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दलित-बहुजनों को अपमानित करनेवाली किताबों को जलाने या न जलाने का प्रश्न

सवाल उठता है कि यदि ‘रामचरितमानस’ और ‘मनुस्मृति’ नहीं जलाई जानी चाहिए, तो रावण का पुतला जलाना भी बंद होना चाहिए, होलिका दहन भी बंद होना चाहिए और हर साल प्रतीकात्मक तौर पर दुर्गा द्वारा महिषासुर का वध भी बंद होना चाहिए। बता रहे हैं डॉ. सिद्धार्थ

बिहार के शिक्षा मंत्री प्रो. चंद्रशेखर और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य द्वारा तुलसीदास द्वारा रचित ‘रामचरितमानस’ के कुछ दोहों-चौपाईयों को बहुजन समाज को अपमानित करने वाला ठहराए जाने के बाद उत्तर भारत में ‘रामचरितमानस’ के प्रति बहुजनों में आक्रोश दिखाई दे रहा है। इसी आक्रोश की एक अभिव्यक्ति उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में गत 29 जनवरी, 2023 को अखिल भारतीय ओबीसी महासंघ के तत्वावधान में प्रतीकात्मक रूप से ‘रामचरितमानस’ को जलाने की घटना में दिखी। इसे लेकर स्वामी प्रसाद मौर्य सहित करीब एक दर्जन लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। 

‘रामचरितमानस’ को जलाने की इस घटना ने इस सवाल पर बहस को तेज कर दिया है कि बहुसंख्यक लोगों को नीचा दिखाने वाली किसी किताब को जलाया जाना चाहिए या नहीं? इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले इस तथ्य पर निगाह डाल लेनी चाहिए कि दुनिया में, विशेषकर भारत में ‘बुराई के प्रतीकों’ को जलाने के संदर्भ में अब तक क्या ऐतिहासिक परंपरा रही है, जो अभी भी जारी हैं?

कोई भी व्यक्ति इस तथ्य से असहमत नहीं हो सकता है कि किताबों की तुलना में जीवित या मृत इंसान का सम्मान या अपमान ज्यादा मायने रखता है। भारत में सैकड़ों वर्षों से बुराई के प्रतीक के रूप में देश के बड़े हिस्से में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले को हर्षोल्लास के साथ हिंदूवादी मानसिकता के लोगों द्वारा जलाया जाता है और जलाने के उत्सव में देश के संवैधानिक पदों पर विराजमान शीर्षस्थ व्यक्तित्व शामिल होते हैं। यहां तक कि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और राज्यपाल तक इसमें हिस्सेदारी करते हैं। 

यह दीगर बात है कि देश में एक ऐसा सामाजिक समूह भी है, जो रावण को बुराई का प्रतीक नहीं मानता और उन्हें अपने महान नायक के रूप में स्वीकार करता है।

इसी तरह देश के बड़े हिस्से में प्रति वर्ष होली के एक दिन पहले बुराई के प्रतीक के रूप में एक स्त्री होलिका का दहन किया जाता है और उसी के नाम पर रंगों के प्राकृतिक उत्सव को होली नाम दे दिया गया है।

भारत के राजनीतिक जीवन में राजनीतिक पार्टियां और वैचारिक-राजनीतिक संगठन अपने वैचारिक-राजनीतिक विरोधियों का पुतला आए दिन जलाते रहते हैं। कई बार दूसरे देशों के राष्ट्रध्याक्षों और शासनाध्यक्षों का भी पुतला जलाया जाता है, जब उनका भारत आगमन होता है और कई बार अन्य वजहों से। पुतला जलाने का यह कार्य सभी धाराओं के राजनीतिक दल और संगठन करते हैं, चाहे वे दक्षिणपंथी हों, वामपंथी हों, उदारवादी हों और बहुजनवादी या कोई और। यह सब जीवित इंसानों के पुतले होते हैं।

डॉ. आंबेडकर, पेरियार और रामस्वरूप वर्मा

आधुनिक भारत में जिस पहली किताब को प्रतीकात्मक तौर पर जलाने की सबसे ज्यादा चर्चा हुई, उस किताब का नाम ‘मनुस्मृति है’। इस किताब को प्रतीकात्मक तौर पर डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में 25 दिसंबर, 1927 को जलाया गया। यहां इस तथ्य को रेखांकित कर लेना जरूरी है कि इस किताब को प्रतीकात्मक तौर पर सिर्फ इसका एक पन्ना फाड़कर जलाया गया था। डॉ. आंबेडकर का सारा लेखन इस बात की गवाही देता है कि वे जिस एक किताब से सबसे अधिक घृणा करते थे, उस किताब का नाम मनुस्मृति है। इसके पीछे कारण यह कि यह किताब बहुसंख्यक दलितों-पिछड़ों और महिलाओं की घोर अवमानना करती है, उन्हें नीचा दिखाती है और उनकी दासता की वकालत करती है। लेकिन कभी भी आंबेडकर ने इस किताब पर प्रतिबंध लगाने और भौतिक तौर पर नष्ट करने की कोई बात नहीं की थी और न ही उन्होंने इसे न पढ़ने की कोई हिदायद दी थी। 

आज कुछ लोग आंबेडकर का अनुसरण करते हुए, 25 दिसंबर को मनुस्मृति का दहन करते हैं। यह दहन भी प्रतीकात्मक ही होता है।

एशिया के सुकरात महान दार्शनिक और चिंतक ई.वी. रामासामी ‘पेरियार’ नें हिंदुओं के उन ग्रथों को प्रतीकात्मक तौर पर जलाने का आह्वान किया था, जो ग्रंथ अनार्यों को आर्यों की तुलना में ‘नीच’ ठहराते हैं। गैर-ब्राह्मणों पर ब्राह्मणों की और महिलाओं पर पुरूषों की सर्वोच्चता को स्थापित करते हैं और गैर-ब्राह्मणों और महिलाओं को नीचा दिखाते हैं। जिन किताबों को उन्होंने जलाने का आह्वान किया था, उसमें मनुस्मृति और रामायण शामिल थीं। इस संदर्भ में उन्होंने लिखा है, “एक अन्य बात जिसने लोगों का ध्यान आकर्षित किया है, वह है अवांछित साहित्य को जलाने का मुद्दा। मुझे इसका जिम्मेदार ठहराया गया है। खुद का सम्मान करने वाले आखिर ऐसा क्यों कर रहे हैं? ऐसा सिर्फ तमिलों को इस तरह के पुस्तकों का बहिष्कार करने के लिए प्रेरित करने के लिए किया जा रहा है, जिसे हम मनु संहिता कहते हैं और जो धर्म और ईश्वर में विश्वास पैदा करने के लिए जिम्मेदार है। रामायण को एक ईश्वर की कहानी के रूप में रचा गया है। पेरिया पुराणम को भी इसी तरह रचा गया है। इन्हें तमिलों के साहित्य के रूप में बहुप्रचारित किया जाता है। यही कारण है कि हम तमिलों से इस तरह के साहित्य का बहिष्कार करने को कह रहे हैं। इन साहित्यों को जलाना एक औपचारिक सांकेतिक विरोध है।” (1 फरवरी, 1943 को उनके द्वारा दिया गया ऐतिहासिक भाषण का अंश) 

पेरियार ने 1922 में मनुस्मृति को जलाने का आह्वान किया था। आंबेडकर के नेतृत्व में 25 दिसंबर, 1927 को मनुस्मृति जलाने से करीब तीन महीने पहले भी तमिलनाडु में पेरियार के आह्वान पर मनुस्मृति जलाई गई थी। जिस तरह उत्तर भारत में रावण का पुतला जलाया था, उसी तरह पेरियार के नेतृत्व में राम के पुतले को भी जलाया गया था। पेरियार के कुछ अनुयायी आज भी इस परंपरा का निर्वाह करते हैं। यहां एक बार फिर यह रेखांकित कर लेना जरूरी है कि डॉ. आंबेडकर या पेरियार दोनों ने एक औपचारिक प्रतीक के रूप में इन किताबों को जलाने का आह्वान किया था। 

उत्तर भारत में जिस किताब को सबसे अधिक जलाया गया और वर्ष-दर-वर्ष जलाया जाता रहा, उस किताब का नाम तुलसीदास कृत ‘रामचरितमानस’ है। ‘रामचरितमानस’ को हिंदी पट्टी में जलाने की शुरूआत अर्जक संघ ने की थी, जिसकी स्थापना 1 जून, 1968 को रामस्वरूप वर्मा ने की थी। जिसके साथ महाराज सिंह भारती और जगदेव प्रसाद सक्रिय तौर पर जुड़े थे और पेरियार ललई सिंह यादव भी उसमें सक्रिय हिस्सेदारी करते थे। अर्जक संघ की सांस्कृतिक इकाई ‘सांस्कृतिक समिति अर्जक संघ’ के वर्तमान अध्यक्ष शिवकुमार भारती बाताते हैं, “अर्जक संघ के आह्वान पर 30 अप्रैल, 1978 को पहली बार ‘रामचरितमानस’ और ‘मनुस्मृति’ को कानपुर जिले (वर्तमान में कानपुर देहात) के दयानकपुर कांधी गांव में जलाया गया था।” यह पूछने पर कि आप ने ‘मनुस्मृति’ और ‘रामचरितमानस’ को जलाने के लिए 30 अप्रैल ही क्यों चुना गया, तो उन्होंने कहा बताया कि, “अर्जक संघ 14 अप्रैल से लेकर 30 अप्रैल तक आंबेडकर जयंती को ‘चेतना दिवस’ के रूप में मनाता है। इसी वजह से यह दिन चुना गया।” 

रामस्वरूप वर्मा द्वारा शिवकुमार भारती को दिया गया सम्मान पत्र

‘रामचरितमानस’ और ‘मनुस्मृति’ जलाने के चलते अर्जक संघ के अनेक कार्यकर्ताओं-नेताओं को पुलिस की लाठियां खानी पड़ीं और जेल जाना पड़ा। अर्जक संघ के संस्थापक रामस्वरूप वर्मा अपने उन कार्यकर्ताओं को सम्मान-पत्र भी देते थे, जो ‘रामचरितमानस’ और ‘मनुस्मृति’ जलाते थे। ऐसा ही एक सम्मान-पत्र शिवकुमार भारती को रामस्वरूप वर्मा द्वारा प्राप्त हुआ था। 

रामस्वरूप वर्मा ‘रामचरितमानस’ को ब्राह्मणवाद का पोषक और बहुसंख्यकों के शोषण का जनक मानते थे। उन्होंने अपनी किताब ‘ब्राह्मण महिमा क्यों और कैसे?’ में रामचरित मानस के दलित-बहुजन और महिला विरोधी चरित्र को विस्तार से उजागर 

किया है। वर्मा जी का मानना था कि हिंदी में पंडित तुलसीदास का ‘रामचरितमानस’ ब्राह्मणवाद का सबसे प्रबल प्रचारक है और यह ग्रंथ ब्राह्मणों की महिमा बढ़ाने और कायम करने के लिए लिखा गया है। इसके नायक दशरथ पुत्र राम के बारे में उन्होंने लिखा है कि “पंडित तुसलीदासकृत ‘रामचरितमानस’ में राम न मर्यादा पालक थे, न महापुरुष। वे शुद्धरूप से जातिवादी, अधर्मी और उदात्त गुणों से हीन थे। वे मनुजद्रोही के नहीं, ब्राह्मणद्रोही के दुश्मन और ब्राह्मणों के मन, वचन, क्रम से गुलाम थे और दूसरों को भी ब्राह्मणों की गुलामी का उपदेश देते रहे और उसके लिए सारे कुकर्म किए।” (ब्राह्मण महिमा क्यों और कैसे? रामस्वरूप वर्मा, पृ. 43)

तथ्य इस बात पुष्टि करते हैं कि लखनऊ में ‘रामचरितमानस’ को पहली बार नहीं जलाई गई है, न ही यह कोई नई रवायत है। जीवित या मृत व्यक्तियों के पुतले और किताबों को पहले भी जलाया जाता रहा है, कई बार यह सांस्कृतिक संघर्षों का एक औजार रहा है। ‘मनुस्मृति’, ‘रामायण’ और ‘रामचरितमानस’ को जलाने का आह्वान करने वाले कोई सामान्य लोग नहीं, बल्कि ई. वी. रामासामी पेरियार, डॉ. आंबेडकर और रामस्वरूप वर्मा जैसे महान चिंतक-विचारक रहे हैं। बहुसंख्यक दलितों-पिछड़ों और महिलाओं के खिलाफ घृणा से भरी किताबों को सांस्कृतिक संघर्ष की प्रक्रिया में प्रतीकात्मक तौर पर जलाने के विरोध में या समर्थन में कोई फतवा जारी करने से पहले इससे संबंधी तथ्थों पर विचार कर लेना चाहिए।

यहां यह एक सवाल जरूर उठ सकता है कि भले ही डॉ. आंबेडकर, पेरियार और रामस्वरूप वर्मा ने किताबों को प्रतीकात्मक तौर पर जलाया। पर हमें अब इस मामले में उनका अनुकरण करने की कोई जरूरत नहीं हैं, यह तर्क उसी स्थिति में जायज ठहराया जा सकता है, जब मानव सभ्यता इतना आगे बढ़ गई है और हम इतने आधुनिक हो गए हैं कि बुराई के प्रतीक किताबों या इंसानों के पुतलों का जलाने की कोई जरूरत नहीं रह गई है। 

फिर सवाल उठता है कि यदि ‘रामचरितमानस’ और ‘मनुस्मृति’ नहीं जलाई जानी चाहिए, तो रावण का पुतला जलाना भी बंद होना चाहिए, होलिका दहन भी बंद होना चाहिए और हर साल प्रतीकात्मक तौर पर दुर्गा द्वारा महिषासुर का वध भी बंद होना चाहिए। सिर्फ बहुजनों के प्रतिवाद और प्रतिरोध के प्रतीक के तौर पर ‘मनुस्मृति’ और ‘रामचरितमानस’ को प्रतीकात्मक तौर पर जलाने का ही विरोध क्यों? 

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सिद्धार्थ

डॉ. सिद्धार्थ लेखक, पत्रकार और अनुवादक हैं। “सामाजिक क्रांति की योद्धा सावित्रीबाई फुले : जीवन के विविध आयाम” एवं “बहुजन नवजागरण और प्रतिरोध के विविध स्वर : बहुजन नायक और नायिकाएं” इनकी प्रकाशित पुस्तकें है। इन्होंने बद्रीनारायण की किताब “कांशीराम : लीडर ऑफ दलित्स” का हिंदी अनुवाद 'बहुजन नायक कांशीराम' नाम से किया है, जो राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है। साथ ही इन्होंने डॉ. आंबेडकर की किताब “जाति का विनाश” (अनुवादक : राजकिशोर) का एनोटेटेड संस्करण तैयार किया है, जो फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित है।

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