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अरुणाचल के चकमा व हाजोंग आदिवासी कर रहे पूर्ण भारतीय नागरिकता की मांग

बहुजन साप्ताहिकी के तहत इस बार पढ़ें छत्तीसगढ़ में सर्व आदिवासी समाज द्वारा चुनाव लड़ने की घोषणा, मध्य प्रदेश में जयस की दसवीं वर्षगांठ और अरुणाचल प्रदेश में चकमा और हाजोंग समुदाय से जुड़ी खबर

बहुजन साप्ताहिकी

लंबे समय से अपने नागरिकता और पहचान को लेकर संघर्षरत अरुणाचल प्रदेश के चकमा और हाजोंग समुदाय ने गत 9 मई, 2023 को एक घोषणा की। इसमें कहा गया है कि अरुणाचल प्रदेश और केंद्र सरकारों के साथ तब तक कोई बातचीत नहीं की जा सकती जब तक कि मुख्यमंत्री पेमा खांडू यह स्पष्ट नहीं करते हैं कि चकमा-हाजोंग मुद्दे का समाधान सर्वोच्च न्यायालय के 1996 के फैसले के पूर्ण अनुपालन से राज्य के भीतर ही मिल जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार, उन्हें भारत के नागरिक के रूप में पूर्ण अधिकार प्रदान किया जाना है। 

विदित है कि चकमा समुदाय में अधिकांश बौद्ध धर्मावलंबी हैं, जो 1960 के दशक में अरुणाचल प्रदेश आ गए थे, जब चिटगांग (पूर्व में पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा, वर्तमान में बांग्लादेश), जहां वे पहले रहते थे, लेकिन बांध परियोजना के कारण विस्थापित हुए। 

वहीं हाजोंग समुदाय हिंदू धर्मावलंबी है। इनका रहवास भी पूर्वी पाकिस्तान था। लेकिन तथाकथित धार्मिक प्रताड़ना के दौरान 1960 के दशक में ही अरुणचल प्रदेश की तरफ आ गए थे। 

अपने अधिकारों की मांग करते चकमा और हाजोंग समुदाय के सदस्य (फाइल फोटो, 2022)

बताते चलें कि वर्ष 1996 में दिये अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि “राज्य के भीतर रहने वाले चकमा समुदाय के प्रत्येक व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा की जाएगी”। जबकि वर्ष 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य को चकमा और हाजोंग लोगों को नागरिकता देने का निर्देश दिया था, लेकिन इसे अभी तक पूर्णतः लागू नहीं किया गया है।

छत्तीसगढ़ : सर्व आदिवासी समाज लड़ेगा चुनाव

छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में प्रभाव रखने वाला ‘सर्व आदिवासी समाज’ संगठन द्वारा राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारने की घोषणा की गई है। इसके अध्यक्ष अरविंद नेताम ने गत 10 मई, 2023 को रायपुर में एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि इस वर्ष के अंत तक होने वाले विधानसभा चुनाव में सर्व आदिवासी समाज अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सभी 29 विधानसभा सीटों और उन 15 से 20 सामान्य सीटों पर उम्मीदवार उतारेगा, जहां 30 से 40 प्रतिशत आदिवासी मतदाता रहते हैं। 

अरविंद नेताम ने आगे कहा कि आदिवासी समाज के हितों की रक्षा करने में राज्य और केंद्र सरकार पूरी तरह विफल है। समाज के जंगल, जमीन को छीनकर कार्पोरेट को सौंपा जा रहा है। संविधान और कानून से मिले अधिकारों को खत्म किया जा रहा है। बस्तर में लगातार निर्दोष आदिवासी मारे जा रहे हैं। इसलिए आदिवासी समाज ने तय किया है कि अन्याय के खिलाफ लड़ाई सिर्फ सामाजिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भी होगी और समाज के प्रतिनिधि विधानसभा चुनाव में खड़े होंगे। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज को अब भाजपा और कांग्रेस पार्टी पर भरोसा नही रहा। उन्होंने कांग्रेस और भाजपा पर वार करते हुए कहा कि इन पार्टियाें ने हसदेव और सिलगेर जैसे आंदोलनों पर बेशर्म चुप्पी साध रखी है।

संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते अरविंद नेताम

विदित हो कि सर्व आदिवासी समाज ने वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का साथ दिया था। वर्ष 2018 में कांग्रेस ने आदिवासियों के लिए आरक्षित 29 विधानसभा सीटों में से 25 पर जीत हासिल किया, जो वर्ष 2019 में दंतेवाड़ा और मरवाही उपचुनाव के बाद बढ़कर 27 हो गई थी। इसके अलावा कांग्रेस के 2 आदिवासी विधायक सामान्य सीटों से निर्वाचित हुए थे। वहीं वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में सर्व आदिवासी समाज ने भाजपा का साथ दिया, जिसका प्रत्यक्ष फायदा भाजपा को मिला। इस चुनाव में भाजपा को राज्य की 11 लोकसभा सीटों में से 9 सीटों पर जीत हासिल हुई। आदिवासियों के लिए आरक्षित 4 लोकसभा सीटों में से 3 भाजपा को मिली। जबकि चौथे सीट पर भाजपा प्रत्याशी को मात्र 39 हजार वोटों से हार का सामना करना पड़ा।  

बहरहाल, सर्व आदिवासी समाज के पास बड़ी चुनौती यह है कि उसके पास कोई चेहरा नहीं है। ऐसे में आदिवासी समाज के बीच लोकप्रियता के बावजूद उसके लिए राहें आसान नहीं होंगी। हालांकि सर्व आदिवासी समाज की इस घोषणा का असर राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस और विपक्षी पार्टी भाजपा पर जरूर पड़ेगा। 

इंदौर और भोपाल में जयस मनाएगा अपनी दसवीं वर्षगांठ, एकजुटता पर उठ रहा सवाल

मध्य प्रदेश में जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) काे तीसरे मोर्चे के तौर पर देखा जाता है। स्थापना के 10 वर्ष पूरे होने पर जयस के द्वारा इंदौर और भोपाल में बड़ा आयोजन करने की घोषणा की गई है। सियासी गलियारे में जयस का यह आयोजन एक जगह न होकर, इंदौर और भोपाल में किये जाने की घोषणा से इसकी एकजुटता पर सवाल खड़े होने लगे हैं। 

बताते चलें कि अनेक सालों के आपसी गतिरोध और खींचतान के बाद गत 29 अप्रैल, 2023 को जयस के सभी गुटों की बेठक हुई थी। इस बैठक के बाद एकजुटता का दावा किया गया था। 

हालांकि जयस के राष्ट्रीय संरक्षक एवं विधायक डॉ. हिरालाल अलावा का कहना है कि “जयस एकजुट है, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन जयस के अधिकतर युवा कार्यकर्ताओं की मांग थी कि जयस के स्थापना दिवस का कार्यक्रम इंदौर में भी आयोजित हो, क्योंकि भोपाल दूर पड़ जाता है। इसलिए जयस कार्यकर्ताओं की मांग पर इंदौर में भी कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है।

वहीं जयस के संस्थापक सदस्य रहे विक्रम अछालिया ने कहा कि “संगठन के सभी पदाधिकारियों की सहमति पर ही भोपाल में स्थापना दिवस का कार्यक्रम आयोजित हो रहा है। जयस हमेशा से एकजुट था, और आगे भी एकजुट रहेगा। सिर्फ कुछ राजनीतिक पार्टियां जयस को लेकर अफवाह फैला रही हैं।”

पालमपुर के संभावना संस्थान में सामाजिक न्याय पर कार्यशाला

हिमाचल प्रदेश के पालमपुर के नजदीक कंडबाड़ी में स्थित संभावना संस्थान के तत्वावधान में आगामी 16 जून, 2023 से 20 जून, 2023 तक सामाजिक न्याय और जाति के विनाश की व्यवहारिकता के आधार पर कार्यशाला का आयोजन किया जाएगा। कार्यशाला का विषय है– ‘वज्रसूची : सामाजिक न्याय पर कार्यशाला, आओ जाति को समझें।’ इस कार्यशाला के मुख्य प्रबोधक सामाजिक कार्यकर्ता व लेखक भंवर मेघवंशी तथा कवि व लेखक मोहन मुक्त होंगे।

संस्थान द्वारा जारी विज्ञप्ति में कहा गया है कि कार्यशाला का उद्देश्य सामजिक न्याय की स्थापना की दिशा में कार्य करने वाले या कार्य करने की इच्छा रखने वाले लोगों की समझ को गहन करना है। इस कार्यशाला में जाति व जाति जनित भेदभावों, वंचनाओं, दृष्टिकोणों, शोषण और अन्यायों के बारे में चर्चा की जाएगी, साथ ही जाति के उद्भव, उसके क्रमिक विकास, जाति आधारित निषेधों, जाति पंचायतों, जातिगत भेदभावों के इतिहास और जाति उन्मूलन की संभावनाओं पर भी विचार किया जाएगा। 

कार्यशाला के विषय को 3 भागों में विभाजित किया गया है– 1. इतिहास, 2. सैद्धांतिक समझ तथा अनुभव आधारित समझदारी तथा 3. जाति विनाश की व्यवहारिकता। इसमें छुआछूत व भेदभाव में धर्मशास्त्रों की भूमिका, सांप्रदायिक संगठन और जाति व्यवस्था तथा जातिवाद को ख़त्म करने के संबंध में सामने आने वाली चुनौतियां तथा जाति व्यवस्था का भारत में भविष्य आदि प्रश्नों को गहराई से देखा जाएगा। 

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

राजन कुमार

राजन कुमार फारवर्ड प्रेस के उप-संपादक (हिंदी) हैं

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