h n

इतिहास के आईने में ‘जाति’

फाहियान ने वर्णन किया है कि गुप्तकाल में एक अस्पृश्य वर्ग था। स्मृतियों में शूद्रों और अस्पृश्यों में अंतर माना गया। गुप्तोत्तर काल में छुआछूत की भावना बढ़ी। चतुर्वर्णी व्यवस्था को ईश्वरीय बनाने के पीछे गहरी चाल थी ताकि मेहनतकश वर्ग अधिकार संपन्न वर्ग पर उंगली न उठाए। बता रहे हैं देवेंद्र शरण

सदियों से भारत की सामाजिक जीवन के केंद्र में जाति प्रथा रही है। जाति प्रथा के उत्पत्ति और विकास के बारे में अनेक धारणाएं, विचार और विरोधाभाष सामने आई हैं। इसके दो मुख्य आधार बताए जाते हैं ‘श्रेणीबद्धता’ (ऊंच नीच की भावना) तथा शुद्ध व अशुद्ध की भावना। अब जरा जाति प्रथा के शुरुआत की ऐतिहासिक विवेचना करें।

ऋग्वेद में जाति शब्द का उल्लेख नहीं किया गया है। इसके बदले चतुर्वर्ण (चार वर्ण) शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ संभवतः रंग से है। इसकी उत्पत्ति के बारे में प्राचीनतम अनुमान ऋग्वेद के ‘पुरुष सूक्त्त’ में वर्णित सृष्टि संबंधी पुराण से प्राप्त होता है। समझा जाता है कि ऋग्वेद के दसवें मंडल में यह विषय बाद में डाला गया। लेकिन उत्तर वैदिककाल के साहित्य में गाथा काव्य, पुराण और धर्मशास्त्रों की अनुश्रुतियों में भी इसे कुछ फेरबदल कर प्रस्तुत किया गया है। ऋग्वेद में यह कहा गया है कि पुरुष (ब्रह्मा) के मुंह से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जांघों से वैश्य और शूद्र की उत्पत्ति उनके पैरों से हुई थी। ब्राह्मणवादी समाज की इस कहानी में शूद्रों को भी एक समुदाय में मिलाने का प्रयास किया गया है। श्रम का विभाजन ऋग्वैदिक काल में ही काफी विकसित हो चुका था, यद्यपि एक ही परिवार के विभिन्न सदस्य कवि, पाठक और भीषक (पिसाई करने वाले) का काम करते थे। इससे कोई सामाजिक भेदभाव उत्पन्न नहीं होता था। लेकिन अथर्ववैदिक काल के अंतिम दिनों में आर्यों की भिन्नता के आधार पर लोगों के सामाजिक हैसियत में भी अंतर किया जाने लगा था और भेदभाव उत्पन्न हो गया था तथा शूद्र और दास कर्म करने वाले कुछ आर्य चतुर्थ वर्ण की श्रेणी में आ गए।

संभव है कि इस कथा में कुछ सच्चाई भी हो, किंतु इसे पूर्णतः सत्य नहीं माना जा सकता। दास का अर्थ अधीन के रूप में होता था। दासता का प्रमुख श्रोत युद्ध था। युद्ध में पराजित होने वाले दास बना लिए जाते थे। संभवतः दास उन मिश्रित भारतीय आर्यों के अग्रिम दस्ते थे, जो उस समय भारत आए, जब केसाइट बेबिलोनिया पहुंचे थे। करीब 1750 ई.पू. शायद इसी कारण दासों के प्रति आर्यों ने मेल-मिलाप की नीति अपनाई और दिवोदास, बलबुथ और तरूण जैसे सरदारों को अपने पक्ष में कर लिया।

इसलिए कई प्रश्न एक साथ उठ खड़े होते हैं। मसलन, चतुर्थ वर्ण शूद्र क्यों कहलाए? शूद्र आर्य थे या आर्यों के आगमन के पूर्व भी एक जनजाति थे? शूद्र भारत में कब आए? इत्यादि इसके जवाब में इतिहासकार आर.एस. शर्मा का कथन है कि जिस प्रकार यूरोपीय शब्द ‘स्लेव’ और संस्कृत शब्द ‘दास’ विजित जनों के नाम पर बने थे, उसी प्रकार शूद्र शब्द उक्त्त नामधारी पराजित जनजाति के नाम से बना था। ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में शूद्र नाम की जनजाति थी, क्योंकि डियोडोरस ने लिखा है कि सिकंदर ने आधुनिक सिंध में रहने वाली सोद्रई नामक जनजाति पर चढ़ाई की थी।[1] अथर्ववेद के आरंभिक भाग में शूद्र को जनजाति माना गया है। महाभारत में आभीरों के साथ शूद्रों की चर्चा बार-बार जनजाति के रूप में हुई है। शूद्र जनजाति का वर्णन भी दरदों, तुखारों और पहलवों के साथ हुआ है। इस प्रकार अथर्ववेद में आरंभिक अंश में शूद्र शब्द का जनजाति-स्वरूप सर्वथा उपयुक्त्त जान पड़ता है। आर.एस. शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘शूद्रों का प्राचीन इतिहास’ की भूमिका में यह लिखा है, “स्वाभाविक रूप में इसमें दासों की स्थिति का भी अध्ययन करना पड़ा है, क्योंकि शूद्रों को उनके सदृश माना जाता था। अछूतों को सिद्धांततः शूद्रों की कोटि में रखा गया है …।”[2]

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में गंगा किनारे पिंडदान कराता ब्राह्मण और पिंडदान करते लोग जिनमें अधिकांश दलित-बहुजन हैं (फोटो : सुशील मानव)

प्रश्न यह है कि शूद्र आर्य थे या अनार्य, यदि वे आर्य थे तो वे भारत में किस समय आए। यद्यपि इस विषय में परस्पर विरोधी विचार प्रकट किए गए हैं। पहले यह माना गया कि शूद्र आर्य जनजाति के थे। बाद में यह माना गया कि शूद्र आर्यों के पूर्वजनों की एक शाखा थे। इन दोनों बातों को उचित प्रमाण के अभाव में दरकिनार कर दिया गया। उपलब्ध तथ्यों के आधार पर शूद्रों और आर्यों के साथ कुछ समानता दृष्टिगोचर होती है। शूद्रों की चर्चा हमेशा आभीरों के साथ हुई है, जो आर्यों की एक बोली ‘आभीरी’ बोलते थे। उस काल में शूद्र आर्य की भाषा समझने में समर्थ थे। फिर शूद्रों को आर्य पूर्व लोगों यथा, द्रविड़, पुलिंद, शबर आदि की सूची में कभी शामिल नहीं किया गया है। उन्हें बराबर उत्तर पश्चिम का निवासी माना गया है।[3]

उत्तर वैदिक काल में तीन वेदों– सामवेद, अर्थववेद और यजुर्वेद के अतिरिक्त चार ब्राह्मण ग्रंथों की रचना हुई। इन्हीं दिनों उपनिषद भी रचा गया। इसी प्रकार कर्मकांड, माया, पुनर्जन्म के सिद्धांत आत्मा और परमात्मा का मिलन तथा मुक्ति इत्यादि बातें मूल रूप से धर्म के मुख्य आधार बने। इन दिनों यज्ञों और बलिप्रथा की महत्ता बढ़ी। यज्ञ कराने वाले ब्राह्मण कहलाने लगे। उनकी प्रतिष्ठा और संपन्नता यज्ञों के द्वारा बढ़ी, क्योंकि ये धार्मिक अनुष्ठान कराने वाले लोग थे। मनुष्य की उत्पत्ति के समय शूद्र वर्ण की स्थिति दयनीय और उपेक्षित थी यह बात ऋग्वेद और अथर्ववेद में वर्णित समाज के चित्रण से शायद ही सिद्ध होता है। इन संहिताओं में कहीं भी दासों और आर्यों तथा शूद्र और उच्च वर्ग के बीच भोजन और वैवाहिक प्रतिबंध के प्रमाण नहीं मिलते हैं। वर्णों के बीच भेदभाव बतलाने वाला एकमात्र पूर्व कालीन संदर्भ अथर्ववेद में पाया जाता है, जिसमें यह दावा किया गया है कि ब्राह्मण को राजन्य और वैश्य की तुलना में किसी नारी का पहला पति बनने का अधिकार प्राप्त है। ब्राह्मण की स्त्री और गाय को कोई हाथ लगा नहीं सकता है, पर इस समय कहीं शूद्र की चर्चा नहीं मिलती, क्योंकि इस समय यह वर्ण विद्यमान नहीं था। इसका कोई आधार नहीं है कि दास और शूद्र अपवित्र समझे जाते थे। यह भी प्रमाण नहीं मिलता है कि उनके छू जाने से उच्च वर्णों का शरीर और भोजन दूषित हो जाता था। अपवित्रता का सारा ढकोसला बाद में खड़ा किया गया। जब समाज कृषि प्रधान हो गया। ऊपर के वर्णों को सुविधाएं और विशेषाधिकार प्राप्त होने लगे।[4]

लगता है कि उत्पादन के ऊपर नियंत्रण करने के लिए ब्राह्मणों और क्षत्रियों में भयंकर संघर्ष चला। अंततः क्षत्रियों ने उत्पादन पर अपना पूर्ण नियंत्रण कर लिया तथा समाज के सबसे ऊपरी वर्ग के रूप में ब्राह्मणों की मान्यता स्वीकार कर ली। इतना ही नहीं, क्षत्रियों ने यज्ञों तथा अन्य अवसरों पर ब्राह्मणों को अधिक से अधिक दान-दक्षिणा देकर संपन्न किया। उत्पादनकर्ता वर्ग वैश्य और शूद्र समाज के निचले वर्ग के रूप में स्थान पा सके। उत्पादनकर्ता के रूप में शूद्रों की स्थिति तत्कालीन ग्रीक नगरों के गुलामों से मिलती है। जिस प्रकार ग्रीक नागरिक अपनी गुलाम प्रजा से सेवा कर प्राप्त करने का दावा और हक समझते थे। उसी प्रकार भारत के उच्च वर्ण शूद्रों की श्रम शक्ति पर अपना हक प्रस्तुत करते थे। उसी प्रकार शूद्रों की तुलना युनान के दासों से की जा सकती है। लेकिन कुछ एक शूद्र राजवंशों की जानकारी भी मिलती है। कहा जाता है कि गंगाघाटी में सर्वोच्च सत्ता प्राप्त शूद्र राजवंश था।[5] अतः आर्थिक दृष्टिकोण से शूद्रों से दासों की तुलना नहीं की जा सकती।

वैदिक काल के अंत होते-होते कुछ कठोर बातें भी सामने आने लगीं। शूद्र के शरीर से स्पर्श करना और कुछ विशेष अवसरों पर उसे देखना निषेध कर दिया गया। “यह ध्यान देने योग्य बात है कि शूद्रों से संपर्क न करने के बारे में सारे निर्देश या तो शतपथ ब्राह्मण में या फिर स्त्रोत-सूत्रों में मिलते हैं, जिससे यह पता चलता है कि शूद्र को अपवित्र मानकर मांगलिक अवसर पर उसकी उपस्थिति, शरीर स्पर्श और दर्शन आदि को निषेद्ध कर दिया गया। ये बातें वैदिक काल के अंत में प्रचलित थीं।”[6]

बौद्ध ग्रंथों में वर्णित अनेक हीन जातियां हिंदू समाज के अछूत वर्गों से मोटे तौर पर मिलती-जुलती हैं। बौद्ध और जैन धर्मों के ग्रंथों में चांडाल को शूद्र वर्ण में सम्मिलित नहीं किया गया है। पतंजलि के अनुसार पाणिनि में चांडाल को शूद्र की श्रेणी में रखा और जिनके स्पर्श से ब्राह्मणों के कांस्यपात्र सदा अपवित्र होते थे। पाली ग्रंथों में चंडाल को स्पष्टतया अछूत बताया गया है और यह कि चांडाल का शरीर स्पर्श करके आने वाली हवा भी दुषित हो जाती थी। चांडाल पर दृष्टि पड़ना भी अपशकुन माना जाता था। यदि चांडाल भोजन और पथ्य सामग्री देख ले तो उसे ग्रहण करना वर्जित था।[7]

मनुस्मृति के आधार पर शूद्रों के बारे में बहुत कुछ कहा गया है। मनु ने कई ऐसे विधान बनाए हैं, जिनसे शूद्रों की स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। मनु का विचार था कि शूद्रों को संपत्ति जमा नहीं करने देना चाहिए, क्योंकि इससे वह ब्राह्मणों को सताने लगेगा। मनु ने यह भी कहा है कि ब्राह्मण अपने शूद्र दास की संपत्ति को निर्ममतापूर्वक जब्त कर सकता है। इसका सीधा सा यह अर्थ है कि मनु ने शूद्रों को आर्थिक दृष्टि से दयनीय ही बनाकर रखने का प्रयास किया है।[8]

मनु ने उच्चवर्ग के लोगों के प्रति अपराध करने वाले शूद्रों को कठोर सजा देने का प्रावधान किया है। जैये यदि कोई शूद्र किसी द्विज को गाली देकर अपमानित करे तो उसकी जीभ काट ली जाए।[9] मनु ने यह भी विदित किया है कि कोई शूद्र यदि किसी द्विज के नाम और जातियों की चर्चा तिरस्कार पूर्वक करे तो उसके मुंह में दस अंगुली लंबी गर्म लोहे की कांटी ठूंस दिया जाए। यदि ब्राह्मणों के साथ उद्दंडतापूर्वक व्यवहार करे तो राजा उसके मुंह और कान में गरम तेल डलवा दे।[10]

मौर्यकाल में शूद्रों की स्थिति में थोड़ा सुधार दृष्टिगोचर होने लगा था। धर्मशास्त्रों के अनुसार कौटिल्य ने भी चारों वर्णों में व्यवसाय निर्धारित की, लेकिन शूद्र को शिल्पकला और सेवावृत्त के अतिरिक्त कृषि, पशुपालन और वाणिज्य से आजीविका चलाने की अनुमति दी गई। इन्हें सम्मिलित रूप से ‘वार्ता’ कहा गया है। चार वर्णों के अतिरिक्त कौटिल्य ने अनेक वर्णसंकर जातियों का उल्लेख किया है। उनकी उत्पत्ति विभिन्न वर्णों के अनुलोम और प्रतिलोम विवाहों से बताई गई है। इन वर्ण संकर जातियों में अंबष्ट, निषाद, रथकार, मगध और चांडाल प्रमुख हैं। कौटिल्य ने चंडालों के अतिरिक्त सभी वर्ण-संकर जातियों को शूद्र माना है।[11] बढ़ई, लोहार, रजक, दर्जी, सुनार और जुलाहे इत्यादि जातियों को वर्ण के अंतर्गत रखा है। गुप्तकाल में चार वर्ण के अतिरिक्त अनेक उपजातियों का भी उल्लेख हुआ है। अनेक शूद्र राजाओं की भी चर्चा गुप्तकाल में हुई है। आभीर और मलेच्छ राजाओं की जानकारी भी इस काल में मिलती है। कुछ ऐसे भी दृष्टांत मिलते हैं, जिनसे यह पता चलता है कि ब्राह्मणों ने भी क्षत्रियों और वैश्यों का पेशा अपना लिया था। मृच्छकटिकम् के अनुसार ब्राह्मण चारूदत्त वाणिज्य व्यवसाय करता था। गुप्तकाल के ग्रंथों में यह बात आई है कि ब्राह्मणों को शूद्रों का अन्न नहीं ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से ब्राह्मणों का आध्यात्मिक बल घटता है। शांतिपर्व में धोबी, चर्मकार और बढ़ई का अन्न नहीं ग्रहण करने योग्य बताया गया है। यदि शूद्र का अन्न सवर्ण ग्रहण करे तो उसके लिए प्रायश्चित का विधान किया गया है। किंतु संकट के समय शूद्र का अन्न ग्रहण करने की शास्त्रों में अनुमति दी गई है। बृहस्पति ने भी संकट के समय शूद्रों का अन्न खाने की अनुमति प्रदान की है। चांडालों को छोड़कर शेष शूद्र जातियों के हाथ का पानी पीना निषेध था, इस बात का प्रमाण नहीं मिलता है। मृच्छकटिकम् में कहा गया है कि ब्राह्मण और शूद्र एक ही कुएं से पानी भरते थे। ऐसे प्रमाण भी मिलते हैं कि गुप्तकाल में शूद्रों को सेना में भी महत्वपूर्ण पद प्राप्त थे। ह्वेनसांग के अनुसार मतिपुर का राजा भी शूद्र था। गुप्तकाल में शूद्रों के लिए वाणिज्य-व्यापार करके जीवन-यापन करने की अनुमति दी गई है। पुराणों में भी यह कहा गया है कि शूद्र खरीद-बिक्री और व्यापारिक लाभ से जीवनयापन कर सकते हैं। अमरकोष और अनुशासनपर्व में शूद्रों को मेहनत मजदूरी द्वारा जीवन निर्वाह करने वाला कहा गया है। अमरकोष में धोबियों, चर्मकारों, ढोल, बंशी और वीणा बजाने वालों इत्यादि को शूद्र की सूची में रखा गया है।[12]

मार्कंडेय पुराण में दान देना और यज्ञ करना शूद्र का कर्तव्य बतलाया गया है। फाहियान के वर्णन से यह जानकारी मिलती है कि गुप्तकाल में एक अस्पृश्य वर्ग था। स्मृति ग्रंथों में अस्पृश्यों और शूद्रों में अंतर माना गया है, लेकिन अमरकोष में वर्ण संकर जातियों और अस्पृश्यों को शूद्र वर्ण में रखा गया है। इस काल में कहा गया है कि यदि किसी द्विज की दृष्टि किसी अस्पृश्य पर कुछ देर पड़ जाए तो वह अपवित्र हो जाता है और उसे शुद्धि अनुष्ठान करने पड़ते हैं। स्मृतियों में अछूतों को अंत्यज अथवा चांडाल तथा प्रतिलोम विवाह से उत्पन्न कहा गया है। साधारणतः चांडालों का पेशा सफाई करना तथा श्मशान का काम करना था। डोम गीत गाते थे और सार्वजनिक मनोरंजन करते थे।[13]

गुप्तोत्तर काल एवं प्राक मुस्लिम युग (500-1200 ईसवी) में परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं। इस काल में छुआछूत की भावना और ज्यादा बढ़ी तथा अस्पृश्य जातियों की संख्या में भी इजाफा हुआ। चांडालों को तो पहले ही अंत्यज जातियों में रखा गया था, अब अन्य कई जातियां अस्पृश्यता के घेरे में आ गईं। स्मृतियों में सात अन्य जातियों का उल्लेख हुआ है। रजक (धोबी), चर्मकार, नट, वरुड़ (चटाई टोकरी इत्यादि बनाने वाली जातियां), केवट, धीवर भेद तथा भील व्यास। मनुस्मृति में कोली, पुष्कर और वराट जातियों के नाम अंत्यजों की श्रेणी में दिए गए हैं। स्कंदपुराण में अंत्यज जातियों की संख्या अठारह बतलाई गई है। अत्रि के अनुसार यदि चर्मकार, नट, व्यास इत्यादि जातियां द्विज के किसी अंग का स्पर्श करें तो उस अंग को धो डालना चाहिए। सांप्रदायिक द्वेष के कारण भी कुछ लोगों को अस्पृश्य समझा जाता था। ब्रह्मपुराण के अनुसार बौद्ध, जैन, पाशुपत, लोकायत और कापालिकों को स्पर्श करने से व्यक्ति अपवित्र हो जाता था और अपवित्र द्विज को सवस्त्र स्नान करके पवित्र होना पड़ता था। कुछ संकट के समय जब घर जल रहा हो, शत्रु देश का आक्रमण हो गया हो तो जाति स्पर्श दोष नहीं लगता था। गाय दुहते समय, देव यात्रा, विवाह और यज्ञोत्सव में जाति स्पर्श दोष नहीं लगता था।[14]

चतुर्वर्ण समाज की रचना ब्राह्मण ने की है। मनुस्मृति में ऐसा लिखा गया है कि विराट पुरुष (ब्रह्मा) ने लोगों के कल्याण के लिए अपने मुख से ब्राह्मण, बाहों से क्षत्रिय, जांघ से वैश्य और पैरों से शूद्र को जन्म दिया। मनुष्य समाज की चतुर्वर्णी व्यवस्था ईश्वर ने बनाई है और ईश्वर की बात गलत नहीं हो सकती। ईश्वर ने लोक कल्याण के लिए ही चार वर्णों का निर्माण किया। संभवतः ब्रह्मा से वर्ण व्यवस्था को जोड़कर इसलिए रखा कि अधिकार संपन्न वर्ग पर कोई अंगुली न उठे। इस देश के शूद्रों-अतिशूद्रों पर सैकड़ों वर्ष तक गुलामी का बोझ लादा जा सके और अज्ञानी लोग इस सिद्धांत को श्रेष्ठ मानकर तदनुसार आचरण करें।[15]

इसलिए जोतीराव फुले ने चतुर्वर्ण व्यवस्था के निर्माण के सिद्धांत को एकदम झूठा करार दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि चार वर्णों की रचना का परंपरागत सिद्धांत काल्पनिक है। वर्ण-व्यवस्था ईश्वर द्वारा नहीं बनाई गई, बल्कि ब्राह्मणों ने अपनी सत्ता और श्रेष्ठता को बनाए रखने के लिए वर्ण-व्यवस्था का निर्माण किया। फुले के अनुसार आर्य बाहर से आए और सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए वर्ण-व्यवस्था की उत्पत्ति की। फुले ने अपने ग्रंथ ‘गुलामगिरी’ की प्रस्तावना में ही एक प्रश्न उठाया है और खुद ही उसका उत्तर भी दिया है– “आज भी ब्राह्मणों और सवर्णों से दस गुना शूद्रों की संख्या होने के बावजूद भी शूद्र दरिद्र और अज्ञानी हैं तथा उनकी (ब्राह्मणों की) सेवा में लगे हैं क्यों? वह इसलिए कि एक सोची-समझी योजना के तहत वर्ण और जाति व्यवस्था लाई गई ताकि समाज में एकजुटता कभी नहीं आए।”[16]

जाति व्यवस्था वर्ण-व्यवस्था से जुड़ी हुई है। वर्ण-व्यवस्था का समर्थन जाति व्यवस्था ने भी किया है। वर्ण सिर्फ चार हैं, लेकिन जाति व्यवस्था में अनेक जातियों का समावेश है। ब्राह्मणों को छोड़कर अन्य वर्णों को विभिन्न जातियों में विभाजित कर दिया गया। जोतीराव के अनुसार ब्राह्मण तो संगठित रहे, किंतु अन्य वर्णों को विविध जातियों में विभाजित कर दिया। इस प्रकार ब्राह्मणों ने जाति-व्यवस्था का निर्माण किया। फुले के अनुसार जाति व्यवस्था का वर्ण-व्यवस्था के समान ही ब्राह्मणों (आर्यों) की देन है। समाजशास्त्री उत्तमराव मोईटे का कहना है, “जाति संस्था का निर्माण ब्राह्मणों ने अपना सामाजिक वर्चस्व स्थापित करने व उसे सदा बनाए रखने के लिए किया था, ऐसा फुले ने प्रतिपादित किया था।”[17] जाति प्रथा भेदभाव व ऊंच-नीच पर आधारित एक सामाजिक व्यवस्था है, अतः जोतीराव फुले की तरह ही डॉ. बी.आर. आंबेडकर जाति प्रथा के कट्टर आलोचक थे। भारत में जाति प्रथा के प्रचलन और संरक्षण की क्रियाविधि पर विचार करते हुए उन्होंने इस प्रश्न का उत्तर तलाशना शुरू किया कि जाति प्रथा की उत्पत्ति कहां से हुई। जाति प्रथा के मूल का अध्ययन की शुरुआत कैसे हुई। वे लिखते हैं,“पूरे भारत वर्ष में जाति प्रथा कैसे पनपी और दृढ़ होती गई, इस प्रश्न का सीधा उत्तर मेरे पास नहीं है। मैं इसका परोक्ष उत्तर दे सकता हूं।”[18]

डॉ. आंबेडकर के अनुसार यह प्रथा ब्राह्मणों ने पूरी दृढ़ता से प्रचलित किया है, जो हिंदू समाज की संरचना में सर्वोच्च स्थान पर हैं और गैर-ब्राह्मण जातियों ने इसका मात्र अनुसरण किया है, जहां इसके पालन में न तो उतनी दृढ़ता है और न संपूर्णता। फुले की तरह ही आंबेडकर भी मानते हैं कि जाति प्रथा के जन्मदाता ब्राह्मण वर्ग ही है।[19]

डॉ. आंबेडकर के अनुसार, मनु ने जाति के विधान का निर्माण नहीं किया और न ही वह ऐसा कर सकता था। जाति प्रथा मनु से पूर्व विद्यमान थी। वह तो इसका पोषक था। इसलिए उसने इसे एक दर्शन का रूप दिया। प्रचलित जाति प्रथा को ही उसने संहिता का रूप दिया और जाति धर्म का प्रचार किया। डॉ. आंबेडकर मानते हैं कि जाति प्रथा का विस्तार और उसकी दृढ़ता इतनी व्यापक है कि किसी एक व्यक्ति या एक वर्ग के धूर्तता और बलबूते का काम नहीं हो सकता।[20] भारत में जिन मान्यताओं ने जाति प्रथा को जन्म दिया उसके बारे में पश्चिम के विद्वानों ने चार सिद्धांत दिए हैं– (1) व्यवसाय, (2) विभिन्न कबायली संगठनों का प्रचलन, (3) नई धारणाओं का जन्म और (4) वर्ण संकर जातियां। आद्रजन नेसफील्ड के अनुसार “सिर्फ कार्य केवल कार्य ही वह आधार था, जिस पर भारत की जातियों की पूर्णप्रथा का निर्माण हुआ।”[21] लेकिन डॉ. आंबेडकर सहित अनेक लोग नेसफील्ड की इस बात को सही नहीं मानते हैं कि सिर्फ व्यवसाय के आधार पर जातियां बन गईं। यह एक लचर दलील है। बहुत सारी जातियां किसी भी पेशे से नहीं जुड़ी हैं। हवर्ट ने ‘जैविक संरचना भेद’ कह कर जाति प्रथा का उदाहरण प्रस्तुत किया है। ‘जैविक संरचना भेद’ भी लचर पुरातन पंथी शब्दजाल की धारणाओं को पुष्टि करता है।

आगे डॉ. अंबेडकर इतिहास के आधार पर यह बतलाते हैं कि भारतीय समाज चार वर्णों में बंटा हुआ था– (1) ब्राह्मण या पुरोहित, (2) क्षत्रिय या सैनिक वर्ग, (3) वैश्य या व्यापारिक वर्ग और,  (4) शूद्र अथवा शिल्पकार और श्रमिक वर्ग। यह ध्यान देने की बात है कि प्रारंभ में वर्ग विभाजन के अंदर व्यक्ति दक्षता के आधार पर वर्ण बदल सकता था, इसलिए वर्णों को व्यक्तियों के कार्य की परिवर्तनशीलता स्वीकार्य थी। हिंदू इतिहास में किसी समय पुरोहित वर्ग या ब्राह्मण वर्ग ने अपना विशिष्ट स्थान बना लिया और इस तरह स्वयं सीमित प्रथा से जातियों का सूत्रपात हुआ। दूसरे वर्ण भी समाज विभाजन के तदनुसार अलग-अलग खेमों में बंट गए। वैश्य और शूद्र वर्ण मौलिक रूप से वे तत्व हैं, जिनके जातियों की

अनगिनत शाखा-प्रशाखाएं कालांतर से बने, क्योंकि सैनिक समुदाय सरलता से विभाजित नहीं हो सकते, इसलिए वह वर्ण सैनिकों और शासकों के लिए सुरक्षित रहा।[22]

समाज में वर्णों की परिवर्तनशीलता के मार्ग अवरूद्ध हो गए और वे संकुचित बनते चले गए, जिन्होंने जातियों का रूप ले लिया। कुछ जातियों ने अपने दरवाजे दूसरे के लिए बंद कर दिए और कुछ ने अपने लिए दूसरों के दरवाजा बंद पाया। पहला पक्ष मनोवैज्ञानिक और दूसरा पक्ष चालाकी भरा। औद्योगिक धार्मिक और अन्य कारणों से जातियों ने अपने आप को आत्मकेंद्रित और सजातीय विवाह में केंद्रित कर लिया। जाति प्रथा की शुरुआत ब्राह्मणों ने की और गैर-ब्राह्मण जातियों ने बढ़-चढ़कर इसकी नकल की तथा सजातीय विवाह प्रथा को अपनाने लगे। डॉ. आंबेडकर यह भी मानते हैं कि यूरोपीय विद्वानों ने व्यर्थ ही इस बात पर जोर दिया कि जाति प्रथा रंग के आधार पर बनाई गई, क्योंकि वे स्वयं रंगभेद के प्रति पूर्वाग्रही हैं। चमड़े के रंग से जातियों को कुछ लेना-देना नहीं है। डॉ. आंबेडकर ने कहा है कि सभी राजा, चाहे वे तथाकथित आर्य थे अथवा द्रविड़, आर्य कहलाते थे। जब तक विदेशियों ने नहीं कहा, भारत के लोगों को इससे कोई सरोकार नहीं रहा कि कोई कबीला या कुटुंब आर्य है या द्रविड़। चमड़ी का रंग इस देश में जाति का मानदंड नहीं रहा।[23]

जाति व्यवस्था ने व्यक्ति की सामाजिक गतिशीलता पर रोक लगा दी। एक व्यक्ति किसी एक जाति में जन्म लेकर किसी दूसरी जाति की स्थिति को प्राप्त नहीं कर सकता।[24]

समाजशास्त्री जी.एस. घुर्ये के अनुसार प्रारंभ में जब आर्य भारत आए तो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये तीन ही वर्ण थे। चौथे वर्ण शूद्र का उल्लेख तत्कालीन साहित्य में काफी अंतराल के बाद आया है। आर्यों ने जिन पर अधिकार प्राप्त किया, वे भारत के मूलनिवासी थे, उनको शूद्र बनाया था। भारत में आए आर्यों ने यहां के मूल निवासियों को अपने अधीन तो किया, लेकिन उन्हें अपने धार्मिक, सांस्कृतिक जीवन में शामिल नहीं किया। स्वयं को सांस्कृतिक दृष्टि से श्रेष्ठ समझा तथा दूसरों के साथ हीन व्यवहार किया। लेकिन जिन मूल निवासियों ने आर्यों का स्वामित्व स्वीकार किया उनको

अलग से शूद्र बनाकर अपने सामाजिक परिधि में स्वीकार किया।[25] घुर्ये के अनुसार ब्राह्मणों ने अपनी स्वयं की वर्ण शुद्धता हमेशा बनाए रखने के लिए जातीय विवाह का बंधन तथा विभिन्न गुटों में आपसी बंधन लगा दिए और उन्हें दूसरों को भी उत्तेजित किया, जिसके कारण जाति व्यवस्था स्थापित करने में सहायता मिली। उच्च वर्गों के विशेषाधिकार और निम्न वर्गों की अयोग्यताएं, वर्गीय समाजों का सार्वदेशिक लक्षण रहा है। अतः ब्राह्मणों की चार वर्णों और उनके अलग-अलग अधिकारों और अयोग्यताओं के सिद्धांत का कोई विशेष स्पष्टीकरण देने की आवश्यकता नहीं है।[26]

घुर्ये साहब यह मानते हैं कि जाति व्यवस्था को गंगा जमुना के किनारे बसने वाले आर्यों खासकर ब्राह्मणों ने स्थापित और विकसित किया। यहीं से देश के अन्य भागों में यह व्यवस्था स्थानांतर हुई।[27]

जाति व्यवस्था की एक बड़ी कमजोरी रही कि इसके कारण हिंदू समाज में कभी एकता की भावना का निर्माण नहीं हुआ। हिंदू समाज केवल अपनी जाति के बारे में सोचता है, चेतनशील रहता है, भावनात्मक रहता है। इसके विपरीत अनेक समस्याओं का सृजन हुआ। जाति के कारण ही संपूर्ण भारतीय समाज का अलग-अलग जातियों में विभाजन हुआ। इसका सबसे अधिक दंश श्रमिक वर्ग, दलितों और बहिष्कृत अतिशूद्रों को झेलना पड़ा।[28]

दलितों के लिए अतिशूद्र शब्द का प्रयोग सबसे पहले जोतीराव फुले ने किया। शूद्रों और अतिशूद्रों के भेद की बात पर उन्होंने कहा कि माली, कुनबी, लोहार, बढ़ई, दर्जी, सोनार यदि शूद्र हैं तो चमार, महार आदि जातियां अतिशूद्र हैं। अतिशूद्र भी शूद्रों में ही हैं।[29]

अंत्यज शब्द अलबरूनी की पुस्तक ‘भारत’ में भी आया है– “शूद्रों के बाद जो लोग आते हैं, वे अंत्यज कहलाते हैं। वे विभिन्न प्रकार के निम्न कार्य करते हैं और उनकी गणना किसी भी जाति में नहीं होती। उन्हें किसी विशेष शिल्प का सदस्य माना जाता है।”

इनकी भी आठ श्रेणियां हैं। ये आठ शिल्पी हैं– धोबी, चमार, बाजीगर, टोकरीसाज, सीपरसाज, नाविक, बहेलिया और जुलाहा। हाड़ी, डोम, चांडाल और बधातउ नामक लोगों की गणना किसी जाति या व्यवसाय से नहीं होती। वे गंदे काम करते हैं, जैसे गांव की सफाई और अन्य छोटे काम। इन सबको एक ही श्रेणी माना जाता है और इनमें केवल व्यवसायिक भेद ही होते हैं। धोबी, चमार, जुलाहे को छोड़कर, जिनके साथ कोई भी किसी तरह का संबंध इनसे नहीं रखना चाहता। वास्तविकता तो यह है कि उन्हें अवैध संतान माना जाता है, क्योंकि आम लोगों की यह धारणा है कि वे शूद्र पिता और ब्राह्मणी माता की धारण संतान हैं, इसलिए निम्नकोटि के अछूत है।[30]

शूद्रों की उत्पत्ति की खोज में हिंदू साहित्य का विश्लेषण करते हुए डॉ. आंबेडकर ने अपने आप को निष्पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि यह सही है कि मैं अब्राह्मण आंदोलन से जुड़ा हूं, किंतु मैं अपने शोध को अब्राह्मण राजनीति का हिस्सा नहीं बनाया।[31] मनुस्मृति में लिखा है कि चांडालों तथा श्वापकों का निवास स्थान गांव के बाहर होंगे तथा उन्हें अपात्र बना देना चाहिए। इस संदर्भ में आंबेडकर पूछते हैं कि अस्पृश्यों को गांव के बाहर क्यों रखा जाता था? यह अविचारणीय प्रश्न है। इस पर उन्होंने दो संभावनाएं व्यक्त की है। पहली कि अस्पृश्यता से गांव के बाहर रहने वाले लोगों का कुछ लेना-देना नहीं है। दूसरी संभावना है कि जो पहले गांव के अंदर रहते थे तथा जब उनके ऊपर अस्पृश्यता का कलंक लगा तो वे गांव के बाहर रहने के लिए विवश किए गए। आंबेडकर ने शास्त्रों द्वारा अंत्यज शब्द के प्रयोग के बारे में लिखा है कि अंत शब्द का अर्थ रचना का अंत नहीं बल्कि गांव का अंत है। यह एक ऐसा नाम है, जो उन व्यक्तियों को दिया जाता था जो गांव के अंत या परिसीमा पर रहते थे, वे अंत्यज कहलाए। आंबेडकर का मानना है कि प्रारंभिक काल में आइरिस तथा बेल्स गांवों में कुछ लोग गांव के बाहर रहते थे। भारत में अस्पृश्यता की तरह आयरलैंड के फुहीधीरों तथा वेल्स गांवों के आलुमुंडों के बीच पूर्ण समानता है, क्योंकि उपर्युक्त दोनों गांव के बाहर रहते थे। किंतु अन्य स्थानों से गांव से अलग हुए लोगों की बस्तियां विलुप्त हो गईं। आदिम समाज आधुनिक समाज में बदल गए किंतु भारत में ऐसा नहीं हो सका।

अस्पृश्यता की उत्पत्ति के बारे में आंबेडकर का मानना है कि 400 ई. में इसकी उत्पत्ति हुई होगी। संभवतः इसकी उत्पत्ति ब्राह्मण और बौद्ध धर्म की प्रभुता को लेकर जो लड़ाई हुई उसके कारण हुई। प्राचीन इतिहासकारों ने इस बात को उद्धृत किया है कि पांचवीं शताब्दी में गुप्तकाल में फाहियान तथा सातवीं शताब्दी में ह्वेनसांग के विवरणों में अस्पृश्यता का वर्णन आया है।[32]

डॉ. आंबेडकर अस्पृश्यता को दास प्रथा से भी बुरा मानते थे। वे कहते थे– “अस्पृश्यता और दास प्रथा में अंतर है, जिससे अस्पृश्यता एक परतंत्र सामाजिक व्यवस्था की सबसे खराब मिसाल बन जाती है। दास प्रथा कभी बाध्यकारी नहीं थी, किंतु अस्पृश्यता बाध्यकारी है। कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को अपने दास के रूप में रख सकता है, लेकिन उस पर कोई बाध्यता नहीं है कि वह नहीं चाहने पर भी रखे। किंतु अछूतों के पास कोई विकल्प नहीं है। एक अछूत के रूप में पैदा होने पर अछूत की सारी अयोग्यताएं उसे मिल पाती हैं। दास प्रथा का कानून का छुटकारे की इजाजत देता है। एक बार गुलाम, हमेशा गुलाम रहेगा, यह गुलाम की नियति नहीं थी। अस्पृश्यता से बच निकलने का कोई रास्ता नहीं। एक बार अछूत हमेशा अछूत।”[33] इस प्रकार आंबेडकर दास प्रथा को अस्पृश्यता से सौ गुना बेहतर मानते हैं। मई, 1916 में डॉ. आंबडेकर की प्रथम कृति प्रकाशित हुई। अमेरिका में गोष्ठी का आयोजन हुआ, जिसमें डॉ. साहब ने ‘कास्ट्स इन इंडिया’ (भारत में जातियां) शीर्षक से एक लंबा लेख पढ़ा। 1917 में यह लेख प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने यह दर्शाया कि अगर भारत में जाति प्रथा व वर्ण व्यवस्था न होती तो यहां सामाजिक एकता होती। यह विषाक्त नासूर का इलाज जल्द नहीं हुआ तो हमारे समाज का बच पाना मुश्किल है।[34]

जातिप्रथा हिंदू समाज की कठोर सच्चाई है। यह हिंदुओं का धार्मिक और सामाजिक जीवन का केंद्र बिंदू रहा है। आर्यों ने पशुपालन छाेड़कर जब कृषि व्यवस्था को अपना लिया तबसे उत्पादन के साधनों और संपत्ति के अधिकार के लिए ब्राह्मणों और क्षत्रियों में समझौता हुआ होगा। क्षत्रियों ने संपत्ति और उत्पादन के साधनों पर अधिकार कर लिया होगा और ब्राह्मणों की श्रेष्ठता स्वीकार कर ली होगी। ब्राह्मणों को यज्ञ और बलि द्वारा बड़ी संख्या में गाय और भूमि दान में दिया जाने लगा था। मनु ने वर्णव्यवस्था को ईश्वरीय और वैधानिक बना दिया। साथ ही स्मृतियों में ब्राह्मणों को सबसे अधिक अधिकार संपन्न बनाया गया और शूद्रों के लिए अनेक कठोर नियम बनाए। शू्द्रों को बेगार करने और ब्राह्मण, क्षत्रियों की सेवा करने को कहा गया। इसके बदले मजदूरी के रूप में शूद्रों को जिंदा रहने भर अनाज प्रदान किया गया।

फाहियान ने वर्णन किया है कि गुप्तकाल में एक अस्पृश्य वर्ग था। स्मृतियों में शूद्रों और अस्पृश्यों में अंतर माना गया। गुप्तोत्तर काल में छुआछूत की भावना बढ़ी। चतुर्वर्णी व्यवस्था को ईश्वरीय बनाने के पीछे गहरी चाल थी ताकि मेहनतकश वर्ग अधिकार संपन्न वर्ग पर उंगली न उठाए। उनसे पढ़ने-लिखने का अधिकार छीनकर उन्हें अज्ञानी और गुलाम बनाए रखा।

अनेक आधुनिक बुद्धिजीवी मानते हैं कि जातिप्रथा के कारण हिंदू समाज में कभी एकजुटता नहीं आई। जातिप्रथा और वर्णव्यवस्था न होती तो सामाजिक एकता होती और भारत सदियों तक गुलाम न होता। अस्पृश्यता के कारण हिंदू समाज एक बड़े वर्ग को पशु से भी खराब जीवन जीने के लिए मजबूर किया। दासप्रथा अस्पृश्यता से सौ गुणा बेहतर है, ऐसा डॉ. आंबेडकर मानते हैं। यह एक विषाक्त नासूर है जो हिंदू समाज को खोखला कर बनाए हुए है।

संदर्भ :

[1] आर.एस. शर्मा, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, राजकमल प्रकाशन- नई दिल्ली 2000 पृष्ठ- 31

[2] वही, पृष्ठ 13

[3] वही, पृष्ठ 33

[4] वही, पृष्ठ 38

[5] वही, पृष्ठ 102-103

[6] वही, पृष्ठ 74

[7] वही, पृष्ठ 118

[8] मनुस्मृति, खंड 8, पृष्ठ संख्या 417; आर.एस. शर्मा, उपरोक्त, पृष्ठ 180

[9] मनुस्मृति, खंड 8, पृष्ठ 270-272

[10] मनुस्मृति खंड 11, पृष्ठ 192 तथा ओमप्रकाश, प्राचीन भारत का सामाजिक और आर्थिक इतिहास, पृ. 5,

[11] डी. एन. झा तथा के.एल. श्रीमाली, प्राचीन भारत का इतिहास, हिंदी माध्यम कार्यान्यवन दिल्ली नि. वि. 1996 पृ. 197

[12] वही, पृष्ठ 309-10

[13] वही, पृष्ठ 381

[14] वही

[15] जोतीराव फुले का सामाजिक दर्शन, डॉ. सरोज आगलवे व पी.आर. गौतम, सम्यक प्रकाशन, 2019, पृष्ठ 36

[16] वही, पृष्ठ 39

[17] डॉ. उत्तमराव मोईटे, महात्मा फुले के सामाजिक परिवर्तन के विचार (लेख), महात्मा फुले गौरव ग्रंथ, महाराष्ट्र राज्य शिक्षा विभाग मंत्रालय मुंबई-1981

[18] बाबा साहेब आंबेडकर संपूर्ण वांगमय भाग-1, पृष्ठ 27-28

[19] वही, पृष्ठ 28

[20] वही, पृष्ठ 29

[21] वही, पृष्ठ 30

[22] वही, पृष्ठ 30-31

[23] वही, पृष्ठ 45

[24] रोमिला थापर, प्राचीन भारत का सामाजिक इतिहास (अनु), ग्रंथ शिल्पी, नई दिल्ली, पृष्ठ 32

[25] जी.एस. घुर्ये, कास्ट-क्लास एंड ऑक्यूपेशन, पॉपुलर बुड डिपो, मुंबई, 1961, पृष्ठ 169

[26] वही, पृष्ठ 176

[27] वही, पृष्ठ 172

[28] जोतीराव, उपरोक्त, पृष्ठ 49

[29] महात्मा फुले समग्र वांग्मय, पृष्ठ 138

[30] भारत, अलवरूनी, पृष्ठ 41

[31] एच.एल. पांडेय, गांधी एवं अंबेडकर, इलाहाबाद 1997, पृ. 12-13

[32] वही, पृष्ठ 12-13

[33] वही पृ. 111

[34] महेश अंबेडकर, डॉ. भीम राव अंबेडकर, नई दिल्ली, पृष्ठ 27-28

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

देवेन्द्र शरण

लेखक रांची विश्वविद्यालय, रांची के सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं। उनकी प्रकाशित कृतियों में ‘शेड्यूल्ड कास्ट्स इन दी फ्रीडम स्ट्रगल ऑफ इंडिया’ (1999), ‘भारतीय इतिहास में नारी’ (2007), ‘नारी सशक्तिकरण का इतिहास’ (2012) और ‘मेरे गीत आवारा हैं’ (काव्य संग्रह, 2009) शामिल हैं।

संबंधित आलेख

भारतीय ‘राष्ट्रवाद’ की गत
आज हिंदुत्व के अर्थ हैं– शुद्ध नस्ल का एक ऐसा दंगाई-हिंदू, जो सावरकर और गोडसे के पदचिह्नों को और भी गहराई दे सके और...
जेएनयू और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के बीच का फर्क
जेएनयू की आबोहवा अलग थी। फिर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में मेरा चयन असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के पद पर हो गया। यहां अलग तरह की मिट्टी है...
बीते वर्ष 2023 की फिल्मों में धार्मिकता, देशभक्ति के अतिरेक के बीच सामाजिक यथार्थ पर एक नज़र
जाति-विरोधी फिल्में समाज के लिए अहितकर रूढ़िबद्ध धारणाओं को तोड़ने और दलित-बहुजन अस्मिताओं को पुनर्निर्मित करने में सक्षम नज़र आती हैं। वे दर्शकों को...
‘मैंने बचपन में ही जान लिया था कि चमार होने का मतलब क्या है’
जिस जाति और जिस परंपरा के साये में मेरा जन्म हुआ, उसमें मैं इंसान नहीं, एक जानवर के रूप में जन्मा था। इंसानों के...
फुले पर आधारित फिल्म बनाने में सबसे बड़ी चुनौती भाषा और उस कालखंड को दर्शाने की थी : नीलेश जलमकर
महात्मा फुले का इतना बड़ा काम है कि उसे दो या तीन घंटे की फिल्म के जरिए नहीं बताया जा सकता है। लेकिन फिर...