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मरांग बुरू या पारसनाथ : सरकारें पैदा कर रहीं विवाद

मरांग बुरु और कोई नहीं, आदिवासी आस्थाओं के अनगिनत पवित्र प्रतीकों में से एक है। झारखंड के संथाल समाज के लिए सिंगबोंगा के बाद सर्वाधिक पवित्र प्रतीक। कुछ लोग इसके साथ लूगू बुरु को शामिल करते हैं। आज अपने इस प्रतीक के लिए संथाल समाज उतना ही आक्रोशित है, जितना यह प्रतीक निराश। बता रहे हैं मनीष भट्ट मनु

मरांग बुरु पहाड़ इन दिनों अपने आप को बेहद ठगा और अपमानित महसूस कर रहा है। इसके साथ ही आदिवासी समाज भी यह महसूस कर रहा है कि शायद इस मुल्क ने कभी भी उसे अपना माना ही नहीं। वैसे चाहे नियमगिरी हो, फिर चाहे बस्तर या हंसदेव, केवड़िया हो, सब एक अंतहीन श्रृंखला की कड़ियां हैं आदिवासी समाज को उजाड़ने और उसकी भूमि पर गैर आदिवासी समाज के लोगो अथवा गैर आदिवासियों द्वारा चलाई जा रही कंपनियों को स्थापित करने की। मरांग बुरु आदिवासी हित की बात कर सत्ता में आए आदिवासी नेताओं को भी समझ चुका है। वह यह जान गया है कि इनमें और उन गैर आदिवासी नेताओं में कोई फर्क नहीं है जो आदिवासी हितों और अधिकारों की बात और सिर्फ बात ही करते हैं।

मरांग बुरु और कोई नहीं, आदिवासी आस्थाओं के अनगिनत पवित्र प्रतीकों में से एक है। झारखंड के संथाल समाज के लिए सिंगबोंगा के बाद सर्वाधिक पवित्र प्रतीक। कुछ लोग इसके साथ लूगू बुरु को शामिल करते हैं। आज अपने इस प्रतीक के लिए संथाल समाज उतना ही आक्रोशित है, जितना यह प्रतीक निराश। हर समय अपनी राजनीति चमकाने के लिए तैयार रहने वाले कुछ नेता और संगठन इस मौके को भी अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते हुए विज्ञप्ति जारी करने लगे हैं, धरना और प्रदर्शन की चेतावनी देने लगे हैं। मगर मरांग बुरु और अधिकांश संथाल समाज अपने प्रतीक को बचाए रखने के प्रति चिंतिंत है, क्योंकि वह देख रहा है कि आदिवासी हित की बात करने वाली हेमंत सोरेन सरकार या केंद्र की मोदी सरकार उसका पक्ष तक जानने की कोशिश नहीं कर रही है।

बात है तो बहुत पुरानी, मगर अब एक बार फिर धुआं उठ रहा है। बात हो रही है झारखंड राज्य के गिरिडीह जिला स्थित पारसनाथ पर्वत की। जहा जैन समुदाय के दोनों प्रमुख पंथों – श्वेतांबर और दिगंबर – के लिए आस्था का प्रतीक श्री सम्मेद शिखर जी व्यवस्थित हैं। जैन समाज यह मानता है कि जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों में से 20वें तीर्थंकर को यही मोक्ष प्राप्त हुआ था। मधुबन के भी नाम से प्रसिद्ध इस पर्वत को पारसनाथ नाम भी जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पारसनाथ से प्राप्त हुआ है। 

आदिवासियों का मरांग बुरु पहाड़, जिसे जैन धर्मावलंबी पारसनाथ पहाड़ मानते हैं

हाल ही में झारखंड सरकार द्वारा इस क्षेत्र को पर्यटन स्थल घोषित किए जाने के निर्णय के विरोध में देश भर का जैन समाज सड़कों पर उतर आया था। उसके बाद केंद्र की मोदी सरकार ने हस्तक्षेप करते हुए – संवैधानिक ढांचे को धता बताकर राज्यों को प्राप्त अधिकारों की अवहेलना करते हुए – झारखंड सरकार को निर्देषित किया कि वह इस पूरे क्षेत्र की पवित्रता बरकरार रखे। खान घोटाले में फंसे और पूजा सिंघल के बहाने केंद्रीय जांच एजेंसियों के निशाने पर चल रही हेमंत सोरेन की सरकार ने यह निर्देश माना भी। सोरेन सरकार ने इस तथ्य को भी ध्यान में नहीं रखा कि जैन समाज के विरोध में एक स्वर पर्यटन स्थल घोषित होने के बाद इस पूरे क्षेत्र में मांस और मदिरा का सेवन बढ़ने की संभावना का भी था। उस क्षेत्र में जहां संथाल समाज परंपरागत तौर पर प्रतिवर्ष तीन दिवसीय शिकार पर्व ‘सेंदरा’ का आयोजन करता चला आया है।

ऐसा नहीं है कि पूर्व में जैन समाज और संथाल समुदाय के बीच विवाद नहीं हुआ। 

बताते चलें कि गिरिडीह पूर्व में हजारीबाग जिला का भाग था। संथाल समाज के अनुसार वर्ष 1932 के जिला गजेटियर, हजारीबाग में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि यह पूरा क्षेत्र मरांग बुरु संवत सुसर बाईसी क्षेत्र है। इस विषय को लेकर कार्यरत सामाजिक कार्यकर्ता अर्जुन हेम्ब्रम के अनुसार संथाल इस क्षेत्र में जैनियों के आने से बहुत पहले से रह रहे हैं और यहां हमारे भी देवता हैं। सरकार को आदिवासियों की संस्कृति – जो यहां की मूल संस्कृति भी है – को बचाना चाहिए। 

बिहार जिला गजेटियर, हजारीबाग, पी.सी. रॉय चौधरी, विशेष अधिकारी, गजेटियर पुनरीक्षण अनुभाग, राजस्व विभाग, बिहार, संदर्भ : पृष्ठ 294-295

परंपरागत शिकार पर्व ‘सेंदरा’ को लेकर संथाल समाज के प्रमुख व्यक्तियों का ‘बिहार जिला गजेटियर, हजारीबाग, पी.सी. रॉय चौधरी, विशेष अधिकारी, गजेटियर पुनरीक्षण अनुभाग, राजस्व विभाग, बिहार, संदर्भ : पृष्ठ 294-295’ के हवाले से यह कहना है कि ‘पारसनाथ पहाड़, हजारीबाग, मानभूम, बांकुड़ा और संथाल परगना के संथालों के मरांग बुरु या पहाड़ी देवता हैं और हर साल वे उन जिलों से बैशाख महीने के पूर्णिमा के दिन इकट्ठा होते हैं और लगातार तीन दिनों तक एक धार्मिक शिकार पर्व सेंदरा का जश्न मनाते हैं, जिसके बाद मांझी और पैरगनैत के खिलाफ आरोपों और अन्य गंभीर मामलों के सुनवाई और परीक्षण के लिए एक महान जनजातीय सत्र आयोजित किया जाता है। इन रिवाजों और अधिकारों की प्रविष्टि आधिकारिक रूप से 1911 में दर्ज की गयी थी और घाटवारों को भी समान अधिकार दिये गये थे। इसके बाद श्वेताम्बर जैनियों के एक मुकदमे करने की संस्था द्वारा यह घोषित किया गया था कि ऐसी कोई प्रथा मौजूद नहीं है। लेकिन उस मुकदमे को न्यायिक आयुक्त ने खारिज कर दिया और उक्त आदेश के खिलाफ जैनियों ने एक अपील दायर की, जिसे उच्च न्यायालय ने भी खारिज कर दिया था। मामला प्रिवी काउंसिल के पास चला गया और वहां भी ये माना गया कि संथालों को पारसनाथ की पहाड़ियों पर शिकार करने का प्रथागत अधिकार है।

मगर, हालिया विवाद के बाद गिरिडीह के सांसद, चन्द्र प्रकाश चौधरी ने विभिन्न बिंदुओ पर केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव को पत्र भेजकर पारसनाथ पर्वत एवं मधुबन क्षेत्र को अन्य धार्मिक नगरों यथा काशी विश्वनाथ, अयोध्या, मथुरा, वैष्णो देवी आदि की तरह पांच किलोमीटर के घेरे को शराब, मांस और नशा-मुक्त क्षेत्र घोषित किए जाने की मांग की है। इस मांग ने भी संथाल समाज को उद्धेलित की दिया है। उनकी आस्था, संस्कृति व परंपरा के अनुसार पूजा के क्रम में चावल का रस और मुर्गा अथवा बकरा की बलि दिए जाने के बाद उनके मांस को मरांग बुरु को चढ़ाया जाता है। संथाल समाज इस बात से भी आक्रोशित हैं कि केंद्र सरकार और स्थानीय सांसद को दरकिनार कर भी दिया जाए तो खुद संथाल समाज से आने वाले झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी संथाल समाज की भावना या आस्था को लेकर कोई सवेदनशीलता नहीं दिखाई।

पूर्व सांसद और वर्तमान में अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे सालखन मुर्मू ने विभिन्न मंचों से पारसनाथ पहाड़ को सथाल आदिवासियों का सर्वाधिक बड़ा पूजा स्थल व तीर्थ स्थल बतलाते हुए इसको मरांग बुरु या ईश्वर का दर्जा प्राप्त बतलाया है। वे यहां तक आरोप लगा चुके हैं कि जैन समाज से इस पूरे क्षेत्र को अवैध और अनाधिकृत तौर पर बलात अपने कब्जे में ले लिया है। अंतरराष्ट्रीय संथाल परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष नरेश कुमार मुर्मू ने चेतावनी जारी की है कि, “अगर सरकार मरांग बुरु को जैनियों के चंगुल से मुक्त करने में विफल रही तो पांच राज्यों में विद्रोह होगा।” उन्होंने कहा कि, “हम चाहते हैं कि सरकार दस्तावेजीकरण के आधार पर कदम उठाए।” 

उल्लेखनीय है कि परिषद की संरक्षक स्वयं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और इसके अध्यक्ष असम के पूर्व सांसद पी. मांझी हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा से विधायक लोबिन हेम्ब्रम ने भी विवाद को हवा देते हुए दावा किया है कि पारसनाथ पर्वत शुरू से आदिवासियों की भूमि रही है। इसलिए जैन समुदाय का सम्मेद शिखर पर मालिकाना हक स्वीकार नहीं किया जाएगा। पूरे देश के आदिवासी इसका विरोध करेंगे। हेम्ब्रम ने आदिवासियों के अधिकार को बहाल करने के लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को 25 जनवरी तक का समय दिया है।

इन सब आरोप – प्रत्यारोप, राजनीतिक घात – प्रतिघात के बीच मरांग बुरु मौन है। वह यह महसूस कर रहा है कि आदिवासी नेताओं का सारा जोर इस विवाद के बहाने ज्यादा से ज्यादा राजनीतिक ताकत हथियाने पर है। बहरहाल, एक बात तो तय है कि यह विवाद आने वाले दिनों में और भी जोर पकडेगा।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

मनीष भट्ट मनु

घुमक्कड़ पत्रकार के रूप में भोपाल निवासी मनीष भट्ट मनु हिंदी दैनिक ‘देशबंधु’ से लंबे समय तक संबद्ध रहे हैं। आदिवासी विषयों पर इनके आलेख व रपटें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे हैं।

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