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दलित कवयित्री नीलम की प्रेमाभिव्यक्ति और स्त्री-मुक्ति की कामनाएं

डॉ. नीलम की ‘सबसे बुरी लड़की’ स्त्री-मुक्ति की प्रतीक है, वह उन तमाम बंधनों से मुक्त है, जो उसके स्वतंत्र विकास को अवरुद्ध करते हैं। वह बेटी और बेटे में भेदभाव वाले समाज की नहीं, बल्कि समतामूलक समाज के निर्माण की पक्षधर है। बता रहे हैं कंवल भारती

साहित्य और आलोचना में धर्म, जाति और लिंग का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। इसका कारण साहित्यकार और आलोचक उन अनुभूतियों से अपनी सोच बनाता है, जो उसे उसके सामाजिक परिवेश से मिलती हैं। किसी भी लेखक का जैसा सामाजिक परिवेश होता है, वैसे ही उसके संस्कार, उसकी मान्यताएं और अनुभूतियां होती हैं। लिंग का प्रभाव भी परिवेशगत होता है, जो पुरुष और स्त्री के मानस में अलग-अलग अनुभूतियों का निर्माण करता है। यही कारण है कि निराला और महादेवी की काव्य-चेतना समान नहीं है। दोनों के परिवेश अलग-अलग हैं, इसलिए दोनों की सोच और अनुभूति में भी गहरा अंतर है।

इसी तरह सवर्ण और दलित स्त्री के परिवेश भी समान नहीं हैं। इसलिए सवर्ण और दलित कवयित्रियों की काव्य-चेतना भी अलग-अलग अनुभूतियों से बनती है। इसे दलित कवयित्री रजनी तिलक ने अपनी कविता ‘औरत-औरत में अंतर है’ में बहुत अच्छे से स्पष्ट किया है। यथा–

औरत औरत होने में
जुदा-जुदा फर्क नहीं क्या?
एक सताई जाती है स्त्री होने के कारण
दूसरी सताई जाती है दलित होने पर।
एक तड़पती है सम्मान के लिए
दूसरी तिरस्कृत है भूख और अपमान से।
एक पायलट है
तो दूसरी शिक्षा से वंचित है
एक सत्तासीन है
दूसरी निर्वस्त्र घुमाई जाती है।[1]

निस्संदेह दलित-स्त्री का दर्द दोहरा है; एक स्त्री होने का और दूसरा दलित होने का। इसलिए दलित कवयित्रियों के काव्य में हमें उनके जीवन का दोहरा अभिशाप मिलता है। इसी ज़मीन पर हम यहां दलित कवयित्री डॉ. नीलम की कविताओं का मूल्यांकन करेंगे। उनका पहला कविता संग्रह ‘सबसे बुरी लड़की’ नाम से 2020 में प्रकाशित हुआ, जिसे उन्होंने उन स्त्रियों को समर्पित किया है, जिनकी कलम को हमेशा दरकिनार करने का प्रयास किया गया। इस संग्रह की पहली कविता ‘मेंहदी’ है, जिसमें उन्होंने स्त्री के जन्म की त्रासदी को चित्रित करने में मेंहदी के रूपक का प्रयोग किया है। यथा–

मेंहदी हूं, डाल से तोड़ ली जाती हूं
अपने को मिटाकर तेरे जीवन में
उत्साह-उमंग भरती हूं मैं
तेरे जुल्मों को चुप रहकर सहती हूं मैं।
लेकिन फिर भी तेरे जीवन में रंग भरती हूं मैं।[2]

यह किसी भी स्त्री का दर्द हो सकता है। जिस तरह पौध को उखाड़कर दूसरी जगह जमाया जाता है, उसी तरह लड़की को भी अपनी जड़ों से उखड़कर अन्यत्र निर्वासित होना पड़ता है। यह उसकी नियति भी है और त्रासदी भी। निर्वासन एक ऐसा शब्द है, जिसमें नियंत्रण, सीमाएं और प्रतिबंध सहज रूप से जुड़े होते हैं। इस तरह हम कह सकते हैं कि पितृसत्ता में स्त्री को गढ़ा जाता है, उसका स्वाभाविक विकास नहीं होता। लेकिन आधुनिक शिक्षा ने स्त्री-मुक्ति और स्वाधीनता की जो चेतना पैदा की, उसने न सिर्फ पितृसत्ता को चुनौती दी, बल्कि, नियंत्रण, सीमा और प्रतिबंध को नकारने का भी साहस किया। इस जागरूक स्त्री ने पितृसत्ता द्वारा निर्मित सीता और सावित्री की मर्यादित छवि को तोड़ने में कोई संकोच नहीं किया। डॉ. नीलम ने ‘प्रतिबंध’ कविता में इस स्वाधीनता को पूरी बेबाकी से अभिव्यक्त किया है। यथा—

जितना लगाओगे प्रतिबंध
बनके दबंग चढ़ जायेंगे
दहाड़ेंगे सिंहनी के समान
बादल बनकर गरजेंगे
बिजली बनकर टूटेंगे
कर जायेंगे लहुलुहान।
नहीं हैं हम सतयुग के सीता-सावित्री,
हैं हम आज की नारी।[3]

जो लड़की या स्त्री सीता-सावित्री की मर्यादित छवि को तोड़ती है, उसे पितृसत्ता सबसे बुरी लड़की या सबसे बुरी स्त्री के रूप में देखती है। यह सबसे बुरी लड़की उच्छशृंखल या आवारा समझी जाती है, क्योंकि वह अपनी स्वाधीनता और अपने अधिकारों के प्रति सजग रहती है। डॉ. नीलम ने इस ‘सबसे बुरी लड़की’ को अपनी कविता में कुछ इस तरह उकेरा है–

मैं बहुत बुरी लड़की हूं, क्योंकि मैं हंसती हूं
सभ्य लडकियां हंसती नहीं
उनकी आंखों में होती है हया और शर्म
मेरी आंखों की शर्म और हया मर गई है
क्योंकि मैं खुलकर हंसती हूं।

पितृसत्ता में अच्छी लड़की कौन है? इसका भी चित्रण कवयित्री ने किया है। यथा–

इस देश की सबसे अच्छी लड़कियां
न सोचती हैं
न खुलकर बोलती हैं
न ख्वाब देखती हैं
न करती हैं समानता की बातें,
क्योंकि वे इस देश की
सबसे अच्छी लड़कियां हैं
जो उछलने नहीं देतीं
बाप की पगड़ी।[4]

इस ज़मीन पर डॉ. शांति यादव की मशहूर कविता है ‘बाप की टोपी’, जिसमें वह कहती हैं–

बाप की टोपी कपड़े की नहीं होती है
बेटी के जिस्म की बनी होती है
जहां-जहां बेटी जाती है
बाप की टोपी साथ जाती है।
रखती हैं बेटियां टोपी की लाज
पहनते हैं बेटे टोपी का ताज।[5]

लेकिन डॉ. नीलम की ‘सबसे बुरी लड़की’ स्त्री-मुक्ति की प्रतीक है, वह उन तमाम बंधनों से मुक्त है, जो उसके स्वतंत्र विकास को अवरुद्ध करते हैं। वह बेटी और बेटे में भेदभाव वाले समाज की नहीं, बल्कि समतामूलक समाज के निर्माण की पक्षधर है। यथा–

लेकिन मैं तो परे हूं इससे
क्योंकि मैं हंसती हूं खुलकर
बोलती हूं बेबाक
ख़्वाबों के भरती हूं उड़ान
सजग अपने अधिकारों से
रचती हूं एक नया समतामूलक संसार।[6]

कवयित्री डॉ. नीलम व उनका काव्य संग्रह ‘सबसे बुरी लड़की’

ये मुक्तिकामी लड़कियां परिधान और शृंगार के नाम पर भी बंधनों की प्रतीक चीजों का उपहार नहीं चाहतीं, बल्कि ‘मुक्त उड़ान’ चाहती हैं। ‘हमें उपहार नहीं चाहिए’ कविता में नीलम कहती हैं–

हमें उपहार नहीं चाहिए
साड़ी और फ्रॉक नहीं चाहिए
हमें एक लंबी उड़ान चाहिए
गुड़िया और बार्बी डॉल ले लो
दे दो कार और हवाई जहाज हमको।

वह आगे कहती हैं–

ले लो मेरी चूड़ी-बिंदिया
दे दो अपने रीति-रिवाज हमको
तीज और करवा-चौथ ले लो
ले लो अपने सारे जेवर कपड़े
दे दो तुम अपनी आज़ादी हमको
दे दो कलम और ऑफिस की फ़ाइल हमको
न चाहिए सदा सौभाग्यवती का वरदान
दे दो खुला आसमान  हमको
खुले आसमान की उड़ान चाहिए।[7]

डॉ. नीलम की मुक्त स्त्री अब मनु-युग में नहीं लौटने वाली। वह मनु की व्यवस्था के विरुद्ध पूरे साहस के साथ खड़ी हो गई है। वह ‘ओ मनु के वंशज’ को संबोधित कविता में कहती हैं–

ओ मनु के वंशज
तुम जितना काटोगे, हम उतना बढ़ते जायेंगे
तुम जितना तोड़ोगे, हम उतना जुड़ते जायेंगे
तुम जितना रोकोगे, हम उतना कदम बढ़ाएंगे
अब रोक न सकोगे हमें
हम घास की तरह फैलते जायेंगे।[8]

लड़कियों को घास की उपमा संभवत: पहली बार उर्दू की शाइरा किश्वर नाहीद ने दी थी, जिन्होंने अपनी एक नज़म में कहा था– “घास भी मुझ-जैसी है/ जरा सर उठाने के काबिल हो/ तो कांटे वाली मशीन/ इसे मखमल बनाने का सौदा लिए/ हमवार करती रहती है।” लेकिन नीलम की स्त्री हमवार होने के विरुद्ध मशीन के सौदा (पागलपन) से दो-दो हाथ करने को तैयार है।

लेकिन डॉ. नीलम अपनी कविता ‘अपनी खुशी न सही, तेरा गम ही सही’ में प्रेम के कारण ही सही, अपनी ही स्त्री-चेतना पर पानी फेर देती हैं। यथा–

अपनी खुशी न सही
तेरा गम ही सही,
तेरा अपनापन न सही
तेरा बेगानापन ही सही,
तेरे मीठे बोल न सही
तेरी गाली ही सही
तेरी अच्छाई-बुराई सब
सही सही सही।[9]

अवश्य ही इस कविता में प्रेम को स्त्री-चेतना से भी ऊपर रखा गया है। पर, क्या प्रेम में गाली, उपेक्षा और तिरस्कार को भी स्त्री-मुक्ति’ में ‘सही, सही, और सही कहा जा सकता है? हालांकि कवयित्री अगली ही कविता ‘तुम्हारी चालाकियां’[10] में पुरुष को बराबर धोखा देने वाले प्राणी के रूप में देखती है, यह भी सम्यक आकलन नहीं है, पर वह ऐसे समाज का सपना भी देखती है, जब स्त्री के साथ कोई भेदभाव नहीं करेगा, और सारी स्त्रियां मिलकर खुले आसमान में उड़ेंगी यथा, ‘सब होंगे बराबर’ कविता में कवयित्री कहती है–

आज मैं उड़ूंगी खुले आसमान में
जहां न कोई बंदिश होगी
न कोई कसेगा फब्तियां
बिना रोक-टोक विचरूंगी।
जहां न कोई भेद होगा
औरत और मर्द का।
सब होंगे बराबर
मिलकर हम उड़ेंगे खुले आसमान में।[11]

लेकिन यह बराबरी अभी आई नहीं है, और यह स्वयं नहीं आएगी, बल्कि इसको लाने के लिए प्रयास करना होगा। यह बराबरी तब आएगी, जब सब मिलकर नई धरा का निर्माण  करेंगे, नई राह बनाएंगे। इसलिए कवयित्री कहती है ‘उठो, संघर्ष करो।‘ यथा–

उठो, संघर्ष करो
हम मरे नहीं हैं, हम जिंदा हैं
मुर्दों की बस्ती में भी जान फूंक दें हम
नदियों की धारा को भी नया मोड़ दें हम
नई धरा का निर्माण करें हम।
दुनिया तो हमें डराएगी
लेकिन बिना डरे हम, बिना रुके हम
मिलकर नई राह बनाएंगे।[12]

संघर्ष सिर्फ स्त्री-चेतना की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र कायम करने के लिए भी आवश्यक है। अन्यथा, स्त्रियों और दलितों की मुक्ति का दमनकारी रामराज्य कायम करने का कोई भी अवसर ब्राह्मणवादी ताकतें नहीं छोड़ने वाली हैं। रामराज्य वह ब्राह्मणवादी राजतंत्र है, जो स्त्री-शूद्र की स्वाधीनता का शत्रु है, और सामाजिक न्याय का विरोधी। इसलिए कवयित्री ‘रामराज्य’ कविता में आह्वान करती है–

आओ मिलकर लड़ें सामाजिक न्याय के लिए
आज उसकी बारी, कल हमारी बारी
एक-एक कर काट दिए जाओगे
मार दिए जाओगे
क्योंकि आया है आज फिर राजतंत्र
लोकतंत्र की बलि चढ़ाकर
रामराज्य के नाम पर करते हैं ये मनमानी
खून बहाते वे पानी जैसा
औरत को अब भी ये न समझें इंसान
दलितों का करते ये संहार
अब फिर आया रामराज्य।[13]

रामराज्य बनाम ब्राह्मण-राज्य कभी भी लोकतंत्र को पसंद नहीं करता। इसका कारण है कि लोकतंत्र सामाजिक न्याय का पक्षधर है और धर्म, जाति, लिंग और भाषा के आधार पर किसी के साथ भेदभाव करने का समर्थन नहीं करता। हमारा संविधान दलितों तथा सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए शिक्षा तथा नौकरियों में आरक्षण प्रदान करता है, जिन्हें हजारों साल से ब्राह्मणी व्यवस्था ने शिक्षा और विकास से वंचित रखा है। रामराज्य के समर्थक आरक्षण का विरोध करते हैं, क्योंकि वे वंचित जातियों को वंचित ही रखना चाहते हैं, ताकि शासन-प्रशासन में उनका वर्चस्व कायम रख सके। लेकिन वंचित जातियों के लिए आरक्षण एक बहुत बड़ी सुविधा है, जिसे ब्राह्मण शासक वर्ग खत्म करने के लिए सदैव तत्पर रहता है। इसी भावबोध पर डॉ. नीलम की कविता ‘सबको सामान्य बना दो’ विचारणीय है। यह कविता इस तरह से अपनी बात रखती है–

हटा दो हटा दो, आरक्षण हटा दो
लेकिन सबसे पहले सबको सामान्य बना दो।
पुजारी को दरबान बना दो
अछूतों को मठ में बिठा दो
पुरुषों को दे दो बावर्चीखाना
औरतों को सुल्तान बना दो।
ज़मींदारों को मजदूर बना दो
मजदूरों को ज़मींदार बना दो।
सारे प्राइवेट स्कूल हटा दो
सबको दे दो समान शिक्षा
दलितों को ब्राह्मण बना दो
ब्राह्मण को दलित बना दो।
एक नया संसार बना दो
तब जाकर आरक्षण हटा दो।[14]

आरक्षण जैसे गंभीर विषय पर यह कविता सतही चिंतन करती है, जिसमें सामाजिक न्याय के सिद्धांत पर भी विचार नहीं किया गया है। ब्राह्मण को दलित बनाने और दलित को ब्राह्मण बनाने की बात कहकर डॉ. नीलम वर्णव्यवस्था का ही समर्थन कर रही हैं। मानव-विभाजन का खंडन करने के बजाए, आरक्षण के लिए उसका मंडन करना, सामाजिक न्याय का पाठ कैसे हो सकता है? इसी तरह अगर पुजारी को दरबान बना दिया गया, तो उससे अछूतों की समस्या कैसे हल हो सकती है? अछूतों को मंदिर का पुजारी बनाने से भी ब्राह्मणवाद कैसे खत्म हो जाएगा? उसका तो विस्तार ही होगा। एक तरफ वह कह रही है कि ‘नया संसार’ बना दो, और दूसरी तरफ उस नए संसार में ब्राह्मण, ज़मींदार और दलित को बनाए रखने पर भी जोर दे रही है। यह विरोधाभास क्यों? पुरुषों को बावर्चीखाना देने और स्त्रियों को सुल्तान बनाने का विचार भी इस गलत सोच पर आधारित है कि बावर्चीखाना सिर्फ स्त्रियों के लिए आरक्षित है। जहां तक सुल्तान के पद का प्रश्न है, उसका लोकतंत्र में क्या अर्थ है?

दरअसल, आरक्षण का अधिकार वंचित जातियों के प्रतिनिधित्व का अधिकार है। इस कविता में इस सोच की उपेक्षा अखरती है।

‘सबसे बुरी लड़की’ कविता-संग्रह में दलित-चेतना की अधिकांश कविताएं ऐसी हैं, जो पुरानी ज़मीन को तोड़ती तो नहीं हैं, पर कोई नई ज़मीन भी नहीं बनाती हैं। ऐसी कविताएं इस तानेबाने में काफी हद तक पहले भी लिखी जा चुकी हैं। इनमें ‘मेरे देश की संसद फिर रोई’, ‘हांडी’, ‘मां’, ‘झूठा रंग’, ‘जिंदा गोश्त’, ‘दोमुंहे सांप’, ‘मुखौटा’, ‘नियति’, ‘मेरा जीवन’, ‘मां आने दो’, ‘दहेज के लोभी’, ‘आरक्षण’, ‘नीला परचम’, ‘आया राजतंत्र’, ‘त्यौहारी’, ‘मकड़जाल’, ‘मानवता’ आदि कविताएं शामिल हैं। असल में दलित कविता की, और दलित विमर्श की भी, जिन प्रतिमानों से पहचान बनती है, वे प्रतिमान इन कविताओं में नहीं हैं। हालांकि, भाव के लिहाज से भी कुछ कविताएं इतिहास की ही गलत व्याख्या करती हैं, जैसे ‘हांडी’, और कुछ कविताएं ऐसी हैं, जो अपनी अवधारणा में ही स्पष्ट नहीं हैं, जैसे ‘वैकेंसी’, ‘मानवता’, ‘लड़कियां’। लेकिन ‘प्रहार’, ‘दमकेगा वैभव मेरा’, ‘बेबस योनि–तीन’, ‘मैं कोई कवि नहीं’ कविताओं पर चर्चा जरूरी है। ‘प्रहार’ को पढ़ते हुए सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता ‘वह तोड़ती पत्थर’ स्मृति में आ जाती है, जिसमें एक मजदूर स्त्री इलाहाबाद के पथ पर पत्थर तोड़ती हुई कवि को देखती है ‘उस दृष्टि से/ जो मार खा रोई नहीं।‘[15] ‘प्रहार’ में भी एक ‘हाड़-मांस में लिपटी/ एक दुबली-सी लड़की’ चट्टान तोड़ रही है, जो कवयित्री को बार-बार देख रही है–

देखती बार-बार मुझे
एक बार देखा उसने इस नज़र से
हो गई मैं विचलित
उसकी आंखों में धधक रही थी एक ज्वाला
लगता था कर देगी प्रहार इन आंखों से।[16]

डॉ. नीलम ने जो बिंब रचा है, उसमें मजदूर लड़की की आंखों में आक्रोश है, जो शिक्षित महिलाओं से प्रश्न करता है कि यह कैसा विकास है, जिसमें उसकी नियति चट्टान तोड़ने के रूप में है? उस आक्रोश से कवयित्री का विचलित होना संवेदना के स्तर पर गहरी अनुभूति का कारण है। इस तरह की संवेदना निराला की कविता में नहीं है।

‘दमकेगा वैभव मेरा’ कविता में कवयित्री ने शिक्षित दलित परिवारों में दहेज की बढ़ती घातक प्रवृत्ति पर व्यंग्य किया है। यह कविता दलित लड़कों की उस मानसिकता को  उजागर करती है, जो आईएएस बनने के बाद समाज के उत्थान को नहीं, बल्कि शादी में करोड़ों रुपए का दान-दहेज लेने को अपना लक्ष्य बनाते हैं। इस कविता में सिविल सेवा में आने वाला लड़का कहता है–

लो बन गया मैं आईएएस
जितना पढ़ा, जितना लगाया
आज उतना वसूलूंगा
लो मैं बन गया आईएएस
खड़ा हूं बाज़ार में
लगा लो बोली
बिकने को मैं तैयार।
ऐ मां, बक्सा-अलमारी खाली कर,
घर दान-दहेज से अब भर उठेगा
दमकेगा वैभव मेरा।[17]

‘बेबस स्त्री योनि’ शीर्षक से कवयित्री ने तीन कविताएं लिखी हैं, जिनमें तीसरी कविता के केंद्र में स्त्री-स्वाधीनता का वह आंदोलन है, जो स्त्री-देह पर स्त्री के अधिकार के लिए हुआ था। सीमोन द बोउवार ने ‘सेकेंड सेक्स’ की भूमिका में लिखा है, “महत्वपूर्ण बात यह है कि सर्वहारा हमेशा से नहीं था, जबकि स्त्री हमेशा से सर्वहारा रही है। स्त्रियों को वही मिला, जो पुरुष ने इच्छा से देना चाहा। इस स्थिति में पुरुष दाता के रूप में और स्त्री ग्रहीता के रूप में हमारे सामने आई। सर्वहारा वर्ग सत्ताधारी वर्ग के पूरे खात्मे का निर्णय ले सकता है, लेकिन स्त्री पुरुष को खत्म कर देने की कल्पना नहीं कर सकती।”[18] सीमोन ने यह भी लिखा है कि गोरी चमड़ी की स्त्रियां कभी काली (नीग्रो) स्त्रियों के साथ बहनापा स्थापित नहीं करतीं।[19] उसी तरह भारत में सवर्ण स्त्रियां दलित स्त्रियों के साथ बहनापा कायम नहीं करतीं। ऐसी स्थिति में स्त्री-स्वाधीनता का क्या अर्थ है? कुछ भी नहीं। लेकिन डॉ. नीलम ने अपनी कविता में पुरुष-स्वाधीनता को केंद्र में रखा है। यथा–

वाह रे रीति, कैसी यह रीति
एक शिखर पर, एक तल में।
पूजा तो करेंगे तेरी
लेकिन रखेंगे ताले में।
औरत हो औरत ही रहना
कभी न तुम हमसे आगे बढ़ना।
तेरी योनि के स्वामी हम,
तेरी शुचिता के रक्षक हम
वाह रे यह रीति, कैसी यह रीति।[20]

यह संभवत: उसी दौर की बात है, जब मार्क्सवादी स्त्री-स्वाधीनता के आंदोलन ने भारत में जोर पकड़ा था। यह शायद पिछली सदी के अस्सी के दशक की या उसके बाद की बात होगी। उन दिनों ‘धर्मयुग’ में मैंने एक कहानी पढ़ी थी, हालांकि मुझे न उस कहानी का और न ही उसके लेखक का नाम याद है, पर उसका यह अंश याद है, जिसमें एक शादीशुदा स्त्री एक दिन अपने पुरुष मित्र से, जो अक्सर उसके घर पर उससे मिलने आता था, कहती है, “मुझे तुमसे एक बच्चा चाहिए।” आज से 50-55 साल पहले इस तरह की कहानी निस्संदेह स्त्री-स्वाधीनता की दृष्टि से क्रांतिकारी थी। हालांकि, यह उस तरह की बात नहीं थी, जो डॉ. नीलम ने कही है कि जब योनि हमारी तो उसकी शुचिता के रक्षक भी हम ही होंगे। उन्होंने फिर भी शुचिता को महत्व दिया है, पर वह कहानी कहती है, ‘शुचिता क्या होती है?’ एक बार राजेंद्र यादव ने भी शुचिता का प्रश्न उठाया था, और स्थापना दी थी कि स्त्री की देह पर स्त्री का ही अधिकार होना चाहिए। इस पर भारत के बौद्धिक जगत में, जिनमें स्त्रियां भी शामिल थीं, गर्मागर्म बहस हुई थी। वह बहस ‘हंस’ की पुरानी फाइलों में देखी जा सकती है।

‘खामोश शहर’ में कवयित्री ने उस शहर को रेखांकित किया है, जो शहर को नंगा होता हुआ देखकर भी चुप रहता है। कविता इस तरह है–

मेरा शहर खामोश है
कुछ कहना चाहता है
लेकिन कोई शब्द नहीं,
नि:शब्द है वह।
देखता है चारों तरफ लोगों की खामोशियां
मग्न हैं सब अपनी दीवारों में
घेरे हुए हैं सब अपने को चारों दीवारों से।
कुछ कहना चाहता है मेरा शहर
किससे कहे वह, सन्नाटा है चारों तरफ
अपने में खामोश हैं सब
सिमटे हैं अपनी दुनिया में
चुप्पी साधे देखते हैं तमाशा
शहर के नंगे हो जाने का।[21]

इस कविता में शहर के खामोश होने का जिक्र है। ऐसे ही शहर को कबीर ने ‘साधो यह मुर्दों का गांव’ कहा था। ऐसा खामोश शहर मुर्दों का ही शहर हो सकता है, जिसमें सब तरफ सन्नाटा होता है, लोग अपनी-अपनी दीवारों के भीतर चुप रहते हैं। लेकिन वास्तव में कोई भी शहर खामोश होता नहीं है, खामोश किया जाता है। कबीर के समय में भी लोग  सत्ता के भय से खामोश रहते थे। सत्ता के दो केंद्र हमेशा से रहे हैं– एक धर्म, जिसकी कमान पंडित-मुल्ला के हाथों में रहती है, और दूसरा राज्य। राज्य का आतंक सबसे भयावह होता है, और जो राज्य धर्म-सत्ता के अधीन होता है, उसका आतंक जनता के लिए और भी अधिक दमनकारी होता है। कबीर ने जिन परिस्थितियों का जिक्र ‘साधो यह मुर्दों का गांव’ में किया, ठीक उन्हीं परिस्थितियों का आभास हमें डॉ. नीलम की कविता  ‘खामोश शहर’ कराती है। इसके बावजूद, सत्य यह है कि कोई भी शहर पूरी तरह मुर्दा नहीं होता, हालांकि अधिकांश लोग मुर्दा होते हैं, पर कुछ लोग सन्नाटा भी तोड़ते हैं और सोए हुए लोगों को जगाए भी रखते हैं। ये ही कुछ लोग इतिहास का वह सच होते हैं, जिन्होंने तानाशाहों से लोहा लिया, और उन्हें धूल चटाई। पंजाबी कवयित्री अमृता प्रीतम की सुप्रसिद्ध कविता की पंक्तियां हैं– “अज्ज आक्खां वारसशाह नूं/ कितों कबरां बिच्चों बोल।” अर्थात, ‘मैं आज वारिसशाह से कहती हूं कि अब कब्रों में से बोलो।‘[22] ऐसे ही जागरूक लोग शहर को जागरूक रखते हैं।

डॉ. नीलम की कविता ‘मैं कोई कवि नहीं’ कवि-कर्म पर ही प्रश्न-चिन्ह है। इस कविता में वह स्वयं को न कवि मानती हैं, न चित्रकार, न मिट्टी को आकार देने वाला कुम्हार, न कांटों में फूल खिलाने वाला माली और न टांके लगाने वाला मोची। यथा–

मैं कोई कवि नहीं,
जो अपने प्रतीकों और बिंबों से
सब कुछ बयां कर दूं।
मैं कोई चित्रकार नहीं कि रंगों से अपने
जज्बात उकेर दूं।
मैं कोई कुम्हार नहीं, जो माटी को आकार दे दूं।
मैं कोई माली नहीं, जो कांटों में भी फूल खिला दूं।
मैं वो मोची नहीं, जो वक्त की बिवाइयों पर
टांके लगा दूं।
मैं वो हूं, जो मूक होकर भी
सब कुछ बयां कर देती हूं।[23]

इस कविता को पढ़ते हुए कबीर का यह पद याद आ जाता है—

कुंभरा ह्वै करि बासन घरि हूं, धोबी ह्वै मल धौऊं।
चमरा ह्वै करि चाम रंगि हूं, अघोरी जाति-पांति कुल खोऊं।
तेली ह्वै तन कोल्हू करि हौं, पाप पुन्न दोउ पेरूं।
पंच बैल जब सूध चलाऊं, राम जेवारिया जोरूं।
क्षत्री ह्वै करि खड़ग संभालूं, जोग जुगति दोउ साधूं।
नउवा ह्वै करि मन कूं मूंडूं, बाढ़ी ह्वै कर्म बाढूं।[24]

यह एक लंबा पद है, जिसमें कबीर विभिन्न जातियों को महत्वपूर्ण न मानते हुए कर्म को महत्वपूर्ण मानते हैं और जात-पात व भेदभाव आदि के निवारण करने की बात करते हैं।  हालांकि ये सारे बिंब अध्यात्मिक हैं, पर इनके अर्थ लौकिक हैं, जो कर्म के महत्व पर जोर देते हैं। लेकिन डॉ. नीलम कुम्हार, चित्रकार, माली, मोची आदि के कर्म के महत्व को अस्वीकार करती हैं। कबीर की कविता कर्म को जाति से जोड़ने के विरुद्ध है। वह उसी बात को कह रहे है, जो ‘जाति का विनाश’ में डॉ. आंबेडकर ने कही थी कि किसी भी व्यक्ति में किसी भी शिल्प का गुण हो सकता है; कोई भी कुम्हार, तेली, नाई, किसान, धोबी का कर्म कर सकता है, इसके लिए किसी जाति विशेष में जन्म लेने की जरूरत नहीं है। जब कोई कवि जाति-पांति और भेदभाव का खंडन करता है, तो वह कुम्हार के रूप में समाज को नया आकार देने का ही कार्य करता है। वह मोची के रूप में किसी की बिवाइयों को ही मरहम लगाता है। मूक होकर सब कुछ बयां करना भी कवि, शायर, चित्रकार, कुम्हार, माली और मोची के कर्म से किस तरह भिन्न है?

डॉ. नीलम की कुछ कविताएं, जैसे, ‘नई दुनिया के रचयिता’, ‘ऐसे थे वो’, ‘तुम्हारी उम्मीदों पर खरे उतरेंगे’, ‘फिजाओं में अब भी हो’, ‘आइकान’, प्रशस्ति-गान की तरह हैं, लेकिन ये किसकी प्रशस्ति में हैं, यह इन कविताओं में स्पष्ट नहीं है। अच्छा होता, यदि कवयित्री इन कविताओं में अपने नायकों का उल्लेख करती। ‘ऐसे थे वो’ कविता डॉ. आंबेडकर के प्रति श्रद्धांजलि हो सकती है, जैसाकि उसकी इन पंक्तियों से अनुमान होता है–

न लड़ा हथियार से
न डरा हथियार से
अपनी बुलंद आवाज़ से
हिला गया संसार को
न लूटा मंदिर, न मारा पंडित
दे गया विचारों का
समतामूलक संसार हमें।[25]

इसी तरह ‘तुम्हारी उम्मीदों पर खरे उतरेंगे’ की अभिव्यंजना से पता नहीं चलता कि यह कविता किसे संबोधित है, पिता को, पति को, मां को या प्रेमी को? यह जिसे भी संबोधित है, पूरी निष्ठा से समर्पित कविता है। शायद यह प्रेम-कविता हो, क्योंकि डॉ. नीलम की कुछ प्रेम कविताएं भी संग्रह में शामिल हैं।

प्रेम कविताएं बहुत कम दलित कवियों ने लिखी हैं, संभवत: न के बराबर। इसका कारण यह नहीं है कि दलित कवि प्रेम नहीं करते। वे प्रेम करते हैं, लेकिन जीवन की जिन विसंगतियों से वे जूझते हैं, उनमें उनका प्रेम दब जाता है, या छूट जाता है। इससे वे उसका इज़हार नहीं कर पाते। डॉ. नीलम उन कवियों में हैं, जिन्होंने अपने प्रेम को शब्द दिए हैं। ‘यही तो मोहब्बत है’, ‘तुम’, ‘चलो दूर यहां से’, ‘दोस्त’, ‘सातवां आसमान’ उनकी कुछ ऐसी कविताएं हैं, जिनमें प्रेम गूंजता है, आध्यात्मिक नहीं, बल्कि लौकिक, जिसके बारे में ज़फ़र ने कहा है– “अजल से मुहब्बत की दुश्मन है दुनिया/ कभी दो दिलों को ये मिलने न देगी।” लेकिन नीलम की प्रेम कविता में हिज्र नहीं है, मिलन है, समर्पण है। जब दिल मोहब्बत में होता है, तो महबूब दूसरे आलम में होता है, मोहब्बत ही उसका धर्म होता है, और मौजूदा दुनिया बहुत छोटी हो जाती है। ‘यही तो मोहब्बत है’ में कवयित्री कहती है–

यही तो मोहब्बत है
यही तो छटपटाहट है
यही तो तड़पन है
यही तो कशिश है
जो जिंदगी को सालती है
जैसे-जैसे जवां होती है मोहब्बत
वैसे-वैसे दिल का सुकून बढ़ता जाता है
और मोहब्बत अपनी ऊंचाई पर जाती है पहुंच
जहां से दुनिया छोटी लगने लगती है
और मोहब्बत बड़ी।
इसलिए मोहब्बत ईमान है,
मोहब्बत धर्म है।[26]

मोहब्बत में दुनिया कितनी सीमित हो जाती है, इसे अल्लामा इक़बाल ने अपने दार्शनिक अंदाज़ में क्या ख़ूब कहा है– “इश्क़ की एक जस्त ने, (यानी, एक छलांग ने) तय कर दिया क़िस्सा तमाम/ इस ज़मीन-ओ-आसमां को बेकरां समझा था मैं।”[27] बेकरां, यानी, इस संसार को मैं असीम समझा था। किसी के भी हृदय में जब प्रेम विकसित होता है, तो फिर उस हृदय में किसी दूसरे के लिए जगह नहीं होती। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि जहां मोहब्बत होती है, वहां दुश्मनी नहीं हो सकती, और जो दुश्मनी से भरे होते हैं, वे कभी प्रेम नहीं कर सकते। इसी को कबीर ने कहा है– ‘प्रेम गली अति संकरी, जामे दो न समाएं।’ नीलम की प्रेमाभिव्यक्ति ‘चलो दूर यहां से’ कविता में इस प्रकार है–

चलो यहां से वादियों के उसी पहलू में
जहां दो पल पास बैठें
न मन में हो किसी से बैर।[28]

इसमें वो बेताबे-मोहब्बत है, जिसके बारे में जिगर कहते हैं, ‘तू वो नाले ही न कर, जिनमें असर होता है।’[29] इसी कविता के आखिरी हिस्से में कवयित्री कहती है–

दो पल कर लें मीठी बातें
न वक्त है तेरे पास
न वक्त है मेरे पास
बांट लें इन वादियों में बैठकर
अपने गम और तेरे गम
कहां ले जाएगा वक्त
न तुझे पता, न मुझे पता।[30]

मोहब्बत सिर्फ महबूब से ही नहीं होती, बल्कि उन बलाओं से भी होती है, जो महबूब के कारण फिज़ाओं में पैदा होती हैं। नीलम ने ‘दोस्त’ कविता में इसे बहुत ही खूबसूरत ढंग से व्यक्त किया है। यथा–

मुझे पता है तू बेखबर नहीं
फिज़ा की दहकती अंगारों की लपटें
तुझ तक भी पहुंच रही हैं
लेकिन तेरी दोस्ती
इतनी प्यारी है दोस्त
कि मैंने लपटों से भी
मोहब्बत करना सीख लिया है।[31]

नीलम की एक और प्रेम कविता ‘सातवां आसमान’ है, जिसका हर शब्द मोहब्बत में तरबतर है, और हालेदिल तो मीर जैसा ही है।[32] यथा–

अपनी तो यही मोहब्बत है
जब से तू समाया मन में
तब से तेरी परछाईं को
मान बैठी देह
तू मेरे पास हो, न हो
तेरी छवि से ही कर लेती हूं
मोहब्बत।[33]

मोहब्बत के इस रूप पर बहुत खूबसूरत अशआर कहे जा सकते हैं। शायद उर्दू शायरी में भी इश्क़ के इस रूप पर कोई शे’र नहीं मिलेगा। इसकी वजह यह है कि प्रेम या इश्क़ में अद्वैत-भाव को माना गया है। लेकिन नीलम ने जिस इश्क़ का इज़हार किया है, उसमें द्वैत है। यह शुद्ध इश्क़ मजाज़ी है, जिसमें आशिक़ और माशूक़ अलग-अलग हैं, और सच यह है कि हकीकत में द्वैत ही होता है, अद्वैत तो धोखा है। एक उस्ताद शायर ‘शेफ़्ता’ का बहुत ही मक़बूल शे’र है– “शायद इसी का नाम मुहब्बत है शेफ़्ता/ एक आग-सी है दिल में हमारे लगी हुई।”

मोहब्बत की यह आग नीलम की सभी प्रेम-कविताओं में लपटें मार रही है। उन्हीं लपटों से उनकी काव्य-वेदना का सृजन हुआ है। दलित साहित्य में प्रेमाभिव्यक्ति ही नहीं, यौनाभिव्यक्ति भी अजय नावरिया की कहानियों से आरंभ होती है, तो दलित कविता में हम पहली बार नीलम की कविताओं में यह प्रेमाभिव्यक्ति देखते हैं। उन्होंने प्रेम के सन्नाटे को तोड़ा है, और दलित कविता को नया आयाम दिया है। आशा की जाती है कि आने वाले दलित कवि और कवयित्रियां प्रेम के कैनवास पर और भी खूबसूरत रचनाएं देंगे।

[1] रजनी तिलक, पदचाप (कविता-संग्रह), 2000, पृ. 39-40
[2] नीलम, सबसे बुरी लड़की (कविता-संग्रह), 2020, रश्मि प्रकाशन, लखनऊ, पृ. 10
[3] वही, पृ. 11
[4] वही, पृ. 23
[5] डा. शांति यादव, तोडूंगी मौन (कविता-संकलन), 1996, पृ. 15
[6] डा. नीलम, वही, पृ. 23
[7] वही, पृ. 12-13
[8] वही, पृ. 14
[9] वही, पृ. 26
[10] वही, पृ. 28
[11] वही, पृ. 58-59
[12] वही, पृ. 70-71
[13] वही, पृ. 82-83
[14] वही, पृ. 84-85
[15] सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, अनामिका (कविता-संकलन), संस्करण 1994, पृ. 64
[16] डा. नीलम, वही, पृ. 61-62
[17] वही, पृ. 66-67
[18] सीमोन द बोउवार, स्त्री : उपेक्षिता, अनुवादक,  डा. प्रभा खेतान, 2002, पृ. 24-25
[19] वही।
[20] डा. नीलम, वही, पृ. 17
[21] वही, पृ. 33
[22] अमृता प्रीतम, धूप का टुकड़ा (पंजाबी-हिंदी कविता संग्रह), 1966, पृ. 96-97
[23] डा. नीलम, वही, पृ. 21-22
[24] कबीर ग्रंथावली, संपादक : डा. श्याम सुंदर दास, पद 389, पृ. 164
[25] डा. नीलम, वही, पृ. 34
[26] वही, पृ. 30
[27] इक़बाल की शायरी, सं. प्रकाश पंडित, पृ. 97
[28] डा. नीलम, वही, पृ. 64
[29] ‘कौन देखे उसे बेताबे-मोहब्बत ऐ दिल/ तू वो नाले ही न कर, जिनमें असर होता है।’जिगर मुरादाबादी, सं. प्रकाश पंडित, हिंद पाकेट बुक्स, पृ. 90
[30] डा. नीलम, वही, पृ. 64-65
[31] वही, पृ. 79
[32] चाहें तो तुमको चाहें, देखें तो तुमको देखें,
खाहिश दिलों की तुम हो, आंखों की आरज़ू तुम।
-मीर, रामनाथ सुमन, भारतीय ज्ञानपीठ, काशी, 1959, पृ. 300
[33] डा. नीलम, वही, पृ. 80

(संपादन : राजन/नवल)


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लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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