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मणिपुर : हिंसा थमी, लेकिन जनजातियों में भय बरकरार

इस बार पढ़ें मणिपुर में मचे हिंसक बवाल के बाद की स्थितियों के मद्देनजर न्यायालयों में चल रही सुनवाइयों के बारे में। साथ ही किरेन रिजिजू को केंद्रीय कानून मंत्रालय से बाहर किये जाने व मेघालय में खासी समुदाय में मां का उपनाम रखने संबंधी अनिवार्यता को लेकर बहस भी

आदिवासी न्यूज राऊंड-अप

मणिपुर में हाईकोर्ट द्वारा बहुसंख्यक मैतेयी समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) में शामिल करने की सिफारिश वाले आदेश के बाद जो हिंसा प्रारंभ हुई थी, अब वह थम गई है। लेकिन अभी भी जनजीवन सामान्य नहीं हो सका है। कुकी, नागा समेत राज्य की लगभग सभी जनजातियों में भय व्याप्त है। 

मणिपुर सरकार के अनुसार 45 हजार लोग विस्थापित हो गए हैं, जबकि 71 लोगों की इस हिंसा में मौत हो चुकी है। हिंसा में 230 लोग जख्मी हुए हैं और 1700 घरों को दंगाईयों ने जला दिया है। 

मणिपुर के पुलिस महानिदेशक पी. डुंगेल के अनुसार केंद्र ने संविधान के अनुच्छेद 355 के तहत कानून व्यवस्था अपने हाथ में ले ली है। राज्य के कई इलाकों में केंद्रीय बलों के साथ-साथ सेना की टुकड़ियों ने मोर्चा संभाल लिया है। हालांकि राशन एवं अन्य जरूरी सामान की आपूर्ति सामान्य नहीं हो पाने से लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। 

मणिपुर की राजधानी इंफाल में सेना द्वारा संचालित राहत केंद्र का एक दृश्य

सुप्रीम कोर्ट में हिंसा पर सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट में मणिपुर हाईकोर्ट का मैतेयी समुदाय को एसटी दर्जा देने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका और मणिपुर में हुई भीषण हिंसा को लेकर विशेष जांच दल की मांग वाली याचिका पर 17 मई, 2023 को सुनवाई हुई। वेब पोर्टल लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश की तीखे शब्दों में आलोचना की। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश पर रोक लगाने से इंकार करते हुए मणिपुर हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष मामला पेश करने को कहा। 

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ ने कहा कि “मुझे लगता है कि हमें हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगानी चाहिए। हमने जस्टिस मुरलीधरन को उनकी गलती सुधारने के लिए समय दिया और उन्होंने ऐसा नहीं किया। यह बहुत स्पष्ट है कि यदि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश संवैधानिक पीठों के निर्णयों का पालन नहीं करते हैं, तो हमें क्या करना है।” 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चूंकि एकल न्यायाधीश के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष अपील दायर की गई है, इसलिए पीड़ित पक्ष खंडपीठ के समक्ष अपना मामला पेश कर सकते हैं।

इसपर मणिपुर ट्राइबल फोरम दिल्ली की ओर से वकील कॉलिन गोंजाल्विस ने कुकी जनजातियों में व्याप्त भय को उजागर करते हुए कहा कि “हम हाईकोर्ट के सामने पेश नहीं हो सकते। कुकी समुदाय का वकील हाईकोर्ट के सामने पेश नहीं हो रहा है, क्योंकि गांव एक किमी दूर है, यह बहुत खतरनाक है। कुकी समुदाय के लोगों के लिए जाना संभव नहीं है। न तो पीड़ित जा सकते हैं और ना ही उनके वकील”। इसपर मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने उन्हें वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित होने के निर्देश दिए तथा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को इसके बाबत इंतजाम करने के लिए भी निर्देशित किया। 

ज्ञात हो कि पिछली सुनवाई में भी सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर हाईकोर्ट के फैसले की आलोचना की थी, जिसमें न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा था कि “हाईकोर्ट का फैसला कई संविधान पीठ के फैसलों के विपरीत था। अनुसूचित जनजातियों की सूची को बदलने के लिए न्यायिक आदेश पारित नहीं किए जा सकते, क्योंकि यह राष्ट्रपति की शक्ति है।”

किरेन रिजिजू से छिना कानून मंत्रालय

पूर्वोत्तर के आदिवासी चेहरा के रूप में देखे जाने वाले केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू से केंद्रीय कानून मंत्रालय छिनकर उन्हें पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय दिया गया है। केंद्रीय कानून मंत्रालय की कमान अब अर्जुन राम मेघवाल को सौंपी गई है। इसे लेकर सियासी गलियारे में कई तरह की बातें कही जा रही हैं। मुख्य तौर पर माना यह जा रहा है कि सरकार और न्यायपालिका की लड़ाई को सार्वजनिक मंचों पर लाने के कारण किरेन रिजिजू से कानून मंत्रालय छिना गया। 

हालांकि दो दिन पहले 16 मई, 2023 को अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू के नेतृत्व में कुछ आदिवासी नेताओं की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बैठक हुई थी। अंदरखाने में इस बैठक को भी इससे जोड़ कर देखा जा रहा है।

वहीं, मंत्रालय बदले जाने के बाद किरेन रिजिजू ने ट्वीट कर प्रधानमंत्री मोदी और मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि “प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन में क़ानून मंत्री के रूप में काम करना मेरे लिए सम्मान की बात रही। मैं चीफ़ जस्टिस समेत सुप्रीम कोर्ट के जजों, हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस, निचले कोर्ट के जजों और सभी क़ानून अधिकारियों का भी शुक्रगुज़ार हूं। मैं पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय में भी उसी उत्साह से काम करूंगा, जैसा भाजपा कार्यकर्ता के रूप में करता रहा हूं।”

सनद रहे कि पिछले साल मार्च में किरेन रिजिजू ने कहा था कि भाजपा ने जनजातियों को सम्मान दिया है। उन्होंने कहा था– “मैं खुद जनजातीय समुदाय का हूं और इस देश का कानून मंत्री हूं। यह अपने आप में बहुत बड़ा संदेश है।” उन्होंने कहा था कि “पूर्वोत्तर क्षेत्र के लोगों के साथ भेदभाव के मामले आते थे। जब मैं गृह राज्य मंत्री था तब दिल्ली पुलिस में पूर्वोत्तर राज्य के एक हजार लोगों की भर्ती की गई। दिल्ली पुलिस में एक नई कमांडो टीम ‘स्वाट’ बनाई गई, जिसमें पूर्वोत्तर की महिलाओं को शामिल किया गया। ये कदम प्रतीकात्मक ही सही, लेकिन बहुत महत्वपूर्ण हैं।” 

मेघालय : मां के उपनाम अपनाने वालों को ही मिलेगा एसटी सर्टिफिकेट

खासी हिल्स स्वायत्त जिला परिषद (केएचएडीसी) द्वारा अपने पति या पिता के उपनाम को अपनाने वाले लोगों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का सर्टिफिकेट नहीं देने के आदेश के बाद मेघालय में बहस छिड़ गया है। पुरुषों के अधिकार संबंधी संगठन एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस आदेश की निंदा की है।

द हिंदू में प्रकाशित रपट के अनुसार इस आदेश पर मेघालय में विपक्षी पार्टी ‘द वायस ऑफ द पीपल पार्टी’ (वीपीपी) के अध्यक्ष एवं नोंगक्रेम से विधायक अर्देंट मिलर बसाइवमोइत ने नाराजगी जताई और कहा कि “यदि मेरे बच्चों से खासी कहलाने का अधिकार छीना जाएगा तो मैं उनके लिए लड़ूंगा। मेरे बच्चे मेरे उपनाम का प्रयोग करते हैं। जब मेरी पत्नी और मैं खासी हैं तो मेरे बच्चों को खासी क्यों नहीं माना जाएगा।”

वहीं केएचएडीसी के मुख्य कार्यकारी सदस्य टिटोस्टारवेल चाइन ने द मेघालयन को बताया कि यह आदेश खासी समाज के मातृसत्तात्मक रीति-रिवाजों को संरक्षित करने के लिए दिया गया था और स्थानीय कानूनों के अनुरूप था। जब मैंने कहा कि खासी समुदाय के लोग पिता का उपनाम नहीं ले सकते तो यह मेरा किसी पर व्यक्तिगत हमला नहीं था। लेकिन ऐसा लगता है कि वह (बसाइवमोइत) मेरा व्यक्तिगत रूप से मेरी आलोचना कर रहे हैं।”

टिटोस्टारवेल चाइन ने कहा कि “खासी हिल्स ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट खासी सोशल कस्टम ऑफ लाइनेज एक्ट, 1997 की धारा 3 और धारा 12 में कहा गया है कि केवल अपनी मां के उपनाम का उपयोग करने वालों को ही खासी के रूप में पहचाना जाएगा।” 

उन्होंने कहा कि यह आदेश खासी समुदाय की सदियों पुरानी परंपरा के संरक्षण एवं सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध था। चाइन ने यह भी कहा कि यदि कोई खासी महिला किसी गैर-खासी पुरुष से शादी करती है तो अपने बच्चों के खासी एसटी सर्टिफिकेट के लिए उसे पहले खुद खासी एसटी सर्टिफिकेट पाने के लिए पंजीकरण प्राधिकरण के समक्ष आवेदन करना होगा। 

ज्ञात हो कि खासी समुदाय, जिनकी संख्या लगभग 1.39 लाख है, मेघालय राज्य के तीन मातृसत्तात्मक आदिवासी समुदायों में से एक है। अन्य दो समुदायों का नाम गारो और जयंतिया है। मेघालय में 1960 के दशक से पुरुषों के अधिकार संबंधी संगठन एवं कार्यकर्ता मातृसत्तात्मक से पितृसत्तात्मक व्यवस्था में परिवर्तन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। 

झारखंड के प्रसिद्ध शिक्षाविद् डॉ. करमा उरांव का निधन

आदिवासी अधिकारों के लिए हमेशा मुखर रहे रांची विश्वविद्यालय के समाज विज्ञान विभाग के पूर्व डीन एवं प्रसिद्ध मानवशास्त्री डॉ. करमा उरांव का 14 मई, 2023 को 72 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वह पिछले कुछ महीनों से बीमार चल रहे थे। 

डॉ. उरांव सरना धर्म कोड सहित झारखंड के कई मुद्दों पर अपना पक्ष मजबूती के रखते थे। वह रांची विश्वविद्यालय में मानवशास्त्र के पूर्व विभागाध्यक्ष और अविभाजित बिहार में लोक सेवा आयोग के सदस्य भी रह चुके थे। उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं थी और देश-विदेश का दौरा भी किया था।

उनके निधन पर झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने ट्वीट कर शोक व्यक्त किया। सोरेन ने ट्वीट किया कि “महान शिक्षाविद तथा आदिवासी उत्थान के प्रति हमेशा सजग रहने और चिंतन करने वाले डॉ. करमा उरांव जी के निधन का दुःखद समाचार मिला। डॉ. करमा उरांव जी से कई विषयों पर मार्गदर्शन मिलता था। उनके निधन से आज मुझे व्यक्तिगत क्षति हुई है।” 

झारखंड के पहले मुख्यमंत्री और भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी ने भी शोक जताया और ट्वीट किया कि “आदिवासी संस्कृति व समाज के उत्थान के लिए जीवनपर्यंत समर्पित रहे, प्रख्यात मानवशास्त्री व शिक्षाविद डॉक्टर करमा उरांव जी के निधन की दुःखद सूचना प्राप्त हुई। भाषा, संस्कृति और समाज के लिए उनके उल्लेखनीय कार्य सदैव लोगों को प्रेरित करती रहेगी।”

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

राजन कुमार

राजन कुमार फारवर्ड प्रेस के उप-संपादक (हिंदी) हैं

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