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सिद्दारमैया : शूद्र नेता, जिसने दिया आक्रामक हिंदुत्व को कड़ा जवाब

कर्नाटक के मतदाताओं को सिद्दारमैया की जनकल्याणकारी राजनीति और मोदी की ‘जय बजरंगबली’ मार्का सांप्रदायिक राजनीति में से एक को चुनना था और उसने अपनी पसंद साफ़ कर दी है। पढ़ें, प्रो. कांचा आइलैय्या शेपर्ड का यह विश्लेषण

कहा जा रहा है कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत, राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो’ यात्रा का नतीजा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि राहुल गांधी की यात्रा ने इस जीत को मुमकिन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन यह भी सही है कि अमूमन कोई भी राष्ट्रीय पार्टी तब तक किसी राज्य में चुनाव नहीं जीत सकती, जब तक कि राज्य में उसका कोई ऐसा मज़बूत नेता न हो, जिसे जनसाधारण का समर्थन हासिल हो। 

सिद्दारमैया जैसे जननेता के बिना कांग्रेस कर्नाटक में चुनाव नहीं जीत पाती। सिद्दारमैया की ख्याति न केवल एक अच्छे प्रशासक के रूप में रही है, बल्कि उन्हें ऐसा नेता भी माना जाता है जो भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं था। यद्यपि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार ने भी जीत में अहम भूमिका का निर्वहन किया। लेकिन राज्य में उनका कोई ख़ास जनाधार नहीं है। सिद्दारमैया के परिपक्व और धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्ध नेतृत्व और लोगों को गोलबंद करने की उनकी क्षमता के कारण ही कांग्रेस को जीत हासिल हो सकी। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व को कर्नाटक मॉडल को अन्य राज्यों में लागू करने से पार्टी को होने वाले लाभ को समझना होगा। 

सिद्दारमैया का दूसरी बार कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनना, पूरे भारत के लिए सुखद समाचार है। निस्संदेह उनके समक्ष चुनौतियां हैं। उन्हें भाजपा से जूझना होगा और अपनी सरकार इस तरह से चलानी होगी जिससे राज्य की जनता, जिसने न केवल भाजपा बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी धूल चटाई है, संतुष्ट और प्रसन्न रहे। कर्नाटक के मतदाताओं को सिद्दारमैया की जनकल्याणकारी राजनीति और मोदी की ‘जय बजरंगबली’ मार्का सांप्रदायिक राजनीति में से एक को चुनना था और उसने अपनी पसंद साफ़ कर दी है। सिद्दारमैया की लोकप्रियता और उनकी धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक रणनीति ने उन्हें सच्चे अर्थों में जननेता बना दिया था।  

देश एक चौराहे पर खड़ा है। जनता को सांप्रदायिक और लोकतांत्रिक जनकल्याणकारी राज्य में से एक को चुनना है। जाहिर है कि कर्नाटक चुनाव हमें कई सबक सिखाता है। अगर जनता सांप्रदायिकता को ख़ारिज कर देती है तो इसके हिंदुत्ववादी विचारधारात्मक मशीनरी के लिए गहरे निहितार्थ होंगे।

कर्नाटक दत्तात्रेय होसबोले का गृह राज्य है। वे आरएसएस के अगले मुखिया होंगे, इसकी काफी संभावना है। ऐसे में वे जरूर चाह रहे होंगे कि भाजपा को किसी भी तरह यह चुनाव जीतना चाहिए। ऐसा कहा जाता है कि होसबोले आरएसएस के उन नेताओं में से थे, जिन्होंने वर्ष 2013 के आम चुनाव में मोदी को भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की वकालत की थी। शायद इसी अहसान का बदला चुकाने के लिए मोदी ने अपनी सरकार की पूरी ताकत कर्नाटक में जीत हासिल करने के लिए झोंक दी। उन्होंने कर्नाटक की ढेरों यात्राएं कीं, ओबीसी कार्ड का भरपूर उपयोग किया और सांप्रदायिकता की आग को जम कर सुलगाया। कर्नाटक की पूर्व भाजपा सरकार ने कई मुस्लिम-विरोधी निर्णय लिए थे। होसबोले और बी.एल. संतोष जैसे आरएसएस नेताओं के तुष्टिकरण के लिए पूर्व मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने सरकारी स्कूलों में हिजाब पर प्रतिबंध लगाया और मुसलमानों के लिए आरक्षण कोटा समाप्त कर दिया।   

सिद्दारमैया ने इससे मुकाबला करने के लिए जनता को अपने साथ जोड़ा और 2013 से लेकर 2018 तक मुख्यमंत्री के रूप में अपनी शानदार प्रशासनिक रिकॉर्ड को लोगों के सामने रखा। राज्य के गरीब, ओबीसी, दलित और आदिवासी उन्हें फिर से गद्दी पर बैठाने के लिए आतुर थे। मुसलमान भी उनके साथ थे क्योंकि उन्होंने टीपू सुल्तान की सकारात्मक भूमिका पर जोर दिया था और टीपू की खुलकर सराहना की थी।

सिद्दा, जिस नाम से वे जाने जाते हैं, किसी छोटे-बड़े शहरी व्यापारी परिवार से नहीं आते और ना ही वे ऐसी किसी जाति से हैं, जिसे राजनैतिक कारणों से ओबीसी का दर्जा दिया गया हो। वे एक शूद्र चरवाहा जाति से आते हैं जिसके सदस्य शिक्षा, गरिमा और सम्मान से जीने के अधिकारों से तभी से वंचित हैं जबसे प्राचीन हिंदू ग्रंथ अस्तित्व में आए। 

सिद्दारमैया, मुख्यमंत्री, कर्नाटक

बहरहाल संघ, भाजपा और उनके संगी-साथियों को यह अहसास हो गया है कि अब सत्ता में कौन आएगा। यह ओबीसी मतदाता तय करेंगे। और इसलिए वे कई गैर-शूद्र नेताओं को ओबीसी नेताओं के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। संघ परिवार ने पहले तो मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का विरोध किया, लेकिन बाद में उन्हें यह समझ में आया कि ओबीसी वोटों के बिना वे दिल्ली की सत्ता पर काबिज़ नहीं हो सकेंगे। इसलिए नरेंद्र मोदी और सुशील मोदी जैसे नेताओं, जिन्होंने मंडल आरक्षण का विरोध किया था और जो कमंडल आंदोलन के आक्रामक योद्धा थे, ने अचानक ओबीसी का चोला ओढ़ लिया। 

परन्तु सिद्दारमैया ने उनके रचे चक्रव्यूह को सफलतापूर्वक भेद दिया। वे मंडल आंदोलन के मज़बूत स्तंभ थे। चरवाहों के परिवार – एक ऐसे परिवार, जिसकी जड़ें कृषि और पशुपालन से जुड़ीं थीं – से आने वाले सिद्दारमैया ने दस वर्ष की आयु में पहली बार स्कूल में दाखिला लिया। उन्होंने बीएससी किया और फिर एलएलबी। उस समय किसी कुरुबा लड़के के लिए यह स्वप्न जैसा था। कानून के पढ़ाई पूरी करने के बाद वे वकालत करने लगे। लेकिन साथ-साथ वे मैसूर क्षेत्र में सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी सक्रिय हो गए। इस युवा वकील पर 1980 के दशक में कृषक आंदोलन के एक प्रमुख नेता एम.डी. नंदुंदास्वामी की नज़र पड़ी। उन्होंने ही सिद्दारमैया को कर्नाटक राज्य रायथा संघ के उम्मीदवार के रूप में विधानसभा चुनाव लड़ने का मौका दिया। वे जीत गए और 1983 में विधायक बने। बाद में उन्होंने जनता पार्टी की सदस्यता ले ली और उस खिचड़ी पार्टी में गरीबों के हितचिंतक गुट के नेता के रूप में उभरे। वे एक के बाद एक चुनाव जीतते चले गए और जल्दी ही मंत्री बन गए। 

जनता दल के विभाजन के बाद वे देवेगौडा के जनता दल में चले गए, जहां उनकी पहचान निर्धन वर्गों, ओबीसी, दलितों और आदिवासियों के प्रतिनिधि के रूप में थी। जब देवगौड़ा प्रधानमंत्री बनने के पहले कनार्टक के मुख्यमंत्री थे, तब सिद्दारमैया उनके मंत्रिपरिषद में वित्त मंत्री रहे। वहीं देवगौड़ा के प्रधानमंत्री बनने के बाद जब जे.एच. पटेल मुख्यमंत्री बने तब पहली बार वे उपमुख्यमंत्री बनाए गए। बाद में जब कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) की संयुक्त सरकार बनी तब भी देवगौड़ा ने उन्हें उपमुख्यमंत्री ही बनाया। लेकिन जब संयुक्त सरकार का पतन हुआ तब भाजपा के साथ मिलकर देवगौड़ा ने सरकार का गठन किया और अपने पुत्र को प्राथमिकता दी। 

इसके बाद सिद्दारमैया ने जनता दल (सेक्युलर) को भी छोड़ दिया। उन्होंने ‘अहिनदा’ (अल्पसंख्याका, हिंदूलिदा, दलिता) के हितों को समर्पित क्षेत्रीय पार्टी का गठन करने पर भी विचार किया। कन्नड़ में हिंदूलिदा का अर्थ होता है– पिछड़े। 

अंततः उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा। लेकिन यहां भी उन्होंने धर्मनिरपेक्षता और तार्किकता के प्रति अपनी दृढ़ प्रतिबद्धता को बनाए रखा। भाजपा के दिल्ली में सत्ता में आने के बाद से सिद्दारमैया ने जो कुछ कहा और किया, उससे धर्मनिरपेक्षता और तार्किकता में उनकी गहरी आस्था झलकती है। उन्होंने भगवाकरण से कभी समझौता नहीं किया। डी.के. शिवकुमार की कलाई पर आप भगवा धागों का पूरा बंडल देख सकते हैं, लेकिन सिद्दा कभी इन चक्करों में नहीं पड़े। 

राहुल गांधी और प्रियंका सहित कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं ने अपनी हिंदू आस्था को प्रदर्शित करने के लिए कई मंदिरों की यात्रा की, लेकिन सिद्दारमैया ने कभी किसी मंदिर में माथा नहीं टेका। वे बसवा और अक्का महादेवी को अपनी आध्यात्मिक प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत और उद्धृत करते रहे। 

सिद्दारमैया क्यों हैं असली ओबीसी?

शूद्र, जो भारत में आबादी का लगभग 52 प्रतिशत हैं, दो हिस्सों में बंटे हैं। उनमें से कुछ ओबीसी हैं और कुछ सामान्य श्रेणी में आते हैं। जैसे जाट, पटेल, मराठा, रेड्डी, कम्मा, नायर इत्यादि। कर्नाटक में लिंगायत और वोक्क्लिंगा, जिन्हें हम जाट और रेड्डी के समकक्ष मान सकते हैं, शूद्र बड़े किसान हैं, जिन्हें आरक्षण हासिल है। वे ओबीसी कहलाते हैं। सिद्दारमैया, जो कुरुबा (चरवाहा) जाति से हैं, की जिंदगी कृषि और और पशुपालन से जुड़ी रही है। इस अर्थ में वे लिंगायतों और वोक्क्लिंगाओं के समान हैं। दूध और मांस पर आधारित अर्थव्यवस्था और खाद्यान्न उत्पादकों से उनकी गहरा और नजदीकी रिश्ता है। 

मोदी, जो शहरी मोद-घांची व्यापारी समुदाय से आते हैं, सिद्दारमैया को लिंगायतों का विरोधी सिद्ध करने का प्रयास करते रहे हैं। लेकिन सिद्दारमैया ओबीसी के असली प्रतिनिधि हैं, जो कन्नड़ शूद्रों को आरक्षण का लाभ दिलवाने के लिए संघर्ष करते रहे हैं। लिंगायत और वोक्क्लिंगा दोनों इस तथ्य से वाकिफ हैं। इन जातियों के गरीब सिद्दारमैया के साथ हैं। देवराज अर्स के बाद वे एकमात्र ऐसे नेता हैं, जिनकी कर्नाटक की जनता में गहरी पैठ है। 

भाजपा मोदी के ओबीसी होने का ढिंढोरा पीट कर दो बार आम चुनाव जीत चुकी है। मेरा मानना है कि मोदी को तभी हराया जा सकता है जब देश के शूद्र कृषक ओबीसी जातियों के नेता एक मंच पर आ जाएं। सिद्दारमैया के अलावा, दक्षिण भारत के सभी मुख्यमंत्री, जिनमें पिनयारी विजयन, एम.के. स्टालिन, के. चंद्रशेखर राव और जगन मोहन रेड्डी शामिल हैं, शुद्र कृषक या शिल्पकार जातियों से हैं। उत्तर भारत में नीतीश कुमार, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, भूपेश बघेल और अशोक गहलोत की सामाजिक पृष्ठभूमि भी यही है। अगर ये सब अपनी-अपनी पार्टियों के साथ मिलकर जोर लगाएं तो 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराया जा सकता हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व को यह समझना होगा कि भाजपा के व्यवसायी ओबीसी जमावड़े का मुकाबला केवल कृषक ओबीसी नेता मिलकर कर सकते हैं। सिद्दारमैया का मॉडल राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जा सकता है।  

मोदी ने लोगों से वोट देने के पहले ‘जय बजरंगबली’ कहने का आह्वान करके यह सिद्ध कर दिया है कि वे आक्रामक सांप्रदायिकता का सहारा लेने से नहीं हिचकिचाएंगे। लेकिन कर्नाटक के नतीजे उनके लिए बड़ा धक्का हैं।  

अब समय आ गया है जब पूरे देश के शूद्र-ओबीसी नेताओं को एक होकर देश को नेतृत्व प्रदान करना चाहिए। उन्हें सकारात्मक, लोकतांत्रिक और जनकल्याणकारी नीतियों को प्रोत्साहन देना होगा ताकि ओबीसी राजनीति के नाम पर सांप्रदायिकता फैलाने की प्रवृति पर रोक लग सके। शहरी सांप्रदायिक ओबीसी राजनीति, कृषक उत्पादक शूद्र/ओबीसी राजनीति से एकदम अलग है।   

कृषक राष्ट्रवाद को बढ़ावा देना और अवारा पूंजीवादियों, जिनमें ओबीसी, दलित और आदिवासी वर्गों की भागीदारी नहीं है, की गोलबंदी को रोकना ज़रूरी है। हमारे देश ने लोकतंत्र और पूंजीवाद का रास्ता चुना था। लेकिन इन ताकतों ने इस राह को कलंकित कर दिया है। फुले, आंबेडकर और पेरियार ऐसे लोकतंत्र का निर्माण करना चाहते थे, जिसमें राजनीति में धर्म की कोई भूमिका न हो। सिद्दारमैया अपने पूरे राजनैतिक जीवन में इसी विचारधारा के अनुरूप काम करते आये हैं। कांग्रेस के बुद्धिजीवी वर्ग को, अगर वह समझता है कि उसकी पार्टी के लिए क्या अच्छा है, सिद्दारमैया के दिखाए रास्ते पर चलकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी वापसी के लिए रणनीति बनानी चाहिए। 

(आलेख पूर्व में वेब पत्रिका ‘द वायर’ द्वारा अंग्रेजी में प्रकाशित। यहां लेखक की अनुमति से हिंदी अनुवाद प्रकाशित) 

(अनुवाद: अमरीश हरदेनिया, संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

कांचा आइलैय्या शेपर्ड

राजनैतिक सिद्धांतकार, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता कांचा आइलैया शेपर्ड, हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक और मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद के सामाजिक बहिष्कार एवं स्वीकार्य नीतियां अध्ययन केंद्र के निदेशक रहे हैं। वे ‘व्हाई आई एम नॉट ए हिन्दू’, ‘बफैलो नेशनलिज्म’ और ‘पोस्ट-हिन्दू इंडिया’ शीर्षक पुस्तकों के लेखक हैं।

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