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छत्तीसगढ़ : राज्य सत्ता के निशाने पर आदिवासियत

पूरे प्रदेश में पौनी पसारी, चर्मशिल्प और नाई पेटी योजना की आड़ में वर्णाश्रम आधारित परंपरागत व जातिगत व्यवसाय के अनुरूप सरकारी योजनाएं लागू की जा रही हैं। राज्य की कांग्रेस सरकार गोधन न्याय योजना का क्रियान्वयन कर रही है। इस योजना के क्रियान्वयन की आड़ में हाशिये पर जीने को मजबूर भूमिहीन श्रमिकों को भूमि के स्वामित्व से वंचित किया जा रहा है। बता रहे हैं पीयूसीएल, छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष डिग्री प्रसाद चौहान

[प्रस्तुत आलेख पीयूसीएल, छत्तीसगढ़ के द्वारा जारी ‘बस्तर का बहिष्कृत भारत : अल्पसंख्यक इसाई आदिवासियों पर अनवरत जारी हिंसा और अत्याचारों पर लेखा-जोखा’ रपट में प्रस्तावना के रूप में संकलित है। इसके लेखक पीयूसीएल, छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष डिग्री प्रसाद चौहान हैं। संकलित आलेख का संपादित अंश हम यहां उनकी सहमति से प्रकाशित कर रहे हैं]

छत्तीसगढ़ में इसाई आदिवासी अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और आदिवासियों के मध्य आपसी वैमनस्य की मूल वज़ह आदिवासियों का हिंदूकरण है। राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार द्वारा विशेष तौर पर लक्षित आदिवासी क्षेत्रों में राम वन गमन पथ परियोजना का क्रियान्वयन व सरकार प्रायोजित मतांतरण अर्थात आदिवासियों के संविधानेत्तर हिंदूकरण भारत में सबसे बड़ी परिघटना है। आदिवासी पेनगुड़ियां (पुरखों का स्थान), जहां मान्यता के अनुसार आदिवासियों के आराध्य प्रकृति-चिन्हों के रूप में परंपरागत रूप से निवास करते हैं, को सरकार द्वारा जीर्णोद्धार के नाम पर भारी तादाद में देवगुड़ी (देव स्थान) में बदला जाना इस अभियान में शामिल है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दशकों से यह काम वनवासी कल्याण आश्रम के जरिए आदिवासियों को दीक्षित करने के नाम पर कर रहा है।वहीं कांग्रेस के नेतागण यही काम सत्ता में बर्चस्व स्थापित करने के मकसद से उदार हिंदुत्व की एजेंडा के तहत कर रहे हैं।

पौराणिक कथाओं के मुताबिक राम चौदह वर्षों के वनवास के दौरान जिन रास्तों से गुजरे थे, उसमें दंडकारण्य एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। छत्तीसगढ़ के संदर्भ में गंगा नदी के कछार से गोदावरी नदी के कछार के मध्य स्थित भूभाग को दंडकारण्य कहा जाता है। प्रदेश में सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार का दावा है कि इस भूभाग के उत्तर में सीतामढ़ी से लेकर दक्षिण में रामाराम तक ऐसी कोई जगह नहीं है, जो कि हिंदू देवता राम के चरण-रज से पवित्र ना हुई हो। हिंदुओं के आदि ग्रंथ ऋग्वेद में जनजातीय लोगों का उल्लेख दास अथवा आदिम जातियों के रूप में किया गया है। हिंदू पौराणिक पात्र निषाद राज गंगा के किनारे रहने वाले जनजातीय लोगों के मुखिया थे। उन्होंने राम, लक्ष्मण और सीता को गंगा नदी पार करने के लिये नावों और मल्लाहों की व्यवस्था की थी। कथा के मुताबिक वे राम के आगे दंडवत लेट जाते हैं और राम उन्हें उठाकर गले लगा लेते हैं। महाभारत का जनजातीय पात्र एकलव्य कौरवों और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य की प्रतिमा से प्रेरणा लेकर अभ्यास करता है। द्रोणाचार्य उससे गुरु दक्षिणा के रूप में उसके दाहिने हाथ का अंगूठा मांग लेता है। 

शबरी रामायण की एक पात्र है, जिसने राम के वनवास के दौरान उन्हें बेर खिलाये थे। वाल्मीकि के महाकाव्य में अरण्यकांड के मुताबिक मतंगा मुनि की देखभाल करने वाली शबरी रामायण की लोकप्रिय पात्र है। गुजरात के डांग में सन् 2005 में संपन्न हुये शबरी कुंभ मेला में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने यह भ्रम फैलाया था कि डांग क्षेत्र ही रामायण में उल्लेखित दंडकारण्य का इलाका है। छत्तीसगढ़ के जांजगीर चांपा जिले में स्थित जोक, महानदी और शिवनाथ नदी के संगम स्थल शिवरीनारायण में नर-नारायण और शबरी का मंदिर है। यहां ऐसी कहानी गढ़ी गई है कि इस स्थान पर रुककर भगवान राम ने शबरी के जूठे बेर खाए थे। पहले माना जाता था कि शबरी का प्रसंग उड़ीसा से जुड़ा था।

आज जब पूरा सरकारी अमला राम वन गमन पथ के शिलान्यास कार्यक्रमों तथा यात्राओं में व्यस्त है, छत्तीसगढ़ का आदिवासी और दलित इलाका सांप्रदायिकता और जातीय हिंसा के लपटों में जल रहा है। सांप्रदायिक ताकतें महासमुंद में दलितों को सार्वजनिक तालाबों में निस्तार होने की मनाही और औकात में रहने के फरमान दीवारों पर लिख रहे हैं। धरमपुरा में दलितों के श्रद्धा व आस्था स्थल जैतखाम को चुन-चुन कर आग के हवाले किया जा रहा है। कबीरधाम में ध्वज़ फहराने का विवाद तथा लुन्द्रा, सरगुजा में धार्मिक अल्पसंख्यकों को विशेष लक्ष्य करते हुये उनके सामाजार्थिक बहिष्कार के सामूहिक शपथ की घटनाओं के जरिये धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ दहशतगर्दी का मकसद साफ़-साफ दिखाई देता है। 

पूरे प्रदेश में पौनी पसारी, चर्मशिल्प और नाई पेटी योजना की आड़ में वर्णाश्रम आधारित परंपरागत व जातिगत व्यवसाय के अनुरूप सरकारी योजनाएं लागू की जा रही हैं। राज्य की कांग्रेस सरकार गोधन न्याय योजना का क्रियान्वयन कर रही है। इस योजना के क्रियान्वयन की आड़ में हाशिये पर जीने को मजबूर भूमिहीन श्रमिकों को भूमि के स्वामित्व से वंचित किया जा रहा है। जबकि सदियों से भूमिहीन इन समुदायों को गांव में गोबर इकट्ठे करने के लिए प्रोत्साहित करने के बनिस्बत भूमि सुधार योजनाओं के तहत जमीन आवंटित किया जाना ज्यादा सार्थक हो सकता है। आदिवासी भूमियों को गैर आदिवासियों द्वारा धोखे और छल-कपट से हडप लिए जाने से संरक्षण करने वाली भू-राजस्व कानून के क्रियान्वयन में भेदभाव साफ़ दिखाई देता है। 

अपने ऊपर हिंदू संस्कृति थोपे जाने का विरोध करते आदिवासी

रायगढ़ में जहां खनन कंपनियों और ताप बिजली घरों के द्वारा हड़प लिए गए आदिवासी जमीनों को संरक्षण व वापस करने की प्रशासनिक जवाबदेही नकारा साबित हो रही है। वहीं जशपुर में इसी कानून का हवाला देकर इसाई मिशनरियों के गिरिजाघरों के विरुद्ध प्रशासनिक कार्यवाहियों की लंबी सूची है। राज्य का प्रशासनिक तंत्र और उसका रवैया धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ घटित होने वाले हिंसक घटनाओं में उग्र प्रतिक्रिया करने कट्टरपंथियों के पक्ष में खड़ा दिखता है।

हिंदुत्व के सांस्कृतिक आक्रमण ने पेसा कानून के जरिए आदिवासी इलाकों में ग्राम सभा को मिली सर्वोच्चता के मुद्दे को सामने लाकर रख दिया है। पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों में पेसा कानून की आड़ लेकर ये ताकतें आदिवासियों में पवित्रता-अपवित्रता बोध तथा उनके रूढ़ि-परंपरागत व्यवस्था के जातीय पुनर्संरचना तथा कथित रूप से उन्हें दूषित होने से बचाने आदिवासी इसाई धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ गैर इसाई आदिवासियों को गोलबंद करने के अभियान में अतिसक्रिय हैं। संघ एक रणनीति के तहत आदिवासी ईसाई अल्पसंख्यक समुदाय को बाहरी और दुश्मन के रूप में प्रस्तुत करने में सफल रहा है। 

आदिवासी स्वशासन की आड़ लेकर पुरातन परंपरागत व्यवस्था के पुनर्स्थापना के लिये पेसा कानून-पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम का इस्तेमाल एक औजार के रूप में करते हुये गांव के समाजार्थिक व्यवस्था में गैर-हिंदू अल्पसंख्यक धार्मिक समूहों को विशेष लक्ष्य करते हुये गांव की सीमा से बहिष्कृत करते हुये जीवनयापन के प्राकृतिक स्रोतों पर हक़-हुकूक से उन्हें बेदखल कर देता है।

आदिवासी इसाई अल्पसंख्यकों को उनके गांव-बसाहटों से बेदखली, सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार तथा मृत शवों को दफ़नाने पर पाबंदी और अंतहीन प्रताड़ना के मूल में हिंदू राष्ट्रवाद की अवधारणा कार्य कर रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि गांव-स्वराज्य और जल, जंगल, जमीन तथा पारिस्थितिकी तंत्र बचाने के लिए कथित जन-आंदोलनों के मध्य हिंदू फासीवादी ताकतों ने पैठ बना लिया है। 

जहां एक ओर ये ताकतें आदिवासी इलाकों में गैर हिंदू मतावलंबियों की उपासना पद्धति और धार्मिक स्थलों के निर्माण के खिलाफ मुखर हैं, वहीं दूसरी ओर हिंदू धर्म ग्रंथों का स्थानीय भाषाओं में अनुवाद व वितरण, राम वन गमन पथ, पेनगुड़ियों को हिंदू देवगुड़ियों में बदले जाने के मामलों पर अविश्वसनीय रूप से चुप्पी साधे हुए हैं। बस्तर के सिरिसगुड़ा में पैतीस से अधिक ग्रामसभाओं के सामूहिक जन सभाओं के मध्य गैर हिदू धर्मों के प्रार्थना सभाओं तथा प्रचार एवं उपदेश पर पाबंदी का फरमान इसका एक उदाहरण है।

हिंदुत्व के इस वर्चस्ववादी सांस्कृतिक आक्रमण के प्रतिरोध में ब्राह्मण संस्कृति और परंपराओं को खारिज करने तथा मूलवासी परंपराओं व संस्कृति को पुनर्स्थापित करने के लिए आंदोलन भी तेज हो चुका है। छत्तीसगढ़ में दशहरा के मौके पर जब रावण वध का आयोजन होता है या फिर दुर्गा के हाथों महिषासुर का वध दिखाया जाता है तो मूलवासी इसका विरोध करते हैं। मानपुर में भगवा ध्वज दहन की घटना, जंगो-लिंगो संगठन द्वारा दुर्ग अनुभाग कार्यालय में राम वन गमन पथ के निर्माण के खिलाफ हस्तक्षेप ज्ञापन, कलगांव में राम वन गमन पथ प्रचार रथ यात्रा का विरोध, धमतरी के तुमाखुर्द में राम मंदिर के बोर्ड को हटाकर बुढ़ादेव आर्युर्वेद चिकित्सा अनुसंधान केन्द्र का शिलान्यास आदि घटनाओं का प्रमुख रूप से उल्लेख करना जरुरी है। 

राज्य सत्ता में व्याप्त वर्चस्वशाली सांस्कृतिक-सांप्रदायिक ताकतें, जो आदिवासी बाहुल्य प्रांत की प्रशासनिक तंत्र पर कब्जा कर छत्तीसगढ़ में एक धर्म विशेष को जबरन थोपना चाहते हैं, उन ताकतों के द्वारा, ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के खिलाफ स्थानीय दलित-आदिवासियों के प्रतिवाद को दमन करने राजकीय दमन व पुलिसिया कार्यवाहियां बदस्तूर जारी हैँ।

यह समझ में आता है कि हिंदू कट्टरपंथी ताकतों की चिंता की मूल वज़ह मूलवासियों का हिंदू धर्म को खारिज करना है। घरवापसी और शुद्धिकरण के नारों के सहारे हिंदू-आदिवासियों और गैर-हिन्दू आदिवासियों के मध्य वैमनस्य के वातावरण का निर्माण किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ में धर्म स्वातंत्र्य कानून व्यक्ति को एक धर्म से दूसरे धर्म में दीक्षित करने पर रोक लगाने के लिये प्रभावी है, लेकिन यह कानून घरवापसी के मामलों में अविश्वसनीय स्तर तक शिथिल हो जाता है। इस कानून की आड़ में धर्मांतरित आदिवासी ईसाईयों को प्रताड़ित व अपमानित करने की घटनाएं लगातार जारी हैं। 

असल में घरवापसी दलित-आदिवासियों के बलपूर्वक धर्मांतरण का धूर्ततापूर्ण नाम है। एक ओर यह कहना कि कोई किसी का धर्मांतरण करा रहा है, एक तरह से लोगों की चेतना को कमतर आंकना है। वहीं दूसरा पहलू यह कि इस बारे में प्रशासन को पूर्व सूचना की अनिवार्यता भी कट्टरपंथी ताकतों को उग्र प्रतिक्रिया करने को उकसाने के लिए पर्याप्त है।

हाल के वर्षों में ग्रामीण समुदायों के मध्य परंपरागत व प्राचीन मान्यताओं को देश के संविधान से ऊपर मानने के अभियानों और कार्यक्रमों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई है। यह कहने की जरुरत नहीं है कि यह हिंदू राष्ट्र अभियान का अभिन्न हिस्सा है और इस अभियान के तहत धर्मांतरित दलित-आदिवासियों को डी-लिस्टिंग अथवा गैर-अधिसूचित करने का जोर अपने चरम पर है। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

डिग्री प्रसाद चौहान

लेखक पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज, छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष हैं

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