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बहस-तलब : बहुजन आंदोलनों की विफलता की वजहें और निदान

जब किसी दलित पर हमला होता है या उनका अपमान होता है तो हमारी प्रतिक्रियाए अपनी-अपनी जातियों के अनुसार होती है और इस आधार पर सच खोजना बहुत आसान नहीं है। गांव में आप व्यक्ति नहीं, समुदाय हैं और डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि जब तक हम व्यक्ति नहीं बनेंगे और व्यक्ति को सम्मान नहीं देंगे तो हम एक बेहतर समाज का निर्माण नहीं कर सकते। बता रहे हैं विद्या भूषण रावत

भारत में भोजन भी छुआछूत का एक बहुत बड़ा हथियार है। मध्याह्न भोजन योजना के तहत सरकारी स्कूलों में पढ़नेवाले बच्चों के मामले में भी किसी को अपने से बड़ी जाति के रसोइए के हाथ से पकाए गए भोजन को खाने में कोई आपत्ति नहीं होती। अपने से ‘तथाकथित’ छोटी जातियों के हाथ का पका भोजन बिल्कुल निषेध है। इस प्रकार भोजन के जरिए भी जातिवाद होता है और छुआछूत को बढ़ावा मिलता है। यह बात कटु सत्य है और हर जाति के लोगों ने मनुवाद की इस ‘विरासत’ को अपने गले में बांधकर रखा है। एक वजह यह भी कि इसके विरुद्ध न तो कोई आंदोलन ही हो रहा है और ना ही आगे इसकी कोई संभावनाए दिखाई देती है।

दरअसल, सोशल मीडिया के उभार से एक बात तो साफ हो गई के खबरों का थोड़ा लोकतांत्रिकरण हुआ, लेकिन उसकी प्रसार क्षमता पर तो मीडिया कंपनियों का ही नियंत्रण है। वही तय करते हैं कि सोशल मीडिया पर किस संदेश को आगे बढ़ाएं और किस संदेश के प्रसार को अत्यंत सीमित कर दें। लेकिन इसके बावजूद यह तो कहा ही जा सकता है कि सभी के पास अपनी-अपनी मीडिया हो गई है। अक्सर हम जाति देख कर खबरें पढ़ते हैं और फिर अपनी राजनीतिक विचारधारा या जातीय पक्षधरता के हिसाब से अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। नतीजा यह हुआ है कि जाति उन्मूलन, छुआछूत और जातिवाद के पक्ष में गोलबंदी खत्म होने के बजाए बढ़ गई है। 

कुछ महीनों पूर्व उत्तराखंड के चंपावत जिले से एक दलित भोजन माता के द्वारा बनाए गए खाने के बहिष्कार की खबर आई, जिसकी जम कर निंदा हुई। लेकिन उत्तराखंड के शिक्षा विभाग ने उत्पीड़ित महिला को ही निलंबित कर दिया। सोशल मीडिया पर इस पर व्यापक चर्चा हुई और बहुत से क्रांतिकारी तो ऐसे चर्चा कर रहे थे जैसे यह पहली घटना है या ऐसी घटनाएं होती ही नहीं हैं। दरअसल छुआछूत और जातिवाद का सवाल केवल सवर्ण बनाम गैर-सवर्ण नहीं है। यह वर्णव्यवस्था का सवाल है। अनेक इसे मात्र सवर्ण बनाम दलित बनाकर उन सब जातियों को क्लीन चिट दे देते हैं, जिनका आधारवर्णव्यवस्था रही है। फिर भले ही वे सवर्ण न हों आखिर वर्णव्यवस्था का सिद्धांत जिसने भी बनाया हो, उस पर चलने वाले केवल सवर्ण नहीं हैं। डॉ. अंबेडकर वर्षों पहले कह चुके थे कि हमारा समाज सीढ़ीनुमा असमानता का शिकार है। इसमें हर जाति अपने को दूसरे से ऊंचा मानकर बड़ा समझती है और अपने से नीचे समझे जाने वाली जातियों को तुच्छ समझने में ही अपनी महत्ता समझती रही है। ये सवाल आमजनों की ओर से नहीं उठाए जा रहे हैं, अपितु उनके द्वारा उठाए जा रहे हैं, जिनके मुंह दलितों के मामले में तब खुलते हैं, जब उन्हें अपना राजनीतिक और सामाजिक लाभ दिखाई देता है। अभी दो घटनाएं अखबारों मे आई हैं। 

गत दिनों अंग्रेजी दैनिक ‘दी टाइम्स ऑफ इंडिया’ में एक खबर छपी, जिसमें बताया गया था कि गुजरात के मोरबी जिले के एक स्कूल, जिसके कुल 153 बच्चों में से 147 बच्चे पिछड़े वर्ग से आते है, ने एक दलित महिला रसोइया द्वारा बनाए गए भोजन को खाने से इनकार कर दिया। दलित महिला रसोइया धारा मकवाना ने इस संदर्भ में थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाई है। लेकिन इस घटना पर ट्विटर ओर फेसबुक क्रांतिकारियों द्वारा कोई हंगामा नहीं हुआ, क्योंकि यह उनकी थीम के अनुरूप नहीं है। हाल ही में उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले का एक विडियो सामने आया है, जिसमें यादव जाति का एक अध्यापक, स्कूल की प्रधानाध्यापिका, जो अनुसूचित जाति से आती हैं, को बेहद ही अभद्र भाषा में धमकी दे रहा था। सवाल यह नहीं है कि दलितों के साथ हिंसा करने वाले किस जाति के हैं? और इसके आधार पर हमारी कोई राय बने। आवश्यकता इस बात की है कि जातिवाद और छुआछूत के खिलाफ लड़ाई अब हमारी राष्ट्रीय लड़ाई होनी चाहिए और चाहे कोई भी हो, इस संदर्भ मे उसके विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए।

दरअसल, हम सभी सवालों को ‘सवर्ण बनाम दलित’ खोजने की फिराक में रहते हुए उन प्रश्नों पर चिंतन-मनन करना भूल जाते हैं, जिन पर काम करके ही असली दलित–बहुजन एकता बन सकती है। बहुजन कहकर शब्दों के उलट-फेर से हम एक बड़े प्रश्न से आंख नहीं चुरा सकते कि जिस 80-90 प्रतिशत समाज की एकता की बात अक्सर की जाती है, सबसे ज्यादा हिंसा की खबरे उसी समाज से आती है। सवर्णों की हिंसा तो दलितों ने झेली ही है, लेकिन खेती पर अधिकार वाली जातियों ने भी दलितों पर सवर्णों से कम हिंसा नहीं की है। 

बहुजन आंदोलनों की सफलता की अनिवार्य शर्त है जाति का विनाश

अभी हम तमिलनाडु का उदाहरण लेते हैं। यहां का द्रवीड़ियन मॉडल एक उदहारण है, क्योंकि यहां वे नीतियां बनाईं गईं, जिनसे कल्याणकारी राज्य की अवधारणा हो। लेकिन इतने वर्षों से द्रवीडियन विचारधारा के नाम पर चल रहे राज्य मे दलितों पर हिंसा के मामले देश मे सर्वाधिक है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, तमिलनाडु मे 38 जिलों मे से 37 जिलों के 345 गांवों को दलितों पर हिंसा के संदर्भ में बेहद संवेदनशील माना गया है। इस हकीकत से कोई इंकार नहीं कर सकता कि तमिलनाडु में दलितों पर सबसे बड़ी हिंसा थेवर और वननियार जातियों के द्वारा की जाती है और दोनों ही जातियां वहां की पार्टियों का वोट बैंक हैं। वननियार जाति की पीएमके पार्टी प्रतिनिधित्व को लेकर सबसे ज्यादा मुखर थी, लेकिन दलितों पर हिंसा के मामले मे इसी पार्टी के नेता एससी, एसटी एट्रोसिटी एकट को खत्म करने की बात कहते है। वननियार जाति के नेताओं की परेशानी उन प्रेम विवाहों से भी है, जहां एक पक्ष दलित है। इसी के चलते वननियार गांवों में तनाव हुआ है और वे अपने बच्चों को दलितों से नहीं मिलने देना चाहते। 

अब एक दूसरा राज्य है– पंजाब। यहा दलितों पर सबसे अधिक हिंसा जाट सिखों ने किये हैं। वे ही किसान हैं और अधिकांश जमीनों के मालिक हैं। उसके बगल में हरियाणा है और पश्चिमी उत्तर प्रदेश है, जहा पर जाट और गुर्जर जाति के लोगों के द्वारा दलित उत्पीड़न की घटनाएं किसी से छिपी नहीं हैं। 

दरअसल दलितों के ऊपर दो प्रकार की हिंसायें की जाती हैं। एक वह हिंसा, जो दलितों को सत्ता के गलियारों में आने से रोकती हैं। इनमें मीडिया, विश्वविद्यालयों व अन्य अकादमिक संस्थाओं, सरकारी संस्थनों, न्यायपालिका आदि शामिल हैं। हालांकि इन सभी संस्थानों में दलित, पिछड़े और आदिवासी सभी की संख्या बेहद कम है, लेकिन सवर्णों में किस जाति के लोग हैं, यह देखने की जरूरत तो है ही। एक ही डंडे से सबको हांकने का कोई राजनीतिक लाभ नहीं मिलनेवाला है। इसलिए इन संस्थानों में दलित, पिछड़ा, आदिवासी एकता की गुजाइश आसानी से बन जाती है, क्योंकि सभी द्विजवादी शक्तियों के शिकार हैं। लेकिन यही एकता हमारे गांवों मे क्यों नहीं हो पाती? क्यों नहीं इसके राजनीतिक लाभ बहुजन कहने वाली पार्टियों को मिल पाता है? इसके लिए गांव की जाति व्यवस्था और भूमि में हिस्सेदारी का सवाल महत्वपूर्ण होता है। क्योंकि हर गांव की स्थिति अलग-अलग है। इसलिए शोध के लिहाज से तो सामान्यीकरण ठीक है, लेकिन हकीकत में हर जगह के हालत से निपटने के लिए अलग-अलग योजना बनानी पड़ती है, क्योंकि जमीन पर अब पिछड़े वर्ग की जातियों का भी कब्जा है और गांवों में तो हम सब लोग अपनी-अपनी बिरादरियों में ही रहते आए हैं, इसलिए सीतापुर मे जो यादव जाति का शिक्षक एक दलित प्रधानचार्य को गाली दे रहा थ, उसकी गालियां किसी ठाकुर, ब्राहमण या भूमिहारों की गालियों से कम नहीं थी और इसलिए जरूरी है कि इन घटनाओं की हम न केवल निंदा करें, अपितु इन्हें समुदायों की पहचान न बनने दी, क्योंकि राजनीति के चलते यह सब हो रहा है। किसी एक घटना के घटित होने पर हम पूरे समुदायों को खलनायक बना देते हैं और फिर एकता की संभावनाएं एकदम से क्षीण हो जाती हैं। 

यह मसला दलित बनाम सवर्ण या दलित बनाम पिछड़े का नहीं है। यह मसला असल में वर्णव्यवस्था का है। इतने वर्षों से उत्तर प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों मे जाने के क्रम में मैंने जातियों के अंतर्द्वंद्व को बहुत नजदीक से देखा और परखा है। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि गांवों में रहने पर आपकी जाति आपकी ‘सोशल कैपिटल’ के समान है और फिर आप उसे तोड़ना नहीं चाहते, क्योंकि आपकी राजनीति खत्म हो जाएगी। इसलिए जब किसी दलित पर हमला होता है या उनका अपमान होता है तो हमारी प्रतिक्रियाए अपनी-अपनी जातियों के अनुसार होती है और इस आधार पर सच खोजना बहुत आसान नहीं है। गांव में आप व्यक्ति नहीं, समुदाय हैं और डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि जब तक हम व्यक्ति नहीं बनेंगे और व्यक्ति को सम्मान नहीं देंगे तो हम एक बेहतर समाज का निर्माण नहीं कर सकते। 

कुछ वर्षों पूर्व जब मैं भारत का मानवीयकरण अभियान के तहत उत्तर प्रदेश के विभिन्न इलाकों मे एक समूह के साथ छुआछूत और जातिवाद के विरुद्ध अपनी बातें जनता के सामने रख रहा था तो कुशीनगर के आस पास एक डोम बस्ती में हम रुके। हमने उनसे बात करना शुरू किया तो पता चला कि वे बिल्कुल अलग-थलग थे और नजदीक का नाई भी उनके बाल नहीं काटता था। हाईवे के दूसरी और एक घर मे पंचशील का झंडा लहरा रहा था। हमने कहा कि उन्हें भी अपनी बात रखने के लिए बुलाइए तो तो हमें बताया गया कि वे लोग चमार जाति के हैं, हमसे बड़े हैं और इधर नहीं आते। बहुत बुरा लगा लेकिन इस हकीकत को मैं जानता था। डोम समुदाय से बात करने के बाद हम लोग सड़क पारकर चमार समुदाय की बस्तियों में गएऔर मैंने उनसे कहा कि जब आप बुद्ध को मानते हैं, तो उधर क्यों नहीं जाते तो तुरंत ही जवाब आया कि “वे लोग गंदे होते हैं, सूअर पालते है”। 

दरअसल गांवों में यह लोगों का कुसूर नहीं है, क्योंकि दोनों ही जातियां उस व्यवस्था का शिकार है और जो लोग थोड़ा अपने व्यक्तिगत जीवन मे बदलाव ला रहे हैं, उन्हे लगता है कि ऐसे लोगों से दूरी बना लेनी चाहिए, जो उनके जैसे नहीं हैं। 

उत्तर प्रदेश मे मुसहर जाति दलितों मे सबसे हाशिए की जाति मानी जाती है, जो लबभग पूरी तरह से भूमिहीन है। लेकिन जरूरत पड़ने पर यह भी अपने को चमारों से बड़ा समझती है। देवरिया जनपद के एक गांव मे डोम लोगों की एक बस्ती में गया। हमने बातों-बातों मे उनकी समस्याओ के बारे मे जानकारी ली। ये करीब 6-7 परिवार थे, जिसे डोम बस्ती कहा जाता है और वे टोकरी बनाने का काम करते है तथा सुअर और बकरी पालन भी करते हैं। बस्ती के पीछे एक गंदा तालाब था। मैंने उनसे पूछा कि उनकी मुख्य समस्या क्या है तो उन्होंने मुझे बताया कि हमारे पास चापाकल नहीं है। मैंने उनसे पूछा कि फिर आप पानी कहां से पीते हैं तो उन्होंने बताया के सामने की यानि रोड पार की मुसहर बस्ती से। रोड कुल आठ फुटा होगी तो मैंने कहा कि अरे यह तो आपके घर के सामने ही है तो आप को क्यों परेशानी है। वो बांसफोड़ समाज का व्यक्ति बोल पड़ा कि मुसहर जाति के लोग उन्हें अपने नल से पानी नहीं भरने देते। मैंने कहा कि नल तो सार्वजनिक है, फिर वे पानी नहीं भरने की बात कैसे कह सकते हैं। बाद में मैं बांसफोड जाति की एक महिला से पूछा तो उसने भी कहा कि मुसहर जाति के लोग पानी नहीं भरने देते। उनके मुताबिक मुसहर बस्ती में बांसफोड़ जाति के लोगों के प्रवेश पर पाबंदी है। उन्हें पानी भरने के लिए मुसहर जाति के लोगों पर निर्भर रहनाना पड़ता है, जो अपनी बाल्टी में पानी भरकर दूर से डोम व बांसफोड़ जाति के लोगों की बर्तनों या बाल्टियों में पानी डालते थे। मुझे इस बात पर यकीन नहीं हुआ तो मैं मुसहर बस्ती में गया। सामने मुसहर जाति की एक महिला पानी भर रही थी। मैंने उससे पूछा कि आप इनलोगों (डोम व बांसफोड़ जाति के लोगों) को पानी क्यों नहीं लेने देती। तो उसने कहा कि पानी की तो इन्हें कोई दिक्कत नहीं है, ये तो हमेशा पानी ले जाते है। डोम व बांसफोड़ जातियों के लोगों ने कहा कि यह महिला झूठ बोल रही है। बहुत कुरेदने पर उस महिला ने कहा कि उनके चापाकल से डोम लोग पानी नहीं भर सकते, क्योंकि वे “छोटी जात” के हैं। 

जातियों मे अपने सर्वोच्च होने का गर्व बहुत अधिक है। शायद अपनी आर्थिक हालातों से हो रहे दूभर जीवन को वे अपनी ‘सांस्कृतिक’ और ‘सामाजिक’ हैसियत के जरिए जीना चाहते हैं। डॉ. आंबेडकर पहले ही बता चुके हैं कि यह ग्रैडेड इनीक्वालटी है, जहां हर एक जाति अपने से छोटी जाति के प्रति हिकारत की नजर और अपने से ऊंची को ‘सम्मान’ की दृष्टि से देखती है और वैसा ही दिखना चाहती है। 

इस हकीकत से भी हम इंकार नहीं कर सकते हैं कि गांवों मे आपकी हैसियत आपकी जमीन से है और उसके चलते ही भूमिहीन लोगों पर हिंसा होती है।

वर्षों पूर्व नीतीश कुमार ने बिहार मे भूमिहीनों को लाभ देने के उद्देश्य से एक बंद्योपाध्याय आयोग बनाया था। लेकिन जब आयोग की रपट आई तो उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया क्योंकि सभी को लगा कि भूमि सुधारों से उनकी जातियों की चौधराहट खत्म हो जाएगी। 

मेरे कहने का आशय केवल इतना ही है कि बहुजनों के बीच एकता के लिए केवल बड़े राजनीतिक-सामाजिक मंचों पर बैठने से काम नहीं चलने वाला। आवश्यकता इस बात की है कि फुले-आंबेडकर-पेरियार की सांस्कृतिक विरासत को हम कितना आगे बढ़ा पा रहे हैं। केवल ब्रह्मणवाद की आलोचना करने से कुछ होने वाला नहीं है। फुले, आंबेडकर और पेरियार ने केवल ब्रह्मणवाद की आलोचना ही नहीं की, बल्कि लोगों को सार्थक विकल्प दिए। आज इन समुदायों मे काम करने की जरूरत है और उनके सवालों को उठाकर, उनकी समस्याओ को समझकर ही हम उन्हें बदलाव की ओर अग्रसर कर सकते हैं। यह भी याद रखने की आवश्यकता है कि बहुजन आंदोलन तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक उसमें जातिभेद और भूमि के प्रश्नों पर ईमानदार बहस नहीं होगी।। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विद्याभूषण रावत

विद्याभूषण रावत सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता हैं। उनकी कृतियों में 'दलित, लैंड एंड डिग्निटी', 'प्रेस एंड प्रेजुडिस', 'अम्बेडकर, अयोध्या और दलित आंदोलन', 'इम्पैक्ट आॅफ स्पेशल इकोनोमिक जोन्स इन इंडिया' और 'तर्क के यौद्धा' शामिल हैं। उनकी फिल्में, 'द साईलेंस आॅफ सुनामी', 'द पाॅलिटिक्स आॅफ राम टेम्पल', 'अयोध्या : विरासत की जंग', 'बदलाव की ओर : स्ट्रगल आॅफ वाल्मीकीज़ आॅफ उत्तर प्रदेश' व 'लिविंग आॅन द ऐजिज़', समकालीन सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों पर केंद्रित हैं और उनकी सूक्ष्म पड़ताल करती हैं।

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