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मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करवाने में शरद यादव की भूमिका भुलाई नहीं जा सकती

“इस स्थिति का लाभ उठाते हुए मैंने वी. पी. सिंह से कहा कि वे मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा तुरंत करें। उन्होंने पहले कहा कि वे 15 अगस्त, 1990 को लाल किले से इसकी घोषणा कर देंगे। मुझे साफ-साफ शब्दों में उनसे कहना पड़ा कि अगर वे सिफारिशें लागू करना चाहते हैं तो उन्हें 9 अगस्त, 1990 के पहले ऐसा करना होगा।” शरद यादव के योगदान को याद कर रहे हैं कांचा आइलैया शेपर्ड

शरद यादव (11 जुलाई, 1947 – 12 जनवरी, 2023) पर विशेष

शरद यादव ने गत 12 जनवरी, 2023 को 75 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। उनके निधन से पूरे देश में उनके समर्थक व प्रशंसक दुःखी हैं। 

शरद यादव ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरूआत मध्य प्रदेश से आपातकाल विरोधी विद्यार्थी नेता के रूप में की थी। मात्र 27 वर्ष की आयु में वे लोकसभा सदस्य बन गए थे। सन् 1974 के जेपी आंदोलन से उभरे यादव समाजवादी चिंतक और शूद्र व अन्य पिछडे़ वर्गों के राजनैतिक प्रतिनिधि के रूप में जाने जाते थे। यह उस समय की बात है जब ओबीसी’ की अवधारणा और वर्गीकरण हमारे राष्ट्रीय शब्दकोष का हिस्सा नहीं थे। 

शरद यादव उस युवा शूद्र व ओबीसी नेतृत्व में शामिल थे, जो उत्तर भारत में मुख्यतः राममनोहर लोहिया और कर्पूरी ठाकुर के समाजवादी खेमों के कारण उपजा था। आगे चलकर वे राष्ट्रीय स्तर के नेता बन गए जबकि उनके अन्य साथी अपने-अपने राज्यों तक सीमित रह गए। 

जहां मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव व नीतीश कुमार कभी राज्य और कभी केंद्र की राजनीति करते रहे, वहीं शरद यादव लगातार संसद में बने रहे। वे सात बार लोकसभा और तीन बार राज्यसभा के सदस्य रहे तथा संसद में हमेशा गरीबों और मजदूरों की लड़ाई लड़ी। वे हिंदी में अच्छा भाषण देते थे, तार्किक सोच रखते थे और राजनैतिक रणनीति बनाने में माहिर थे।

शरद यादव (11 जुलाई, 1947 – 12 जनवरी, 2023)

उनकी राजनीतिक रणनीति के चलते ही विश्वनाथ प्रताप सिंह को उनकी सरकार में उपप्रधानमंत्री और कद्दावर जाट नेता चौधरी देवीलाल के विरोध के बाद भी मंडल आयोग की रपट लागू करने पर मजबूर होना पड़ा। 

इस बारे में शरद यादव का स्वयं क्या कहना था, इसे मैं अपने द्वारा संपादित पुस्तक द शूद्राज विजन फॉर ए न्यू पाथसे उद्धृत करना चाहूंगा– 

यादव ने बताया कि जनता दल सरकार के गठन के बाद “हमने सभी समाजवादी नेताओें को गोलबंद करना शुरू किया और जनता दल सरकार पर यह दबाव बनाया कि वह अपने चुनाव घोषणापत्र में किए गए इस वायदे को पूरा करे कि सत्ता में आने पर वह मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करेगी। हमारा यह दृढ़ विश्वास था कि इसके बिना शूद्रों के साथ सच्चा न्याय नहीं हो सकता। वी. पी. सिंह के आसपास के लोग आयोग की सिफारिशें लागू करने के सख्त खिलाफ थे। इस स्थिति से निपटने के लिए वी. पी. सिंह ने उपप्रधानमंत्री और प्रमुख जाट नेता चौधरी देवीलाल की अध्यक्षता में एक समिति का गठन कर दिया। सिंह को पता था कि चौधरी चरणसिंह के हस्तक्षेप के कारण मंडल ने जाटों को पिछड़ा वर्गों की सूची में शामिल नहीं किया था। 

परंतु कई स्थानीय जाट नेता और संगठन अपने-अपने नेताओं पर दबाव बना रहे थे कि उन्हें भी आरक्षण का लाभ दिया जाए। इस स्थिति का लाभ उठाते हुए वी. पी. सिंह ने तुरूप का पत्ता फेंका। उन्हें पता था कि सबसे जाने-माने और प्रमुख जाट नेता देवीलाल कभी जाटों को शामिल किए बिना मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू नहीं करेंगे, फिर चाहे वे व्यक्तिगत रूप से इसके खिलाफ क्यों न हों। इस बीच जनता दल के महासचिव और उद्योग मंत्री चौधरी अजीत सिंह ने पिछड़े वर्गों के अधिकारों के लिए अभियान शुरू कर दिया और यह मांग करनी शुरू कर दी कि जाटों को ओबीसी सूची में शामिल किया जाना चाहिए।

देवीलाल राजनैतिक दुविधा में फंस गए। एक ओर वे नहीं चाहते थे कि जाटों को पिछड़े वर्ग में शामिल करवाने का श्रेय अजीत सिंह को मिले। दूसरी ओर वे जाट समुदाय को शामिल न करके उसके रोष के शिकार भी नहीं बनना चाहते थे। वी. पी. सिंह ने सोचा कि इस दुविधा के चलते देवीलाल न तो आयोग की सिफारिशों को लागू करने की बात कह पाएंगे और ना ही लागू न करने की व मंडल आयोग की चर्चा पर विराम लग जाएगा। 

3 अगस्त, 1990 को वी. पी. सिंह ने सुबह-सुबह मुझे फोन कर कहा, शरद भाई, मैं अब चौधरी देवीलाल को और बर्दाश्त नहीं कर सकता’। मैंने उन्हें आश्वासन दिया कि मैं देवीलाल से बात करूंगा और इस अध्याय को हमेशा के लिए बंद कर दूंगा। परंतु मैंने उनसे अनुरोध किया कि वे देवीलाल को मंत्रिपरिषद से न हटाएं। इस पर सिंह का जवाब था कि उन्होंने इस आशय की सूचना पहले ही राष्ट्रपति को भेज दी है। इसके बाद मैंने फ़ोन काट दिया। 

अगले दिन सुबह 7 बजे प्रधानमंत्री के एक विश्वस्त सहयोगी मेरे घर पहुंचे और कहा कि प्रधानमंत्री अपने कार्यालय में मुझसे मिलना चाहते हैं। हमने लगभग 3 घंटे तक देवीलाल और उनकी राजनीति पर चर्चा की। वी. पी. सिंह मुझसे यह आश्वासन चाहते थे कि मैं देवीलाल के साथ नहीं जाऊंगा, क्योंकि अगर मैं ऐसा करता तो वे प्रधानमंत्री नहीं रह पाते। 

इस स्थिति का लाभ उठाते हुए मैंने उनसे कहा कि वे मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा तुरंत करें। उन्होंने पहले कहा कि वे 15 अगस्त, 1990 को लाल किले से इसकी घोषणा कर देंगे। मुझे साफ-साफ शब्दों में उनसे कहना पड़ा कि अगर वे सिफारिशें लागू करना चाहते हैं तो उन्हें 9 अगस्त, 1990 के पहले ऐसा करना होगा अन्यथा मेरे पास चौधरी देवीलाल की दिल्ली में होने वाली रैली में भाग लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। मेरी सोच यह थी कि इन सिफारिशों को लागू करने से आंबेडकर, कर्पूरी ठाकुर, लोहिया और जयप्रकाश नारायण का सपना पूरा होगा। ये सभी समानता पर आधारित समाज के निर्माण के हामी थे और उसका स्वप्न देखते थे। जनता दल सरकार, जिसका नेतृत्व वी.पी. सिंह कर रहे थे, भी समाजवादियों के संघर्ष का ही परिणाम थी।

मैंने उनसे कहा कि पिछड़े वर्ग, जिन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में उनके चुनाव में मदद की थी और जो हजारों सालों से समाज के हाशिए पर हैं, आशा भरी निगाहों से उनकी ओर देख रहे हैं। इन वर्गों की अपेक्षा है कि वे मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करेंगे। अपनी सरकार को बचाने के लिए वी. पी. सिंह, अपने कुछ नजदीकी राजनैतिक सहयोगियों से चर्चा के बाद, इसके लिए राजी हो गए। 6 अगस्त, 1990 को उन्होंने अपने निवास पर शाम 6 बजे कैबिनेट की बैठक बुलाई। बैठक का मुख्य एजेंडा था मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने पर चर्चा। अपने निकट सहयोगियों की चेतावनी के बावजूद अगले ही दिन 7 अगस्त, 1990 को सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को मंजूर कर लिया और यह घोषणा की कि वह आरक्षण की नयी योजना लागू करेगी, जिसके अंतर्गत ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा।

अंततः 13 अगस्त, 1990 को ओबीसी आरक्षण को लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी गई। इसके पहले 10 अगस्त, 1990 से ही द्विज जातियों ने आरक्षण की खिलाफत शुरू कर दी थी। लगभग एक महीने तक विद्यार्थियों, नौकरशाहों और अध्यापकों ने देशभर में विरोध प्रदर्शनों में भाग लिया। इस दौरान सार्वजनिक संपत्ति नष्ट की गई और सड़कों पर यातायात बाधित किया गया।”

अगर वी. पी. सिंह सरकार को मंडल आयोग की सिफारिशों के अंतर्गत ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के लिए शरद यादव मजबूर नहीं करते तो भारत के शूद्र और ओबीसी आज उस स्थिति में नहीं पहुंच पाते, जहां वे हैं। 

अगर मंडल के समर्थन में शूद्र और ओबीसी जातियों की गोलबंदी नहीं होती तो द्विजों द्वारा नियंत्रित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी, जिन्होंने मंडल आरक्षण का विरोध किया था, कभी एक ओबीसी नरेंद्र मोदी को अपने नेता के रूप में स्वीकार नहीं करते और ना ही उन्हें प्रधानमंत्री बनने देते। 

सभी शूद्र और ओबीसी नेताओं, चाहे वे किसी भी पार्टी में क्यों न हों, को अपने राजनैतिक दर्जे के लिए इस असाधारण योद्धा को श्रेय देना चाहिए।

(यह आलेख पूर्व में ‘द वायर’ द्वारा अंग्रेजी में व यहां लेखकीय अनुमति से हिंदी में प्रकाशित)

(अनुवाद: अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)  


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लेखक के बारे में

कांचा आइलैय्या शेपर्ड

राजनैतिक सिद्धांतकार, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता कांचा आइलैया शेपर्ड, हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक और मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद के सामाजिक बहिष्कार एवं स्वीकार्य नीतियां अध्ययन केंद्र के निदेशक रहे हैं। वे ‘व्हाई आई एम नॉट ए हिन्दू’, ‘बफैलो नेशनलिज्म’ और ‘पोस्ट-हिन्दू इंडिया’ शीर्षक पुस्तकों के लेखक हैं।

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