संवैधानिक न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति में एससी, एसटी, ओबीसी के लिए आरक्षण आवश्यक

एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों के लोगों को लगता है कि प्रतिनिधित्व की कमी के गंभीर परिणाम हैं। संवैधानिक न्यायालयों की नीतियों और न्यायशास्त्र में उनकी आवाज अनसुनी रहती है। वे संवैधानिक न्यायालयों के न्यायाधीशों के बीच प्रतिनिधित्व को हमारे लोकतांत्रिक संविधान के कामकाज की सबसे बड़ी विफलताओं में से एक मानते हैं। बता रहे हैं जस्टिस वी. ईश्वरैय्या

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग, भारत सरकार के अध्यक्ष के रूप में मेरे कार्यकाल (2013-2016) के दौरान और बाद में अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग संघ के अध्यक्ष के रूप में, मुझे एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों के नेताओं से सैकड़ों अभ्यावेदन प्राप्त हुए हैं। इन अभ्यावेदनों में देश भर में उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के बीच अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के पर्याप्त प्रतिनिधित्व की कमी की ओर इशारा करते हुए और सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के पद पर नियुक्ति के लिए आरक्षण का प्रावधान करने की बात कही गई।

वे दृढ़ता से महसूस करते हैं कि प्रतिनिधित्व की कमी इसलिए नहीं है क्योंकि एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों में प्रभावशाली समुदायों की तुलना में कम प्रतिभा और क्षमता है। उनका मानना है कि मूल कारण बार के वकीलों में प्रतिनिधित्वहीन समुदायों के खिलाफ सामाजिक भेदभाव है। वे देखते हैं कि हाशिए के समुदायों के युवा अधिवक्ताओं को हाई प्रोफाइल चैंबर या फर्म में शायद ही कभी स्थान मिलता है। वे देखते हैं कि सफल वकीलों के कार्यालयों में अक्सर उनके अपने सामाजिक समुदायों के सदस्यों का वर्चस्व होता है, जिन्हें उनके वरिष्ठों द्वारा सफल वकील बनने के लिए सलाह दी जाती है। ऐसे कई वकील फिर जज बन जाते हैं और दुष्चक्र बदस्तूर जारी रहता है। सामाजिक रूप से हाशिए के समुदायों के अधिवक्ताओं को विकास के इन अवसरों के योग्य नहीं देखा जाता है, जो कि प्रमुख समुदायों से उनके समकक्षों के लिए उपलब्ध हैं।

उन्होंने यह भी देखा है कि वादी जनता के बीच कभी-कभी यह धारणा होती है कि उनके मामले में जल्द और धैर्यपूर्वक सुनवाई का एक बेहतर मौका होगा यदि उनके वकील की पृष्ठभूमि वही हो, जो उस न्यायालय के अधिकांश न्यायाधीशों की है। 

एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों के लोगों को लगता है कि प्रतिनिधित्व की कमी के गंभीर परिणाम हैं। संवैधानिक न्यायालयों की नीतियों और न्यायशास्त्र में उनकी आवाज अनसुनी रहती है। वे संवैधानिक न्यायालयों के न्यायाधीशों के बीच प्रतिनिधित्व को हमारे लोकतांत्रिक संविधान के कामकाज की सबसे बड़ी विफलताओं में से एक मानते हैं। उन्हें लगता है कि उच्च न्यायालय / सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए प्रचलित चयन प्रक्रिया भेदभाव को समाप्त करने और मुट्ठी भर सामाजिक समूहों (न्यायिक नियुक्तियों पर एक सामाजिक कुलीन वर्ग) के वर्चस्व को तोड़ने में असमर्थ रही है।

प्रतिनिधित्वविहीनता के उन्मूलन के लिए आरक्षण जरूरी

यह ध्यान दिया जा सकता है कि न्यायिक नियुक्तियों में आरक्षण वर्तमान में जिला न्यायपालिका (उच्च और निम्न) के लिए लागू है। इसने अधीनस्थ अदालतों को मजबूत किया है और विविधता का विस्तार हुआ है। लेकिन वर्तमान में उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति में कोई आरक्षण नहीं है। उच्च न्यायालय के अधिवक्ताओं और जिला न्यायाधीशों को बिना किसी आरक्षण के उच्च न्यायालय में पदोन्नत किया जाता है। इसी तरह उच्च न्यायालय के न्यायाधीश व सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ताओं को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में बिना किसी आरक्षण के पदोन्नत किया जाता है।

इस आलोक में एक मजबूत सहमति है कि उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति में एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों के लिए आरक्षण ही संरचनात्मक भेदभाव, बहिष्कार से उत्पन्न होने वाले सामाजिक हाशिए के समुदायों के पर्याप्त प्रतिनिधित्व की कमी को दूर कर सकता है।

प्रतिनिधित्व और बहिष्करण की वास्तविकता का आकलन करने के लिए अविभाजित आंध्र प्रदेश के उच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय, तेलंगाना और आंध्र के विभिन्न न्यायाधीशों की सामाजिक पृष्ठभूमि के डेटा को संकलित किया गया है। 

यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि इन विवरणों को प्रस्तुत करने में किसी व्यक्ति की सामाजिक पृष्ठभूमि को और उनकी योग्यता, प्रदर्शन या न्यायिक विचारों और निर्णयों के बीच किसी भी तरह संबंध उल्लेखित करने की मंशा नहीं है। इसका एकमात्र उद्देश्य है कि क्या प्राप्त परिणाम पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए संवैधानिक न्यायालय में आरक्षण की आवश्यकता को उचित ठहराता है या नहीं।

आंध्र और तेलंगाना में उच्च न्यायालय

भारत ने 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता प्राप्त की और 17 सितंबर, 1996 को यह राज्य भारतीय संघ में शामिल हो गया। बाद में भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के तहत आंध्र प्रदेश राज्य का गठन किया गया। इस उच्च न्यायालय ने 5 नवंबर, 1956 से 2014 तक संयुक्त राज्य में न्यायिक कार्यों का निष्पादन किया। इस अवधि में न्यायाधीशों की संख्या 1956 में 12 से बढ़कर 2014 में 61 हो गई।

प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014 के तहत आंध्र प्रदेश राज्य के विभाजन के बाद, उच्च न्यायालय को तेलंगाना और आंध्र प्रदेश राज्य के लिए हैदराबाद में न्यायिक न्यायालय का नाम दिया गया। भारत के राष्ट्रपति ने आदेश जारी किया कि 26 दिसंबर, 2018 को तेलंगाना और आंध्र प्रदेश राज्य के लिए अलग-अलग उच्च न्यायालय होगा। इसके तहत तेलंगाना उच्च न्यायालय हैदराबाद में और आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय अमरावती में। इसके आलोक में तेलंगाना के लिए न्यायाधीशों के 24 पद और आंध्र प्रदेश के लिए 37 न्यायाधीशों के पद को स्वीकृत करते हुए दो पृथक उच्च न्यायालय 1 जनवरी, 2019 से लागू हो गया।

सोलह न्यायाधीशों को सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नत किया गया

अब तक आंध्र प्रदेश राज्य से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नत न्यायाधीशों की संख्या 16 है। इनमें 7 रेड्डी समुदाय के, तीन कम्मा/चौधरी समुदाय के, 2 ब्राह्मण समुदाय के, 2 क्षत्रिय समुदाय के (एक वेलामा और एक राजू) , एक मुस्लिम समुदाय के और एक अनुसूचित जाति के शामिल हैं। इस प्रकार, आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय से सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत 16 न्यायाधीशों में से केवल एक अनुसूचित जाति समुदाय के हैं। ओबीसी और एसटी में से किसी को भी सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश के पद पर पदोन्नत नहीं किया गया है।

उच्च न्यायालय के पूर्व और वर्तमान मुख्य न्यायाधीश की सामाजिक पृष्ठभूमि 

उच्च न्यायालय की स्थापना से लेकर अब तक लगभग 45 मुख्य न्यायाधीश रहे हैं। इनमें लगभग 16 ब्राह्मण समुदाय के, 5 रेड्डी समुदायके, 5 बनिया समुदाय के, 3 कायस्थ/खत्री समुदाय के, 3 क्षत्रिय (वेलमा, राजू और राजपूत समुदाय से एक-एक) समुदाय के, 2 कम्मा/चौधरी समुदाय के, 2 मुस्लिम समुदाय के, 2 पंजाबी समुदाय के, एक माहेश्वरी, एक नायर, एक मराठा और एक ईसाई समुदाय के शामिल हैं। केवल 3 मुख्य न्यायाधीश ओबीसी वर्ग के रहे हैं। इन तीन से एक केरल से, दूसरे तमिलनाडु से और एक तेलंगाना से हैं। एससी और एसटी समुदाय का कोई भी व्यक्ति उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश नहीं बन सका है। 

तेलंगाना राज्य और आंध्र प्रदेश राज्य के लिए उच्च न्यायालय के पूर्व और वर्तमान न्यायाधीशों पर एक नजर

उच्च न्यायालय की स्थापना से लेकर अब तक लगभग 254 न्यायाधीश हुए हैं। इनमें गभग 66 ब्राह्मण समुदाय के, 44 रेड्डी समुदाय के, 31 कम्मा/चौधरी समुदाय के, 17 क्षत्रिय (वेलमा/राजू/राजपूत) समुदाय के, 15 मुस्लिम समुदाय के, रहे हैं। इनके अलावा 13 कप्पी समुदाय के, 8 बनिया/वैश्य समुदाय के, 2 कायस्थ/खत्री समुदाय के, 2 नायर समुदाय के और एक पटनायक समुदाय के न्यायाधीश भी इस आंकड़े में शामिल हैँ। वहीं 43 न्यायाधीश ओबीसी समुदाय के, 10 एससी समुदाय के और और 2 एसटी समुदाय के रहे हैं।

आरक्षण क्यों है जरूरी?

इस प्रकार हम पाते हैं कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी की संयुक्त रूप से 80 प्रतिशत से अधिक आबादी के लिए, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों का प्रतिनिधित्व केवल 21.73 प्रतिशत है और 20 प्रतिशत से कम आबादी वाले समुदायों का प्रतिनिधित्व लगभग 78.26 प्रतिशत है। इस आंकड़े के आधार पर पाते हैं कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के रूप में एससी, एसटी और ओबीसी का प्रतिनिधित्व उनकी आबादी के सापेक्ष बहुत कम है। 

आज की तारीख में तेलंगाना उच्च न्यायालय में एससी समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाला एक भी न्यायाधीश नहीं है। इसी तरह, आज की तारीख में आंध्र प्रदेश के उच्च न्यायालय में मुस्लिम समुदाय का एक भी न्यायाधीश नहीं है। जबकि उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में निष्पक्ष और न्यायसंगत प्रतिनिधित्व पाने के लिए मेधावी और योग्य उम्मीदवार एससी, एसटी, ओबीसी, मुस्लिम, ईसाई के समुदायों से भी उपलब्ध हैं। उपरोक्त अनुभवजन्य और समकालीन आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि पिछड़े वर्गों को उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के रूप में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जाता है।

इसलिए एससी, एसटी और ओबीसी तथा अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के विभिन्न समुदायों की भारत सरकार और अन्य संवैधानिक संस्थानों से अपील है कि संवैधानिक न्यायालयों में एससी, एसटी, ओबीसी व अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक वर्गों को समुचित व न्यायसंगत प्रतिनिधित्व देने के लिए आरक्षण लागू करे।

उपरवर्णित आंकड़े व तथ्य एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों की आशंकाओं की पुष्टि करते हैं। उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में इनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है। इसलिए यह वांछनीय है कि संवैधानिक न्यायालयों में पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, धार्मिक अल्पसंख्यकों के समुदायों के लिए पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिले, इसके लिए राष्ट्रीय न्यायिक आयोग का गठन के लिए एक नये कानून के अंतर्गत आरक्षण देकर पात्र उम्मीदवारों की उम्मीदवारी पर विचार किया जाए।

(संपादन : नवल/अनिल)


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