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छत्तीसगढ़ : आदिवासी ईसाइयों पर हमले की सियासत

आदिवासी समाज से जुड़े अधिकांश व्यक्ति आरोप लगाते हैं कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) और बघेल सरकार मिल कर ईसाई बनाम हिंदू का खेल रच आदिवासियों की असल पहचान खतम करने की साजिश रच रहे हैं। हिंसा में सर्व आदिवासी समाज का नाम आने को भी वे षड्यंत्र करार देते हैं। बता रहे हैं मनीष भट्ट मनु

क्या बहुप्रतीक्षित और बहुप्रचारित पेसा कानून [पंचायत (अधिसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम] आदिवासी समाज में फूट डालने और विद्वेष करने का औजार बन सकता है? क्या इसीलिए भाजपा इस कानून को लागू करने पर जोर दे रही है? यह वह सवाल हैं जो इन दिनों आदिवासी स्वशासन और आदिवासी समाज के लिए काम कर रहा प्रत्येक व्यक्ति पूछ रहा है। हैरत की बात है तो यह कि इन सवालों की शुरुआत कांग्रेस शासित छत्तीसगढ़ से हुई है और इन सवालों को जन्म दिया है सर्व आदिवासी समाज के नाम पर की गई हिंसा ने।

दरअसल बीती 18 दिसंबर को छत्तीसगढ़ के कोंडागांव और नारायणपुर जिला अंतर्गत आने वाले लगभग 35 गांवों में एक साथ संगठित भीड़ ने उन सैकड़ों आदिवासी परिवारों पर हिंसक हमला किया, जिनकी आस्था ईसाइयत में है। उन्मादी भीड़ ने महिला, पुरुष, वृद्धों, बीमारों और गर्भवती महिलाओं में से किसी को नहीं छोड़ा। आरोप तो यहां तक हैं कि हमलावर भीड़ पेसा के तहत ग्राम सभा को सर्वोच्च शक्ति प्राप्त होना बताकर इन परिवारों को गांव खाली करने को कह रहे थे। हमलावरों का आरोप था कि यह सभी परिवार अन्य आदिवासियों के धर्म परिवर्तन को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं। हालांकि पीड़ित परिवार और चर्च से जुड़े लोग इसे गलत और राजनीतिक विद्वेष से प्रेरित आरोप बतलाते हैं। वहीं आदिवासी समाज के लोग भी इसे समाज में विभाजन करने का षड्यंत्र करार देते हैं। 

उल्लेखनीय है कि लगभग 32 प्रतिशत आदिवासी जनसंख्या वाले छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल के लगभग चार वर्ष के कार्यकाल में ईसाइयों पर हमले की लगभग 500 घटनाओं होने का आरोप ईसाई समाज लगाता है। उसका आरोप है कि बघेल सरकार में तो पुलिस इनमें से अधिकांश मामलों में एफआईआर दर्ज करना तो दूर ऐसे किसी भी हमले पर आवेदन तक लेने से इंकार कर देती है।

आदिवासी समाज से जुड़े अधिकांश व्यक्ति आरोप लगाते हैं कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) और बघेल सरकार मिल कर ईसाई बनाम हिंदू का खेल रच आदिवासियों की असल पहचान खतम करने की साजिश रच रहे हैं। हिंसा में सर्व आदिवासी समाज का नाम आने को भी वे षड्यंत्र करार देते हैं। सर्व आदिवासी समाज, छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष बी. एस. रावते के मुताबिक भाजपा और कांग्रेस ने गोंड आदिवासियों का संगठन अघोषित रूप से बना लिया है और वे ही डि-लिस्टिंग और घर-वापसी का अभियान चला रहे हैं। इससे सर्व आदिवासी समाज व गोंड समुदाय की कोई भूमिका नहीं है। उनका यह भी कहना है कि नारायणपुर में घट रहीं घटनाएं निंदनीय हैं तथा प्रशासन को सख्त कदम उठाते हुए ईसाई धर्म अपना चुके आदिवासियों के जान-माल की सुरक्षा करे। 

नारायणपुर जिले के एक अर्द्धनिर्मित सामुदायिक भवन में शरणार्थी के रूप में रह रहे पीड़ित

यह सच है कि छत्तीसगढ़ में ईसाई मतावलंबी आदिवासियों की घर वापसी की कराने की मुहिम ने पिछले दिनों जोर पकड़ा है। नारायणपुर तथा कोंडागांव की हालिया घटना को भी इसी मुहिम का दुष्परिणाम करार दिया जा सकता है। नारायणपुर के बेनूर थानांतर्गत आने वाले ग्राम बेनूर के निवासियों द्वारा की गई लिखित शिकायत में इस बात का स्पष्ट लेख किया गया है कि हमलावर पीढ़ितों को ईसाई धर्म छोड़ने या फिर गांव से चले जाने को कह रहे थे।

जबकि पूर्व भाजपा विधायक भोजराज नाग इस पूरे मसले को गोंड समुदाय के दो समूहों का मसला बताते हैं। उनके मुताबिक, एक तरफ वे हैं जो देवी-देवता मानते हैं, अपनी संस्कृति को मानते हैं तो दूसरी तरफ वे हैं जो पहले समूह की मान्याताओं की आलोचना करते हैं। भोजराज नाग यह भी कहते हैं कि हिंसक घटनाएं नहीं होनी चाहिए और प्रशासन को चाहिए कि दोनों पक्षों को बिठाकर संवाद कर जायज व नाजायज पर विचार करे।

वहीं इस पूरी घटना पर उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर करने वाले तथा पीयूसीएल की राज्य इकाई के अध्यक्ष एडवोकेट डिग्री प्रसाद चौहान इसे सरकारी तंत्र की उदासीनता और लापरवाही करार देते हैं। वे कहते हैं कि मध्य भारत मे आदिवासी-मूलवासियों का जनसंहार, उन्हें गांव-बसाहटों से बेदखली, सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार तथा मृत शवों को दफनाने पर पाबंदी और अंतहीन प्रताड़ना का कारण केवल आर्थिक साम्राज्यवाद और संसाधनों की लूट नही है, बल्कि इसके मूल में जातीय व धार्मिक आधार तथा सांस्कृतिक साम्राज्यवाद – हिन्दू राष्ट्रवाद इसका एक स्वरूप है – की धारणा कार्य कर रही है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि गांव गणराज्य और जल, जंगल, जमींन बचाने के लिए कथित जन आंदोलनो के मध्य फासीवादी ताक़तों की घुसपैठ हो चुकी है। वे आरोप लगाते हैं कि आदिवासी इलाकों में पेसा कानून की आड़ लेकर ये ताक़तें ईसाई धर्म मानने वाले आदिवासियों के विरुद्ध शेष आदिवासी समाज की गोलबंदी को लेकर सक्रिय हैं। 

धर्मांतरण और घर वापसी जैसे मुद्दों के मध्य एक सच यह भी है कि छत्तीसगढ़ में ईसाइयों की आबादी अगभग स्थिर बनी हुई है। वर्ष 2001 की जनगणना में प्रदेश की कुल आबादी में इस समाज की भागीदारी 1.92 प्रतिशत थी, जो वर्ष 2011 की जनगणना में भी इतनी ही बनी रही। वर्ष 2021 में आबादी की गिनती नहीं होने से कोई अधिकृत आंकड़ा तो नहीं है मगर एक अनुमान के अनुसार ईसाई समुदाय का प्रतिशत राज्य की कुल आबादी में लगभग 1.94 प्रतिशत हो गया है। आदिवासी समाज के और ईसाई धर्म को मानने वाले एक युवा नेता ने गोपनीयता की शर्त पर कहा कि मसला ईसाई बनाम गैर ईसाई आदिवासी का नहीं है। दरअसल छत्तीसगढ़ विधान सभा की कुल 90 में से 19 सीटें ऐसी हैं जिनमें ईसाई मतदाताओं की भूमिका को निर्णायक माना जाता है। ऐसे में न तो भाजपा और ना ही कांग्रेस को यह समुदाय रास आ रहा है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

मनीष भट्ट मनु

घुमक्कड़ पत्रकार के रूप में भोपाल निवासी मनीष भट्ट मनु हिंदी दैनिक ‘देशबंधु’ से लंबे समय तक संबद्ध रहे हैं। आदिवासी विषयों पर इनके आलेख व रपटें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे हैं।

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