‘नाली पर मोची’ : उपेक्षितों का जीवंत दस्तावेज

“बनारस शहर के राजघाट, मच्छोदरी, मैदागिन, मुकीम गंज, चौक, गोदौलिया, लंका, कैंट स्टेशन से चलकर आप कहीं भी चले जाइए, मोचियों के बैठने का स्थान नालियों के ठीक ऊपर है। चौक से दालमंडी की ओर जाने वाले रास्ते पर जहां मोची बैठते हैं, उनके ठीक सर पर सरकार का बनवाया हुआ पेशाब घर है। वहां इतनी बदबू है कि एक मिनट खड़ा नहीं रहा जा सकता। वहां मोची कैसे सुबह से रात तक बैठे रहते हैं?” डॉ. मंजू देवी की किताब ‘नाली पर मोची’ का पुनर्पाठ कर रहे हैं कंवल भारती

कुछ लोग बिना शोर-शराबे के खामोशी से बेहतर और महत्वपूर्ण काम कर लेते हैं, लेकिन वे चर्चा में नहीं आ पाते। ऐसी ही एक शख्शियत डॉ. मंजू देवी हैं। वह उत्तर प्रदेश के बनारस में रहती हैं, और पिछड़े वर्ग में अति निर्धन, भूमिहीन एवं स्वतंत्रता सेनानी परिवार की पृष्ठभूमि से आती हैं। मंजू देवी ने 2006 में बनारस शहर के मोचियों का सर्वे किया था, जो पुस्तकाकार रूप में वर्ष 2009 में राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ। यह साहित्यिक ही नहीं, सामाजिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण कृति है, पर अफसोस कि इसकी कहीं चर्चा नहीं हुई। मंजू देवी की इस किताब का नाम है– “आजादी पर उठते सवाल : नाली पर मोची”। यह सचमुच गजब का काम है, मोची के जीवन पर इतना बारीक और गहन विश्लेषण हिंदी में मैंने पहली बार देखा। मोची के काम और जीवन से जुड़ा कोई सवाल उन्होंने छोड़ा नहीं है।

शुरुआत में ही वह दिल को झकझोर देती हैं। अपनी ‘दो-चार बातें’ में वह लिखती हैं– “इस पुस्तक का उद्देश्य मोचियों के जीवन की वास्तविक स्थितियों की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट कराना है। हमारे आस-पास ऐसी बहुत-सी घटनाएं घटित होती हैं, जिन्हें हम देखते हैं, समझते हैं, सुनते हैं, फिर भी हमारी संवेदनाओं में कोई बदलाव नहीं होता है। हमारे अंदर कोई हलचल पैदा नहीं होती।” वह आगे लिखती हैं– “पुस्तक तैयार करने के लिए बनारस के मोचियों से मिलकर व्यापक पूछताछ की गयी। गरीबी की मार सह रहे मोचियों के पास कोई पूंजी नहीं थी, उन्हें अपने जीवन में बदलाव की कोई संभावना नहीं दिख रही थी। घंटों साथ बैठकर उनका दुःख-दर्द बांटा गया। उनके मन में उठ रहे सवालों का जवाब दिया गया। उन्हें सलाह दी गयी कि रास्ता खुद ढूंढना होगा। अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी।”

अक्सर लोग ख्याति या डिग्री के लिए किताबें लिखते हैं, पर मंजू देवी ने यह काम अपनी संवेदना के लिए किया। वह लिखती हैं– “शहर में नालियों के ऊपर (लोहे का) तीनटंगा, रांपी, धागा, ब्रुश, पालिश आदि की पेटी लेकर बैठे मोचियों को देखकर यह पुस्तक लिखने का ख्याल आया। पुस्तक न तो किसी विश्वविद्यालय से भारी-भरकम डिग्री प्राप्त करने के लिए लिखी गयी है, न (इसमें) शब्दजाल गढ़ने का प्रयास किया गया है।”

मंजू देवी की यह किताब मोचियों के जीवन और हालात को रेखांकित करते हुए लोकतंत्र और आजादी दोनों को ही कटघरे में खड़ा करती है। यह दलितों के पुनर्वास और कल्याण के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च करने वाली सरकारों को तो आईना दिखाती ही है, दलित लेखकों, चिंतकों और बुद्धिजीवियों के लिए भी एक जीवंत तस्वीर पेश करती है। मंजू देवी ठीक ही कहती हैं– “हाशिए पर खड़े व्यक्ति की जिंदगियों से जुड़ी निर्मम-कठोर सच्चाइयां उजागर करके (यह पुस्तक) नीति बनाने वालों को रास्ता दिखायेगी।” वह लिखती हैं– “भारतवर्ष में जो आजादी आयी, उसका इन मोचियों से कुछ लेना-देना नहीं है। वे गांवों में जब जमीदारों के खेतों पर काम करने जाते थे, तो उनका आतंक बर्दाश्त के बाहर था। उस आतंक को सहने के बाद भी (उन्हें) दो जून की रोटी नहीं मिल पाती थी।” वह एक मोची की आपबीती बताती हैं– “रीवा से शहर में आकर जब एक व्यक्ति ने मोची का काम शुरू किया, तो उसकी खुशी कल्पना के बाहर थी, क्योंकि उसे अब दो जून की रोटी मिल रही थी। यह कैसी आजादी है?”

डॉ. मंजू देवी ने अपने अध्ययन की शुरुआत बनारस के मोचियों से की है। बनारस में ‘मोचियों का संसार’ बहुत मार्मिक और दयनीय है। वह लिखती हैं– “शहर के राजघाट, मच्छोदरी, मैदागिन, मुकीम गंज, चौक, गोदौलिया, लंका, कैंट स्टेशन से चलकर आप कहीं भी चले जाइए, मोचियों के बैठने का स्थान नालियों के ठीक ऊपर है। चौक से दालमंडी की ओर जाने वाले रास्ते पर जहां मोची बैठते हैं, उनके ठीक सर पर सरकार का बनवाया हुआ पेशाब घर है। वहां इतनी बदबू है कि एक मिनट खड़ा नहीं रहा जा सकता। वहां मोची कैसे सुबह से रात तक बैठे रहते हैं?” वह पूछती हैं– “क्या अपने सामानों के साथ बैठने के लिए थोड़ी-सी जगह नहीं होनी चाहिए?” उन्हें पूरे शहर में एक भी मोची नहीं मिला, जिसके पास बैठने के लिए साफ-सुथरा स्थान हो। उन्हें आश्चर्य होता है कि इस मांग को लेकर कोई मोची न तो सरकार से मांग करता है और न नेताओं से शिकायत। वह लिखती हैं– “सभी का अपना साहस और आत्मविश्वास है। अभाव, अन्याय और उत्पीडन की अंधेरी गुफा से बाहर निकलने के लिए सभी मोची अपना दीपक स्वयं बने हुए हैं।”

डॉ. मंजू देवी की किताब ‘नाली पर मोची’ का आवरण पृष्ठ

मोचियों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति के सर्वे में डॉ. मंजू देवी के तथ्य व्यथित करने वाले हैं। वह लिखती हैं कि बनारस में मोचियों के रहने का अपना बसेरा तक नहीं है। उनके आंकड़े बताते हैं कि 27 प्रतिशत मोची अपनी रात सड़कों पर और 20 प्रतिशत स्टेशन पर गुजारते हैं, जबकि 9 प्रतिशत मोची अपने रिश्तेदारों के यहां, तो 35 प्रतिशत किराये के घरों में रहते हैं और ऐसे मोची, जिनके अपने घर हैं, वे केवल 9 प्रतिशत ही हैं। उनकी दिन-भर की आमदनी के आंकड़े भी संतोषजनक नहीं हैं। वह लिखती हैं– “10 प्रतिशत मोची 20 से 30 रुपए रोज, 25 प्रतिशत मोची 31 से 50 रुपए रोज, 50 प्रतिशत मोची 51 से 70 रुपए रोज, 10 प्रतिशत मोची 71 से 100 रुपए रोज और 5 प्रतिशत मोची ही 100 रुपए से ऊपर रोज कमा पाते हैं।”

मोचियों की शैक्षिक स्थिति के बारे में मंजू देवी बताती हैं कि शहर के जिन मोचियों से वह मिलीं, उनमें शिक्षा का स्तर काफी कम था। उनमे अधिकांश गरीबी के कारण नहीं पढ़ सके। कोई चौथी तक ही पढ़ सका, तो किसी के सिर पर बचपन में ही घर की जिम्मेदारियों का बोझ था, इसलिए नहीं पढ़ सका। सर्वे के अनुसार जो चार्ट उन्होंने प्रस्तुत किया है, उनमें 40 प्रतिशत मोची निरक्षर हैं। साक्षर मोचियों की संख्या दस प्रतिशत है, जो दसवीं तक पढे़ हैं, उनकी संख्या पांच प्रतिशत और दसवीं से ऊपर पढ़ने वाले मोची केवल दो ही प्रतिशत हैं। शिक्षा की इस बदतर स्थिति पर मंजू देवी सही सवाल उठाती हैं– “ये नवोदय विद्यालय आखिर किसके लिए खोले गए हैं? क्या पूरे समाज में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है, जो इन्हें ऐसे विद्यालयों की जानकारी दे सके? क्या कोई ऐसा स्कूल नहीं खोला जा सकता, जहां समाज की मुख्यधारा से कटे लोगों को स्कूल भेजा जा सके? एक ऐसा स्कूल जहां भेदभाव न हो? घोटाला करने वाले सफेदपोश न हों?” 

डॉ. मंजू देवी ने मोचियों के परिवारों की स्थिति का भी जायजा लिया है। वह लिखती हैं कि गरीबी के कारण इन मोचियों के परिवार की बालिकाओं और स्त्रियों की शिक्षा पुरुषों से भी कम है। वे गरीबी से इस कदर ग्रस्त हैं कि अपनी लड़कियों की शिक्षा की बात करना भी उन्हें पसंद नहीं है।

डॉ. मंजू देवी के अनुसार इन मोचियों की सबसे बड़ी समस्या उनके शौच और नहाने-धोने की है। वह लिखती हैं– “बनारस जैसे भीड़-भाड़ वाले शहर में नाली पर बैठ कर दो वक्त की रोटी तो उन्हें मिल जाती है, पर पानी और शौच के लिए उन्हें बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं।” वह गिरजाघर चौराहे पर कूड़े के ढेर के बगल में बैठे फूलचंद का बयान दर्ज करती हैं, जिसमें वह कहता है– “हम तीस वर्षों से यहाँ बैठे हैं। शौचालय के लिए हमलोगों को बहुत परेशानी होती है। पांच लड़कियां और एक लड़का है। पाखाना करने के लिए हम लल्लापुर से पितरकुंडा या औरंगाबाद पानी की टंकी पर जाते हैं। सार्वजनिक शौचालय में दो रुपया प्रति व्यक्ति लगता है। बच्चों से एक रुपया ही लेते हैं। घर में न तो इतनी जगह है और ना ही इतना पैसा है कि शौचालय बनवा सकें। हमलोग किसी तरह जीवन बिता रहे हैं।” यही कहानी कैंट स्टेशन के राजाराम, चौकाघाट के दिनेश राम, कबीर चौरा के विकलांग जुगुल, मैदागिन के धूलबटोर और कोतवाली थाना के पीछे की टंकी के रामकिशुन की है। ‘सबसे दयनीय स्थिति’, मंजू देवी की दृष्टि में, ‘उन मोचियों की है, जो दालमंडी के नुक्कड़ पर बने पेशाबघर के पास बैठते हैं। कोई व्यक्ति जहां एक मिनट खड़ा नहीं रह सकता, वहां वे पूरे दिन बैठ कर काम करते हैं। 

डॉ. मंजू देवी स्वतंत्रता का उपभोग कर रहे नागरिकों से सवाल करती हैं– “बनारस जैसे शहर के प्रतिदिन बदलते स्वरूप में आए दिन दो-चार नये मंदिर बनते देखे जा सकते हैं। इस शहर में क्या कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है, जो इनकी मूलभूत समस्याओं की ओर ध्यान दे? देश स्वाधीन है, पर हम जिस समाज में रह रहे हैं, उसमें मौलिक परिवर्तन नहीं हुआ है। आज मूल प्रश्न केवल विकास का नहीं है, बल्कि सामान्य लोगों की रोजी-रोटी का है।” वह आगे लिखती हैं– “इन अभागे मोचियों के लिए शौच के स्थान खेत-मैदान (7.5 प्रतिशत), रेलवे स्टेशन (10 प्रतिशत), लाइन पार (10 प्रतिशत), गंगा का किनारा (7.5 प्रतिशत) और सार्वजनिक शौचालय (50 प्रतिशत) हैं।”

स्वच्छता, रहन-सहन और भोजन के अपने अध्ययन में डॉ. मंजू देवी का कहना है कि जिन मोचियों से भी वह मिलीं, सबने बताया कि वे प्रतिदिन नहाते हैं, लेकिन उनका काम जिस तरह का है, उसमें गंदगी हो ही जाती है। वह लिखती हैं– “मोचियों के लिए स्वच्छता एक स्वप्न की तरह है। गंदगी ही उसकी सबसे बड़ी मित्र है। जहां रहने के लिए जगह न हो, बैठने के लिए नालियों, पेशाबघर का सहारा हो, वहां स्वच्छता की बात करना ही बहुत बड़ा मजाक है। जिन मैले-कुचौले कपड़ों के साथ वह अपना जीवन बसर कर 50-60 रुपए रोज कमा लेता है, वहीं उसके लिए शाम की रोटी का सवाल सफाई से बहुत ऊपर होता है।” वह उन मोचियों के घर के हालात भी बयान करती हैं, जो किराये पर घर लेकर रहते हैं। वह लिखती हैं– “अधिकांश मोचियों के पास रहने के लिए छोटा अंधेरा कमरा है। कमरे गंदे हैं, उनमें न जाने कितने वर्षों से पुताई नहीं हुई है। एक ही कमरे में उन्हें सब-कुछ करना पड़ता है। जहां पांच-छह लोग मिलकर एक कमरा लेकर रहते हैं, वहां तो स्थिति और भी बुरी है। रोजी-रोटी की चिंता में उनके पास समय नहीं होता कि सफाई पर ध्यान दें। वह बताती हैं कि रीवा, नयी गढ़ी से रोजी-रोटी की तलाश में आकर ज्ञानपुर में रहने वाले बैजनाथ के कमरे में तो खिडकी भी नहीं है। पर उसे खुशी है कि दोनों वक्त खाना मिल जाता है। घरों में रहने वाले मोचियों की पानी की समस्या भी विकट है। वह बताती हैं कि केवल तीन प्रतिशत मोचियों के घरों में ही नल है, बाकियों को काफी दूर से पानी लेकर आना पड़ता है। दशाश्वमेध घाट पर बैठने वाले उपेंद्र राम बताते हैं कि जब तक वह घर पहुंचते हैं, सरकारी नल से पानी जा चुका होता है, तब वह काफी दूर से चापाकल से पानी लाकर खाना बनाते हैं।

यह कैसी आजादी है? मंजू देवी लिखती हैं– “देश की करोड़ों-करोड़ जनता बदहाली की हालत में है, उसके पास घर नहीं है, कपड़े नहीं हैं, जमीन नहीं है, शिक्षा नहीं है, खेती नहीं है, (उन्होंने) स्कूल का मुंह नहीं देखा है, (उनके पास) पीने के लिए स्वच्छ जल नहीं है, शौचालय नहीं है, शहर में बैठ कर कमाने-खाने के लिए जगह नहीं है, (ऊपर से) पुलिस का आतंक है, गांवों में जमीदारों का आतंक है। ऐसी स्थिति में इन मोचियों के लिए आजादी का क्या अर्थ है?” क्या कहा जाय? यही कहा जा सकता है कि कोई भी सरकार इनके प्रति कभी संवेदनशील नहीं रही। न कांग्रेस की सरकारें और न दलित-पिछड़ों के नाम पर बनी बहुजन की सरकारें। और आज की भाजपा की सरकारें भी नहीं।

किताब का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय “अपनी कहानी : अपनी जुबानी” है, जिसमें डॉ. मंजू देवी ने उन मोचियों के बयान कलमबद्ध किए हैं, जो दूसरे राज्यों और शहरों से पलायन करके बनारस आए हैं। इनमें कोई बिहार से आया है, कोई कोलकाता से, कोई उत्तराखंड से तो कोई मध्य प्रदेश से आकर यहां मोचीगीरी करके अपना पेट पाल रहा है। इनमें एक बारह साल का सदानंद भी है, जो ट्रेन में घूम-घूम कर जूते पालिश करता है। यह ठाकुर जाति का है। इससे लेखिका की मुलाकात भी देहरादून से बनारस आने वाली एक ट्रेन में होती है। इसके माता-पिता मर चुके हैं, चाचा-चाची ने घर में रहने नहीं दिया। कानपुर के नौबस्ता का रहने वाला यह लड़का दादी के सहारे अपनी छोटी बहिन को छोड़कर काम पर आता है। वह खुद तो पढ़ना नहीं चाहता, पर बहिन को पढ़ाना चाहता है।

डा. मंजू देवी ने कर्ज में डूबे मोचियों का भी जिक्र किया है, जो मौसम, बीमारी या अशक्त होते शरीर की वजह से काम नहीं कर पाते हैं। ऐसी स्थिति में वे भारी ब्याज पर कर्ज लेकर घर का खर्चा चलाते हैं। कभी उन्हें इलाज या शादी आदि के लिए भी कर्ज लेना पड़ता है। कर्ज से ज्यादा ब्याज की मार उन्हें बर्बाद कर देती है। वे ब्याज भरते रहते हैं, मूल कर्ज ज्यों का त्यों रहता है। यह एक ऐसी दलदल है, जिसमें वे धंसते ही चले जाते हैं। लेकिन, लेखिका का सर्वे बताता है कि कर्ज उनलोगों का बहुत बड़ा सहारा भी है। कर्ज के बिना उनका काम नहीं चल सकता। इसलिए बीस-पच्चीस हजार का कर्ज उन पर हमेशा बना ही रहता है।

अंतिम अध्याय में डॉ. मंजू देवी ने मोचियों के जीवन का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है। यह विश्लेषण बहुत गहन और यथार्थपरक है, जो उनके जीवन को गहराई से देखे बिना नहीं हो सकता था। अशिक्षा, असुरक्षा, अभाव और दरिद्रता के बीच जी रहे मोचियों के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का जैसा मार्मिक और विचारोत्तेजक अध्ययन उन्होंने किया है, उससे उनकी यह पूरी किताब एक जीवंत दस्तावेज बन गयी है। इस दस्तावेज में प्रत्येक मोची की एक मार्मिक कहानी है। ऐसी कहानियां बहुत कम दलित साहित्य का हिस्सा बन पायी हैं। प्रत्येक दलित लेखक और बुद्धिजीवी को इस पुस्तक का अध्ययन करना चाहिए, न केवल उसे अंपनी सर्जना का हिस्सा बनाने के लिए, वरन् उनकी समस्याओं को सरकार के समक्ष रखने के लिए भी। कम से कम दलित नेताओं और अनुसूचित जाति आयोग को तो इसका संज्ञान लेना ही चाहिए।

(संपादन : नवल/अनिल)


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