और भारत जिस तरीके से विविधता को समेटे हुए है, उसके लिए दुनिया उसकी सराहना करती है।” कौन-सी दुनिया सराहना करती है, उस देश का नाम भी अगर मोहन भागवत बता देते, तो अच्छा होता! सच तो यह है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ-साथ अमेरिका की संसद तक में दलितों और अल्पसंख्यकों पर भारत में किए जा रहे जुल्मों की निंदा की जा चुकी है। भारत में विविधता का प्रबंधन कैसा है, यह भारत के दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के सिवा कौन बेहतर ढंग से जान सकता है, जिनके ऊपर रोज जुल्म हो रहे हैं? आदिवासियों के साथ क्या नहीं हो रहा है? क्या उन्हें जल-जंगल-जमीन से बेदखल करने की दमनात्मक कार्रवाई नहीं की जा रही है? क्या सरकार के जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने वाले आदिवासी कार्यकर्ताओं का नक्सलवाद के नाम पर दमन नहीं किया जा रहा है? दलितों के साथ जो बर्बर व्यवहार यहां के ब्राह्मण शासक वर्ग द्वारा निरंतर किया जा रहा है, क्या वह कुशल प्रबंधन है? जिन ब्राह्मणों की पांच प्रतिशत आबादी भी ठीक से नहीं है, उन्हें हर क्षेत्र में शत-प्रतिशत पदों पर नियुक्त किया जा रहा है, और दलित-पिछड़ी जातियों के लिए शिक्षा और नौकरियों के दरवाजे बंद किए जा रहे हैं, क्या वह कुशल प्रबंधन है? क्या हिंसा, दमन और आतंक के बल पर विविधता को दबाकर रखने का नाम कुशल प्रबंधन है? माफ कीजिए, भागवत जी, यह दमन है, कुशल प्रबंधन नहीं है, और दुनिया का कोई भी देश इस दमन की सराहना नहीं कर सकता और ना ही किसी ने की है।

अब दूसरी भ्रांति– “हममें मतभेद पैदा करने के लिए अनावश्यक रूप से जातियों की खाई बनाई गई, जबकि वर्णव्यवस्था काम के लिए बनाई गई व्यवस्था थी।” इसमें दो बातें हैं, पहली यह कि काम के लिए वर्णव्यवस्था बनाई गई, और दूसरी यह कि मतभेद पैदा करने के लिए जातियों की खाई बनाई गई। मोहन भागवत यह तो स्वीकार करते हैं कि वर्णव्यवस्था जैसी वाहियात और अवैज्ञानिक व्यवस्था के निर्माता ब्राह्मण हैं, पर यह भी कहते हैं कि उन्होंने यह व्यवस्था काम के बंटवारे के लिए बनाई थी। पहली बात यह कि काम के आधार पर मानव समाज का बंटवारा करने का जलील काम वही ब्राह्मण कर सकता है, जो राजा हो और विभाजित मानव समाज उसके अधीन हो। श्रम के विभाजन का यह जलील काम कोई भी राजा कानून बनाकर बलपूर्वक उसका पालन कराकर ही कर सकता है। उसके बिना यह काम संभव ही नहीं है। इतिहास में ऐसे अत्याचारी राजा का नाम पुष्यमित्र शुंग के रूप में मिलता है। यह पुष्यमित्र शुंग ही इस अवैज्ञानिक वर्णव्यवस्था और ऊंच-नीच की अमानवीय समाज-व्यवस्था का निर्माता है, जिसके राज में मनुस्मृति नाम से ब्राह्मण कानून बनाया गया। इस व्यवस्था को काम के लिए बनाई गई व्यवस्था कोई विवेक-शून्य व्यक्ति ही कह सकता है, जो प्रकृति को अपने अनुसार चलाने का दंभ पाले हुए हैं। लेकिन जिसके पास दिमाग है, वह प्रकृति के नियम में विश्वास करता है, जिसके अनुसार बुद्धि, कौशल और कर्म से कोई भी व्यक्ति न ब्राह्मण पैदा होता है, न क्षत्रिय पैदा होता है, न वैश्य पैदा होता है, और न शूद्र। इसे भारत के आधुनिक युग ने, जिसे ब्राह्मण कलियुग कहते हैं, अच्छी तरह साबित भी कर दिया है कि वर्णव्यवस्था अवैज्ञानिक और अप्राकृतिक व्यवस्था है, अन्यथा, कोई ब्राह्मण भारतीय सेना का प्रमुख कैसे बन गया? कोई क्षत्रिय प्रोफेसर कैसे बन गया? कोई शूद्र, जैसे रामदेव, व्यापार कैसे कर रहा है? कोई दलित, जिसे ब्राह्मणों ने अछूत कहा, किसी विश्विद्यालय का कुलपति कैसे बन गया? कलियुग की प्राकृतिक गति ने ब्राह्मणों की वाहियात वर्णव्यवस्था को एक झटके में धराशायी कर दिया। लेकिन चूंकि इस कलियुग में एक बार फिर ब्राह्मणों के हाथों में शासन-सत्ता आ गई, इसलिए वे अपने उच्चता के झूठे दंभ और सत्ता पर अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए जातिव्यवस्था को जीवित रखे हुए हैं, जिसके अंतर्गत वे दलितों, आदिवासियों और ईसाई-मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाए हुए हैं। लेकिन मोहन भागवत यह कहकर कि “विदेशी आक्रमणकारियों ने हमारी भूमि पर कब्जा कर लिया और हममें भेद पैदा करने के लिए जातियों की खाईयां पैदा कर दीं” उल्टा चोर कोतवाल को डांटने की कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। जब वर्णव्यवस्था का निर्माता ब्राह्मण है, तो जातियों का निर्माण कोई बाहर से आकर कैसे करेगा? मोहन भागवत जी किसे बेवकूफ बना रहे हैं? जातियों की खाईयां भी वर्णव्यवस्था के ही गर्भ से पैदा हुई हैं। जब ब्राह्मण ने स्वयं को एक बंद वर्ग में बदल लिया, और अपने को जन्म से ब्राह्मण मानने लगा, तो अन्य वर्णों ने भी इसी का अनुकरण किया, और इसी से जातियों का विकास हुआ। मोहन भागवत की सबसे बड़ी भ्रांति कि वह जातियों के निर्माता बाहर से आए आक्रमणकारियों को ठहराते हैं, जबकि बाहर से आने वाला कोई भी दल, चाहे वह मुसलमानों का हो, और चाहे अंग्रेजों का, उनके रक्त में जातिवाद है ही नहीं। वर्णव्यवस्था और जातिवाद किस चिड़िया का नाम है, इसे वे लोग जानते भी नहीं थे, उन्होंने भारत में आकर ही हिंदुओं के जातिवाद को देखा, और उसे अमानवीय महसूस किया, क्योंकि वे सभी विदेशी लोग समानता और बंधुता के सिद्धांत में विश्वास करने वाले थे।

मोहन भागवत, आरएसएस प्रमुख

मोहन भागवत ने तीसरी भ्रांति यह फैलायी कि भारत अहिंसा का पुजारी है, दुर्बलता का नहीं, जबकि सच यह है कि वैदिक काल से लेकर आज तक भारत में हिंसा ही मुख्य तत्व रहा है। अहिंसा बहुत थोड़े समय के लिए, केवल अशोक के शासनकाल में स्थापित हुई, उसके बाद, ब्राह्मण साम्राज्य कायम होने के बाद, भारत में हिंसा ही उनके धर्म और राज्य का मुख्य सिद्धांत रहा है। ऐसा कोई राज्य नहीं था, जहां नर-बलि और पशु-बलि के अनुष्ठान न होते हों। ब्राह्मणों ने धर्म के नाम पर इस देश में इतनी हिंसा की कि उसको सही ठहराने के लिए उन्हें ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’ का नारा गढ़ना पड़ा। लेकिन यह सारी हिंसा ब्राह्मणों ने देश के भीतर ही अपना वर्चस्व कायम करने के लिए कमजोर लोगों पर की, जैसे उन्होंने दलितों व अन्य अल्पसंख्यक धर्मावलंबियों का नरसंहार किया, जो कमजोर लोग हैं। हिंदू अपने घर में शेर बनकर रहते हैं, लेकिन घर के बाहर बुद्ध की आड़ लेकर छिपते फिरते हैं। यही कारण है कि अशोक के समय के भारत को वे अखंड नहीं रख सके, क्योंकि वर्णव्यवस्था के योद्धा क्षत्रिय किसी विदेशी आक्रांता का मुकाबला करने में सक्षम ही नहीं थे, उनके विपरीत, ब्राह्मणों-बनियों का काम लड़ने का था नहीं, शूद्र तो खैर, सेवक ही थे, वे क्या करते। परिणामत: आक्रांता जिस रास्ते से भी भारत में घुसे, उन्हें सुरक्षित रास्ता मिला और सबको रौंदते हुए यहां के शासक बन गए। और मोहन भगवत जी, संस्कृत व्याकरण का जन्म जिस गांधार में हुआ था, वह भारत का ही अंग था। लेकिन आज वह भारत में नहीं है, क्योंकि ब्राह्मणों की वर्णव्यवस्था ने एक अक्षम और कायर हिंदू समाज बनाया, जो भारत की सीमाओं को सुरक्षित नहीं रख सका।

अब अमित शाह की भ्रांतियों पर भी कुछ बात कर ली जाए। हालांकि यह भी आरएसएस की कारखाने में ही गढ़ी गई हैं, भगवाई नेता तो सिर्फ उसे दोहराते हैं। उन्होंने कहा कि भारत के विभाजन के लिए जवाहरलाल नेहरू और वामपंथी जिम्मेदार हैं। नेहरू के साथ वामपंथ का नाम इसलिए जोड़ा गया, क्योंकि वह वामपंथी विचारधारा के व्यक्ति थे। लेकिन इस भ्रांति को बंगाल के विभाजन से समझना होगा। वर्ष 1905 में लार्ड कर्जन ने बंगाल के विभाजन की घोषणा की थी। इस विभाजन में बंगाल दो प्रांतों में बंट गया था– पूर्वी बंगाल और पश्चिमी बंगाल। पूर्वी बंगाल एक प्रकार से मुस्लिम राज्य के गठन का ही प्रयास था, क्योंकि असम के भागों को छोडकर यह एक मुस्लिम बहुल राज्य ही था। हिंदुओं ने इस योजना का प्रबल विरोध किया, जिसके परिणामस्वरूप, ब्रिटिश सरकार हिंदुओं के विरोध के आगे झुक गई, और उसने बंगाल के विभाजन को वर्ष 1911 में रद्द कर दिया, क्योंकि मुसलमान अपनी आवाज उठाने के लिहाज से काफी कमजोर थे। डॉ. आंबेडकर ने लिखा है कि मुस्लिम राज्य के रूप में पूर्वी बंगाल हिंदुओं को इसलिए स्वीकार नहीं था, क्योंकि वहां उद्योग, व्यापार, शिक्षा-प्रतिष्ठान सब उच्च हिंदुओं के हाथों में थे। भारत के विभाजन में भी पाकिस्तान एक अलग मुस्लिम देश था। भारत के हिंदू इसका भी आर्थिक आधार पर विरोध कर रहे थे, क्योंकि भारत के जो इलाके पाकिस्तान में जा रहे थे, वहां भी उद्योग, व्यापार, शिक्षा-प्रतिष्ठान और तमाम संसाधनों पर उच्च हिंदुओं का ही कब्जा था। लेकिन चूंकि इस बार पाकिस्तान के लिए मुस्लिम आवाज काफी मजबूत थी, इसलिए हिंदुओं का विरोध विभाजन को नहीं रोक सका।

आरएसएस के नेता जानबूझकर अनजान बनते हैं। क्या वे नहीं जानते हैं कि भारत के विभाजन की पटकथा तब लिखी गई थी, जब 1925 में लाला हरदयाल ने स्वराज की हिंदू योजना तैयार की थी, और हिंदू महासभा के नेता सावरकर दो राष्ट्र का सिद्धांत लेकर आए थे? क्या उन्हें नहीं मालूम कि सावरकर भारत में हिंदूराष्ट्र कायम करना चाहते थे, जिसमें मुसलमान दोयम दर्जे का नागरिक बनकर रह सकते थे? क्या मुसलमान एक ऐसे हिंदू राष्ट्र में रह सकते थे, जिसमें उनकी हैसियत दोयम दर्जे के नागरिक की हो? इसलिए मुस्लिम लीग ने सावरकर के दो राष्ट्र के सिद्धांत से ही सबक लेकर अलग मुस्लिम राष्ट्र के लिए पाकिस्तान की मांग की, जिसके लिए सिर्फ हिंदुओं की हिंदू राज्य की घोषणा ही जिम्मेदार थी। विभाजन पर मगरमच्छ के आंसू बहाने वाले आरएसएस के मोहन भागवत क्या अखंड भारत के मुसलमानों को सत्ता में भागीदारी देते? आज भारत में बीस करोड़ मुसलमान हैं, जिनके खिलाफ आरएसएस और भाजपा के नेता रात-दिन नफ़रत फैला रहे हैं, अगर विभाजन न होता, तो इन बीस करोड़ में 22 करोड़ मुसलमान और जुड़ जाते। आज बीस करोड़ भारतीय मुसलमान हिंदू राष्ट्र की नफ़रत और हिंसा का सामना कर रहे हैं, क्या बयालीस करोड़ मुसलमान इस हिंसा और उपेक्षा को सहन कर लेते?

(संपादन : नवल/अनिल)

 

लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आम्बेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’ ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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