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महाराष्ट्र : जातिवार जनगणना को लेकर फड़णवीस ने दिया आश्वासन, उठ रहे सवाल

गत 25 मार्च, 2023 को महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने बिहार की तर्ज पर जातिवार जनगणना कराने का आश्वासन दिया है। इसके लिए उन्होंने अधिकारियों की एक विशेषज्ञ समिति को बिहार भेजने की घोषणा की। उनके इस आश्वासन पर सवाल उठ रहे हैं। पढ़ें, यह खबर

महाराष्ट्र सरकार अपने राज्य में जातिवार गणना कराने की प्रक्रिया को समझने के लिए अपनी एक विशेषज्ञ समिति बिहार भेजेगी। इस आशय की घोषणा महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने गत 25 मार्च, 2023 को विधानसभा में की। उन्होंने यह भी कहा कि समिति की अनुशंसा के बाद सरकार राज्य में जातिवार जनगणना पर विचार करेगी। 

गौरतलब है कि महाराष्ट्र में जातिवार जनगणना कराने का सवाल विधान परिषद में कपिल पाटिल ने 9 मार्च, 2023 को उठाया था। इस तरह उनके द्वारा पूछे गए प्रश्न का जवाब करीब 16 दिनों के बाद राज्य सरकार द्वारा दिया गया।

राज्य सरकार के इस फैसले का स्वागत करते हुए प्रश्नकर्ता कपिल पाटिल ने कहते हैं कि वे इसे सकारात्मक पहल मानते हैं। जो सरकार पहले जातिवार जनगणना के लिए तैयार नहीं थी, वह अब यह कह रही है कि वह टीम भेजेगी तो इसे एक उपलब्धि के रूप में देखा जाना चाहिए। फारवर्ड प्रेस से दूरभाष पर बातचीत में पाटिल ने कहा कि आज नीतीश कुमार जी ने पूरे देश को रास्ता दिखाया है। देश के सभी राज्यों को बिहार जाकर देखना चाहिए कि वहां राज्य अपने बूते जातिवार जनगणना कैसे करा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि जातिवार जनगणना के बगैर वंचितों के लिए कोई भी योजना कारगर नहीं होगी, क्योंकि सरकार के पास ठोस आंकड़े ही नहीं हैं।

देवेंद्र फड़णवीस, उपमुख्यमंत्री, महाराष्ट्र

वहीं इस संबंध में महाराष्ट्र में ओबीसी विमर्शकार प्रो. श्रावण देवरे ने राज्य सरकार को एक पत्र लिखकर उनसे मांग की है कि सरकार इसे चुनावी जुमला न बनाए। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार यदि ईमानदारी से जातिवार जनणगना कराना चाहती है तो उसे यह काम अविलंब करना चाहिए। 

उन्होंने यह मांग भी की है कि कपिल पाटिल को विशेषज्ञ समिति का अध्यक्ष बनाया जाय। वे किसी पार्टी के सदस्य नहीं, बल्कि ओबीसी आंदोलन से निकले हुए नेता हैं।

फारवर्ड प्रेस से बातचीत में प्रो. देवरे ने कहा कि विधान परिषद के सदस्य कपिल पाटिल के सवाल का जबाब देने में सरकार को पूरे 16 दिन लग गए। इससे सरकार की मंशा पर सवालिया निशान लगता है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस व भाजपा ने सत्ता में रहते हुए इसके पहले भी जातिवार जनगणना कराने का आश्वासन लोकसभा में दिया था, लेकिन धरातल पर क्रियान्वित नहीं किया गया। आज भी फड़णवीस द्वारा दिया आश्वासन महज चुनावी जुमला अधिक प्रतीत होता है।

प्रो. देवरे ने आगे बताया कि शिवसेना के 16 विधायकों के निलंबन के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा है और इसकी संभावना अधिक है कि वह एक सप्ताह में अपना फैसला सुनाएगी। जिस तरह की टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान की है, उससे सत्ता पक्ष पेशोपेश में है और उसके सामने सरकार के गिरने का खतरा मंडरा रहा है। प्रो. देवरे ने कहा कि यदि ऐसा हुआ राज्य में मध्यावधि चुनाव होने की स्थिति बन जाएगी और यही वजह है कि फड़णवीस अभी से चुनावी मोड में आ गए हैं और जातिवार जनगणना के सवाल पर केवल जुमले के सहारे ओबीसी का वोट हासिल करना चाहते हैं।

वहीं पूर्व राज्यसभा सदस्य और महाराष्ट्र में ओबीसी आंदोलनकर्ता हरिभाऊ राटौर का कहना है कि राज्य सरकार की मंशा जातिवार जनगणना कराने की ही नहीं है और बिहार विशेषज्ञ समिति भेजने के नाम पर टाइम पास कर रही है। यदि उसकी मंशा होती तो वह सीधे अधिसूचना जारी कर सकती थी। राठौर ने कहा कि यह कोई आज की बात नहीं है जब भाजपा के लोग महाराष्ट्र में ओबीसी के हितों को लेकर असंवेदनशील हैं। मराठा आरक्षण की मांग के समय भी जब ओबीसी के लोगों ने उनसे कहा कि वे मराठाें के लिए आरक्षण को ओबीसी के लिए निर्धारित आरक्षण से अलग रखे, तब भी उसने इसी तरह का टाइमपास किया था।

राष्ट्रीय ओबीसी महासभा के महासचिव सचिन राजुरकर बताते हैं कि इसमें कोई शक नहीं कि राज्य सरकार जातिवार जनगणना कराने की इच्छा नहीं रखती है और यदि वह इस समय इसका नाम भी ले रही है तो इसके पीछे राज्य में ओबीसी आंदोलन है। इस आंदोलन के कारण राज्य सरकार बैकफुट पर आयी है, लेकिन अभी भी उसके मन में चोर है।

(संपादन : अनिल)


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लेखक के बारे में

नवल किशोर कुमार

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस के संपादक (हिन्दी) हैं।

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