h n

हिंदी नवजागरण के मौलिक चिंतक पेरियार ललई सिंह

सनद रहे कि यदि दलित नायकों पर केंद्रित उनके नाटक हिंदी क्षेत्र में दलित-चेतना के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे तो वहीं बहुजन नवजागरण के निर्माण का गंभीर सकारात्मक प्रयास भी कर रहे थे। प्रो. चौथीराम यादव की राय

हिंदी नवजागरण के इतिहास में बहुजन नायिकाओं और नायकों के प्रखर स्वर की घोर उपेक्षा वस्तुतः नवजागरण के व्याख्याकारों के घोर षड्यंत्र का परिणाम है। ऐसा माना जाता है कि हिंदी नवजागरण का आरंभ भारतेन्दु के नाटकों से होता है, लेकिन उनके द्वारा लोकधर्मी जमीन पर लिखे गये नाटकों का अभाव है। 

आगे चलकर भिखारी ठाकुर के लोकधर्मी नाट्यों में नवजागरण की लोकधर्मी विरासत का विकास जरूर देखने को मिलता है, लेकिन मुख्यधारा की नाट्य परंपरा में उन्हें वह महत्व नहीं मिला, जो मिलना चाहिए था। पेरियार ललई सिंह ने हिंदी में पांच नाटकों (एक-वीर संत माया बलिदान, दो-अंगुलिमाल, तीन-एकलव्य, चार-शंबूक वध, पांच-नागयज्ञ) तथा एक एकांकी ‘सिपाही की तबाही’ लिखी, जिनकी नोटिस तक नहीं ली गई।

नवजागरण के व्याख्याकारों और हिंदी आलोचकों का यह अजीब द्विचित्तापन है कि हिंदी में नाटकों के अभाव का रोना-रोते हैं और जब नाटक लिखे जाते हैं तो उन्हें आलोच्य स्वीकृति और अकादमिक जगत में प्रवेश नहीं करने देते। 

क्या पेरियार ललई सिंह के नाटकों को इसलिए अनदेखा कर दिया जाय कि वे एक बहुजन लेखक हैं, वे एक बौद्ध चेतना के लेखक हैं तथा उनका साहित्य बुद्ध, आंबेडकर और पेरियार के विचारों से प्रभावित है? जबकि उनकी रचनाओं में लोकधर्मी चेतना है।

‘पेरियार ललई सिंह ग्रंथावली’ का आवरण पृष्ठ व प्रो. चौथीराम यादव

सनद रहे कि यदि दलित नायकों पर केंद्रित उनके नाटक हिंदी क्षेत्र में दलित-चेतना के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे तो वहीं बहुजन नवजागरण के निर्माण का गंभीर सकारात्मक प्रयास भी कर रहे थे।

हिंदी नवजागरण के व्याख्याकार डॉ. रामविलास शर्मा की दिक्कत यह है कि वे हिंदी नवजागरण के केंद्र में 1857 का खूंटा गाड़ कर बैठ गए हैं और यह मान बैठे हैं कि आधुनिक हिंदी का पूरा साहित्य 1857 की साम्राज्यवादी विरोधी चेतना से प्रभावित है और यह भी कि हिंदी क्षेत्र में दलित जागरण का कोई स्वर प्रस्फुटित ही नहीं हुआ। 

इस जिद पर डॉ. शर्मा वैसे ही अड़े हुए हैं जैसे हिंदी साहित्य से सिद्धों-नाथों की बौद्ध पंरपरा को खारिज करते हुए, यह साबित करने पर अड़े रहते हैं कि हिंदी साहित्य पर बौद्ध-चिंतन का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। 

वास्तव में, वे वैदिक-पौराणिक परंपरा के वर्णवादी भाववादी वेदांत दर्शन से प्रभावित ही नहीं हैं वरन् उसके सम्मोहन से भयाक्रांत भी हैं। जबकि बुद्ध से होते हुए कबीर तक के चिंतन का स्पष्ट प्रभाव पेरियार ललई सिंह के साहित्य और चिंतन में साफ-साफ दिखता है।

वह मार्क्सवाद, बहुजन समाज के किस काम का, जो हिंदी नवजागरण में स्वामी अछूतानंद, चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु, पेरियार ललई सिंह, रामस्वरूप वर्मा, महाराज सिंह भारती, जगदेव प्रसाद जैसे लोकधर्मी बहुजन लेखकों से मुंह मोड़कर केवल शास्त्रधर्मी वर्णवादी परंपरा की ब्राह्मणवादी ‘एकेडमी’ के भीतर ही सारी प्रगतिशीलता की तलाश करता है। उसके बाहर विकसित हो रही सचमुच की परिवर्तनकामी प्रगतिशीलता को वह खारिज करता हैै। 

इस प्रकार बुद्ध की सामाजिक क्रांति हो या फुले, आंबेडकर, पेरियार की सामाजिक क्रांति हो, जिनकी विरासत को ये बहुजन लेखक हिंदी क्षेत्र में विकसित कर रहे थे, उन सबकी सायास उपेक्षा की गई।

वैसे, यदि साम्राज्यवाद-विरोध ही 1857 के विद्रोह के केंद्र में है तो उस समय के कलावादी-छायावादी या स्वयं हिंदी नवजागरण के उन्नायक कहे जाने वाले भारतंदु के साहित्य में उसका स्पष्ट स्वर क्यों नहीं सुनायी पड़ता? 

यदि कहीं सुनाई पड़ता है तो उस समय के लिखे गये लोकधर्मी रचनाकारों के लोकगीतों में, जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था। ब्रिटिश सत्ता को खतरा कलावादी साहित्य से नहीं, लोकधर्मी राष्ट्रवादी लोकगीतों से ही क्यों महसूस हुआ? 

दूसरी बात यह कि साम्राज्यवाद विरोध तो 1857 से लगभग सौ साल पहले ही सन् 1760 में आमने-सामने की लड़ाई के रूप में, तिलका मांझी के नेतृत्त्व में शुरू हो चुका था और लगभग सन् 1780 तक चला। 

इसी दौरान तिलका मांझी को फांसी पर लटका दिया गया था। इतनी दूर न भी जायें तो 1857 से ठीक दो साल पहले 1855 में घटित संथाल की उस ऐतिहासिक जन-क्रांति को कैसे भुलाया जा सकता है, जिसमें हजारों आदिवासी शहीद हो गये और गांव के गांव जला दिये गये। 

चार सगे भाईयों– सिदो मुर्मू, कान्हो मुर्मू, चांद मुर्मू और भैरव मुर्मू के नेतृत्त्व में लड़ी गयी लड़ाई आदिवासी विद्रोह मात्र नहीं, एक महान जनक्रांति थी, जिसमें आदिवासियों के साथ ही कुछ दलित, पिछडे़ और अल्पसंख्यक भी शामिल थे। 

उस जनक्रांति को आज ‘हूल दिवस’ के रूप में याद किया जाता है। उन महान पुरखों के सम्मान में ‘हूल जोहार’ अभिवादन किया जाता है। संघर्ष का यह सिलसिला 50-55 साल बाद भी क्रांतिकारी बिरसा मुंडा के नेतृत्त्व में चलता रहा।

इन क्रांतिकारी बहुजन महानायकों– सिदो, कान्हो, चांद, भैरव, तिलका मांझी और बिरसा मुंडा की जनक्रांति व विद्रोह को नज़रंदाज कर इतिहास लिखा गया। इसी कारण 1857 का इतिहास आधा-अधूरा और एकांगी है। 

क्या आदिवासी और उनके क्रांतिकारी नायक भारत के नागरिक नहीं थे? असल लड़ाई तो वही लड़ रहे थे। वे तब भी असल क्रांति कर रहे थे और आज भी। वे तब भी मारे जा रहे थे और आज भी। तब अंग्रेजों द्वारा और आज अपने ही लोगों द्वारा मारे जा रहे हैं। 

भारत के स्वाधीनता आंदोलन में पूरे देश की भागीदारी थी। उसमें अपना विशेषाधिकार गंवा बैठे राजे-रजवाड़े, देशी सामंत, सुविधा भोगी अभिजन और बहुत बड़ी संख्या में बहुजन समाज के आदिवासी, पिछड़े, दलित, किसान-मजदूर, अल्पसंख्यक सभी शामिल थे और अपने बेहतर भविष्य के लिए आशान्वित भी थे। लेकिन इतिहास में मामूली से मामूली अभिजन नायकों की भूमिका को तो खूब ‘हाईलाइट’ किया गया। जबकि बहुजन पृष्ठभूमि से आने वाले नायकों की घोर उपेक्षा की गयी। 

सत्य तो यह है कि ऐतिहासिक स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान शहीद होने वालों में सबसे बड़ी संख्या बहुजनों की थी। सामाजिक क्रांति की यह पंरपरा बुद्ध, कबीर-रैदास, गुरु नानक, संत गाडगे जैसे संतों से लेकर तिलका मांझी, सिदो, कान्हो, चांद, भैरव और बिरसा मुंडा से होती हुई फुले-आंबेडकर, पेरियार, भगत सिंह और फूलन देवी तक फैली हुई है, जो अपने-अपने समय की वर्चस्वशाली सत्ता-संस्कृतियों से टकराती रही है। 

सच पूछा जाय तो बहुजन नायकों की पंरपरा ही भारत की असल क्रांतिकारी परंपरा है, जो कथित मुख्यधारा के चिंतकों द्वारा बराबर उपेक्षित होती रही। इस पृष्ठभूमि को समझे बिना हिंदी नवजागरण की समझ आधी-अधूरी रह जाएगी। 

अतः बहुजन लेखकों के नवजागरण के स्वर की उपेक्षा कर हिंदी नवजागरण की चर्चा करना बेमानी है। इस पर विस्तृत चर्चा-परिचर्चा और लेखन होना चाहिए तब हिंदी नवजागरण की अवधारणा पूर्ण होगी। पेरियार ललई सिंह के चिंतक और साहित्य इस विमर्श में अमूलचूल हस्तक्षेप हैl 

इस क्रम में धर्मवीर यादव गगन द्वारा संकलित और संपादित ‘पेरियार ललई सिंह ग्रंथावली’ आधे-अधूरे हिंदी नवजागरण को पूर्णता प्रदान करने की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज है।  

(मूल आलेख ‘पेरियार ललई सिंह ग्रंथावली’, खंड तीन की भूमिका। यहां पुस्तक के संपादक की सहमति से आंशिक संपादन के उपरांत प्रकाशित)

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

चौथीराम यादव

आलोचक और प्रखर वक्ता चौथीराम यादव हिन्दी साहित्य के उन आलोचकों में से एक हैं, जो अपनी मार्क्सवादी और फुले-आंबेडकरवादी दृष्टि के लिए जाने जाते हैं। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफ़ेसर श्री यादव को उत्तरप्रदेश के हिन्दी संस्थान ने प्रतिष्ठित 'लोहिया साहित्य सम्मान' से सम्मानित किया है

संबंधित आलेख

जोतीराव फुले का काव्य-कर्म (पहला भाग)
जोतीराव फुले अपने साहित्य से एक ओर तो शूद्र-अतिशूद्रों को ब्राह्मणवादी नैतिक बोध से मुक्ति दिलवाने के लिए तथा दूसरी ओर इस दलित-वंचित-उपेक्षित वर्ग...
दलित कविता की आंबेडकरवादी चेतना का उत्तरोत्तर विकास (पांचवीं कड़ी का अंतिम भाग)
उत्तर भारत में दलित कविता के क्षेत्र में शून्यता की स्थिति तब भी नहीं थी, जब डॉ. आंबेडकर का आंदोलन चल रहा था। उस...
दलित कविता की आंबेडकरवादी चेतना का उत्तरोत्तर विकास (तीसरा भाग)
उत्तर भारत में दलित कविता के क्षेत्र में शून्यता की स्थिति तब भी नहीं थी, जब डॉ. आंबेडकर का आंदोलन चल रहा था। उस...
दलित कविता की आंबेडकरवादी चेतना का उत्तरोत्तर विकास (दूसरा भाग)
उत्तर भारत में दलित कविता के क्षेत्र में शून्यता की स्थिति तब भी नहीं थी, जब डॉ. आंबेडकर का आंदोलन चल रहा था। उस...
संस्मरण : गाेरखपुर में राजेंद्र यादव
नब्बे के दशक में वे एक बार गोरखपुर आए थे। गोरखपुर विश्वविद्यालय में तब प्रेमचंद पीठ की स्थापना हुई थी। इसके निदेशक प्रो. परमानंद...