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‘एक देश, एक चुनाव’ : लोकतंत्र की हत्या का प्रस्ताव

यदि धन के अपव्यय का मसला होता तो कुछ और बातें मुमकिन थीं, लेकिन प्रधानमंत्री को असली चिंता अपनी राजनीति की हो रही है। इसलिए भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए ज़ारी अपने घोषणा पत्र में चुपके से यह लिख दिया था कि सरकार में आने के बाद वह “लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का तरीक़ा निकालेगी।” बता रहे हैं तेजपाल सिंह ‘तेज’

गत 24 अप्रैल, 2023 को नवभारत टाइम्स में छपे अपने बयाननुमा आलेख में भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री तरुण चुघ ने एक बार फिर ‘एक देश, एक चुनाव’ की बात कही है। वे लिखते हैं कि “भारत में लगभग हर साल चुनावी प्रक्रिया चलती रहती है। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग समय पर विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनाव होते रहते हैं। इनमें लगने वाली आचार संहिता के चलते तकरीबन छह माह विकास कार्य ठप पड़ जाता है।” 

सनद रहे कि 26 नवंबर, 2020 को संविधान दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन में एक देश, एक चुनावकी व्यवस्था और एकल मतदाता सूची लागू करने की बात कही थी।

ध्यातव्य है कि संविधान के अनुच्छेद 83 (2) में लोकसभा का कार्यकाल उसकी पहली बैठक से पांच साल तक के लिए तय है। इसी तरह अनुच्छेद 172 (1) विधानसभाओं को भी पांच साल के कार्यकाल का अधिकार देती है। सामान्य स्थिति में यह कार्यकाल पूरा होना ही चाहिए। असामान्य स्थिति में राष्ट्रपति को किसी विधानसभा का कार्यकाल एक साल तक बढ़ाने का अधिकार है। लेकिन एक साथ चुनाव कराने के मक़सद से विधानसभाओं को समय से पहले भंग करना संविधान का दुरुपयोग ही माना जाएगा। 

खैर, अब तक जो बातें सामने आई हैं, उनके अनुसार एक देश, एक चुनावका सिस्टम भारतीय चुनाव प्रक्रिया को नया स्वरूप दे सकता है। इसके जरिए लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ कराए जाने की संकल्पना है। वैसे भी आजादी के बाद वर्ष 1952, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ-साथ हो चुके हैं। लेकिन इसके बाद यह चक्र बदल गया, क्योंकि कई बार लोकसभा और विधानसभाएं निर्धारित पांच साल से पहले अलग-अलग समय पर भंग होती रहीं 

लोकतंत्र के लिए घातक है ‘एक देश, एक चुनाव’ की सोच

प्रधानमंत्री का यह कोई पहला प्रस्ताव नहीं है। वर्ष 2014 में सत्ता में आने के बाद व अपनी सरकार के दो साल पूरे होते ही, उन्होंने अपनी जिस मुहिम को तेज़ करने करने की कवायद की थी, वह लोकसभा, विधानसभा, नगर निकायों और पंचायतों के चुनाव एक साथ कराने की ही थी। उनका तर्क है कि राजनीतिज्ञों को बार-बार होने वाले चुनावों की उठापटक में ज़्यादा वक़्त देने के बजाय सामाजिक कार्यों पर ध्यान देने के लिए समय मिलेगा और राजनीतिक संस्थानों के चुनाव अलग-अलग कराने पर होने वाले सरकारी खर्च में हज़ारों करोड़ रुपए की बचत भी होगी। 

निस्संदेह यदि धन के अपव्यय का मसला होता तो कुछ और बातें मुमकिन थीं, लेकिन प्रधानमंत्री को असली चिंता अपनी राजनीति की हो रही है। इसलिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए ज़ारी अपने घोषणा पत्र में चुपके से यह लिख दिया था कि सरकार में आने के बाद वह लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का तरीक़ा निकालेगी।

मोदी ने भाजपा की राष्ट्रीय कार्यसमिति की एक बैठक में सभी चुनाव एक साथ कराने की अपनी योजना को पूरी तरह से समझाया और फिर सभी राजनीतिक दलों की एक बैठक में भी इस पर ज़ोर दिया कि बड़े-छोटे सभी चुनावों का एक साथ होना क्यों ज़रूरी है।

असल में इस पूरे विमर्श को 2019 में हुए लोकसभा चुनाव के पहले शुरू करने की कार्ययोजना बनाई गई। तब इसकी वजह भी थी। तमाम नुस्खे आजमाने के बाद भी बिहार और कई अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों में मात खाने के तुरंत बाद दिसंबर 2015 में प्रधानमंत्री मोदी ने एक देश, एक चुनाव’ के मुद्दे को जोर-शोर से उठाना प्रारंभ किया। एक संसदीय समिति का गठन किया गया और उसे लोकसभा व विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की संभावनाओं के बारे में अपनी रपट देने को कहा गया। संसद में प्रस्तुत इस रपट में कहा गया कि अगर भारत को एक मज़बूत लोकतांत्रिक देश के नाते विकास की दौड़ में दुनिया के अन्य देशों से मुक़ाबला करना है तो देश को आए दिन होने वाले चुनावों से निज़ात पानी ही होगी।

समिति के मतानुसार, यदि देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होंगे तो परेशानियों से निजात मिल सकती है। रपट में विस्तार से यह भी बताया गया है कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की स्थिति कैसे लायी जा सकती है और इस बीच किस तरह विधानसभाओं के कार्यकाल को समायोजित किया जाय।

बहरहाल, तरुण चुघ के लेख में तीन फ़ायदों पर ज़ोर दिया गया है। एक, इससे बार-बार चुनाव कराने पर अभी खर्च होने वाले सरकारी धन के व्यय में काफी कमी आएगी; दूसरा, चुनावों के समय लगने वाली आचार संहिता की वज़ह से रुक जाने वाले कामों से होने वाला नुक़सान कम हो जाएगा; और तीसरा, सरकारी अमले के चुनाव के काम में लग जाने की वज़ह से सार्वजनिक सेवा के बाक़ी ज़रूरी कामों पर प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा। 

जाहिर तौर पर, इस प्रस्ताव के पीछे की सत्तासीन राजनीतिक दल की मंशा को सहजता से भांपा जा सकता है। कहना अतिशयोक्ति नहीं कि यदि केंद्र और राज्यों की सरकारों के लिए चुनाव एक साथ होंगे तो मतदाता एक ही राजनीतिक दल के पक्ष में मतदान करना पसंद करता है। यह एक आम अवधारणा है। इसमें कोई रहस्य की बात नहीं। ऐसा होने पर केंद्र और राज्यों में किसी एक ही दल की सरकारें बनने की संभावना को नहीं नकारा जा सकता। ऐसी संभावनाएं लोकतंत्र की परिभाषा को न केवल नकारती हैं, बल्कि लोकतंत्र की हत्या का द्योतक है। 

सारांशत: कहा जा सकता है कि एक देश, एक चुनाव की व्यवस्था देश में अधिनायकवाद को ही जन्म देगी। इसका असर क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व पर पड़ेगा और देश में चौतरफा अराजकता का माहौल कायम होगा। यह हमारे देश में लोकतंत्र उत्तरोत्तर कमजोर करता जाएगा और अंतत: इसके प्राण हर लेगा।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

तेजपाल सिंह तेज

लेखक तेजपाल सिंह तेज (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हैं- दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है आदि ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि, पुश्तैनी पीड़ा आदि ( कविता संग्रह), रुन-झुन, चल मेरे घोड़े आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र) और अन्य। तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता के साहित्य संपादक और चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक रहे हैं। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर इन दिनों अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक का संपादन कर रहे हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित।

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