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गुलामगिरी : सामाजिक न्याय का आधार ग्रंथ

सरकारी विभागों में भटों के वर्चस्व को समाप्त करने के लिए तथा शूद्रों के प्रतिनिधित्व को स्थापित करने के लिए फुले के द्वारा सुझाये गये उपाय पर गौर करें तो वर्तमान में हम जिस आरक्षण की मांग करते हैं, उसके सूत्रधार जोतीराव फुले हैं। पढें, ज्योति पासवान की यह समीक्षा

‘गुलामगिरी’ पुस्तक को अगर हम केवल एक पुस्तक के रुप में देख रहे हैं तो यह हमारी भूल हो सकती है। सदियों से भारत में स्थापित सामाजिक व्यवस्था की जड़ों को किन-किन सामाजिक नियमों एवं धार्मिक कर्मकांडों, कुप्रथाओं एवं परंपराओं का सहारा लेकर मजबूती प्रदान की गई, आर्य-अनार्य के संघर्ष ने किस प्रकार उत्पादक अनार्यों को दास वर्ग और आर्यों को शासक व उपभोक्ता वर्ग के रुप में परिवर्तित कर दिया, ऐसे अनेक तथ्यों की पड़ताल कर ‘गुलामगिरी’ के माध्यम से जोतीराव फुले ने अभिव्यक्त किया है।

इस पुस्तक में जहां एक ओर उन्होंने हिंदू धर्म के के मिथकों का खंडन किया है, वहीं दूसरी ओर यह भी बताया कि समाज में शूद्रों एवं अतिशूद्रों (अछूतों) का शारीरिक, आर्थिक और मानसिक दोहन किया जा रहा है। उनका उद्देश्य था कि समाज में अछूतों के पिछड़ेपन को कायम रखने के लिए ब्राह्मण वर्ग किस प्रकार का प्रपंच कर रहे हैं, इस कूटनीति से ना केवल शूद्र बल्कि अंग्रेज भी परिचित हों। ‘गुलामगिरी’ का प्रकाशन 1 जून, 1873 ई. को हुआ था। यह पुस्तक मूलत: मराठी में लिखी गई थी। लेकिन इसकी भूमिका अंग्रेजी में थी।

यह पुस्तक भले ही 1873 में लिखी गई हो, किन्तु जोतीराव फुले के विचार आज भी हमारे समाज के लिए प्रासंगिक हैं। दुखद पहलू यह है कि जिन संकीर्ण विचारों, रुढ़िवादिता एवं कुत्सित परंपराओं का विरोध जोतीराव फुले ने डेढ़ सौ साल पहले किया था, वे आज भी समाज एवं सत्ता में उपस्थित हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि ‘गुलामगिरी’ का सार लोगों तक उसी उद्देश्य के साथ नहीं पहुंच सका है। यह इस पुस्तक की महत्ता ही है कि इसका पहले भी हिंदी में अनुवाद किया गया है । तो अब यह प्रश्न उठता है कि फिर से हिंदी में अनुवाद कराने के क्या कारण हो सकते हैं?

इस संबंध में उज्ज्वला म्हात्रे के अनुवाद के प्रकाशन के संबंध में प्रकाशक ने लिखा है कि इस पुस्तक के जो हिंदी अनुवाद उपलब्ध थे, उनमें अनुवादकों ने जान-बूझकर या जाने-अनजाने में पुस्तक के कथ्य को उसी प्रकार स्वीकार नहीं किया है, जिस रूप में यह मूल मराठी में है। इसे स्वीकार्य बनाने के लिए उन्हें तोड़ा-मरोड़ा या नरम बनाया गया है।[1]

इस पुस्तक से समाज पूर्णत: तभी लाभान्वित हो सकती है, जब ठीक उसी रुप में स्वीकार किया जाय, जिस रुप में जोतीराव फुले ने पुस्तक की रचना की थी। अत: गुलामगिरी का पुन: हिंदी में अनुवाद कराने के उद्देश्य को इंगित करते हुए प्रकाशक ने लिखा है– “अगर हम चाहते हैं कि हमारा समाज बदले तो हमें फुले की गुलामगिरी को उसकी समग्रता में स्वीकार करना होगा – जैसा है, ठीक वैसे ही। यह एक कड़वी खुराक है, जिसे हमें निगलना ही होगा, एक दर्पण है, जिसमें हमें अपना चेहरा देखना ही होगा। तभी हम अपने समाज को न्यायपूर्ण बनाने की बात सोच सकते हैं।”[2]

जोतीराव फुले द्वारा लिखित व फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित ‘ब्राह्मणवाद की आड़ में गुलामगिरी’ का मुख पृष्ठ

जोतीराव फुले का जन्म एक माली परिवार में हुआ था। उनका परिवार फूलों की खेती किया करते थे, इसलिए उनके परिवार को ‘फुले’ उपनाम दिया गया था। जन्म के एक वर्ष बाद ही फुले की माता का देहांत हो गया था। इस कारण उनका पालन-पोषण सगुनाबाई ने किया था। वह जोतीराव फुले के पिता गोविंदराव की विधवा बहन थीं और एक ब्रिटिश मिशनरी मिस्टर जॉन के घर में अनाथ बच्चों को पालने का काम करती थीं।[3]

जोतीराव फुले पहले भारतीय थे, जिन्होंने अछूतों और स्त्रियों के लिए विद्यालय खोले। वे जानते थे कि अशिक्षा के कारण ही अछूतों के जीवन में अंधकार है। वास्तव में इन्हें शिक्षा की प्रेरणा जोतीराव को सगुनाबाई से ही मिली थी। सगुनाबाई ने अछूत बच्चों के लिए एक स्कूल खोला था। हालांकि सगुनाबाई का यह प्रयास असफल हो गया। ब्राह्मणों के बहकावे में आकर महार नेताओं ने ही स्कूल को बंद करवा दिया था।[4] भट चाहते थे कि शूद्रों-अतिशूद्रों को शिक्षा से वंचित ही रखा जाय। अगर अंग्रेजी सरकार उन्हें शिक्षित भी करना चाह रही है तो उन्हें केवल साक्षर किया जाय और वे पढ़ना-लिखना जान जायें।

लेकिन जोतीराव चाहते थे कि शूद्रों-अतिशूद्रों के बच्चों को भी उच्च शिक्षा प्रदान की जाय। शूद्रों के उच्च शिक्षा से वंचित होने के लिए वे ब्रिटिश सरकार को भी दोषी मानते थे, क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने समाज में शिक्षा के लिए टपकन के सिद्धांत का अनुसरण कर रही थी, जिससे शूद्र-अतिशूद्र समाज को किसी तरह का लाभ नहीं मिल रहा था।[5] फुले ने सरकार की आलोचना करते हुए कहा है कि शिक्षा पर एकाधिकार प्राप्त कर लेने के कारण सभी सरकारी नौकरियों पर भी ब्राह्मणों का ही एकाधिकार स्थापित है। कारण यह है कि कोई भी ब्राह्मण शिक्षित होने के बाद किसी भी शूद्र को शिक्षित करने का कार्य नहीं करते हैं, शिक्षा को उन्होंने केवल अपने तक ही सीमित रखा है। अत: सरकार को अछूतों की शिक्षा के उत्तरदायित्व का निर्वहन स्वयं करना चाहिए। आयवन कोस्का ने इस संदर्भ में लिखा है कि “फुले ब्रिटिश सरकार से अपील करते हैं कि वह शूद्रों की सार्वभौमिक शिक्षा का प्रबंध करें और ब्राह्मण स्कूल शिक्षकों से मुक्ति पाए , जिसके परिणामस्वरुप मेरे शूद्र बंधु दासता के बंधनों से मुक्ति पा सकेंगे”।[6]

फुले की अपील की ओर ध्यान दें तो भारत में आज जो 6-14 वर्ष के बच्चों को मुफ्त शिक्षा के अधिकार प्रदान किया गया है, उस सार्वभौमिक शिक्षा की नींव जोतीराव फुले ने अपने समय में ही रख दिया था।

अनेक ऐसे सामाजिक मुद्दे हैं, जिनके बारे में फुले के विचार महत्वपूर्ण है। उनमें से एक है– आरक्षण। जोतीराव ने अपने समय में ही किसी भी वंचित समाज को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए आरक्षण को आवश्यक माना था और उसकी मांग ब्रिटिश सरकार के सामने रखी थी। ‘गुलामगिरी’ में इन्होंने भटों के द्वारा शूद्रों पर किये गये अत्याचार को दिखाया है। अशिक्षित होने के कारण किस प्रकार वे झूठे कर्ज से दबा दिये गये, उनकी जमीनें हड़प ली गईं। भटों ने उन्हें जीवनभर अशिक्षित और वंचित बनाये रखने के लिए कूटनीतियां बनायीं और अपना एकाधिकार स्थापित किया। फुले यह जानते थे कि बिना एकाधिकार का अंत किये शूद्रों का विकास सम्भव नहीं है। शूद्रों की गुलामी के अंत और एकाधिकार की समाप्ति के समाधान के लिए ही वे धोंडिबा से कहते हैं– “इसका एक ही उपाय है। समाज में भटों की संख्या को देखते हुए सभी विभागों में उनका उचित प्रतिनिधित्व हो, इसमें कोई समस्या नहीं है। मैं यह तो नहीं कहता कि भटों की नियुक्ति ही नहीं होनी चाहिए। मेरा तो बस इतना ही कहना है कि अन्य जातियों के अफसरों की भी नियुक्ति होनी चाहिए।”[7] सरकारी विभाग में भटों के वर्चस्व को समाप्त करने के लिए तथा शूद्रों के प्रतिनिधित्व को स्थापित करने के लिए फुले के द्वारा सुझाये गये उपाय पर गौर करें तो वर्तमान में हम जिस आरक्षण की मांग करते हैं, उसके सूत्रधार जोतीराव फुले हैं। उन्होंने ‘गुलामगिरी’ के माध्यम से आज से डेढ़ सौ साल पहले ही इस तथ्य पर विचार किया कि समाज में समता स्थापित करने के लिए यह आवश्यक है कि सरकारी नौकरियों में सभी जातियों के लोगों की नियुक्ति होनी चाहिये ताकि किसी भी एक विशेष वर्ग का वर्चस्व कायम स्थापित ना हो। दुखद यह है कि डेढ़ सौ साल पहले की वह मांग आज भी पूर्णत: पूर्ण होती नहीं दिख रही है। देश के आजाद होने के इतने वर्ष बाद आज भी सरकारी नौकरियों में सभी जातियों की समानुपातिक हिस्सेदारी नहीं है। इसका अर्थ यही हुआ कि आज भी उन्हें मुख्यधारा में आने से उसी तरह रोका जा रहा है, जिस प्रकार फुले के समय में भट कुलकर्णी शूद्रों को रोका करते थे। न्याय-व्यवस्था भी उन्हें न्याय दिलाने में असफल हो रही है।

वैसे अछूतों की नियुक्ति भी होती है। लेकिन उनके लिए सफाई-कर्मचारी के पद आरक्षित हैं। आज भी इस पद पर दलित ही नियुक्त होते हैं। किसी तरह से अगर कोई दलित नगरपालिका के ऊंचे पद पर नियुक्त हो भी जाया करते हैं, तो उनकी स्थिति भी उनकी तरह ही होती है, जिनका जिक्र करते हुए धोंडिबा ने जोतीराव से कहा है कि कमेटी में कई ऐसे शूद्र विद्वान हैं, जो अपना मत व्यक्त करते समय केवल अपनी मूंडी हिलाते हैं। शूद्र विद्वानों की इसी निष्क्रियता के कारण उन्हें कर्तव्यबोध का ज्ञान देते हुए जोतीराव फुले ने पुस्तक की भूमिका में लिखा है– “यह उन शूद्रों का भी कर्तव्य है, जिन्होंने कुछ शिक्षा प्राप्त की है। वे सरकार के सामने अपने बंधुओं की सत्य परिस्थिति पेश करें ताकि वे उन्हें और खुद को भी ब्राह्मणों की गुलामी से मुक्त कर सकें।”[8]

प्रश्न यह उठता है कि क्या आज भी दलित-बहुजनों को इस कर्तव्य को याद दिलाने की आवश्यकता नहीं है? यह बात तो पूरी तरह से सठीक बैठती है कि दलित-बहुजन समाज के प्रति कर्तव्य को भूल चुके हैं। मुठ्ठी भर दलितों ने सत्ता या समाज में अपना प्रतिनिधित्व स्थापित करने के बावजूद आज भी दलित-बहुजन सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्तर पर पिछड़े हैं।

जोतीराव फुले इस बात को भली-भांति जानते थे कि अंग्रेजों के रहते हुए शूद्रों के विकास का आरम्भ हो सकता है। लेकिन अंग्रेजों के द्वारा की गयीं कुछ अभिक्रियाएं उन्हें स्वीकार नहीं थीं। मसलन, भटों के सुझाव के आधार पर अंग्रेजों ने जो पाठ्यक्रम बनाये थे, उससे वे संतुष्ट नहीं थे, क्योंकि भटों ने बड़ी चालाकी से उन पुस्तकों को पाठ्यक्रम में शामिल नहीं होने दिया, जिनके शामिल कर लेने पर भटों के पूर्वजों के द्वारा लिखे गये ग्रंथों पर प्रश्नचिन्ह लगाया जा सकता था।[9] वर्तमान के संदर्भ में भी एक विचारणीय तथ्य यह है कि आज भी हमारे पाठ्यक्रम में वे पुस्तकें शामिल नहीं की गई हैं, जिनसे यह भय हो कि समाज से अंधविश्वास, सामाजिक व्यवस्था, रुढ़िवादिता आदि पर प्रश्न उठ सकें।

‘गुलामगिरी’ पुस्तक केवल शूद्रों के प्रति किये गये अत्याचारों का दस्तावेज भनहीं है। भटों ने अपनी स्त्रियों को भी जिन अधिकारों से वंचित रखा और निरंकुश होकर उनके जीवन को भी नारकीय बनाने में किसी तरह की कसर नहीं छोड़ी, फुले ने उन सभी कुप्रथाओं और परंपराओं का वर्णन इस पुस्तक में किया है। यथा– “स्त्रियों को शिक्षा के अधिकार प्राप्त नहीं थे, विधवा होने पर उन्हें पुनर्विवाह का भी अधिकार नहीं था, अपनी वास्तविक सौंदर्यता का अंत करके विधवा स्त्रियां कुपरंपराओं का पालन करने के लिए बाध्य थीं।” फुले वास्तव में शोषण का अंत करना चाहते थे, चाहे शोषित शूद्र हो या भट समाज की स्त्रियां। यही कारण है कि उन्होंने स्त्रियों के लिए स्कूल खोला। उन्होंने एक प्रसव गृह बनवाया था, जहां पर लोकलाज के भय से भट विधवा स्त्रियां अपना प्रसव कराया करती थीं। यहां तक कि वे स्त्रियां अपने बच्चों को आश्रम में छोड़ने के लिए भी स्वतंत्र थीं। उन अनाथ बच्चों का पालन-पोषण फुले दंपत्ति ही करती थी ।

‘गुलामगिरी’ संवाद शैली में लिखी गई है। फारवार्ड प्रेस, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित व उज्ज्वला म्हात्रे द्वारा मूल मराठी से अनूदित इस पुस्तक के संदर्भ में फुले के तीन नामों जोतीराव फुले, ज्योतिबा फुले और ज्योतिराव फुले पर विचार किया गया है तथा पुस्तक में इन्हें जोतीराव फुले कहकर ही संबोधित किया गया है।[10] एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सदियों पहले ब्राह्मणों को ‘भट’ कहकर संबोधित किया जाता था, इस पुस्तक में ब्राह्मणों के लिए ‘भट’ शब्द का ही उपयोग किया गया है। निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि वर्षों पहले जोतीराव फुले के द्वारा उठाये गये सामाजिक मुद्दे देश के स्वाधीन होने पर भी वर्तमान में हमारे समाज में जीवित हैं। तथाकथित विशेष वर्ग के द्वारा निर्मित धार्मिक नियम, सामाजिक व्यवस्था से हम आज भी मुक्त नहीं हो पाये हैं। ऐसे में आवश्यकता है कि हम अपने देश की स्वाधीनता पर एक बार पुनर्विचार करें, आधुनिकता की परिभाषा को फिर से परिभाषित करें। कहने को हमने आधुनिक युग में जी रहे हैं। लेकिन समस्याएं तो आज भी उसी रुप में जीवित हैं, जिनका अंत करने के लिए जोतीराव फुले ने ‘गुलामगिरी’ की रचना की। इस संदर्भ में प्रकाशक ने ठीक ही लिखा है कि “आज से डेढ़ सदी पहले फुले के जो सरोकार थे, वे आज भी हमारे सरोकार होने चाहिए। आज भी आबादी का बड़ा हिस्सा – शूद्र-अतिशूद्र – हाशिए पर है और समाज और सत्ता प्रतिष्ठानों में उनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है। ब्राह्मणवादी मिथकों का कुप्रभाव समाज पर अब भी हावी है और वे सामाजिक विभाजन तथा गहन शैक्षणिक व आर्थिक असमानता का पोषण कर रहे हैं।”[11]

समीक्षित पुस्तक : ब्राह्मणवाद की आड़ में गुलामगिरी
लेखक : जोतीराव फुले
अनुवादक : उज्ज्वला म्हात्रे
संदर्भ-टिप्पणियां : रामसूरत व आयवन कोस्का
प्रकाशक : फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली
मूल्य : 400 रुपए (सजिल्द), 200 रुपए (अजिल्द)

संदर्भ –

[1] फुले, जोतीराव, ब्राह्मणवाद की आड़ में गुलामगिरी, फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली, 2021, पृष्ठ xi
[2] वही
[3] वही, प्राक्कथन, पृष्ठ xvii
[4] वही
[5] वही, पाद संख्या 33, पृष्ठ 51
[6] वही, पृष्ठ xxv
[7] वही, पृष्ठ 144
[8] वही, पृष्ठ 53
[9] वही, पृष्ठ 149
[10] वही, पाद संख्या 2, पृष्ठ xxxiii
[11] वही, प्रकाशकीय पृष्ठ xi

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

ज्योति पासवान

दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम.ए. ज्योति पासवान काज़ी नज़रुल विश्वविद्यालय, आसनसोल, पश्चिम बंगाल में पीएचडी शोधार्थी हैं

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