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परिवर्तन का सारथी बन रहा हरियाणा का सत्यशोधक फाउंडेशन

हरियाणा समाज के भीतर भारी उथल-पुथल चल रही है और फुले की भाषा में जिन्हें शूद्र-अतिशूद्र (पिछड़े-दलित) और महिलाएं कहते हैं, उनका शिक्षित-सचेत हिस्सा वर्ण-जाति आधारित सामाजिक व्यवस्था और पितृसत्ता को निर्णायक चुनौती दे रहा है। बता रहे हैं डॉ. सिद्धार्थ

भारत में नवजागरण और आधुनिकता की नींव 19वीं सदी के मध्य में फुले दंपत्ति ने डाली थी। इसमें कोई दो राय नहीं कि विश्व भर में नवजागरण के केंद्र में तर्क, विवेक और न्याय पर आधारित आधुनिक प्रबुद्ध समाज का निर्माण रहा है। मसलन, यूरोप में नवजागरण के पुरोधाओं ने सामंती श्रेणीक्रम यानी ऊंच-नीच की निर्मित व्यवस्था को चुनौती दी। भारत में सामंती श्रेणीक्रम वर्ण-जाति के व्यवस्था के रूप में सामने आई थी। इसी का हिस्सा ब्राह्मणवादी पितृसत्ता है। वर्ण-जाति और पितृसत्ता की रक्षक विचारधारा को ही फुले दंपत्ति ने ब्राह्मणवादी विचारधारा के रूप में चिन्हित किया था और इसके समूल नाश को भारत की आधुनिकता की बुनियादी और अनिवार्य शर्त कहा था। 

शायद ही कोई इससे इंकार कर पाए कि सामाजिक तौर पर हिंदी पट्टी भारत के सबसे पतनशील सांस्कृतिक-वैचारिक मूल्यों का गढ़ रहा है।  वर्ण, जाति और पितृसत्ता आधारित मध्यकालीन बर्बर सांस्कृतिक-वैचारिक मूल्य इस पट्टी के सामाजिक व्यवस्था की रीढ़ हैं, जो यहां के जीवन के सभी रूपों में पग-पग पर दिखाई देते हैं। यहां की आम जनता ही नहीं, बौद्धिक-सांस्कृतिक और साहित्यिक आंदोलनों की अगुवाई करनेवाला बहुलांश हिस्सा वर्ण-जाति और पितृसत्ता के कीचड़ में धंसा हुआ है और जाने-अनजाने इन्हीं मूल्यों-विचारों को पल्लवित-पुष्पित करता है। 

यहां तक कि हिंदी पट्टी का वामपंथी वैचारिक-सांस्कृतिक और साहित्यिक आंदोलन भी  इस दायरे से निर्णायक तरीके से बाहर नहीं निकल पाया। जो कोई संस्था, संगठन या व्यक्ति हिंदी पट्टी को मध्यकालीन बर्बर सांस्कृतिक-वैचारिक मूल्यों से बाहर निकालना चाहता है और उसे एक प्रबुद्ध आधुनिक समाज में तब्दील करना चाहता है, उसे फुले दंपत्ति और उनके द्वारा स्थापित संस्था सत्यशोधक समाज के विचारों, मूल्यों और एजेंडे को आत्मसात करना ही होगा। 

वर्तमान में हिंदी पट्टी में बहुत सारी संस्थाएं और व्यक्ति निरंतर इस दिशा में काम कर रहे हैं और फुले दंपत्ति द्वारा स्थापित सत्यशोधक समाज के विचारों को फैलाने में लगे हैं, ऐसे कई सारे संगठन और लोग हरियाणा में भी काम कर रहे हैं। यह उल्लेखनीय है क्योंकि सामान्य तौर पर लोग हरियाणा के समाज के भीतर चल रही उथल-पुथल को नहीं जानते-समझते हैं और मुख्यधारा की मीडिया द्वारा की जा रही सतही  रिपोर्टिंग के आधार अपनी राय बनाते हैं। उन्हें लगता है कि हरियाणा सामाजिक-सांस्कृतिक तौर पर जड़ समाज है। वहां खापों पंचायतों का राज है और वहां ऐसे संगठन और व्यक्ति नहीं हैं, जो हरियाणवी समाज के मध्यकालीन बर्बर मूल्यों और सामाजिक संबंधों को चुनौती दे रहे हों। लेकिन सच इसके विपरीत है। वहां समाज के भीतर भारी उथल-पुथल चल रही है और फुले की भाषा में जिन्हें शूद्र-अतिशूद्र (पिछड़े-दलित) और महिलाएं कहते हैं, उनका शिक्षित-सचेत हिस्सा वर्ण-जाति आधारित सामाजिक व्यवस्था और पितृसत्ता को निर्णायक चुनौती दे रहा है और चुनौती देने के वैचारिक हथियार के रूप में फुले दंपत्ति, आंबेडकर और भगत सिंह के विचारों अपना रहा है तथा व्यापक पैमाने पर प्रचार-प्रसार कर रहा है। इस क्रम में हरियाणा के गांवों और कस्बों में बड़े पैमाने पर फुले, आंबेडकर और भगत सिंह के नाम पर पुस्तकालय खोले जा रहे हैं। छोटी-बड़ी गोष्ठियां आयोजित की जा रही हैं।  दलित-बहुजन विचारकों-चिंतकों के जन्मदिन और स्मृति दिवस मनाए जा रहे हैं। इसके अलावा फुले दंपत्ति, आंबेडकर और भगत सिंह के विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए पर्चे, पुस्तिकाएं और किताबे तैयार की जा रही हैं, गीतों और नाटकों की रचना हो रही है।

ऐसे ही संगठनों में एक संगठन ‘सत्यशोधक फाउंडेशन’ है, जिसका केंद्र कुरुक्षेत्र (हरियाणा) है। इस संगठन की स्थापना 4 अप्रैल, 2020 को हुई। इस संस्थान की स्थापना में कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय के शिक्षकों-छात्रों की अहम भूमिका है।  इस संस्था के साथ कुरूक्षेत्र और उसके आसपास के 7-8 जिलों के बड़ी संख्या में शिक्षक, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता और लेखक-पत्रकार जुड़े हुए हैं। इनमें सुभाष चंद्र, अरूण कैहरबा, प्रोफेसर टी. आर. कुंडू, सुरेंद्रपाल सिंह, जयपाल, अविनाश सैनी, राजकुमार जांगड़ा, परमानंद शास्त्री, अशोक भाटिया, सत्यवीर नाहड़िया, जगदीश आर्य आदि शामिल हैं। 

भले ही व्यवस्थित रूप में सत्यशोधक फाउंडेशन की स्थापना 2020 में हुई हो, लेकिन इसकी नींव वर्ष 2015 में ‘देस हरियाणा’ नामक पत्रिका के प्रकाशन की शुरूआत के साथ हो गई थी। यह सिर्फ एक पत्रिका नहीं थी, बल्कि एक संस्था का भी काम करती है। इस पत्रिका के बैनर तले 2015 से ही हर वर्ष जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले की जयंती व स्मृति दिवस मनाया जाना शुरू हुआ। इसका उद्देश्य हिंदी पट्टी, विशेषकर हरियाणा में फुले दंपत्ति और सत्यशोधक समाज के विचारों और उद्देश्यों का प्रचार-प्रसार करना है। अब तक इस पत्रिका के 38 अंक प्रकाशित हो चुके हैं। देश भर के प्रबुद्ध चिंतक-लेखक इस पत्रिका में नियमित तौर पर लिखते हैं। वर्ण-जातिवाद, पितृसत्ता और सम्प्रदायिकता को यह पत्रिका मुख्य रूप से अपना निशाना बनाती है। देश-दुनिया के सभी प्रश्नों पर तार्किक और विवेक संगत ढंग से सोचने के लिए प्रेरित करती है।

‘देस हरियाणा’ पत्रिका के कुछ अंकों के आवरण पृष्ठ

सत्यशोधक फाउंडेशन के केंद्रीय व्यक्तित्व सुभाष चंद्र और उनकी जीवनसंगिनी विपुला जी रही हैं। दोनों पेशे से शिक्षक रहे हैं। सुभाष चंद्र कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर हैं और संप्रति विभागाध्यक्ष हैं। वही विपुला जी राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक कन्या विद्यालय प्रतापगढ़ (कुरूक्षेत्र) में गृह विज्ञान की शिक्षिका थीं। उनका परिनिर्वाण 8 जनवरी, 2021 को हो गया। इसके पहले यह दंपत्ति कदम से कदम मिलाकर सारी सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को अंजाम देता था। 

विपुला जी के परिनिर्वाण के बाद उनकी स्मृति को संरक्षित रखने और उनके संकल्पों एवं विचारों के आगे बढ़ाने के लिए उनकी स्मृति में व्याख्यानमाला की शुरूआत हुई। पहला विपुला स्मृति व्याख्यान 23 सितंबर, 2021 को हुआ।  इसका विषय ‘वर्तमान परिवेश में बाल रचनात्मकता’ था। यह व्याख्यान प्रसिद्ध शिक्षाविद् और नाटककार  कुलदीप सिंह दीप ने दिया। दूसरा विपुला स्मृति व्याख्यान 23 सितंबर 2022 को हुआ, जिसका विषय ‘सत्यशोधक समाज का 150 साल का सफर’ था। 

सत्यशोधक फाउंडेशन के केंद्रीय व्यक्तित्व सुभाष चंद्र इस फाउंडेशन के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि हमारा उद्देश्य बुद्ध, कबीर, रैदास, फुले और आंबेडकर के विचारों का प्रचार-प्रसार करना और इनके विचारों के आगे बढ़ाने वाली संस्थाओं का निर्माण करना है तथा हरियाणा में नौजवानों की ऐसी पीढ़ी तैयार करना है, जो फुले-आंबेडकर के सपनों का भारत बनाने के कार्यभार को अपने हाथ में ले। वे आगे कहते हैं कि इस काम में एक हद तक सफलता भी मिली है। पिछले 7-8 वर्षों के कामों परिणाम है कि एक ऐसी टीम तैयार हुई है, जो अपनी संवेदना, वैचारिकी और आचरण से फुले दंपत्ति के कार्यों को आगे बढ़ा रही है। ‘देस हरियाणा’ और सत्यशोधक फाउंडेशन की टीम ने कुरुश्रेत्र में सावित्री-जोतिबा फुले पुस्तकालय, म्यूजियम और शोध-संस्थान की भी स्थापना की है। इसी संस्थान में फुले दंपत्ति की बहुत खूबसूरत प्रतिमा स्थापित की है, यह प्रतिमा महराष्ट्र से करीब 4 वर्ष पूर्व आई थी। इस प्रतिमा को लेकर फुले दंपत्ति के कारवां को आगे बढ़ाने में लगे 17 लोगों की टीम प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता रघुनाथ ढोक के नेतृत्व में महाराष्ट्र से आई थी। इस टीम ने बिना किसी शुल्क के यह प्रतिमा संस्थान को भेंट की। 

सत्यशोधक फाउंडेशन ने फुले दंपत्ति के विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए भविष्य के लिए महत्वपूर्ण कार्य योजनाएं रखी हैं, जिसमें तहत फुले दंपत्ति के समग्र साहित्य का सहज-संप्रेषणीय अनुवाद और उसका प्रकाशन। इस दिशा में काफी काम हो भी चुका है। सुभाष चंद्र को उम्मीद है कि सावित्रीबाई फुले की जयंती (3 जनवरी) 2023 तक उनका समग्र साहित्य प्रकाशित हो जाएगा। इसके साथ ही संस्थान जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले पर लिखे गए मराठी, हिंदी और अंग्रेजी के समग्र साहित्य पुस्कालय के लिए इकट्ठा करने की योजना है, इस दिशा में काम शुरू हो चुका है। फुले दंपत्ति से संबंधित जो महत्वपूर्ण साहित्य हिंदी में नहीं है, उसे हिंदी में उपलब्ध कराने का कार्यभार भी संस्थान ने लिया है। संस्थान सत्यशोधक समाज और फुले दंपत्ति के कार्यों को हिंदी पट्टी में आगे बढ़ाने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं के लिए पुरस्कार भी शुरू करने की योजना बना रहा है। संस्थान की फेलोशिप देने की भी योजना है। यह फेलोशिप फुले दंपत्ति और सत्यशोधक समाज पर हिंदी में मौलिक कार्य करने वाले शोधार्थियों और अध्येताओं को प्रदान की जाएगी। 

इसी क्रम में सत्यशोधक फाउंडेशन कुरुक्षेत्र में एक बड़ा संस्थान खड़ा करने की योजना पर भी कार्य कर रहा है, जिसके तहत संस्थान का एक भवन तैयार किया जाएगा। इस में सभा सम्मेलन के लिए बड़े हॉल, पुस्तकालय, शोध-संस्थान और ठहरने के लिए आवास बनाया जाएगा। फाउंडेशन की कोशिश है कि यह भवन फुले दंपत्ति और सत्यशोधक समाज के विचारों को आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण केंद्र बने।

यह सच है कि आज की तारीख में हिंदी पट्टी में ब्राह्मणवादी और मर्दवादी श्रेष्ठता में विश्वास करने वाली विचारधारा और उसके संगठन वर्चस्वशाली स्थिति में सतह पर दिख रहे हैं, लेकिन इसी सच का दूसरा पहलू यह है कि सतह के नीचे फुले, आंबेडकर और भगत सिंह की वैचारिकी भी तेजी से फल-फूल रही है। यह अत्यंत ही सुखद है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सिद्धार्थ

डॉ. सिद्धार्थ लेखक, पत्रकार और अनुवादक हैं। “सामाजिक क्रांति की योद्धा सावित्रीबाई फुले : जीवन के विविध आयाम” एवं “बहुजन नवजागरण और प्रतिरोध के विविध स्वर : बहुजन नायक और नायिकाएं” इनकी प्रकाशित पुस्तकें है। इन्होंने बद्रीनारायण की किताब “कांशीराम : लीडर ऑफ दलित्स” का हिंदी अनुवाद 'बहुजन नायक कांशीराम' नाम से किया है, जो राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है। साथ ही इन्होंने डॉ. आंबेडकर की किताब “जाति का विनाश” (अनुवादक : राजकिशोर) का एनोटेटेड संस्करण तैयार किया है, जो फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित है।

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