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हिंसक लपटों में मणिपुर

उच्च न्यायालय का निर्णय होने के चलते अधिकांश इस मुद्दे पर खुल कर कुछ भी बोलने से बच रहे हैं। मगर राज्य की राजनीति और समाज पर नजर रखने वाले इसके लिए भाजपा की अगुवाई वाली राज्य सरकार को काफी हद तक जिम्मेदार मानते हैं। बता रहे हैं मनीष भट्ट मनु

सुवर्णभूमि के नाम से भी पहचाने जाने वाला पूर्वोत्तर भारत का एक खूबसूरत राज्य मणिपुर इन दिनों सुलग रहा है। इसका प्रमुख कारण है राज्य की कुल आबादी में लगभग 55 प्रतिशत माने जाने वाले मैतेई समुदाय की याचिका पर उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया एक फैसला। इस फैसले में उच्च न्यायालय ने पिछले महीने राज्य सरकार को निर्देशित किया कि वह मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने के लिए चार महीने के भीतर केंद्र को सिफारिश भेजे। 

इस निर्णय से आदिवासी समाज आक्रोशित हो गया है। ऑल इंडिया ट्राइबल स्टूडेंट यूनियन ऑफ मणिपुर द्वारा इस फैसले के विरोध में बुलाए गए आदिवासी एकता मार्च के बाद एकाएक इस तरह हिंसा फैली कि कई जिलों में कर्फ्यू लगा दिया गया है। मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को निलंबित करना पड़ा है और लगभग दस हजार परिवारों को सुरक्षित स्थान पर भी ले जाना पड़ा है। गैर सरकारी सूत्रों के अनुसार अब तक इस हिंसा में पांच से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है।

दरअसल पिछले महीने 19 अप्रैल, 2023 को मणिपुर उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) श्रेणी में शामिल करने के अनुरोध पर विचार करने के लिए कहा था। न्यायालय ने इसी आदेश में केंद्र सरकार को भी इस पर विचार के लिए एक सिफ़ारिश भेजने को कहा था। इस निर्णय के विरोध में ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन मणिपुर ने 3 मई को राजधानी इंफ़ाल से क़रीब 65 किलोमीटर दूर चुराचांदपुर ज़िले के तोरबंग इलाक़े में आदिवासी एकता मार्च रैली का आयोजन किया था। इस रैली में हज़ारों की संख्या में लोग शामिल हुए थे। बताया जा रहा है कि इसी दौरान हिंसा भड़क गई। 

चुराचांदपुर ज़िले के अलावा सेनापति, उखरूल, कांगपोकपी, तमेंगलोंग, चंदेल और टेंग्नौपाल सहित सभी पहाड़ी ज़िलों में संगठन के आह्वान पर इस तरह की रैलियां निकाली गई थीं। सबसे ज़्यादा हिंसक घटनाएं विष्णुपुर और चुराचांदपुर ज़िले में हुईं हैं। जबकि राजधानी इंफ़ाल से भी हिंसा की कई घटनाएं सामने आईं है। हिंसा प्रभावित इलाक़ों की मौजूदा स्थिति पर सेना के जनसंपर्क अधिकारी लेफ़्टिनेंट कर्नल महेंद्र रावत ने बयान जारी कर कहा, “अभी स्थिति नियंत्रण में है। गुरुवार सुबह तक हिंसा पर क़ाबू पा लिया गया था।”

इंफाल में आंसू गैस का प्रयोग करता एक सुरक्षाकर्मी

मैतेई बनाम आदिवासी का विवाद मणिपुर के लिए कोई नया नहीं है। मौजूदा व्यवस्था के तहत अभी मैतेई समुदाय के लोग पहाड़ी ज़िलों में जाकर नहीं बस सकते। यहां इस बात का जिक्र मौजूं है कि मणिपुर के 22 हज़ार 300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में महज़ 8 से 10 प्रतिशत ही मैदानी इलाक़ा है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की आबादी 28,55,794 थी। इनमें से 57.2 फीसदी मैदानी क्षेत्रों और बाकी 42.8 फीसदी पहाड़ी इलाकों में निवासरत थे। अर्थात राज्य की सबसे बड़ी आबादी वाला समुदाय राज्य के एक न्यूनतम क्षेत्रफल में रहने को विवश है। मैतेई समुदाय की सबसे बड़ी शिकायत भी यही है कि पहाड़ी इलाक़े में बसे लोग मैदानी इलाक़ों में जाकर बस सकते हैं, लेकिन मैतेई लोग वहां बस नहीं सकते। कृषि भूमि में जनजातीय लोगों का दबदबा बढ़ रहा है। लिहाज़ा इस तरह की कई बातों को लेकर यह पूरा टकराव पिछले कई दशकों से चल रहा है। 

मैतेई समुदाय का कहना है कि अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं होने के कारण पड़ोसी म्यांमार और बांग्लादेश से आने वाले लोगों की लगातार बढ़ती तादाद उनके वजूद के लिए खतरा बनती जा रही है। उधर आदिवासी समुदाय उसकी इस मांग का विरोध कर रहा है। आदिवासी संगठनों का कहना है कि ऐसा होने पर मैतेई समुदाय उसकी जमीन और संसाधनों पर कब्जा कर लेगा।

हिंसा के बीच मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने राज्य में तमाम लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है। उन्होंने कहा कि हिंसा की वजह दो समुदायों के बीच गलतफहमियां हैं। “लंबे समय से चली आ रही शिकायतों को सही तरीके से लोगों के साथ सलाह-मशविरा के जरिए हल कर लिया जाएगा।” वहीं पड़ोसी राज्य मिजोरम के मुख्यमंत्री जोरमथंगा ने मुख्यमंत्री बीरेन सिंह को भेजे एक पत्र में राज्य की स्थिति पर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने संबंधित पक्षों से बात कर बेवजह होने वाली हिंसा पर तुरंत अंकुश लगाने की अपील की है। 

दरअसल, उच्च न्यायालय का निर्णय होने के चलते अधिकांश इस मुद्दे पर खुल कर कुछ भी बोलने से बच रहे हैं। मगर राज्य की राजनीति और समाज पर नजर रखने वाले इसके लिए भाजपा की अगुवाई वाली राज्य सरकार को काफी हद तक जिम्मेदार मानते हैं। उनके अनुसार चुनाव के समय तो तमाम आदिवासी संगठनों के नेताओं को दिल्ली बुला कर उनसे बातचीत में सभी समस्याएं हल करने के वादे भाजपा करती तो है लेकिन चुनाव बाद इसे भूल कर उनको उनके हाल पर छोड़ देती है। आदिवासी संगठनों में भाजपा और उसकी सरकार के प्रति भी भारी नाराजगी है। अगर इस समस्या को शीघ्र बातचीत के जरिए नहीं सुलझाया गया तो हालात को और भी ज्यादा बेकाबू होते देर नहीं लगेगी।”

बहरहाल, इन सबके बीच आग की लपटों में झुलसते इस राज्य में राजनीतिक रोटी भी सेंकी जा रही है। एक ओर जहां राज्य के आदिवासी समुदाय में ईसाइयों का प्रतिशत ज्यादा होने को लेकर उन पर निशाना साधा जा रहा है तो दूसरी ओर मैदानी क्षेत्रों में रोहिंग्या की मौजूदगी को भी मुद्दा बनाया जा रहा है। इन सबके मध्य इतना तो तय है कि आने वाले दिनों में यह विवाद कई अन्य विवादों को भी जन्म दे सकता है।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

मनीष भट्ट मनु

घुमक्कड़ पत्रकार के रूप में भोपाल निवासी मनीष भट्ट मनु हिंदी दैनिक ‘देशबंधु’ से लंबे समय तक संबद्ध रहे हैं। आदिवासी विषयों पर इनके आलेख व रपटें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे हैं।

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