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महाकाल की शरण में जाने को विवश शिवराज

निश्चित तौर पर भाजपा यह चाहेगी कि वह ऐसे नेता के नेतृत्व में चुनाव मैदान में उतरे जो उसकी जीत सुनिश्चित कर सके। प्रधानमंत्री मोदी रातों-रात मुख्यमंत्रियों को हटाने और उनके स्थान पर अपेक्षाकृत अनजान चेहरों को नियुक्त करने के लिए जाने जाते हैं। यही कारण है कि पार्टी में चौहान के विरोधी खुलकर यह कह रहे हैं कि चुनाव के पहले उन्हें विदा कर दिया जाएगा। बता रहे हैं अमरीश हरदेनिया

गत 27 सितंबर, 2022 को मध्य प्रदेश सरकार की मंत्रिपरिषद की उज्जैन में हुई बैठक में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने लिए निर्धारित स्थान पर महाकाल की तस्वीर को रखा। महाकाल, राज्य की राजधानी भोपाल से लगभग 200 किलोमीटर दूर उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर मंदिर के अधिष्ठाता देवता का नाम है।

 

मंदिर के गर्भगृह में विराजे शिवलिंग के एक विशाल चित्र को केबिनेट की बैठक में मुख्यमंत्री हेतु निर्धारित कुर्सी पर रखा गया। चौहान एवं राज्य के मुख्य सचिव इस चित्र के दोनों ओर टेबिल के कोनों पर एक-दूसरे के आमने-सामने बैठे।

प्रदेश के इतिहास में पहली बार मंत्रिपरिषद की बैठक उज्जैन में हुई। यह भी पहली बार हुआ कि बैठक की अध्यक्षता मुख्यमंत्री के अतिरिक्त किसी अन्य ने की हो – फिर चाहे वह इस लोक का वासी हो या दूसरे लोक का। मुख्यमंत्री ने इस बाबत कहा– यह महाकाल महाराज की सरकार है…उनके सारे सेवक महाकाल महाराज की भूमि पर बैठक करने आए हैं।” 

सरकार के इस निर्णय पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं हैं। राज्य के शीर्ष पूर्व नौकरशाहों, जिनमें पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओ. पी रावत एवं पूर्व मुख्य सचिव के. एस. शर्मा शामिल हैं, ने इस पर गंभीर आपत्ति उठाई है। शर्मा की टिप्पणी रही कि– “हम एक धर्मनिरपेक्ष देश में रहते हैं। जो कुछ हुआ वह ठीक नहीं है। कल को अन्य धर्मों के लोग भी सरकार से ऐसी ही मांग करेंगे। तब क्या होगा? 

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के राज्य सचिव बादल सरोज इस निर्णय को धार्मिक और संवैधानिक दोनों ही दृष्टियों से आपत्तिजनक मानते हैं। उनके मुताबिक, “यह महाकाल का अपमान है। आखिर तीनों लोकों के स्वामी को एक मामूली मुख्यमंत्री का दर्जा कैसे दिया जा सकता है? यह भगवान महाकाल की गरिमा के अनुरूप नहीं है। संवैधानिक दृष्टि से देखें तो सरकार को किसी एक धर्म विशेष से जोड़ना ठीक नहीं है, विशेषकर भारत में जहां दुनिया के लगभग सभी धर्मों के मानने वाले रहते हैं और जो हजारों पंथों, संप्रदायों और धर्मगुरूओं का देश है।” 

उज्जैन में हुई मंत्रिपरिषद की बैठक की तैयारी करते मध्य प्रदेश सरकार के अधिकारीगण

फारवर्ड प्रेस से बात करते हुए सरोज ने यह भी कहा कि शिवराज सिंह चौहान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रियतम पात्र बनने के लिए बेचैन हैं और अपने आपको उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी अधिक कट्टर हिंदू साबित करना चाहते हैं। 

महाकाल को काल (समय एवं मृत्यु) का देवता माना जाता है। यह शिव का एक रूप है। उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर देश के 12 ज्योर्तिलिंगों में से एक है। महाकालेश्वर मंदिर, महामृत्युंजय (मृत्यु पर विजय) यज्ञ का सबसे पसंदीदा स्थल है। यह यज्ञ मृत्युशैया पर पड़े लोगों के लिए किया जाता है। इस मंदिर में शीर्ष राजनेताओं से लेकर खेल और फिल्मी दुनिया की बड़ी हस्तियांन्यायाधीश इत्यादि दर्शन के लिए आते रहते हैं। 

सन् 2003 में मध्य प्रदेश में सत्ता में आने के बाद भाजपा सरकार ने उज्जैन को ‘पवित्र नगरी’ घोषित किया था, जिससे उसे वहां शराब, मांस और अंडे की बिक्री प्रतिबंधित करने का अधिकार मिल गया है। इस दर्जे के चलते सरकार के विभिन्न विभाग उज्जैन के विकास पर धन खर्च करने में सक्षम हो गए हैं। 

इस माह की शुरूआत (6 सितंबर) में बालीवुड दंपत्ति रणबीर कपूर और आलिया भट्ट को बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने महाकालेश्वर मंदिर में नहीं घुसने दिया था। कारण यह बताया गया था कि कई वर्ष पहले रणबीर कपूर ने कहा था कि वे बीफ का भक्षण करते हैं। 

मंत्रिपरिषद की बैठक का दृश्य, जिसमें महाकाल की तस्वीर को सीएम की जगह पर रखा गया

भगवान महाकाल सरकारों और व्यक्तियों के राजनैतिक अवसान को टाल सकते हैं या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है, परंतु यह तय है कि चौहान के नेतृत्व वाली राज्य सरकार भगवान महाकाल को प्रसन्न करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। 

राज्य सरकार ने वाराणसी के काशी विश्वनाथ कॉरिडोर की तर्ज पर महाकालेश्वर मंदिर कॉरिडोर परियोजना की शुरूआत की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी 11 अक्टूबर, 2022 को इस परियोजना के प्रथम चरण का उद्घाटन करेंगे। नौ सौ मीटर लंबे कॉरिडोर को शिव, शक्ति और अन्य हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों और भित्तिचित्रों से सुसज्जित किया जा रहा है। इस परियोजना के प्रथम चरण की लागत 351 करोड़ रुपए थी। दूसरे चरण पर 310 करोड़ रुपए खर्च होंगे। उज्जैन में अपनी बैठक में राज्य मंत्रिपरिषद ने कॉरिडोर का नामकरण ‘महाकाल लोक’ करने का निर्णय लिया।

इसमें कोई संदेह नहीं कि चौहान को ‘दैवीय अनुग्रह’ की सख्त आवश्यकता है। उनके नेतृत्व में भाजपा को राज्य में सन् 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। यह अलग बात है कि कांग्रेस के 22 विधायकों के ज्योतिरादित्व सिंधिया के नेतृत्व में पार्टी छोड़ देने से चुनाव के बाद गठित कमलनाथ सरकार मार्च 2020 में गिर गई। भाजपा ने कांग्रेस के विधायकों के सामूहिक पलायन में उसकी कोई भूमिका होने से इंकार किया था, परंतु यह एक तथ्य है कि सिंधिया को पहले राज्यसभा की सदस्यता और फिर केंद्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री पद से नवाजा गया। कांग्रेस छोड़ने वाले विधायकों के अपने पद से त्यागपत्र देने के कारण हुए उपचुनावों में भाजपा ने उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया। जो जीत गए उनमें से कई को मंत्री बना दिया गया और जो हारे उनमें से अनेक सरकारी उपक्रमों में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के रूप में नियुक्त कर दिए गए। 

मार्च 2020 में राज्य के चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद से चौहान अपने आपको हिंदुत्व की सेना का वफादार सिपाही साबित करने की कोशिश में अनवरत लगे हुए हैं। वे अपनी छवि एक सख्त प्रशासक के रूप में बनाने के लिए भी प्रयासरत हैं। कुछ लोगों का कहना है कि वे योगी आदित्यनाथ की नकल कर रहे हैं, बल्कि शायद वे पड़ोसी राज्य के मुख्यमंत्री से भी आगे निकल जाना चाहते हैं। उत्तर प्रदेश की तरह मध्य प्रदेश सरकार ने भी एक कानून बनाकर प्रदर्शनों और आंदोलनों के दौरान पत्थरबाजी से या अन्य तरीकों से सरकारी या निजी संपत्ति को होने वाले नुकसान की भरपाई आंदोलनकारियों से करवाई जाने से संबंधित कानून बनाया है। राज्य विधानसभा द्वारा दिसंबर 2021 में “मध्य प्रदेश लोक एवं निजी संपत्ति को नुकसान का निवारण एवं नुकसानी की वसूली विधेयक” पारित किया गया। इसी तरह पड़ोसी राज्य की तरह मध्य प्रदेश में भी विभिन्न अपराधों के आरोपियों के घरों पर बुलडोजर चलाए जा रहे हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि ऐसे सभी मामलों में पुलिस और स्थानीय प्रशासन अभियोजन, न्यायाधीश और जल्लाद तीनों की भूमिका निभाते हैं। इस संबंध में निर्णय प्रक्रिया को वे सभी पूर्वाग्रह प्रभावित करते हैं, जिनके लिए भगवा सरकारें जानी जातीं हैं। 

चौहान कई अन्य तरीकों से भी अपनी हिंदूवादी छवि चमका रहे हैं। इस साल जुलाई में ईद के अवसर पर वे भोपाल की ईदगाह पर नहीं गए। यह तब जब कि कोविड प्रतिबंधों के चलते पूरे दो साल बाद शहर में सामूहिक रूप से ईद की नमाज़ अदा की गई। अपने पूर्व कार्यकालों में चौहान हर ईद पर ईदगाह जाते थे और नमाजियों से हाथ मिलाकर और गले मिलकर उनका अभिनन्दन करते थे। पहले की तरह उनके निवास पर इफ्तार का आयोजन भी नहीं हुआ और ना ही वे ईद की बधाई देने शहर काज़ी के घर पहुंचे। 

इसी तरह पहले हर क्रिसमस पर चौहान स्थानीय आर्चबिशप के घर जाते थे और शाम को अपने घर पर पार्टी का आयोजन भी करते थे, जिसमें शहर के प्रमुख ईसाई नागरिकों को आमंत्रित किया जाता था। इस साल यह भी नहीं हुआ। 

इसके विपरीत वे अपने आप को अत्यंत धार्मिक हिंदू सिद्ध करने का कोई अवसर हाथ से जाने नहीं देते। वे अपनी धार्मिक आस्थाओं का सार्वजनिक प्रदर्शन करते हैं। इस साल, गणेश चतुर्थी पर वे सपत्नीक शहर के एक बाज़ार में पहुंचे, अपने घर में स्थापना के लिए गणेश की एक मूर्ति खरीदी और फिर मूर्ति के साथ एक खुले वाहन में सवार होकर लौटे। उनके आगे-पीछे फोटोग्राफरों और विडियो कर्मियों का हुजूम था। दस दिवसीय गणेशोत्सव के समाप्ति पर गणेश की मूर्ति के विसर्जन को भी उन्होंने सार्वजनिक समारोह बना दिया। 

लेकिन इस सब के बावजूद, राज्य में जुलाई में हुए नगरीय निकायों के चुनावों में भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। पार्टी ने राज्य की 16 में से नौ नगर निगमों पर कब्ज़ा कर लिया, लेकिन यह भी उसके लिए एक तरह से हार थी, क्योंकि इसके पहले पार्टी सभी 16 नगर निगमों पर काबिज़ थी। सत्ताधारी दल के लिए इससे भी अधिक चिंताजनक बात थी राज्य में आम आदमी पार्टी (आप) की आमद। ‘आप’ ने सिंगरौली नगर निगम जीत ली। अपनी इस सफलता से उत्साहित ‘आप’ अब राज्य की राजनीति में अपनी जगह बनाने में जुट गई है। अगर उसे सफलता मिलती है तो राज्य की द्वि-ध्रुवीय राजनीति, त्रि-ध्रुवीय बन जाएगी। यह भाजपा और कुछ हद तक कांग्रेस, दोनों के लिए चुनौती होगी। 

फिर, अगस्त में चौहान को भाजपा के केंद्रीय संसदीय बोर्ड से हटा दिया गया। वे 2013 से संसदीय बोर्ड के सदस्य थे। इस निर्णय से इस आशय के कयास लगाये जाने लगे कि पार्टी का नेतृत्व चौहान के कद को घटाना चाहता है। यहां तक कि चौहान को यह कहना पड़ा कि “पार्टी ने मुझे इतना कुछ दिया है कि यदि मुझे दरी बिछाने को भी कहा जायेगा तो मैं करूंगा”।

मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव लगभग एक वर्ष दूर हैं। निश्चित तौर पर पार्टी यह चाहेगी कि वह ऐसे नेता के नेतृत्व में चुनाव मैदान में उतरे जो उसकी जीत सुनिश्चित कर सके। प्रधानमंत्री मोदी रातों-रात मुख्यमंत्रियों को हटाने और उनके स्थान पर अपेक्षाकृत अनजान चेहरों को नियुक्त करने के लिए जाने जाते हैं (गुजरात इसका एक उदाहरण है)। यही कारण है कि पार्टी में चौहान के विरोधी खुलकर यह कह रहे हैं कि चुनाव के पहले उन्हें विदा कर दिया जाएगा। 

इस पृष्ठभूमि में चौहान का महाकाल की शरण में जाना कतई आश्चर्यजनक नहीं है। हां, महाकाल उन्हें आशीर्वाद देंगे या नहीं, यह केवल भविष्य ही बताएगा। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अमरीश हरदेनिया

अमरीश हरदेनिया फारवर्ड प्रेस के संपादक (ट्रांसलेशन) हैं। वे 'डेक्कन हेराल्ड', 'डेली ट्रिब्यून', 'डेली न्यूजटाइम' और वीकली 'संडे मेल' के मध्यप्रदेश ब्यूरो चीफ रहे हैं। उन्होंने कई किताबों का अनुवाद किया है जिनमें गुजरात के पूर्व डीजीपी आर बी श्रीकुमार की पुस्तक 'गुजरात बिहाइंड द कर्टेन' भी शामिल है

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