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गोपाल प्रसाद का खंडकाव्य ‘सूर्पणखा’

वास्तव में सूर्पणखा के साथ बलात्कार ही हुआ था, जिसे ब्राह्मण लेखकों ने छिपाने का काम किया। लोक भाषा में इसे ‘नाक कटना’ ही कहा जाता है। निश्चित रूप से बलात्कार की वास्तविकता का उद्घाटन ही गोपाल प्रसाद के ‘सूर्पणखा’ खंडकाव्य को अद्वितीय और महत्वपूर्ण बनाता है। पुनर्पाठ कर रहे हैं कंवल भारती

अतुकांत और गद्य कविता के दौर में तुकांत, लय, गति और मात्राओं में अनुशासित पद्य को, और वह भी छंद में, पढ़ने की अनुभूति कितनी सुखद होती है, यह बोकारो, झारखंड के कवि गोपाल प्रसाद के खंड काव्य ‘सूर्पणखा’[1] को पढ़कर ज्ञात हुआ। इस काव्य ने मैथिलीशरण गुप्त और रामधारी सिंह दिनकर की स्मृति ताजा करा दी। मैथिलीशरण गुप्त ने ‘यशोधरा’ और रामधारी सिंह दिनकर ने ‘उर्वशी’ लिखी, पर ‘सूर्पणखा’ हिंदी में कदाचित पहला खंडकाव्य है, जो सूर्पणखा के चरित्र पर आधारित है।

दो सुमन थे किंतु लतिका एक ही थी
एक का नभ दूसरे का गृह ‘मही’ थी
एक को अनुकूल पूर्णोदय मिला था
दूसरा निज रंग में ही पर खिला था
एक को था प्राप्त संरक्षण अनूठा
दूसरे का भाग्य अपने आप रूठा
एक का जीवन् अहा! संघर्षमय था
दूसरे का पूर्ण जीवन सोममय था
अप्सरा की किंकणी नित थी झनकती
क्या पता क्यों देह ऐसे ही थिरकती?

ये पंक्तियां ‘सूर्पणखा’ काव्य की ‘प्रस्तावना’ से ली गई हैं। यह प्रस्तावना मंगलाचरण सदृश है, जिसमें कवि ने तुलसीदास की तर्ज पर सज्जनों-दुर्जनों सबकी वंदना की है। कई जगह यह वन्दना गैर-जरूरी और कहीं-कहीं कवि की चेतना पर ही प्रश्नचिन्ह लगाती नजर आती है। जैसे, ब्राह्मण से आशीष मांगती कवि की यह वंदना–

उस निशा सम विप्र की छाया पड़े ना
गृद्ध-दृष्टि कहीं कभी उनकी गड़े ना
विप्रदेव! न दृष्टि मुझ पर आप डालें
चाहता आशीष हूं, मुझको बना लें,
बस दया का पात्र।[2]

कवि का ब्राह्मण से आशीर्वाद मांगना कि वह उसे दया का पात्र समझे और उस पर अपनी गृद्ध-दृष्टि न डाले, हास्यास्पद लगता है। इसी तरह कवि राम को आततायी का सहायक, व्यभिचार का पोषक और समता का नाशक मानता है, और उसकी वंदना भी करता है। यथा–

राम की, जो था नहीं सुन मानवेतर
आततायी का सहायक, था गुणाकर
जाल रचने में, अलभ व्यभिचार का जो
था परम पोषक;
है किया उसने धरा से लुप्त समता
वंदना करबद्ध हो मैं नित्य करता
आपका विषयुक्त फल मुझको न भाए
लेखनी मेरी कभी रुकने न पाए।[3]

राम और विप्र की वंदना व्यंग्यात्मक हो सकती है। लेकिन, व्यंग्य के लिए भाषा का भी व्यंग्यात्मक होना जरूरी है, जो नहीं है। कवि इस वंदना के बिना भी सूर्पणखा काव्य की रचना कर सकता था।

‘प्रस्तावना’ में ही आगे कवि रावण की भी वन्दना करता है–

धन्य माता कैकसी जिसने दिया है
जन्म रावण वीरवर जिसने किया है
अंत तक संघर्ष मानवता लिए ही
धर्म रक्षा के लिए समता लिए ही
वयम रक्षाम: रही है नीति जिसकी
वन्दना मैं कर रहा करबद्ध उसकी।[4]

इसी प्रकार सूर्पणखा के आगे भी कवि का शीश झुकता है–

ढोंगियों का वह सफाया चाहती थी
देव-दानव एक हैं वह मानती थी
एक मानव जाति बस मानव सभी हैं
वर्ण भेद तनिक कहीं भी तो नहीं है
शीश झुकता है अहा! सद्भावना से
मांगता आशीष इस वीरांगना से।[5]

कवि विभीषण की भी वंदना करना नहीं भूलता–

कर रहा वंदन विभीषण की प्रकृति का
जो रहा प्रतिरोध अपनी जाति-मति का
राजसत्ता के लिए सबकुछ किया था
राम को कुल-भेद सब बतला दिया था
आत्मग्लानि न क्यों कहो होती विभीषण
क्यों न जलती देह तेरी दुष्ट! प्रतिक्षण?[6]

‘प्रस्तावना’ में, कुछ असंगत वंदनाओं के बावजूद, कवि की दृष्टि वर्णभेद के विरुद्ध समतावादी है। इससे खंडकाव्य की दिशा और दशा दोनों का निर्धारण हो जाता है।

प्रस्तावना के बाद, सर्गों का आरंभ होता है। पूरा खंडकाव्य छह सर्गों में विभक्त है : कुहासा, संलाप, परिचय, संघर्ष, शपथ, और आरोहण। ‘कुहासा’ सर्ग में सीता और राम का संवाद है। सीता राम से पूछती है कि वह घृणित, उपेक्षित और तिरस्कृत लोगों से प्रेम क्यों दर्शा रहे हैं? यथा–

जो घृणित थे, थे तिरस्कृत भी उपेक्षित
दृष्टि क्यों रहती सदा उस ओर लक्षित
राम की, जो जन्म से ही हैं समर्थक
उस व्यवस्था के जहां आपादमस्तक
जा रहा देखा इन्हें नीची नजर से
जा नहीं सकते कभी ये उस डगर से
जिस डगर से आर्यवंशी जा रहे हैं
राम अपनी प्रीति क्यों दर्शा रहे हैं?[7]

राम सीता को उत्तर देते हैं–

मैं न भूला हूं कि रघुवंशी तरुण हूं
है मुझे यह ज्ञात भी मैं वह अरुण हूं
है जिसे करना धरा को हीन ऐसे
क्षुद्र जन से, मक्खियों से दूध जैसे
पर यहां पर राज्य सुगठित राक्षसों का
विग्रही जो देवकुल अरु ताप्सों का
वे मिटाना चाहते वर्णाश्रमों को
और उनकी चाह आर्यों के क्रमों को
ये बहुत रणबांकुरे, रणधीर सारे
इंद्र ब्रह्मा विष्णु अगणित बार हारे।[8]

राम बताते हैं कि जब इन्हीं के बीच रहना है, तो इनसे बैर नहीं किया जा सकता। इनके साथ प्रेम का व्यवहार एक रणनीति है। ये युद्ध-कौशल में खरे हैं, पर मूर्ख हैं। इसलिए आर्यों की विजय के लिए इनसे मैत्री करना जरूरी है। यथा–

मैं न चाहूंगा मगर से वैर करना
जब अभी जलधार के है बीच रहना
इन अधम वनमानुषों से इसलिए ही
कर रहा हूं मित्रता अपने लिए ही।
बुद्धि बल से पर-विजय होती सदा है
इसलिए वन मानुषों का कर गहा है
युद्ध-कौशल में सभी के सब खरे हैं
मूर्ख हैं, अज्ञानता से तो घिरे हैं
इसलिए तो जाल समझेंगे नहीं भी
साथ मेरा छोड़ जा सकते नहीं भी।

‘कुहासा’ में कवि ने सीता और राम के इस संवाद के माध्यम से उस आर्य-नीति का पर्दाफाश किया है, जिसके तहत राम अनार्य जनों के सहयोग से अनार्य रावण का विनाश कर आर्य राज्य स्थापित करने की दिशा में अग्रसर होते हैं। यह आर्य-नीति आज आरएसएस और भाजपा सरकार द्वारा हू-ब-हू अपनाई जा रही है, जिसके अंतर्गत वे दलित-पिछड़ी जातियों और आदिवासियों को हिंदुत्व से जोड़कर उनके वोट से उस ब्राह्मण-राज्य को कायम कर रहे हैं, जिसकी सारी नीतियां ब्राह्मण-उत्थान की और बहुजनों के विनाश की हैं। आज बहुजन समाज के लोग उसी तरह ब्राह्मणों की कठपुतली बन गए हैं, जिस तरह वानर, सुग्रीव आदि जन, राम के हाथों की कठपुतली बन गए थे।

‘संलाप’ सर्ग में कवि ने सूर्पणखा का प्रवेश कराया है और वनवासी राम के साथ बातचीत को चित्रित किया है। आरंभ सूर्पणखा के सौंदर्य-वर्णन से होता है। यथा–

काछनी पतली कमर से थी लटकती
म्यान में तलवार भी शोभित लहरती
सर्पिणी सी केश-लटिका थी लरजती
ज्यों घटा काली हवा में हो थिरकती
कान में कुंडल कनक के थे लटकते
देख जिसको फूल अगणित थे महकते
गाल सिंदूरी, अधर रक्ताभ शोभित
या चलि आई उषा नभ पर नवोदित
सुघरतम सौंदर्य की ज्यों मूर्ति आई
देख आंखें राम की भी चौंधियाई।[9]

वन में अचानक राम अपनी कुटी के सामने एक अपरिचित सुंदर स्त्री को देखकर चौंक जाते हैं। वह नहीं जानते कि वह कौन है, और किस प्रयोजन से उनके पास आई है? वह राम को संशयात्मक दृष्टि से देखकर घूरती है। इस तरह घूरते देखकर राम भयभीत होकर उससे पूछते हैं–

संशयात्मक दृष्टि से वह घूरती यों
मेमने को घूरती है शेरनी ज्यों।
हो भयातुर राम तब बोले विहंसकर
देखती मुझको बता इस तरह क्योंकर?

सूर्पणखा बताती है कि वह रावण की बहिन और कैकसी की पुत्री है, और इस क्षेत्र की स्वामिनी है। यह पूरा क्षेत्र रक्ष-संस्कृति के अधीन है और कोई भी विदेशी यहां कुटी बनाकर नहीं रह सकता। वह राम से पूछती है कि वह कौन है और यहां किस प्रयोजन से कुटी बनाकर रह रहा है? यथा–

सप्त द्वीपाधीश रावण जगजयी की
हूं सुनो अनुजा, सुता मां कैकसी की।
स्वामिनी हूं औ’ अधिष्ठात्री यहां की
रक्ष-धर्म अधीन बसुधा है यहां की
फुल्ल-कुसुमित पादपों की हर शखा है
नाम सूर्पणखा पिता ने तो रखा है।
अब बता तू कौन है? आया यहां तू
किसलिए? फिर भेद यह मुझको बता तू
दैत्य है या आर्यवंशी देव-मानव?
छद्मवेशी या बता तू नीच मानव?
है जटा का यूथ तेरे शीश पर क्यों?
देह पर मृग छाल, कर में तीर पर क्यों?
और कह किसने बनाया कर अवज्ञा
इस कुटी को?[10]

यहां सूर्पणखा के मुख से ‘नीच मानव’ शब्द रक्ष-संस्कृति की विचारधारा से मेल नहीं खाता। कवि प्रस्तावना में कह चुका है कि सूर्पणखा देव-मानव को एक मानती थी, न वर्णभेद मानती थी और न ऊंच-नीच। फिर वह किसी को नीच मानव कैसे कह सकती थी? अभी सूर्पणखा राम के बारे में कुछ भी नहीं जानती थी। अभी दोनों का परिचय ही हो रहा था, ऐसी स्थिति में कवि को ऊंच-नीच की व्यवस्था वाले शब्दों का प्रयोग करने से बचना चाहिए था।

गोपाल प्रसाद का खंडकाव्य ‘सूर्पणखा’

राम सूर्पणखा को अपना परिचय देते हैं–

दाशरथि हूं राम पत्नी जानकी यह
लक्ष्मण भाई हमारा धीरमति वह
उच्च कुल रघुवंश है, हूं आर्य वंशी
क्षत्रिय हूं इसलिए तूणीर अंसी
मैं पिता आदेश से वनवास करता
इसलिए ही सिर जटा का यूथ रखता।
की अवज्ञा कौन हमने यही बताओ
पूर्ण सब मन्तव्य भी अपना सुनाओ।[11]

सूर्पणखा राम को इस प्रकार अपना मंतव्य बताती है–

है बना सकता न आश्रम जो न दीक्षित
है हमारे धर्म में; यह लक्ष्य लक्षित
पर उसे तुमने अरे! रवि-कुल भुलाया
और आगे हाल यों उसने बताया
सभी नृवंशी एक हैं यह मानती हूं
पर सभी को राक्षस बनाना चाहती हूं
जो नहीं मत में हमारे साथ होंगे
खेत आएंगे उसी क्षण; हाथ होंगे
हाथ में मेरे उन्हीं के जो बनेंगे
धर्म के अनुगत; सुनो बाधा बनेंगे
राह में, उनको धराशायी करूंगी।

फिर वह तलवार खींचकर राम से पूछती है–

खींच ली तलवार उसने जो कमर में
थी लटकती; गर्जना की इस गरज में
बोल, क्या तू चाहता, अंगत बनेगा?
या इसी क्षण मौत कुत्ते की मरेगा?[12]

सूर्पणखा का राम से सीधे धर्म की बात करना और धर्म में दीक्षित न होने पर कुत्ते की मौत मरने की बात करना सूर्पणखा का कोई बहुत अच्छा परिचय नहीं है। यह तो वैसी ही फासीवादी विचारधारा हुई, जैसी आज के हिंदुत्ववादियों की है कि या तो जयश्रीराम बोलो, या फिर मरने को तैयार हो जाओ। रक्ष-संस्कृति का आधार फासीवाद और मानव-हिंसा नहीं था। जिस पंचवटी में राम कुटी बनाकर रह रहे थे, सूर्पणखा उस क्षेत्र की अधिपति थी। अपने क्षेत्र में बाहरी तत्वों की अवैध घुसपैठ कोई भी शासक सहन नहीं करता। उस क्षेत्र में ब्राह्मणों की घुसपैठ और उनकी गतिविधियां अवैध थीं, जो न केवल वहां के लोगों के लिए बल्कि उनकी संस्कृति और राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए भी घातक थीं। इसलिए राज्य-हित में उन अवैध घुसपैठों और गतिविधियों को रोकना राज्य का दायित्व था। इसीलिए, राज्य के सैनिक, जिन्हें रामायण में नरभक्षी राक्षस लिखा गया है, ब्राह्मणों के अवैध आश्रमों, यज्ञों तथा अन्य गतिविधियों को नष्ट कर देते थे। इसे ब्राह्मणों ने राक्षसों का आतंक नाम दिया। राम के वन-आगमन का उद्देश्य ब्राह्मणों के हित में राक्षसों के तथाकथित ‘आतंक’ का संहार करना ही था। राम द्वारा अनेक राक्षसों की हत्याओं के समाचार सूर्पणखा को मिल चुके थे। वह इसी की तहकीकात के लिए पंचवटी में आई थी, और वहां राम के अवैध निर्माण को देखकर कुपित हुई थी। वह अधिपति थी, तो निश्चित है कि अकेली नहीं आई होगी, सैनिकों की एक टुकड़ी भी उसके साथ अवश्य रही होगी। उसने राम से अपने अवैध निर्माण को नष्ट करने के लिए कहा होगा, और स्वाभाविक है कि इसी बात पर दोनों के बीच संघर्ष भी हुआ हो।

आगे कवि ने एक और गलतबयानी कर दी है। उन्होंने राम के मुख से रावण को ब्राह्मण कहलवा दिया है। राम सूर्पणखा से कहते हैं–

जगजयी रक्षेंद्र को मैं जानता हूं
रक्ष कुल की लाज तू है, मानता हूं
रक्ष कुल में श्रेष्ठ ब्राह्मण कुल तुम्हारा
जानता यह बात है संसार सारा।[13]

यह कैसा पुनर्पाठ है कि एक ओर रक्ष-संस्कृति वर्णव्यवस्था का खंडन करती है, और दूसरी ओर रक्ष-कुल में ब्राह्मण वर्ण को मान्यता भी देती है? यह अच्छी तरह से जानते हुए भी कि वर्णव्यवस्था आर्यों की संस्कृति की विशेषता है, अनार्य-संस्कृति की नहीं, तो रक्ष-कुल में ब्राह्मण-कुल कैसे हो सकता है? कवि इस तथ्य पर विचार क्यों नहीं कर सका कि यदि रावण ब्राह्मण था, तो राक्षस कैसे हो सकता था, और यदि रावण राक्षस था, तो ब्राह्मण कैसे हो सकता था? मनु के अनुसार, रावण अवध्य है।[14] फिर, राम ने उसका वध करके ब्रह्म-हत्या का पाप कैसे कर दिया? राम ब्राह्मणों की ही राक्षसों से रक्षा करने के लिए वन में गए थे। अगर रावण ब्राह्मण था, तो राम किन राक्षसों से लड़ने गए थे? फिर रावण भी आर्य ब्राह्मण ऋषियों के लिए संकट क्यों पैदा करता, अगर वह खुद ही ब्राह्मण था? क्यों सूर्पणखा पंचवटी जाकर राम को वहां से अपनी कुटी हटाने को कहती? क्योंकि रावण की बहन होने के कारण वह स्वयं भी ब्राह्मण थी। जाहिर है कि कवि का इतिहासबोध स्पष्ट नहीं है।

इसी सर्ग में कवि द्वारा पर्यावरण की चिंता सही है, जो याज्ञिक ऋषियों की अनुष्ठानिक गतिविधियों से दूषित हो रही थी, और पशु-बलियों के कारण अनेक प्रकार के रोग फ़ैल रहे थे। इसकी पुष्टि बौद्ध साहित्य से भी होती है।[15] सुत्तनिपात में लिखा है कि ब्राह्मणों की पशु-हिंसा से अठानवे प्रकार के रोग पैदा हो गए थे, जिसे देखकर असुर और राक्षस ‘अधर्म हुआ, अधर्म हुआ’ कहकर चिल्ला उठे थे।[16] रामकथा एक प्रतीकात्मक इतिहास है, जिसमें राजा राम पुष्यमित्र सुंग के रूप में हैं और रावण के रूप में राम ने बुद्ध की ही हत्या की है। चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु ने ‘रावण और उसकी लंका’ में इस विषय का विस्तार से वर्णन किया है।[17] रामास्वामी नायकर ने भी अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘द रामायण : अ ट्रू रीडिंग’ में इसी सत्य का उदघाटन करते हुए लिखा है, “रावण को वैदिक देवों और ऋषियों से घृणा इसलिए थी कि वे यज्ञ के नाम पर अत्यंत दुखद और क्रूर रीति से निरीह, दीन और मूक पशुओं की हत्या करके दारुण और अक्षम्य अपराध करते थे।”[18] गोपाल प्रसाद ने इसका चित्रण इस प्रकार किया है–

जो निरीहों का सदा करते हनन हैं
अश्व-गो के मांस भक्षक तो मगन हैं
सोम रस के पान करने में अहो जब
क्यों न फिर सबको कहेंगे वे वधिक तब?
देव विधि यज्ञार्थ करते, मांस भक्षण
कौन पापी नर? कहो मुझसे इसी क्षण
हो गया दुर्गंधमय वातावरण है
मौत का सब ओर छाया आवरण है
व्याधियां अनगिनत बढ़ती जा रही हैं
मौत की काली घटाएं छा रही हैं।
पापियों को मारना हिंसा नहीं है
पुण्य इससे दूसरा बढकर नहीं है
याज्ञिकों को हम सताते इसलिए ही
जीवधारी प्राणियों के तो लिए ही।[19]

निस्संदेह, ब्राह्मणों और याज्ञिक ऋषियों के प्रति राक्षसों के विरोध का एक कारण यज्ञों में की जाने वाली प्राणी-हिंसा थी। लेकिन यही एक मात्र कारण नहीं था। ब्राह्मण जब किसी दूसरे राज्य में अपना प्रभुत्व कायम करना चाहते थे, तो सबसे पहले वहां अपनी धार्मिक गतिविधियां आरंभ करते थे। वहां की भोलीभाली अशिक्षित जनता को अपने धर्मजाल में फंसाते थे, और धीरे-धीरे वहां की जनता को सत्ता के खिलाफ भड़काते थे। फिर सत्ता के साथ उनका टकराव होता था, जिसमें वे जनता को आगे करके लड़ते थे। और इस तरह वह समय आ जाता था, जब वे उस क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व कायम कर लेते थे। चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु ने लिखा है कि ब्राह्मणों ने आश्रमों के रूप में अपनी चौकियां कायम की थीं, और उनमें रहने वाले ऋषि लोग आर्य-प्रभुओं के सैन्य दस्ते के रूप में काम करते थे।[20] राक्षसों के नियंत्रण वाले क्षेत्र में ब्राह्मण ऋषियों द्वारा आश्रम बनाकर रहने और याज्ञिक गतिविधियों को संचालित करने के पीछे यही मकसद था।

सर्ग के अंत में कवि ने रावण को रूद्र का अनुयायी बताया है। सूर्पणखा कहती है–

अनुगता रक्षेंद्र की मैं बस उसी के
पूर्ण सपने को बताती हूं उसी के
बोल में जो रूद्र से उसने कहा था
और उससे जो रूद्र ने भी जो कहा था
काश! संशय मिट सके इससे तुम्हारा
और अपना लो हमारा धर्म प्यारा।[21]

क्या वास्तव में रावण ने रूद्र की आराधना की थी? ब्राह्मणी साहित्य और रामायण में रावण को शिव-भक्त बताया गया है। यह भी कहा जाता है कि ‘शिव तांडव स्तोत्र’ रावण कृत ग्रंथ है।[22] लेकिन, शिव और रूद्र दोनों अलग-अलग हैं। शिव अनार्य-देवता हैं और अहिंसक हैं, जबकि रूद्र वैदिक देवता हैं, और हिंसक प्रकृति के हैं। जिज्ञासु ने लिखा है कि शिव के शांत दिव्य रूप को रौद्र और भयंकर बनाने के पीछे ब्राह्मणों का षड्यंत्र मात्र है। वेदों में रूद्र की स्तुति में सूक्त के सूक्त हैं, यहां तक कि यजुर्वेद की पूरी शतरुद्री है। लेकिन शिव की स्तुति में वेदों में कोई सूक्त नहीं है। अन्य ग्रंथों में जहां-जहां शिव शब्द आया है, वहां वह कल्याणकारी और हितकारी अर्थ में है। शिव अगर वैदिक देवता होते, तो उन्हें वेदों में सूर्य, चंद्र, इंद्र, वरुण, अग्नि, वायु आदि वैदिक देवों के बीच अवश्य स्थान मिलता है। जिज्ञासु के अनुसार वैदिक देव अग्नि को ही रूद्र कहा गया है। ब्राह्मण रूद्र-पूजा को ही शिवार्चन कहा करते हैं। शिव को रूद्र रूप देने का कृत्य रावण को वैदिक धर्मी बनाने के उद्देश्य से किया गया।[23] कवि गोपाल प्रसाद को शिव और रूद्र के संबंध में व्यापक अध्ययन करने की आवश्यकता थी।

तीसरा सर्ग ‘परिचय’ है। पर इसमें कोई कथा नहीं चलती है। इस सर्ग में एकालाप है। सर्ग के आरम्भ में कवि रावण के द्वारा यह प्रतिज्ञा कराता है–

आर्य कुल पौलस्त्य यद्यपि वैश्रवण हूं
जिस लिए कटिबद्ध मैं सुन आमरण हूं
मैं करूंगा नाश देवों का धरा से
फिर विषमता को मिटाऊंगा यहां से।[24]

अगर रावण आर्य-कुल से है, तो राम-रावण युद्ध का आधार क्या रह जाता है? फिर रावण को राक्षस कुल का कैसे कहा जा सकता है? निस्संदेह कवि अपनी स्थापना में उलझा हुआ है। इसलिए वह निरंतर विरोधाभासी बातें कहता है।

आगे कवि ने वर्णव्यवस्था से परिचय कराया है, लेकिन एक सामाजिक व्यवस्था के रूप में उसने किस तरह का प्रभाव भारत की स्वतंत्रता और एकता पर डाला, यह बता पाने में कवि असफल रहा है। कवि ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों का अलग-अलग परिचय दिया है, जिसे सामान्यत: सभी जानते हैं। शूद्र का परिचय कवि ने मनु के विधान के हवाले से इस तरह किया है–

श्रेष्ठ ब्राह्मण दूसरे ये क्षत्र जन हैं
तीसरा है वैश्य चौथे शूद्र जन हैं
है धरा अपवित्र होती शूद्र जन से
है कथन यह सत्य सुनिए विप्र जन से
दंड देना भी गजब इनके यहां है
कर रहा लिपिबद्ध मनु ने जो कहा है।[25]

इस सर्ग में कवि ने रावण के लिए ‘दशानन’ और ‘दसशीश’ का प्रयोग किया है। यथा–

तनने लगी थी भौं दशानन की।
देखकर दसशीश की ऐसी अवस्था।[26]

ये दोनों शब्द ब्राह्मण-शब्दावली के हैं, जिनका अर्थ होता है दस सिरों वाला। क्या कवि मानता है कि किसी व्यक्ति के दस सिर होते थे या हो सकते हैं? हालांकि रावण के बारे में ब्राह्मणों की यही मान्यता है कि रावण के दस सिर थे, और रामलीलाओं में भी रावण बना कलाकार दस सिर वाला मुखौटा लगाकर अभिनय करता है। लेकिन क्या भौतिक रूप से किसी के दस सिर हो सकते हैं? अगर नहीं, तो कवि ने इस अविश्वसनीय और अवैज्ञानिक मान्यता को अपनी स्वीकृति क्यों दी?

चौथा सर्ग ‘संघर्ष’ कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही एक मात्र सर्ग है, जिसमें कवि ने राम और लक्ष्मण द्वारा सूर्पणखा के अंग भंग किए जाने वाली कहानी का पुनर्पाठ किया है। आरंभ लक्ष्मण की वासना से होता है। ये पंक्तियां देखिए–

दोष किसका हम कहें वातावरण का
जाल छाया वासना के आवरण का
शंभु भी खुद को बचा पाए न जिससे
पार पा सकता कहो फिर कौन उससे?[27]

इन पंक्तियों में कवि ने लक्ष्मण के विरह को दिखाने का प्रयास किया है, जो वन में अपनी कुटी में अपनी पत्नी उर्मिला की याद में वासना में जल रहे हैं। पर, ‘शंभु भी खुद को बचा पाए न जिससे’ में कवि शिव के बारे में क्या कहना चाहता है? संसार का कोई भी प्राणी नहीं है, जो अपनी संगिनी के प्रेम में न पड़ता हो। यह प्रेम ही संसार के विकास का आधार है। फिर शिव का उदाहरण किस प्रयोजन से दिया गया? क्या कवि का उद्देश्य शिव को कामांध दिखाना तो नहीं है? अगर कवि इसके माध्यम से इस मिथक का स्मरण कराना चाहता है कि शिव वासना के वशीभूत कामांध होकर मोहिनी के पीछे भागे थे, तो कहना न होगा कि कवि ब्राह्मणी कहानियों के प्रभाव में है, और यह समझ पाने में असमर्थ है कि ब्राह्मणों ने शिव-चरित्र का विकृतिकरण किया है।

आगे कवि वासना में जल रहे लक्ष्मण के समक्ष सूर्पणखा की उपस्थिति कराता है–

याद करते जा रहे थे उर्मिला की
लग रही उनके हृदय में आग जिसकी
पर चपल पद-चाप ने झकझोर डाला
लखन को।
इसलिए तो हाथ धनुही पर गया था
पर वहां का दृश्य तो बिल्कुल नया था
क्षीण कटि उन्नत नितम्ब उरोज उभरे
गाल द्वय थे लाल पूर्ण सरोज निखरे।[28]

आगे लक्ष्मण और सूर्पणखा के बीच न तो कोई तार्किक बहस होती है और न धार्मिक। लक्ष्मण के मन में वासना का तीव्र वेग है, वह सूर्पणखा के सौंदर्य पर मोहित होता है और उसे अपनी जोगन बनने को कहता है। इसे सुनकर सूर्पणखा अपने अपमान से क्रोधित होकर लक्ष्मण पर प्रहार के लिए तलवार खींचती है, तभी लक्ष्मण उसे दबोचकर नीचे गिरा देता है, और उसे बलात भोगने में सफल हो जाता है। यथा–

क्या बनेगी तू हमारी बोल योगन?
ले संभल, आराध्य का अब ध्यान तू कर
‘देहि युद्धम’ और शर संधान भी कर
बोल इतना और चाहो वह कमर से
खींचना तलवार को निज कर अपर से
‘वज्रमणिका ध्यान भटका’ जान लक्ष्मण
मीन पर ज्यों बाज झपटे, झपट तत्क्षण
पकड़ कटि झट दे पछाड़ा और भूखे
केसरी सम धर दबोचा; हाय सूखे
वृक्ष जैसा गिर गई वह चरमराकर
चीख निकली एक फिर बेहोश होकर
हो गई थी शांत; वह निष्प्राण मानो
हो गया अंगार शीतल राख मानो।

‘संघर्ष’ बहुत लंबा सर्ग है, जिसका विस्तार 32 पृष्ठों में हुआ है। इसमें सूर्पणखा और विद्युजीह्व के बीच के प्रेम-प्रसंग और अपने प्रेम को पाने के लिए रावण के साथ उसके संघर्ष को भी पार्श्व में चित्रित किया गया है। संभवत: इसी कारण से कवि ने इसका नाम ‘संघर्ष’ रखा है। लेकिन यह प्रसंग ऐसे समय में डाला गया है, जब कामांध लक्ष्मण सूर्पणखा को अपनी वासना का शिकार बनाता है। ऐसी स्थिति में सूर्पणखा की अंतरवेदना का प्रस्फुटन होना चाहिए था, वहां अचानक पूर्व प्रेम-प्रसंग की स्मृति उचित नहीं लगती। इसके लिए कवि अगर अलग से एक नए सर्ग की रचना करता, तो ज्यादा अच्छा होता।

उसके बाद ‘शपथ’ सर्ग है, जो अपेक्षाकृत सबसे छोटा है। इसमें कवि ने लक्ष्मण द्वारा सूर्पणखा के साथ किए गए बलात्कार को ठीक ही ‘नाक कटने’ की संज्ञा दी है। यह एकदम सही दिशा है। वास्तव में सूर्पणखा के साथ बलात्कार ही हुआ था, जिसे ब्राह्मण लेखकों ने छिपाने का काम किया। लोक भाषा में इसे ‘नाक कटना’ ही कहा जाता है। निश्चित रूप से बलात्कार की वास्तविकता का उद्घाटन ही गोपाल प्रसाद के ‘सूर्पणखा’ खंडकाव्य को अद्वितीय और महत्वपूर्ण बनाता है। सूर्पणखा रावण के पास जाकर अपने साथ हुए अत्याचार को बताती है और प्रतिज्ञा करती है कि उसका क्रोध तभी शांत होगा, जब वह लक्ष्मण के कलेजे पर पैर धर कर नहाएगी और अंजली भरके उसके रक्त का पान करेगी। रावण भी शपथ खाकर वचन देता है कि वह अपनी बहन की प्रतिज्ञा को अवश्य पूरा करेगा। यथा–

जो अगर बल बाहू में, भाई मंगा दे
उस तरुण का ही कलेजा ला दिखा दे
मैं नहाऊंगी उसी पर पैर धर कर
मैं करूंगी पान-शोणित अंजली भर।
पूर्ण तेरी मैं प्रतिज्ञा को करूंगा
मैं बचाने लाज अपनी, मर मिटूंगा।
नाक तेरी ही नहीं, मेरी कटी भी
पूर्ण बदला बिन लिए रहना नहीं भी
मैं रहूंगा या रहेगा दाशरथि ही
है शपथ, साक्षी बनेगी पूर्ण महि ही।[29]

खंडकाव्य का छठा और अंतिम सर्ग ‘आरोहण’ है। पर गौरतलब बात यह है कि यह एक दुखांत सर्ग है। इस सर्ग में विभीषण और सूर्पणखा के बीच संवाद हुआ है। विभीषण कुल-द्रोह करके राम के साथ मिल जाता है, जो रावण के विनाश का कारण बनता है। आर्य शासकों की नीति रही है कि वे अपने शत्रुओं में फूट डालकर एक पक्ष को सत्ता का लोभ देकर अपने गुट में मिला लेते हैं और फिर उसकी सहायता से शेष शत्रु पक्ष का सफाया करके उसके राज्य को अपना उपनिवेश बना लेते हैं। इसी नीति के तहत विभीषण कुल-द्रोह करके युद्ध में रावण के विनाश में राम की सहायता करता है। परिणामत: युद्ध में राम के हाथों रावण मारा जाता है, और लंका के कठपुतली राजा के रूप में विभीषण की ताजपोशी हो जाती है। यह आघात सूर्पणखा को सहन नहीं होता है और वह कुल-द्रोही विभीषण को मारने के लिए उसके घर पहुंच जाती है। इस अवसर पर पहले दोनों के बीच संवाद होता है, और इसी संवाद के दौरान सूर्पणखा द्वारा युद्ध के लिए विभीषण को ललकारने के साथ ही विभीषण छिपकर तीर चला देता है, जिसके प्रहार से सूर्पणखा की मृत्यु हो जाती है। सूर्पणखा के कुछ संवाद गौरतलब हैं। यथा–

छोड़ दूं तुझको अगर, फिर कौन भाई
राजसत्ता है बहन को बेच पाई
खोलकर निज नैन देख पातकी तू
क्या न जीवित मूर्ति है कुल-घात की तू?
यह दसानन था कि सीता थी सुरक्षित
अन्यथा होती लुटी रहती न रक्षित
कायरों का साथ तो तूने दिया है
नाम ऐसा कर जगत में कर लिया है
विट, कृतघ्न मरो कहीं तू जा विजन में
ताकि मत व्यवधान होवे जग-सृजन में
त्यागकर बकवास अब शर कर गहो तुम
वाक्य पूरा भी अभी तो हो न पाया
सनसनाता तीर उर में जा समाया
कापुरुष, पौरुष यही तूने दिखाया
हाथ आखिरकार छिप के ही उठाया
कापुरुष के हाथ से पर मौत पाई
एक पीड़ा है यही उर में समाई।[30]

समग्रत: ‘सूर्पणखा’ एक अनार्य स्त्री के संघर्ष की कहानी है, जिसमें उसकी प्रशासनिक क्षमता, उसके शौर्य, साहस, प्रेम और बलिदान का मार्मिक चित्रण कवि ने किया है। मृत्यु अटल सत्य है। पर कोई कैसे मरता है, यह महत्व रखता है। विभीषण को इतिहास में कुल-घातक के रूप में याद किया जाता है, जबकि सूर्पणखा कुल की रक्षा के लिए संघर्षरत मृत्यु का वरण करती है। गोपाल प्रसाद की स्थापना मौलिक है, पर इतिहास और संस्कृति के वैज्ञानिक चिंतन की उनसे अपेक्षा की जाती है।

[1] गोपाल प्रसाद, सूर्पणखा, (खंडकाव्य), 2022, परिकल्पना, दिल्ली,
[2] वही, पृष्ठ 35
[3] वही, पृष्ठ 36
[4] वही।
[5] वही, पृ. 37
[6] वही, पृ. 38
[7] वही, पृ. 40
[8] वही, पृ. 42-43
[9] वही, पृ. 48
[10] वही, पृ. 50
[11] वही, पृ. 50-51
[12] वही, पृ. 52-53
[13] वही, पृ. 54
[14] मनुस्मृति, 8/380
[15] देखिए, दीघनिकाय, 1-15
[16] देखिए, सुत्तनिपात का ब्राह्मणधम्मिय सुत्त, 2/7/23-28
[17] देखिए, चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु ग्रंथावली, खंड दो,
[18] ए ट्रू रीडिंग आफ रामायना, पृ. 55
[19] गोपाल प्रसाद, वही, पृ. 57
[20] चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु, रावण और उसकी लंका, पृ. 71 (देखिए, जिज्ञासु ग्रन्थावली, खंड दो)
[21] गोपाल प्रसाद, वही, पृ. 61
[22] जिज्ञासु, रावण और उसकी लंका, पृ. 47
[23] चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु, शिव तत्व प्रकाश, पृ. 17-26 (जिज्ञासु ग्रंथावली, खंड तीन, पृ. 47-54)
[24] गोपाल प्रसाद, वही, पृ. 62
[25] वही, पृ. 63
[26] वही, पृ. 65-66
[27] वही, पृ. 78
[28] वही, पृ. 51-52
[29] वही, पृ. 110
[30] वही, पृ. 116-120

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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