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हम औरतों के लिए ‘रामचरितमानस’ का अर्थ

कुछ लोग साहित्यिक और कला दृष्टि से तुलसीदास को एक बड़ा कवि बताते हैं। लेकिन खूबसूरती से कही गयी पिछड़ी, बुरी और खराब बातें अच्छी तो नहीं हो जाती। सार महत्वपूर्ण है। जन भाषा या विशिष्ट भाषा में खूबसूरती से लिखा गया वो साहित्य हमारे किस काम का जो हमारे पैरों में जंजीरे डालता हो। बता रही हैं सीमा आजाद

2022 के 15 अगस्त को, जिस दिन सरकार ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ मना रही थी, एक झगड़े के सिलसिले में एफआईआर दर्ज कराने मुझे पुलिस थाने जाना पड़ा। दूसरे पक्ष का इंतज़ार करते हुए थाना प्रभारी मुझे ताड़ रहा था। थोड़ी देर बाद बोला– “आ जाने दीजिये, महिला है न व्रती होगी आज, आज फलाना ‘चौथ’ … आप नहीं हैं व्रती?” मैंने छोटा सा जवाब दिया– “नहीं।” थोड़ी देर चुप रहकर वह फिर बोला– “औरत ही सब झगड़े की जड़ है।” मैंने उसे घूरती नज़र से देखा, लेकिन वह इसकी परवाह किये बगैर बोलता चला गया– “देखिये, सभी युद्ध की जड़ में औरत ही होती है … महाभारत औरत के कारण ही हुआ, राम-रावण का युद्ध भी … तुलसीदास ने रामायण में लिखा है … ’’

वो आगे नहीं बोल पाया, उसे काटते हुए मैंने कहा– “मुझे रामायण और महाभारत न पढ़ाइये, हमारी एफआईआर दर्ज कीजिये।”

आज ‘रामचरितमानस’ के संदर्भ में यह बात याद आयी तो मुझे बड़ा अफसोस हो रहा है कि उसकी पूरी बात क्यों नहीं सुनी, कम-से-कम पता तो चलता कि वह तुलसीदास की कौन-सी पंक्ति अपनी बात पुष्ट करने के लिए कहता। तो तुलसीदास हमारे यानि औरतों के जीवन को इस तरह से प्रभावित करते हैं। जब भी औरतों को झगड़ालू, कुटिल, मूर्ख, लोभी, दुष्ट, अधम बताना होता है, तो तुलसीदास की लिखी चौपाइयां-दोहों की गोलीबारी हम पर की जाती है। पुलिस थाने से लेकर घरों के अंदर तक।

मैं ऐसे घर में पली-बढ़ी, जहां अधिकांश घरों की तरह ‘रामचरितमानस’ का पाठ हम पर थोपा नहीं गया था, बेशक इसका दर्शन यहां भी पूरी तरह लागू था। ‘रामचरितमानस’ का इस्तेमाल हम भाई-बहन केवल मनोकामना विचारने के लिए किया करते थे, जो कि हमारे लिए रोचक खेल हुआ करता था। राम कथा को हमने दादी और अम्मा की कहानियों और कई अन्य जगहों से सुना और जाना था। मुकम्मल तौर पर राम की कहानी शायद हमने टीवी पर रामायण सीरियल देखने के बाद ही जानी। ‘रामचरितमानस’ हमारे घरों में किसी साहित्यिक कृति की तरह नहीं, बल्कि धार्मिक पुस्तक के रूप में ही पूजा घर में पड़ी रही। इस धार्मिक पुस्तक के नायक राम से यह गुस्सा हमेशा रहा कि उन्होंने गर्भवती सीता को क्यों छोड़ दिया।

रामचरितमानस व सावित्रीबाई फुले तथा मुक्ता साल्वे

जब यह चेतना आई कि यह धार्मिक ही नहीं, साहित्यिक पुस्तक भी है तो इसके साथ ही यह भी पता चला कि तुलसीदास ने इसी में लिखा है–

“ढोर गंवार शूद्र पशु नारी,
सकल ताड़ना के अधिकारी।”

सुनकर अजीब लगा और मन में सबसे पहले यही बात आई कि जिसने हमारी तुलना ढोल और पशु से की है और जिसने हमें दुत्कारे जाने लायक ही समझा है, ऐसी किताब और लेखक का हम खुद ही बहिष्कार करते हैं। इस बहिष्कार के कारण ही मैंने कभी इसे धार्मिक या साहित्यिक रूप से गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन और समझदारी बढ़ने के साथ समझ में आया मेरे बहिष्कार का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ में जो सवर्ण मर्दवादी दर्शन दिया है, उसी से हमारे आसपास के लोग और पूरा समाज संचालित है। यह समाज का इतना बड़ा संचालक दर्शन है कि अहिंसावादी गांधी जी से लेकर फासीवादी भाजपा की सरकार तक सभी इस देश में रामचरितमानस में वर्णित ‘रामराज’ लाना चाहते हैं। इसलिए इसे केवल तिरस्कृत छोड़ देना ही काफी नहीं है, बल्कि इस दर्शन की काट से अपने को समृद्ध भी करना होगा। तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ का दर्शन दरअसल एक नायक राम की कहानी नहीं, यह समाज में वर्ण-व्यवस्था के साथ औरतों की गुलामी को स्थापित करने वाला दर्शन है। इन दोनों को ही स्थापित करने वाले मनुशास्त्र की तरह रामचरित मानस में तुलसीदास कहते हैं–

“महावृष्टि चलि फूटि कियारी
जिमिसुतन्त्र भये बिगरहिं नारी।”

यानि जैसे बहुत बारिश होने पर क्यारियों की मेड़ें फूट जाती हैं, वैसे ही स्वतंत्र होने पर औरतें बिगड़ जाती हैं। ध्यान दें, मनु ने भी ऐसी ही बात कही है कि औरत को बचपन में पिता के, जवानी में पति के और बुढ़ापे में पुत्र के अधीन रहना चाहिए, औरतें स्वतंत्र छोड़ने लायक नहीं।

एक जगह तुलसीदास औरतों को सभी दुखों की जड़ बताते हुए लिखते हैं–

“एक मूल बहु शूल प्रद। प्रमदा सब दुख खानि।”

हो सकता है 15 अगस्त, 2022 को वह पुलिस अधिकारी यही सुनाना चाह रहा हो।

एक दोहे में तुलसीदास ने औरतों को अवगुणों की खान भी बताया है और इसे किसी पात्र के मुंह से नहीं कहलाया है, बल्कि दोहे में कवि के नाम से ही कहने चले आये हैं–

“नारी स्वभाव सत्य कवि कहहीं,
अवगुण आठ सदा उस रहहीं।।
साहस, अनृत चपलता माया।
भय अविवेक अशौच अदाया।।”

यानि आठ अवगुण तो हर नारी में होते ही हैं। उसका साहसी होना भी अवगुण है, क्योंकि इसके कारण पुरूष संकट में पड़ जाता है। वो अविवेकी होती है यानि उसके पास बुद्धि नहीं होती। हम अपने घरों में भी इसे अलग-अलग तरीकों से सुनते हैं। जैसे “औरत की नाक न हो तो गू खा ले”, “औरत का दिमाग तो घुटने में होता है” आदि-आदि। कुछ दिन पहले ही सुना “महिला है लेकिन बहुत अच्छी जज है।” इसके अलावा वो मायावी होती है, जिसमें सात्विक पुरूषों को फंसा लेने की कला होती है, डरपोक भी होती है और अशुद्ध यानि गंदी होती है। एक इंसान होकर इंसान के बारे में ऐसी सोच को क्या कहेंगे? पितृसत्तात्मक और सामंती ही नहीं बल्कि फासीवादी भी। आज के फासीवाद का आधार भारत में व्याप्त यही दर्शन है।

एक और दोहा देखें। नारी को अवगुणों की खान घोषित करने के बाद भी जिसमें उन्होंने विपत्ति में उन्हें परखने की बात कही है–

“धीरज धर्म मित्र अरू नारी
आपद काल परखिये चारी।”

उनकी नज़र में अपने से अलग हर कोई जिसमें नारी भी है, परखने की वस्तु है। मानदंड वही पितृसत्तात्मक फासीवादी, जिसमें औरतों को पुरूषों के बराबर इंसान माना ही नहीं गया, बल्कि उनकी गुलाम माना गया। मनु ने लिखा है– पति चाहे मूढ़ ही क्यों न हो पत्नी को उसे पूजना चाहिए। तुलसीदास ने इसका भी विस्तार करके ‘रामचरितमानस’ में लिखा है।

‘रामचरितमानस’ में तुलसीदास के लिखे बहुत सारे दोहे घोर सामंती, ब्राह्मणवादी, ब्राह्मणों का महिमामंडन करने वाले और वर्ण-व्यवस्था के दर्शन की स्थापना करने वाले हैं। वर्ण-व्यवस्था में रक्तशुद्धता के लिए औरतों की यौन शुचिता के जो नियम मनु ने बनाये हैं, उसी की स्थापना तुलसीदास अपने साहित्य के माध्यम से करते हैं। वहीं से होता हुआ मामला आज ‘लव-जेहाद’ और खाप पंचायतों के ‘ऑनर किलिंग’ तक पहुंचा है।

वर्ण-व्यवस्था का दर्शन भारतीय फासीवाद की विशेष पहचान है, संस्कृति में उसकी स्थापना सबसे बढ़िया तरीके से तुलसीदास ही करते है।

कुछ लोग साहित्यिक और कला दृष्टि से तुलसीदास को एक बड़ा कवि बताते हैं। लेकिन खूबसूरती से कही गयी पिछड़ी, बुरी और खराब बातें अच्छी तो नहीं हो जाती। सार महत्वपूर्ण है। जन भाषा या विशिष्ट भाषा में खूबसूरती से लिखा गया वो साहित्य हमारे किस काम का जो हमारे पैरों में जंजीरे डालता हो। हमारे पैरों में ज़ंजीरे डालने वाला और हमें ताड़ना का अधिकारी मानने वाला साहित्य कितना भी सुंदर क्यों न लिखा गया हो, हम खुद उसे ताड़ना का अधिकारी ही मानेंगे और उसे छोड़ आगे बढ़ जायेंगे। हमें तो सावित्रीबाई फुले और मुक्ता साल्वे जैसा साहित्यकार और रोल मॉडल चाहिए, जो हमें न सिर्फ आगे बढ़ाता है, बल्कि मंजिल पर पहुंचकर मंजिल के विस्तार की प्रेरणा भी देता है। जिस साहित्य को एक पिछड़े समाज ने स्थापित कर दिया था, उसे जनता की चेतना बढ़ने के साथ उखाड़कर फेंका भी जा सकता है। 

लेकिन चूंकि यह एक साहित्यिक पुस्तक मात्र नहीं, एक दर्शन और उसपर खड़ी शासन व्यवस्था को उखाड़ फेंकने का बड़ा काम है, इसलिए इसपर चीख-पुकार का मचना स्वाभाविक है।

स्त्री और दलित जो सदियों तक इसी व्यवस्था के कारण दमित रहे हैं, उनके नजरिये से आज साहित्य को देखना ही आज की प्रगतिशीलता होगी। इसी मानदंड से आज तुलसीदास का साहित्य ही नहीं, हर साहित्य और संस्कृति की जांच होनी ही चाहिए, वह कितना ही प्रतिष्ठित क्यों न हो।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सीमा आजाद

मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल से सम्बद्ध लेखिका सीमा आजाद जानी-मानी मानवाधिकार कार्यकता हैं। उनकी प्रकाशित कृतियों में ‘ज़िंदांनामा’, ‘चांद तारों के बगैर एक दुनिया’ (जेल डायरी), ‘सरोगेट कन्ट्री’ (कहानी संग्रह), ‘औरत का सफर, जेल से जेल तक’ (कहानी संग्रह) शामिल हैं। संपति द्वैमासिक पत्रिका ‘दस्तक’ की संपादक हैं।

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