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जानिए, नक्सली हमले में किन्होंने दी शहादत?

छत्तीसगढ़ सरकार ने नक्सली गतिविधियों पर लगाम कसने के लिए डीआरजी का गठन किया है। इसमें स्थानीय दलित, आदिवासी, ओबीसी युवको को भर्ती किया जाता है। इनमें अधिकांश वे होते हैं, जो नक्सली संगठनों से आए होते हैं और उन्होंने पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण किया होता है। बता रहे हैं तामेश्वर सिन्हा

गत 26 अप्रैल, 2023 को छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के दंतेवाड़ा जिले में एक बार फिर नक्सलियों ने दुस्साहस किया। उनके द्वारा जमीन के अंदर लगाए गए बम के विस्फोट से डीआरजी (डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड) के दस जवानों व एक निजी वाहन चालक की मौत घटनास्थल पर हो गई। इसे लेकर केंद्र व राज्य सरकार के दावे पर फिर से यह सवाल उठने लगा है कि सूबे में उग्र वामपंथ का खात्मा हो गया है। इससे भी महत्वपूर्ण यह कि इस नक्सली हमले में मारे गए सभी दस जवान आदिवासी थे और चालक ओबीसी। इस कारण भी पूरे इलाके में चर्चा का बाजार गर्म है।

दरअसल, बस्तर संभाग के दंतेवाड़ा जिले के अरनपुर-समेली कैंप के बीच में नवनिर्मित सड़क में नक्सलियों ने बारूदी सुरंग बिछा रखी थी। इस हमले में नक्सलियों ने डीआरजी के जवानों से भरी गाड़ी को उड़ा दिया। 

शहीद जवानों में जोगा सोढ़ी, मुन्ना राम कड़ती, संतोष तामो, दुल्गो मंडावी, लखमू मरकाम, जोगा कवासी, हरिराम मंडावी, राजूराम करटम, जयराम पोड़ियाम, जगदीश कवासी और निजी वाहन चालक धनीराम यादव शामिल हैं। इनमें संतोष तामो एकमात्र ऐसे रहे, जिनकी नियुक्ति जिला पुलिस बल के रूप में हुई थी और डीआरजी के रूप में तैनाती थी। शेष नौ सभी पूर्व नक्सली थे। वहीं एक अन्य शहीद धनीराम यादव निजी वाहन चालक था।

शहीदों की तस्वीरें

सनद रहे कि छत्तीसगढ़ सरकार ने नक्सली गतिविधियों पर लगाम कसने के लिए डीआरजी का गठन किया है। इसमें स्थानीय दलित, आदिवासी, ओबीसी युवको को भर्ती किया जाता है। इनमें अधिकांश वे होते हैं जो नक्सली संगठनों से आए होते हैं और उन्होंने पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण किया होता है। राज्य सरकार ऐसे लोगों को प्रशिक्षण देकर जंगलों में तैनात कर देती है। इस प्रकार हिंसा से छुटकारा पाने के लिए जो नक्सली आत्मसमर्पण करते हैं, उन्हें ही डीआरजी का जवान बनाकर वापस नक्सलियों से लड़ने को भेज दिया जाता है। 

सूबे की प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता सोनी सोरी ने इस घटना के बाद मीडिया से बातचीत में कहा कि सरकार नहीं चाहती है कि नक्सल समस्या खत्म हो। उन्होंने कहा कि सैनिकों के शिविरों की संख्या बढ़ाने से इस समस्या का समाधान नहीं होगा। उन्होंने केंद्र और राज्य दोनों सरकारों पर नक्सली मुद्दे को हल करने में विफल रहने का भी आरोप लगाया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सरकार को इस मुद्दे को हल करने के लिए आम आदिवासियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, जनप्रतिनिधियों और बुद्धिजीवियों के साथ बातचीत करनी चाहिए। 

बम विस्फोट के बाद घटना स्थल पर पहुंचे छत्तीसगढ़ पुलिस के जवान

वहीं, पीयूसीएल के प्रदेश अध्यक्ष डिग्री प्रसाद चौहान ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सलवा जुडुम को यह कहकर प्रतिबंधित किया था कि आदिवासियों को आदिवासियों के खिलाफ न खड़ा किया जाय। तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सलवा जुडुम में शामिल किये गये लाेगों के पास पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं होता है। चौहान ने कहा कि आज भी सलवा जुडुम केवल कागजों में बंद है। हकीकत यह है कि सरकार डीआरजी के मार्फत वही कर रही है। जबकि आवश्यकता इस बात की है कि वह लोकतांत्रिक तरीके से इस समस्या का हल निकाले ताकि कोई आदिवासी न मारा जाय।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

तामेश्वर सिन्हा

तामेश्वर सिन्हा छत्तीसगढ़ के स्वतंत्र पत्रकार हैं। इन्होंने आदिवासियों के संघर्ष को अपनी पत्रकारिता का केंद्र बनाया है और वे विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रिपोर्टिंग करते हैं

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