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नीतीश के बाद दीपंकर ने कहा, खत्म हो आरक्षण पर 50 फीसदी की सीमा

हालांकि नीतीश कुमार ने ईडब्ल्यूएस आरक्षण का विरोध नहीं किया। उन्होंन कहा कि ‘उच्चतम न्यायालय ने जो फैसला सुनाया, वह उचित था। हम हमेशा से ही आरक्षण के समर्थन में थे। लेकिन अब समय आ गया है कि आरक्षण पर 50 फीसदी की सीमा बढ़ाई जाय। आरक्षण की यह सीमा ओबीसी और ईडब्ल्यूएस को उनकी जनसंख्या के अनुपात में अवसरों से वंचित कर रही है।’

गत 7 अक्टूबर, 2022 को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा आर्थिक आधार पर कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) के लिए दस फीसदी आरक्षण को वैध करार दिए जाने के बाद सियासी हलचल तेज होती दिख रही है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आरक्षण पर 50 फीसदी की सीमा को खत्म करने की मांग की है। वहीं बिहार में ही उनकी सरकार को सहयोग देनेवाली भाकपा माले पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने भी यही मांग की है। जबकि सामाजिक न्याय की राजनीति करने का दावा करनेवाली राष्ट्रीय जनता दल की तरफ से अभी तक इस संबंध में कोई स्पष्ट बयान जारी नहीं किया गया है।

बीते 8 नवंबर, 2022 को मीडियाकर्मियों से बातचीत में हालांकि नीतीश कुमार ने ईडब्ल्यूएस आरक्षण का विरोध नहीं किया। उन्होंन कहा कि “उच्चतम न्यायालय ने जो फैसला सुनाया, वह उचित था। हम हमेशा से ही आरक्षण के समर्थन में थे। लेकिन अब समय आ गया है कि आरक्षण पर 50 फीसदी की सीमा बढ़ाई जाय। आरक्षण की यह सीमा ओबीसी और ईडब्ल्यूएस को उनकी जनसंख्या के अनुपात में अवसरों से वंचित कर रही है।”

नीतीश कुमार, मुख्यमंत्री, बिहार और दीपंकर भट्टाचार्य, राष्ट्रीय महासचिव, भाकपा माले

विभिन्न सामाजिक समूहों की संबंधित आबादी के नए अनुमान की आवश्यकताओं को दोहराते हुए नीतीश कुमार ने कहा कि पिछले साल उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष भी यह सवाल उठाया था। 

वहीं, भाकपा माले के राष्ट्रीय महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने नीतीश कुमार की मांग को आगे बढ़ाते हुए कहा कि अब जब आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत बढ़ गई है तो राज्य सरकारों को वंचित समुदाय के आरक्षण के दायरे को बढ़ाने के लिए विचार करना चाहिए। 9 नवंबर, 2022 को पटना में अपनी पार्टी के पोलित ब्यूरो की दो दिवसीय बैठक के अंतिम दिन मीडियाकर्मियों से बातचीत में दीपंकर ने कहा कि “ईडब्ल्यूएस के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट द्वारा वैध ठहराना एक दुर्भाग्यपूर्ण फैसला है। यह संविधान की मूल भावना और आरक्षण की मूल अवधारणा के विपरीत है। आरक्षण का प्रावधान सामाजिक भेदभाव व विषमता को खत्म कर सामाजिक न्याय को मजबूत करने के लिए किया गया था। इस तरह, आर्थिक आधार पर आरक्षण सामाजिक न्याय की व्यवस्था को कमजोर करता है।” 

उन्होंने आगे कहा कि “सुप्रीम कोर्ट के फैसले में मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति यू.यू. ललित व न्यायमूर्ति रवींद्र भट अल्पमत में रहे, लेकिन उनकी टिप्पणी काफी महत्वपूर्ण है। इन दोनों न्यायाधीशों ने कहा कि 103वें संवैधानिक संशोधन के तहत केवल सामान्य वर्गों को लाभ देने के उद्देश्य से आर्थिक आधार पर आरक्षण का प्रावधान किया गया। आंकड़ों का हवाला देते हुए न्यायाधीशों ने आगे कहा कि गरीबी रेखा से नीचे के परिवारो में 80 प्रतिशत से अधिक तो अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति व अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग हैं। आर्थिक आधार पर दिए जा रहे आरक्षण में इस तबके के लिए कोई प्रावधान नहीं किया जाना उनके प्रति भेदभाव है।” 

(संपादन : नवल/अनिल)


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