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छत्तीसगढ़ में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ हिंसा के लिए कांग्रेस सरकार ज़िम्मेदार : जांच दल

रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य की कांग्रेस सरकार यह काम सत्ता में बने रहने के लिए अपने उदार हिंदुत्व की एजेंडा के तहत कर रही है। यह क़दम किसी भी संघ प्रायोजित वनवासी कल्याण आश्रम से अलग नहीं हैं, जो पिछले कई दशकों से आदिवासियों को हिंदू धर्म में दीक्षित करने के लिए चलाया जा रहा है। बता रहे हैं सैयद जैगम मुर्तजा

छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाक़ों में बढ़ते हिंदूकरण की वजह से अल्पसंख्यक ईसाइयों के ख़िलाफ लगातार हमले बढ़ रहे हैं। ‘बस्तर का बहिष्कृत भारत’ नाम से जारी फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट पर यक़ीन करें तो राज्य की कांग्रेस सरकार अल्पसंख्यकों को सुरक्षा दे पाने में नाकाम रही है और पार्टी की नर्म हिंदुत्व की नीतियों के चलते ईसाई समुदाय के ख़िलाफ हिंसा में बढ़ोत्तरी हुई है।

पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की राज्य इकाई की पहल पर छत्तीसगढ़ प्रोग्रेसिव क्रिश्चियन अलायन्स, आल इंडिया पीपुल्स फोरम तथा दलित अधिकार अभियान, और आल इंडिया लायर्स एसोसिएशन फॉर जस्टिस के संयक्त तत्वाधान में जारी फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट के मुताबिक़ राज्य में राजनीतिक हिंदुत्व के बढ़ते प्रभाव के चलते धार्मिक अल्पसंख्यकों की मुश्किलें लगातार बढ़ी हैं। इस दल ने यालम शंकर की हत्या, आदिवासी बहुल इलाक़ों में हिंदू संगठनों और धर्मगुरुओं की सक्रियता, धर्मांतरण बनाम घर वापसी, हाल की हिंसा की घटनाओं में प्रशासन की भूमिका समेत कई बिंदुओं पर गहन पड़ताल की। इसके बाद जारी की गई रिपोर्ट में राज्य की कांग्रेस सरकार की नीतियों पर तमाम तरह के सवाल उठाए गए हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि आदिवासी क्षेत्रों में राम वन गमन पथ परियोजना का क्रियान्वयन, और सरकार प्रायोजित मतान्तरण यानी आदिवासियों का हिंदूकरण संविधानेत्तर भारत की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक हैं। हाल के वर्षों में आदिवासी पेनगुड़ियों (उपासना स्थल) को बड़ी संख्या में सरकार ने जीर्णोद्धार के नाम पर देवगुड़ी में बदल दिया है। मान्यता है कि पेनगुड़ियां में आदिवासियों के तमाम आराध्य प्रकृति-चिन्हों के रूप में परंपरागत रूप से निवास करते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य की कांग्रेस सरकार यह काम सत्ता में बने रहने के लिए अपने उदार हिंदुत्व की एजेंडा के तहत कर रही है। यह क़दम किसी भी संघ प्रायोजित वनवासी कल्याण आश्रम से अलग नहीं हैं, जो पिछले कई दशकों से आदिवासियों को हिंदू धर्म में दीक्षित करने के लिए चलाया जा रहा है। इसके अलावा कांग्रेस सरकार की गोधन न्याय योजना के क्रियान्वन के तरीकों पर भी इस रिपोर्ट में सवाल उठाए गए हैं।

पीड़ितों से आपबीती दर्ज करतीं जांच दल की एक सदस्य

रिपोर्ट में हाल की हिंसक घटनाओं का विस्तृत उल्लेख किया गया है, जिसमें छत्तीसगढ़ के ईसाई समुदाय को बार-बार निशाना बनाया गया है। जांच दल के मुताबिक़ राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन अल्पसंख्यक ईसाइयों की रक्षा कर पाने में नाकाम रहे हैं। दल ने आरोप लगाया है कि हिंसा की घटनाओं के आरोपियों को बचाया जा रहा है और ज़िम्मेदारी उन लोगों पर डाली जा रही है, जिनका इन घटनाओं से कोई लेना देना नहीं है। 17 मार्च, 2022 को छत्तीसगढ़ के दक्षिणी जिले बीजापुर के मद्देड़ थाना क्षेत्र के अंगमपल्ली गांव के रहने वाले यालम शंकर की धारदार हथियार से हत्या का उदाहरण देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि इस हत्या का आरोप माओवादियों पर मढ़ दिया गया जबकि वह दक्षिणपंथियों के निशाने पर थे। 

इसी तरह नारायणपुर हुई हिंसा की घटना के बारे में कहा गया है कि ज़िला मुख्यालय पर हुई इस हिंसा ने ज़िले में कानून के शासन की पोल खोलकर रख दी। रिपोर्ट कहती है कि नारायणपुर में दंगाई समूहों ने खुलेआम ईसाइयों की आस्था के केंद्रों को निशाना बनाया। यहां दंगाइयों के निशाने पर चर्च, मिशनरी स्कूल, और पादरी रहे। दंगाई ज़बरदस्ती चर्चों और स्कूलों में घुसकर अपवित्र करते रहे, ईसाइयों के साथ मार-पीट होती रही, उनकी संपत्तियों पर तोड़-फोड़ की घटनाओं को अंजाम दिया गया, लेकिन उनकी सुनने वाला कोई न था। इससे यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि आदिवासी ईसाई अल्पसंख्यक किस भय के माहौल में जीवन जीने को मजबूर हैं।

जांच दल ने आरोप लगाया है कि प्रशासन दंगाइयों के ख़िलाफ कार्रवाई करने के बजाय आश्रयस्थलों में रह रहे  पीड़ित आदिवासी अल्पसंख्यकों के ऊपर ही अपने घरों को वापिस लौट जाने का दबाव बना रहा है जबकि उनके गांवों में दंगाइयों का खतरा कम नहीं हुआ है। रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ हिंसा की घटनाओं के लिए हिंदूवादी संगठन और उनको मिलने वाला सरकारी संरक्षण ज़िम्मेदार हैं। रिपोर्ट में अक्टूबर, 2021 में उत्तरी छत्तीसगढ़ के सरगुजा ज़िले में आयोजित सर्व सनातन हिंदू रक्षा मंच की धर्मान्तरण विरोधी रैली का उदाहरण दिया गया है। इस रैली में मुख्य वक्ता स्वामी परमानंद समेत तमाम वक्ताओं ने नफरती भाषण दिए। स्वामी परमानंद ने रैली में आये हुए लोगो से कहा कि “मैं ईसाइयों और मुसलमानों के लिए अच्छी भाषा बोल सकता हूं, पर इनको यही भाषा समझ आती है।” स्वामी परमानंद ने लोगों को उकसाते हुए कहा कि जो धर्मांतरण करने आता है, उसकी मुंडी काटो। इस तरह के और भी कई मामले हैं लेकिन सरकार ने इनपर कोई क़दम नहीं उठाया।

धर्मांतरण बनाम घर वापसी मुद्दे के ज़िक्र पर जांच दल ने पाया है कि राज्य सरकार संविधान की भावना के ख़िलाफ धर्म विशेष को प्रश्रय दे रही है। इसके विपरीत अल्पसंख्यक समुदाय स्वतंत्र रूप से धर्म के आचरण, अभ्यास और प्रचार के अधिकार से वंचित हैं। इसी तरह छत्तीसगढ़ में सत्तासीन कांग्रेस सरकार ने राज्य के सोलह जिलों में 51 पुरातात्विक स्थलों को चिन्हित कर उस कथित ट्रैक को ‘राम वन गमन पथ’ के रूप में विकसित करने का फैसला लिया। इस परियोजना के तहत राज्य के उत्तर में कोरिया जिले और दक्षिण में सुकमा जिले के मध्य लगभग 2260 किलोमीटर लंबी राम वन गमन पथ पर्यटन सर्किट की पहचान की गयी है।

रिपोर्ट कहती है कि इस पथ निर्माण के लिए एक अरब सैंतीस करोड़ पैंतालिस लाख रूपये का बजट राज्य सरकार ने पारित किया है। इस योजना के नाम पर आदिवासियों के देवगुड़ी और दूसरे आस्था स्थलों पर अचानक राम वन गमन मार्ग का बोर्ड लगा दिया गया। जांच रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के देवगुड़ी अचानक राम मंदिर में बदल दिए गए। आदिवासियों के देव प्रकृति-चिन्हों को मंदिरों में तब्दील करना आदिवासियो को हिंदू बनाने का अभियान है। ज़ाहिर है यह काम सरकारी आदेश पर हो रहा है।

रिपोर्ट में जांच दल ने कहा है कि बस्तर इलाक़े के आदिवासियों को धर्म के आधार पर बांट दिया गया है। इस कारण लोगों के बीच विवाद बढ़ रहे हैं। 

जांच दल ने मांग की है कि सांप्रदायिक और धार्मिक हिंसा की घटनाओं को भीषण आपदा और त्रासदी की तरह समझा जाना चाहिए। ऐसी घटनाओं के बाद पुनर्वास योजना के तहत पीड़ितों का समुचित पुनर्व्यवस्थापन होना चाहिए। दल ने पीड़ितों के लिए समुचित राहत पैकेज की घोषणा के अलावा हिंसा के लिए ज़िम्मेदार अधिकारियों के ख़िलाफ अनुशासनात्मक औक दंडात्मक कार्यवाही की मांग भी की गई है। रिपोर्ट में पेसा क़ानून –- (पंचायत (पांचवी अनुसूची क्षेत्रों का विस्तार) अधिनियम – और उसके क्रियान्वयन की समीक्षा की भी मांग की गई है।

इस जांच दल में रिनचिन, अखिलेश एडगर, विभीषण पात्रे, आशीष बेक, वैभव इफ्राइम, संजीत बर्मन, डिग्री प्रसाद चौहान, विजेंद्र तिवारी, और डॉ गोल्डी एम.जॉर्ज शामिल थे। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सैयद ज़ैग़म मुर्तज़ा

उत्तर प्रदेश के अमरोहा ज़िले में जन्मे सैयद ज़ैग़़म मुर्तज़ा ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से लोक प्रशासन और मॉस कम्यूनिकेशन में परास्नातक किया है। वे फिल्हाल दिल्ली में बतौर स्वतंत्र पत्रकार कार्य कर रहे हैं। उनके लेख विभिन्न समाचार पत्र, पत्रिका और न्यूज़ पोर्टलों पर प्रकाशित होते रहे हैं।

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