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दलित कविता की आंबेडकरवादी चेतना का उत्तरोत्तर विकास

उत्तर भारत में दलित कविता के क्षेत्र में शून्यता की स्थिति तब भी नहीं थी, जब डॉ. आंबेडकर का आंदोलन चल रहा था। उस दौर में और आजादी के बाद अनेक दलित कवि हुए, जिन्होंने कविताएं लिखीं। प्रस्तुत है कंवल भारती की विशेष आलेख श्रृंखला ‘हिंदी दलित कविता का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य’ की पांचवीं कड़ी का पहला भाग

दलित कविता का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पांचवीं कड़ी का पहला भाग

हमने पिछली कड़ियों में देखा कि सातवें और आठवें दशक की दलित कविता जाति के दायरे को तोड़कर वर्ग-संघर्ष की चेतना से लैस हो रही थी। लेकिन इसी समय दलित कवियों के एक वर्ग पर बुद्ध और डॉ. आंबेडकर की भक्ति-भावना का रंग भी चढ़ रहा था। ये कवि जातीय आधार पर डॉ. आंबेडकर के साथ उसी तरह का अपना भावुक संबंध बना रहे थे, जैसे एक भक्त ईश्वर के साथ बनाता है। ऐसे सारे कवि दलित जातियों से थे, लेकिन वे रामचरित मानस, हनुमान चालीसा और कीर्तनों के संसार में पैदा हुए थे। इसलिए ये राम और कृष्ण को भूल गये, पर उनके स्थान पर बाबासाहेब के पुजारी हो गये। उदाहरण के लिये उस काल के दलित कवि लालचंद्र ‘राही’ की एक कविता की ये दो पंक्तियां देखिए–

बाबा-बाबा पुकारूं तेरे नाम को।

मैं तो भूल चुका हूं घनश्याम को।।[1]

राम और घनश्याम को पुकारने वाला दलित कवि अब ‘बाबा-बाबा’ पुकारने लगा था। जिस भूत-प्रेत को वह हनुमान चालीसा पढ़कर भगाता था, उसे अब वह भीम बाबा का नाम लेकर भगाने लगा। यथा, लालचंद्र ‘राही’ की ही यह कविता–

भीम कहे भय भागे।

भूत-पिशाच निकट नहिं आवे, तेज-पुंज तन जागे।।

नाशै रोग, हरै सब पीरा, भीम नाम सुमिरे बलबीरा।

बढ़ै मनोबल, ज्ञान विमल हो, बुद्ध शरण अनुरागे।।[2]

यदि यह कवि डॉ. आंबेडकर की विचारधारा का कवि होता, तो वह भूत-पिशाच को कोरी कल्पना बताता। लेकिन उसने हिंदूवादी दर्शन के तहत परलोक और स्वर्ग में भी अपनी आस्था व्यक्त की–

संदेशा है ये हम दलितों का, जन्नत जाय कह देना।

हमारा भीम बाबा को ‘नमो बुद्धाय’ कह देना।।[3]

‘बुद्ध शरण’ और ‘नमो बुद्धाय’ शब्दों का प्रयोग बताता है कि वे डॉ. आंबेडकर के बौद्ध हो जाने पर बुद्ध के प्रति भावनात्मक रूप से जुड़ गये थे, पर हिंदूवादी अध्यात्म से मुक्त नहीं हुए थे। इसलिए वे हिंदू अवतारवाद के सांचे में ही आंबेडकर को ढाल रहे थे। एक और दलित कवि शंकरानंद की यह कविता देखिए–

हमें उठाने के हित बाबा, एक बार फिर आओ।

याद रखेगा तुम्हें जमाना, मानवीय अधिकार दिलाना।

फैल गया फिर अनाचार जो, आके इसे मिटाओ।।

जन ‘शंकरानंद’ आकुल है, दुखित हृदय है अति व्याकुल है।

बाबा मेरे करुणा करके, इसको धीर बंधाओ।।[4]

यह वही शंकरानंद हैं, जिन्होंने 1946 में “पूना-पैक्ट बनाम गांधी” जैसी विचारोत्तेजक कृति लिखी थी। जैसे गीता में लिखा है कि जब-जब पाप बढ़ेंगे, तब-तब कृष्ण पाप मिटाने के लिये धरती पर जन्म लेंगे, उसी भाव-बोध के साथ उपर्युक्त कविता में शंकरानंद ने बाबासाहेब को याद किया है।

इसमें संदेह नहीं कि भारत की गुलाम कौम के लिये डॉ. आंबेडकर सिर्फ एक नेता नहीं हैं, उसके मुक्तिदाता भी हैं। हजारों साल से दलित जिन काल्पनिक देवी-देवताओं की पूजा करते आ रहे थे, उनमें से किसी ने भी उनकी गुलामी दूर नहीं की थी। बीसवीं शताब्दी में डॉ. आंबेडकर ही उनके लिये एक ऐसे मसीहा बनकर आये, जिन्होंने उन्हें मनुष्य की गरिमा दिलायी, मानवीय अधिकार दिलाये और शासन-प्रशासन में भागीदारी दिलायी। इसलिए यदि दलित कवियों ने उन्हें भगवान के स्तर पर प्रतिष्ठित किया, तो इसे अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता। उनके लिये डॉ. आंबेडकर उस राम से बेहतर थे, जिसने गौओं और ब्राह्मणों की रक्षा के लिये जन्म लिया था, वे उस कृष्ण से महान थे, जो दिन-भर पिछड़ी जातियों की जवान लड़कियों के साथ रास रचाता था; वे उस शिव से श्रेष्ठ थे, जो एक मोहिनी के पीछे कामांध होकर भाग रहे थे; और उस विष्णु से उत्तम थे, जिसका मुख्य काम दूसरों की स्त्रियों का शील भंग करना था। डॉ. आंबेडकर ऐसे व्यक्ति थे, जो अछूत जाति में जन्मे थे और अछूतों के उद्धार के लिये कृत-संकल्पित थे। इसलिये उनका जो महत्व दलितों के लिये था, वह अन्य लोगों के लिये सचमुच नहीं हो सकता था। उनके प्रति जो कृतज्ञता दलित दिखा सकते थे, वैसी कृतज्ञता कोई गैर-दलित नहीं दिखा सकता था। यही कारण है कि हिंदी साहित्य में डॉ. आंबेडकर के संबंध में किसी भी द्विज लेखक की कोई रचना नहीं मिलती, जबकि गांधी की प्रशंसा में उन्होंने कविताओं से लेकर महाकाव्य तक और कहानियों से लेकर उपन्यास तक की भरमार कर डाली है। इसलिए ये दलित कवि ही थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं में डॉ. आंबेडकर को जीवित रखा।

1970 और 1980 के दशक में प्रकाशित कुछ दलित काव्य संग्रहों के मुख्य पृष्ठ

ये दलित कवि जिस अध्यात्म और आस्तिकता के हिंदूवादी वातावरण में पले थे, उसी से उनकी सौंदर्य दृष्टियां और कल्पनाएं निर्मित हुई थीं। उसमें भावना का मुख्य स्थान था, तर्क के लिये गुंजाइश नहीं थी। इन कवियों में इन पंक्तियों का लेखक भी था, जो अपने छात्र-जीवन (1968) में आंबेडकर-मिशन से प्रभावित होकर अपनी ईश्वरवादी अवधारणाओं से डॉ. आंबेडकर पर कविताएं लिखने लगा था। ये कविताएं 1971 में प्रकाशित संकलन ‘नयी चेतना नये राग’ में और 1978 में प्रकाशित ‘भीम वंदना’ में मौजूद हैं। उसमें से कुछ उदाहरण यहां इसलिये दिये जाते हैं, ताकि यह समझा जा सके कि इस काल के दलित कवि इसी भावबोध की कविताएं लिख रहे थे। यथा ‘बाबा साहेब को शत-शत प्रणाम’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियां–

विश्व पुकार रहा है बाबा एक बार फिर आओ।

मिलजुल कर रहने का सबको फिर से पाठ पढ़ाओ।।

पीड़ित दलित पुकार रहे हैं ऊपर हमें उठाओ।

अत्याचार मिटाकर सबको सदाचार सिखलाओ।।[5]

कवि के भावुक मन में यह विचार नहीं आया कि जो मर जाते हैं, वे पुनः नहीं आते और दलितों को ऊपर उठने के लिये खुद ही संघर्ष करना होता है। इस भावुक कवि ने एक अन्य कविता में लिखा–

तुम थे भारत के ललित पुष्प सुन्दर थे फलित कुसुम जैसे,

तुम को था जग से प्यार अमित, तुम ही थे प्राण सकल जग के।

तुम थे देवों में सर्वश्रेष्ठ, अंतर में शुद्ध भवन थे तुम,

सचमुच यह जग की सत्य उक्ति, तुम थे अवतार इसी युग के।।[6]

इस प्रकार डॉ. आंबेडकर देवता और अवतार के रूप में पूजा की वस्तु हो गये थे। ‘भीम वंदना’, ‘भीम कीर्तन’ और ‘भगवान आंबेडकर’ जैसी शीर्षकों वाली काव्य कृतियां छपने लगी थीं। बुलंदशहर के दलित कवि रणजीत सिंह ने लिखा–

दीन हीन मानव के बाबा

तुम्हीं एक भगवान हो।

अरमान लुटी मानवता के

बस तुम्हीं एक अरमान हो।।[7]

यह वह समय था, जब डॉ. आंबेडकर पर इस प्रकार की कविताओं की बाढ़-सी आ गयी थी। ऐसी ही बाढ़ लोक-गीतों और छंदों में भी आई हुई थी। दरअसल, डॉ. आंबेडकर के जीवन-संघर्ष और उनकी दलित-मुक्ति की लड़ाइयों ने दलित जातियों में जो सांस्कृतिक परिवर्तन किया था, उसमें उन्हें उनके जीवन-काल में ही महानायक बना दिया था। हमारे आधुनिक समय के वे पहले ऐसे नायक हैं, जो भारत की दलित जातियों में भगवान के रूप में माने जाते हैं। डॉ. आंबेडकर का यह दैवीकरण उचित है या नहीं, यह गौरतलब नहीं है, वरन् गौरतलब यह है कि डॉ. आंबेडकर के प्रति उनकी यह दीवानगी ही भारतीय राजनीति में उनकी सबसे बड़ी ताकत है। यह ताकत अभी तक किसी भी दलित नेता को नहीं मिली; जगजीवन राम को भी नहीं और कांशीराम को भी नहीं, हालांकि कुछ दलीय प्रचारक दलित कवियों ने इन नेताओं का भी दैवीकरण उनके जीवन में ही शुरु कर दिया था।

लेकिन एक देवता के रूप में डॉ. आंबेडकर का चित्रण कतई हवाई नहीं है, जैसा कि पौराणिक देवताओं के बारे में हवाई चित्रण मिलता है। दलित कवियों के लिये आंबेडकर भगवान के रूप में भी इतिहास के व्यक्ति हैं, तुलसी के राम की तरह पौराणिक नहीं हैं। तुलसी ‘कवितावली’ में राम की महानताओं को गिनाते हुए राम की जय बोलते हैं – “ताड़का और सुबाहु का नाश किया, मारीच का मद तोड़ा, शिला रूपी अहल्या को तारा, शिव जी के धनुष को तोड़कर परशुराम के अभिमान को चूर्ण किया, जयंत को जीतकर साधुजनों को आनंद दिया, विराध का वध करके देवता और मुनि गणों का भय दूर किया एवं शूर्पणखा को रूप रहित कर रघुकुल के भूषण बने।”[8]

यदि हम तुलनात्मक अध्ययन करें, तो दलित कवियों के डॉ. आंबेडकर राम से ही नहीं, सारे देवताओं से महान हैं। वे न किसी मनुष्य का वध करते हैं और ना ही किसी स्त्री को रूप विहीन कर अपमानित करते हैं। दलित कविता में वे दलित समुदाय के भूषण हैं, जो पत्थर रूपी अहल्या का नहीं, गुलाम बनायी गयी जनता का उद्धार करते हैं। दलित कवि रणजीत सिंह इन शब्दों में आंबेडकर को प्रणाम करते हैं–

जिस भीम ने हमको उबारा

उस भीम को शत शत प्रणाम।

जिस भीम ने जीवन दिया-

उस भीम को शत शत प्रणाम।।[9]

दलितों को जीवन न राम ने दिया और न अन्य किसी देवी-देवता ने। वह जीवन उन्हें डॉ. आंबेडकर ने दिया। इसलिये उनके लिये वे ही सबसे बड़े देव हैं। इसी भाव-भूमि पर रचित एक ‘महिला गीत’ में कवि कहता है–

मैं भीम मनाऊं देवरिया, जानै कीयौ दलित उद्धार।

भीम में नांय देखौ कोई ऐव है।

सब देवन में बड़ौ देव है।

यापै होयं शोषित बलिहार, मैं भीम मनाऊं देवरिया।।[10]

इस कविता में बुलंदशहर और अलीगढ़ की आंचलिक भाषा का प्रयोग हुआ है, जो बहुत ही सरस और ओजपूर्ण है।

हिंदू कवियों ने जिस तरह अपने देवताओं और भगवानों की सुंदरता का वर्णन किया है, उसी तरह दलित कवियों ने भी ‘भीम भगवान’ की सुंदरता का वर्णन किया है। दलित कवि मोतीलाल संत ने तो उनका नख-शिख वर्णन इस तरह किया–

विशाल माथा भीम का, भृकुटी बनी कमान।

नेत्र दिव्य ज्योति बने, चेहरा कमल समान।।

चेहरा कमल समान, कर्ण जग भेद जताये।

तीक्ष्ण बुद्धि भुजा दोऊ बलवान बताये।।

कहै ‘संत’ कविराय, बबर शेर का सीना।

चले चाल अलमस्त, बुद्धधर्म दिया नगीना।।[11]

व्यक्तित्व-वर्णन के बाद कवियों ने आंबेडकर के जन्म, माता-पिता, परिवार, शिक्षा और संघर्ष का चित्रण किया और उनकी उन महानताओं का वर्णन किया, जो उन्हें ‘उद्धारक’ और ‘मसीहा’ बनाती हैं। दलित कवि राजपाल सिंह ‘राज’ ने ‘भीम परिचय’ नामक कविता में इन शब्दों में आंबेडकर का परिचय कराया है–

क्या दोहराऊं राम-कथा को, हो गयी युगों पुरानी।

भारत के विद्वान भीम की, सांची सुनो कहानी।।

परम पवित्र सतारा नगरी, महू छावनी दिव्य धाम।

चौदह अप्रेल अठारह सौ इक्यानवे को हुए भीम राम।।

धन्य-धन्य माता भीमाबाई, दिया सबको ललित ललाम।

जागे भाग्य शोषित जन के, सबको मिला विपुल विश्राम।।[12]

दलित कवि मनोहर लाल ‘प्रेमी’ ने भीमराव की शिक्षा का वर्णन करते हुए लिखा–

एम.ए., एम.एस.सी., पी-एच.डी.।

बार एट-लॉ की डिग्री ली।।

पांच विषय में बने डाक्टर।

तुम बाबा जी ज्ञान दिवाकर।।

दीन्हा जन-जन को शुचि ज्ञान।

जय हो जय हो भीम महान।।[13]

दलित कवियों ने डॉ. आंबेडकर के जीवन संघर्ष को भी उनकी महानताओं के रूप में चित्रित किया है। तालाब से पानी लेने के अधिकार की लड़ाई, मंदिर में प्रवेश की लड़ाई और शासन-सत्ता में दलितों की भागीदारी की लड़ाई आंबेडकर के वे महान कार्य हैं, जिन्होंने दलितों की मुक्ति के द्वार खोले। राजपाल सिंह राज ने अभिभूत होकर लिखा–

करुणा निधान मेरे, करुणा निधान मेरे।

गायेंगे सदियों शोषित, गर्वित गुण गान तेरे।।

तू आंबेडकर है, एक शेर बबर है।

दलितों का मसीहा, दुनिया का दुखहर है।

कर्म का चर्चा, भारत में घर-घर है।

इतिहास विधाता तू अजर-अमर है।

तू था एक अकेला दुश्मनों का रहा झमेला।

निडर होकर बड़ा आगे, ना रुके आहवान तेरे।।[14]

आंबेडकर ने दलित-मुक्ति की सभी लड़ाईयां जीती थीं। चावदार तालाब की लड़ाई में भारत की सबसे बड़ी अदालत ने दलितों के पक्ष में फैसला किया था, नासिक के धर्म सत्याग्रह ने दलितों को मंदिर प्रवेश का कानूनी अधिकार दिया। स्वतंत्रता मिलने के बाद वे स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री बनाये गये और उन्हें अपने देश का संविधान बनाने का अवसर मिला। संविधान-शिल्पी के रूप में उन्होंने हजारों वर्षों से प्रचलित मनु के कानून के स्थान पर समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व को कायम करने वाला कानून बनाकर लोकतंत्र को मजबूत किया। सिर्फ इसी आधार पर दलित उन्हें अपना मुक्तिदाता मानते हैं। मनोहर लाल ‘प्रेमी’ ने उनकी इस महानता को इन शब्दों में याद किया–

भारत का कानून बनाया।

दलितों को अधिकार दिलाया।।

समता का मारग दिखलाया।

जनहितमय संदेश सुनाया।।

कीना नवयुग का निर्माण।

जय हो जय हो भीम महान।।[15]

सातवें दशक के दलित कवियों ने भी डॉ. आंबेडकर के संविधान-निर्माण को इसी भाव के साथ स्मरण किया था। लालचंद्र राही की एक कविता की ये पंक्तियां द्रष्टव्य हैं–

युग मानव बाबासाहेब ने, संविधान भारत का रचकर।

मिटा दिये मनु के हस्ताक्षर, बना दिये युग के हस्ताक्षर।।[16]

संविधान-निर्माण की घटना के साथ-साथ आंबेडकर के जीवन की लगभग सभी महत्वपूर्ण घटनाओं पर दलित कवियों ने कविताएं लिखीं। ये कविताएं उन खंड काव्यों तथा महाकाव्यों से अलग हैं, जो आंबेडकर के सम्पूर्ण व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर लिखे गये। इनमें तुलसीदास के ‘रामचरित मानस’ की तर्ज पर ‘भीमचरित मानस’ की रचना की गयी। इस नाम से दो काव्य ज्यादा प्रसिद्ध हुए, जिसमें एक के रचयिता फीरोजाबाद के अनेग सिंह दास, एम.काम थे, जिन्होंने 1980 में दोहा, चौपाई और सोरठा छंदों में ‘भीमचरित मानस’ की रचना की थी और दूसरे के रचयिता सण्डीला (हरदोई) के गोकरन लाल ‘करुणाकर’ थे, जिनका आल्हा छंद में ‘भीमचरित मानस’ 1984 में प्रकाशित हुआ था। इसी समय ग्राम लोहगढ़ जिला अलीगढ़ के अमर सिंह राही की लोक सांगीत में ‘दलितों का मसीहा भीमराव आंबेडकर’ पुस्तक आयी, जो जवाहर बुक डिपो, भारतीय प्रेस, गुजरी बाजार, मेरठ से 1982 में प्रकाशित हुई थी। इन काव्यों और कविताओं में डा. आंबेडकर के जीवन की घटनाओं का जिस भाव-बोध के साथ वर्णन हुआ है, वह उद्वेलित करने वाला है।

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इन घटनाओं में चार घटनाएं महत्वपूर्ण हैं, पहला, महाड का चावदार तालाब से पानी लेने का सत्याग्रह, दूसरा, नासिक का कालाराम मंदिर में दलितों के प्रवेश का आंदोलन, तीसरा, दलितों के पृथक राजनैतिक अधिकारों के प्रश्न पर गांधी-आंबेडकर विवाद और पूना-समझौता तथा चौथा, हिन्दू धर्म को त्यागकर बौद्धधर्म को स्वीकार करना। आंबेडकर में आस्थावान दलित कवियों ने इन्हीं घटनाओं पर सबसे अधिक लिखा है।

महाड़ का सत्याग्रह दलितों की सीधी लड़ाई की शुरुआत थी। वह चिनगारी थी, जो आग बन गयी थी। किसी मराठी दलित कवि ने उसे पानी में आग कहा है। हिन्दी की दलित कविता में, इस तरह की विचारोत्तेजना नहीं मिलती। उसकी सर्जना आमतौर पर भावुक तथा परिचयात्मक ही है। यथा, नत्थू सिंह ‘पथिक’ ने ‘महाड’ की घटना का वर्णन इस प्रकार किया है–

महाद ग्राम से आयी चिट्ठी, यहां हम से होती घृणा गंदी है।

वर्षा से भरा ताल में पानी, उसे भरने की हमें पाबंदी है।।

पढ़ चिट्ठी क्रोध हुआ भीम को, चलने की सुता लगायी है।

पानी भरने के लिये, ताल पे हुई घमाशान लड़ाई है।।

ताल से पानी भरकर छोड़ा, भीम वापस आ गये।

पोप पुजारी रूढ़िवादी, सब इनसे घबराय गये।।[17]

इस घटना का सबसे मार्मिक चित्रण दलित कवि अमर सिंह ‘राही’ ने अपने संगीत आधारित नाटक ‘दलितों का मसीहा भीमराव आंबेडकर’ (1982) में किया है। जिस समय दलितों ने चावदार तालाब की ओर कूच किया, उस समय का चित्र कवि ने इस तरह खींचा है–

नायक बनकर आप चल दिये साथ टीम के।

पीछे-पीछे जनता चल दी, साथ भीम के।।

सीधे ऊंगली घी न निकले ये दूं तुम्हें बताई।

भीख मांगने से आजादी, नहीं किसी ने पाई।।

अधिकारों की खातिर रण में, लड़नी पडे लड़ाई।

कष्ट झेल कर ही सुख मिलता, सुन लो कान लगाई।।[18]

आंबेडकर के नेतृत्व में हजारों अछूतों ने तालाब पर पहुंचकर पानी पिया। उस समय का चित्र अमर सिंह राही ने इस तरह खीचा–

सबसे पहले भीमराव ने बड़ के नीर पिया।

ता पीछे सब लोगों को, उसने आदेश दिया।।

हज्जारों ने उस पानी को, पीकर मजा लिया।

इस प्रकार से भीमराव ने पूरा परण किया।।[19]

अछूतों के पानी पीने की खबर सुनकर बौखलाये सवर्ण हिंदुओं ने अछूतों पर हमला बोल दिया। आंबेडकर समेत बहुत से अछूतों के सिर फूट गये। इस घटना ने दलितों के नेता पर क्या प्रभाव डाला, कवि ने उसका ओजस्वी वर्णन वीर रस के लोक छंद ‘आल्हा’ में किया है–

इस घटना ने इन दलितों के, खोल दिये मस्तिष्क के द्वार।

कब तक और पिटोगे इनसे, ऐसे जीवन से धिक्कार।।

और नहीं हम सह सकते हैं, इससे घोर बड़ा अपमान।

यही पूत क्या भारत मां के, क्या नहीं हम उसकी संतान।।

भीमराव के जवाला भड़की, गुस्सा गयी बदन में छाय।

लड़ें लड़ाई अब हम इनसे, दिया भीम ने बिगुल बजाय।।[20]

मार्च 1930 में डॉ. आंबेडकर ने नासिक में अछूतों के धर्म-सत्याग्रह का नेतृत्व किया। इस घटना का चित्रण भी दलित कवियों ने किया । नत्थू सिंह ‘पथिक’ ने रथयात्रा के मेले में रथ खींचने के प्रश्न को मानवाधिकार का प्रश्न बनाते हुए ‘आल्हा’ छंदमें लिखा–

बेटा गर्जा था फौजी का वह मेले में रहा ललकार।

दहशत गालिब हुई भीम की, सवर्ण मान गये थे हार।।

रथयात्रा आरंभ हो गयी, विजय भीम की रहे पुकार।

गज-ग्रह जैसी हुई लड़ाई, वहां से हुई है जय-जयकार।।

कर्मकांड मानव मर्यादा, कौम की सेवा करी कमाल।

सदा बधाई हो जननी को, जिसके जन्मा ऐसा लाल।।

आज भीम न कोई बन पाया, दुखी आत्मा रही पुकार।

यह आजादी है कैसी जो इज्जत लुटती बीच बजार।।

उठो दलितों होश सम्भालों, समता युग को लो पहचान।

दलित दर्पण-पथिक बनाये, सोचो समझो हो कल्याण।।[21]

संडीला (हरदोई) उत्तर प्रदेश के दलित कवि गोकरन लाल ‘करुणाकर’ ने भी अपने ग्रंथ ‘भीमचरित मानस’ में इस घटना का वर्णन आल्हा छंद में इस तरह किया। यथा–

खून खौलिगा सब दलितन का, अब कुछ रहो ठिकाना नाय।

इंकलाब का नारा देकर, आगे बढ़ा कारवां जाय।।

सिंह गर्जना बाबा गरजे, हैं दलितों से कही सुनाय।

पांव पिछारी को मत धरना, चाहे तन धजी-धजी उड़ जाय।।

शिक्षित बनो संगठित होवो, अपने छीन लेव अधिकार।

बिना संगठन बिन जनमत के, ना बिन जंग मिलै अधिकार।।

चारि कोस लों धूरि उड़ानो, अंधा कुप्प पड़ै दिखलाय।

जौ छन दलित घुसे मंदिर में, ढोंगी गये सनाका खाय।।

जैसे भेड़हा भेड़िन पैठै, जैसे सिंह बिड़ारे गाय।

जैइसे लरिका गबड़ी खेलैं, गिन-गिन धरें अगारी पांव।।[22]

‘पथिक’ और ‘करुणाकर’ दोनों ने ही नासिक के धर्म-सत्याग्रह का वर्णन वीर रस में किया है। वीर रस में छंद-रचना जनता को जोश दिलाने के उद्देश्य से की जाती है और इस रस का सबसे अच्छा छंद ‘आल्हा’ ही है। अतः दोनों दलित कवियों ने नासिक की घटना के वर्णन में ‘आल्हा’ छंद का ही प्रयोग किया।

डॉ. आंबेडकर के जीवन-संघर्ष की सबसे महत्वपूर्ण घटना दलितों के लिये पृथक राजनैतिक अधिकारों की लड़ाई है। इसे गांधी-आंबेडकर विवाद के रूप में भी जाना जाता है और पूना-पैक्ट के रूप में भी। भारत के राजनैतिक इतिहास में इस घटना का बहुत कम उल्लेख मिलता है। पर, दलित लेखकों ने इस घटना पर अनगिनत पुस्तकें लिखी हैं, जिसमें सबसे मुख्य और पहली पुस्तक शंकरानंद शास्त्री की 1946 में प्रकाशित ‘पूना-पैक्ट बनाम गांधी’ है। इस पुस्तक ने, आंबेडकर और गांधी की वैचारिकी को जिस तरह रेखांकित किया था, उसी से विकसित चेतना हमें दलित कवियों के काव्य में मिलती है। यहां उन सब का उदाहरण देना संभव नहीं है। यहां गोकरन लाल ‘करुणाकर’ और कवि अमर सिंह राही के काव्य से दो उदाहरण दिये जाते हैं। दलितों के पृथक राजनैतिक अधिकारों के विरुद्ध गांधी के आमरण अनशन पर कवि अमर सिंह ने अपने उदगार इस प्रकार प्रगट किये–

देखो-देखो रे करी है कैसी रार जेल में इस गाँधी ने।

दलितों को अधिकार मिले ना, इसी बात का अनशन।

क्यों नहीं होने देते गांधी, न्यारा निर्वाचन।।

ऐरे कितनौ ढायौ हैं, साथ में अत्याचार।

यदि मरणाव्रत गांधी करते आजादी पाने को।।

सारा देश त्यार हो जाता, साथ जेल जाने को।

ऐरे केवल दलितों के, छीन लिये क्यों अधिकार।।[23]

गांधी-आंबेडकर के बीच पूना में हुए इस पैक्ट पर सबसे मार्मिक टिप्पणी गोकरन लाल ‘करुणाकर’ की है। यथा–

का नहिं भूख-नींद करवावे, का नहिं अबला सके बनाय।

का नहिं कामदेव करवावे, का नहिं पावक सके जलाय।।

को हितकारीं पर स्वारथ बस, को परहित तन देय नसाय।

का नहीं गांधी ने करवायो, दस्तखत पूना में करवाय।।

सोचे बाबा बुड्ढा मरि जै है, हमका होई बड़ा अपराध।

करो कुरबानी अपने लोगन की, पूरी हुई ढोंगिन की साध।।

बाबा से दस्तखत करवाकर, पूना-पैक्ट लिया बनाय।

कोटिक भारत के दलितों के, गले पे छूरी दी चलवाय।।[24]

करुणाकर की दृष्टि में पूना-पैक्ट दलित जातियों के साथ विश्वासघात था। हिंदुओंओं के लिये गांधी ने दलितों के गले पर छुरी चलायी थी।

क्रमश: जारी

संदर्भ :

[1] ‘भीम चेतावनी’, बहुजन कल्याण प्रकाशन, सआदत गंज, लखनऊ, संस्करण-1985, पृष्ठ 3

[2] वही

[3] वही, पृष्ठ 13

[4] वही, पृष्ठ 12

[5] ‘नयी चेतना नये राग’, कंवल भारती, बहुजन कल्याण प्रकाशन, लखनऊ, द्वितीय संस्करण- 1980, पृष्ठ 3

[6] वही, पृष्ठ 8

[7] ‘ललकार’, रणजीत सिंह, प्रकाशक- प्रेमवती, सेक्टर 9/51, आर.के. पुरम, नयी दिल्ली, पहला संस्करण- 1985, पृष्ठ 5

[8] ‘कवितावली’, तुलसीदास, गीता प्रेस, गोरखपुर, संस्करण- संवत् 2058, उत्तरकांड, कविता संख्या 112-113, पृष्ठ 119-20

[9] ‘ललकार’ (उपर्युक्त), पृष्ठ 15

[10] वही, पृष्ठ 13

[11] ‘संत के छक्के’ (प्रथम भाग), मोती राम ‘संत’, सहदेव गली, शाहदरा, दिल्ली, प्रथम संस्करण- 15 अगस्त 1984, पृष्ठ 65-66

[12] ‘भीम भारती’, राजपाल सिंह ‘राज’, राजलक्ष्मी प्रकाशन, भगवत गली, ब्रह्मपुरी, दिल्ली, प्रथम संस्करण- 6 दिसम्बर 1986, पृष्ठ 7

[13] ‘बहुजन गुहार’, मनोहर लाल ‘प्रेमी’, पंचशील प्रकाशन, लखनऊ, प्रथम संस्करण- 1985, पृष्ठ 7

[14] ‘भीम भारती’ (उपर्युक्त), पृष्ठ 5

[15] ‘बहुजन गुहार’ (उपर्युक्त), पृष्ठ 7

[16] ‘भीम चेतावनी’, पृष्ठ 7

[17] ‘दलित-दर्पण’, नत्थू सिंह ‘पथिक’, प्रकाशक- धर्मसिंह, भगवानपुर खेड़ा, शाहदरा, दिल्ली, प्रथम संस्करण- 1984, पृष्ठ 13

[18] ‘दलितों का मसीहा भीमराव अम्बेडकर’, कवि अमर सिंह, जवाहर बुक डिपो, भारतीय प्रेस, गुजरी बाजार, मेरठ, संस्करण प्रथम- 1982, पृष्ठ 13

[19] वही, पृष्ठ 14

[20] वही, पृष्ठ 15

[21] ‘दलित-दर्पण’ (उपर्युक्त), पृष्ठ 15

[22] ‘भीम चरित मानस’ (आल्हा छन्द में), गोकरन लाल ‘करुणाकर’, कल्चरल पब्लिशर्स, लखनऊ, प्रथम संस्करण- 1984, पृष्ठ 39

[23] ‘दलितों का मसीहा भीमराव अम्बेडकर’ (उपर्युक्त), पृष्ठ 22

[24] भीम चरित मानस (उपर्युक्त), पृष्ठ 52

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आम्बेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’ ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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