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जानिए, आदिवासी संघर्षों से जुड़ा भागलपुर का यह इतिहास

भागलपुर-संथाल परगना क्षेत्र ईस्ट इंडिया कंपनी के राज के खिलाफ संघर्ष का महत्वपूर्ण केंद्र था। तिलका मांझी इस संघर्ष के पहले दौर के अगुआ थे। भागलपुर-राजमहल क्षेत्र की पहाड़िया जनजाति ने 1772 ई. में प्रथम संगठित विद्रोह किया था। बता रहे हैं रिंकु यादव

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम सेनानी और प्रथम शहीद तिलका मांझी थे। इतिहास के पन्नों पर यह दावेदारी पुख्ता हो चुकी है। हालांकि आज भी यह स्थापित है कि आजादी की लड़ाई 1857 से शुरू होती है, जिसके आगाज का श्रेय मंगल पांडेय को दिया जाता है। लेकिन सच यह है कि 1857 से काफी पहले इस मुल्क के आदिवासियों ने ही आजादी की लड़ाई की बुनियाद रखी। 

उल्लेखनीय है कि भागलपुर-संथाल परगना क्षेत्र ईस्ट इंडिया कंपनी के राज के खिलाफ संघर्ष का महत्वपूर्ण केंद्र था। तिलका मांझी इस संघर्ष के पहले दौर के अगुआ थे। भागलपुर-राजमहल क्षेत्र की पहाड़िया जनजाति ने 1772 ई. में प्रथम संगठित विद्रोह किया था। सन् 1780 ई. में तिलका मांझी ने शाल वृक्ष की छाल में गिरह देकर सभी संथाल एवं पहाड़िया गांवों में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करने के निमंत्रण के बतौर भेजा था। वहीं,1857 से पहले 30 जून, 1855 को सिदो, कान्हू, चांद, भैरव, फूलो व झानो की अगुआई में सैकड़ों गांवों के हजारों स्त्री-पुरुष की भागीदारी वाले ऐतिहासिक हूल विद्रोह की शुरुआत भी तत्कालीन भागलपुर जिला के भोगनाडीह (बरहेट) से हुई थी। भोगनाडीह अब वर्तमान में झारखंड के साहिबगंज जिला में है।

भारत का लिखित इतिहास जो हमें पढ़ाया जाता रहा है, वह वर्ण-जाति आधारित व्यवस्था के सोपानक्रम के अनुरूप ही रहा है। इतिहास में हाशिए के समाज का संघर्ष और उसके नायक हाशिए पर किए जाते रहे हैं या तो गायब किए जाते रहे हैं। आदिवासियों के संघर्षों व उसके नायकों को भी इतिहास में यथोचित स्थान नहीं मिलना अप्रत्याशित नहीं है। प्रथम शहीद तिलका मांझी भी अपवाद नहीं हो सकते थे। वे इतिहास की मुख्यधारा के पन्नों से गायब रहे। लेकिन इतिहास केवल पन्नों पर नहीं होता। 

तिलका मांझी विभिन्न रूपों में उत्पीड़ित समाज की स्मृतियों में जिंदा रहे और खासतौर पर जिस भागलपुर की जमीन पर जहां उनका खून बहा, उस जमीन से उनके इतिहास को मिटाना संभव नहीं हुआ। भागलपुर की जमीन ने उस इतिहास को जिंदा रखा है। 

गौरतलब है कि 15 नवंबर, 2001 को झारखंड बिहार से अलग हो गया। लेकिन, भागलपुर की पहचान और गौरव के साथ शहीद तिलका मांझी का नाम जुड़ा हुआ है। हालांकि जिस जमीन पर उनके संघर्ष के निशान और ऐतिहासिकता के प्रमाण जिंदा रहैं और जिस शहर व आस-पास के क्षेत्र ने सबसे पहले उनकी स्मृति और सम्मान व श्रद्धांजलि के प्रतीकों के साथ अपने पहचान को खड़ा किया है, वहां अब आदिवासी आबादी की उपस्थिति नगण्य है। 

तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय परिसर में स्थापित तिलका मांझी की प्रतिमा, भागलपुर जंक्शन व विश्वविद्यालय परिसर में क्लीवलैंड का स्मारक

बताते चलें कि यहां भी उनकी ऐतिहासिकता पर सवाल खड़ा करने वाले मौजूद हैं तो दूसरी तरफ, जो उनकी ऐतिहासिकता को स्वीकारते हैं, उनके बीच भी तिलका मांझी के संथाल या पहाड़िया जनजाति के होने पर विवाद है। लेकिन सवाल और विवाद के बीच भी वे आज के दौर में भागलपुर क्षेत्र के उत्पीड़ित समुदायों-बहुजनों के निर्विवाद व प्यारे नायक हैं। इसलिए आज इस शहर में उनके नाम पर एक चौक है, जहां उनकी प्रतिमा कायम है। यह प्रतिमा वहीं पर स्थापित है, जहां तिलका मांझी को फांसी दी गई थी। हालांकि पूर्व में इस जगह पर भू-माफियाओं ने कब्जा कर लिया था, जिसे अब मुक्त करा लिया गया है। यहां अब उनके नाम पर एक पार्क भी बना दिया गया है। इतना ही नहीं, यहां स्थित विश्वविद्यालय का नाम उनके साथ जुड़ा हुआ है– तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय। इस विश्वविद्यालय के प्रशासनिक भवन के सामने धनुष पर तीर चढ़ाए तिलका मांझी की प्रतिमा स्थापित है।

विश्वविद्यालय परिसर में तिलका मांझी की प्रतिमा से कुछ ही दूरी पर क्लीवलैंड का स्मारक भी है। यह स्मारक टिल्हा कोठी के सामने है, जहां प्रथम कलेक्टर के बतौर क्लीवलैंड निवास करते थे। अब यह रवींद्र भवन कहलाता है तथा यहां विश्वविद्यालय का प्राचीन इतिहास विभाग संचालित होता है। तिलका मांझी का संघर्ष क्लीवलैंड से जुड़ा हुआ है। 

भागलपुर में तिलका मांझी चौक पर लगाई जा रही है तिलका मांझी की नई प्रतिमा

उल्लेखनीय है कि 1772 ई. से शुरू पहाड़िया संघर्ष से निपटने में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना सफल नहीं हो सकी। इस परिस्थिति में कंपनी शासकों ने ‘बांटो और राज करो’ की नीति अपनाई। एक तरफ, अंग्रेजों ने पहाड़िया लोगों का समर्थन हासिल करने की कार्यनीति अख्तियार किया तो दूसरी तरफ, पहाड़िया समुदाय के बीच से विशेष सैनिक बल (हिल-कार्पस) और हिल रेंजर्स जैसे पहाड़िया सैनिक संगठनों को गठित कर उनके प्रतिरोध को खत्म कर देने की कोशिश भी की। सन् 1779 ई. में क्लीवलैंड भागलपुर के प्रथम कलक्टर नियुक्त हुए। अंतत: तिलका मांझी की अगुआई में जारी लड़ाई से निपटने के लिए बाद के दिनों में क्लीवलैंड ने खुद सैनिक अभियान का नेतृत्व अपने हाथों में ले लिया। तीतापानी के जंगल में हुए युद्ध में तिलका मांझी के हमले से क्लीवलैंड जख्मी हुए। अपने सहायक चार्ल्स कॉकरेल को प्रभार सौंपकर चिकित्सा के लिए स्वदेश लौटते समय रास्ते में 13 जनवरी,1784 को महज 29 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो गई। क्लीवलैंड के बाद 1784 ई. में सी. कैपमैन भागलपुर के कलक्टर बनाए गए। इसके बाद ही पूरे राजमहल इलाके में आतंक का राज शुरू हुआ। 

सन् 1785 में तिलका मांझी और उनके साथियों ने सुल्तानगंज-भागलपुर को जोड़नेवाली सड़क किनारे एक गांव (वर्तमान में तिलकपुर या तिलकापुर गांव) के जंगल में मोर्चा संभाला, क्योंकि कंपनी की फौज इसी रास्ते होकर भागलपुर पहुंचती थी। इस लड़ाई में तिलका मांझी के कंधे में गोली लगी। वे गिरफ्तार कर लिये गए। घायल अवस्था में उनके ऊपर कोड़े बरसाए गए। उन्हें घोड़े से बांध कर घसीटा गया और अंत में भागलपुर के एक चौराहे पर बरगद के पेड़ से लटकाकर फांसी दे दी गई। यह 13 जनवरी, 1785 को, यानी क्लीवलैंड की मृत्यु की तिथि के एक साल बाद, हुआ।

तिलका मांझी का शहादत स्थल तिलका मांझी चौक और उसके निकट तिलका मांझी मोहल्ला और शहर में एक हाट उनके नाम से जुड़ा हुआ है। 

सन् 1980 और 90 के दशक में तिलका मांझी की दावेदारी इतिहास के पन्नों पर उचित जगह हासिल करने के लिए उभर कर आई और आगे बढ़ी, जिसका केंद्र भागलपुर बना। इन दशकों में विश्वविद्यालय में छात्र आंदोलन से जुड़े रहे और बाद के दिनों इसी विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर इतिहास विभाग के शिक्षक और आंबेडकर विचार व समाजकार्य विभाग के अध्यक्ष रहे डॉ. विलक्षण रविदास का कहना है कि खासतौर पर महाश्वेता देवी के उपन्यास ‘शाल-गिरह की पुकार पर’ ने तिलका मांझी के जीवन-संघर्ष को सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। उन्होंने बताया कि सबसे पहले 1978-80 के बीच तिलका मांझी के जन्म दिन पर उनको याद करने और तिलका मांझी चौक पर मूर्ति स्थापना के लिए आवाज उठी तथा विश्वविद्यालय के दलित-बहुजन छात्रों ने पहल की। केंद्र बना विश्वविद्यालय का एससी-एसटी छात्रावास। उनके शहादत के लगभग 195 वर्षों के बाद तिलका मांझी चौक से थोड़ी दूर सड़क किनारे उनकी मूर्ति 1980 ई. में लगाई गई। यह उनकी पहली मूर्ति थी। उसी समय शहादत स्थल पर उनके शहादत की स्मृति को जीवंत बनाने के लिए नया बरगद का पेड़ भी लगाया गया। यह इसलिए किया गया, क्योंकि अंग्रेजों ने बरगद के पेड़ से लटकाकर ही तिलका मांझी को फांसी दी थी। 

खास तौर पर विश्वविद्यालय के दलित-बहुजन छात्रों ने तिलका मांझी को अपने नायक के बतौर सामने लाने में उल्लेखनीय भूमिका निभायी है। उस दौर में छात्र आंदोलन से जुड़े रहे विश्वविद्यालय के पूर्व सीनेट सदस्य डॉ. कपिलदेव मंडल बताते हैं कि 1980 के दशक में प्रोग्रेसिव स्टूडेंट-यूथ फ्रंट के बैनर तले विश्वविद्यालय परिसर में तिलका मांझी की जयंती 11 फरवरी को बड़े पैमाने पर आयोजित किया जाना प्रारंभ हुआ। यह इसलिए कि तिलका मांझी का जन्म 11 फरवरी, 1750 ई. माना जाता है। बाद के दिनों में शहादत दिवस पर भी उनको याद किया जाने लगा। 

डॉ. मंडल बताते हैं कि वाम-लोकतांत्रिक छात्र संगठनों के साझा मंच स्टूडेंट्स कॉर्डिनेशन कमिटी के छात्रों ने भागलपुर विश्वविद्यालय के स्टेडियम और क्लीवलैंड स्मारक के सामने ऊंचे टीले पर स्थित रवींद्र भवन का नामकरण तिलका मांझी के नाम पर करने की मांग को लेकर आंदोलन भी चलाया। ऊंचे टीले पर स्थित इस भवन में ही भागलपुर जिला के प्रथम कलक्टर के बतौर क्लीवलैंड भी निवास करते रहे थे।

तिलका मांझी को अपने नायक के बतौर याद करने का केंद्र तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय बना। यह समाज व राजनीति के बदलाव की आहट भी थी।

डॉ. विलक्षण रविदास व डॉ. कपिलदेव मंडल

सनद रहे कि 1980 के दशक में कॉलेज-विश्वविद्यालयों की सामाजिक संरचना बदलने लगी थी। परिसर जीवन में सवर्ण प्रभुत्व व दबदबे को बहुजन छात्रों की ओर से संगठित तौर पर चुनौती मिलने लगी थी। भागलपुर विश्वविद्यालय में दलित-बहुजन छात्रों की दावेदारी के साथ तिलका मांझी भी एक नायक के बतौर उभर रहे थे। हाशिए की दावेदारी बढ़ती है तो इसकी अभिव्यक्ति इतिहास में भी होती है। तिलका मांझी के साथ भी यही हुआ है। तिलका मांझी को लेकर इतिहास में दावेदारी शोध-अध्ययन या अकादमिक मसला भर नहीं रहा है। 1980 के दशक के अंत और 90 के दशक की शुरुआत में हिंदी पट्टी के समाज व राजनीति में बड़ा बदलाव घटित हो रहा था। सवर्णों की सामाजिक-राजनीतिक सत्ता को जबर्दस्त चोट पड़ रही थी। बिहार में सवर्णों को राजनीतिक सत्ता से पीछे धकेला गया। लालू यादव मुख्यमंत्री बने। विश्वविद्यालय परिसर में भी सवर्ण दबदबे के खिलाफ बहुजन छात्रों की दावेदारी नई ऊंचाई हासिल कर रही थी। इस दावेदारी में उनके साथ इतिहास के पन्नों से बाहर रखे गए नायक भी थे। 1990 के दशक में बिहारी समाज और राजनीति ही नहीं बदल रही थी, इतिहास के पन्नों पर भी यह बदलाव धावा बोल रहा था। 

वर्ष 1991 में लालू यादव भागलपुर में गंगा नदी पर विक्रमशिला सेतु का शिलान्यास करने आए थे। भागलपुर विश्वविद्यालय के बहुजन छात्रों की अगुआई में स्टूडेंट्स कॉर्डिनेशन कमिटी ने मुख्यमंत्री के सामने भागलपुर विश्वविद्यालय का नामकरण तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय करने की मांग रखी। अंतत: भागलपुर विश्वविद्यालय का नाम तिलका मांझी के साथ जुड़ गया और दूसरी तरफ चौराहे के किनारे से 1993 में तिलका मांझी चौक पर तिलका मांझी की प्रतिमा स्थापित हुई।

तिलका मांझी के नाम पर विश्वविद्यालय का नामकरण ब्राह्मणवादी सवर्ण शक्तियों को आसानी से कबूल नहीं ही होना था। उस दौर में विश्वविद्यालय में सवर्ण छात्र समूह का प्रतिनिधित्व कांग्रेस का छात्र संगठन एनएसयूआई करता था। उसने विरोध किया। सवर्ण बुद्धिजीवियों-इतिहासकारों ने भी तिलका मांझी की ऐतिहासिकता पर सवाल खड़ा किया।

विश्वविद्यालय का नामकरण तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय होने के बावजूद लंबे संघर्ष के बाद ही 14 अप्रैल, 2002 को तिलका मांझी विश्वविद्यालय के प्रशासनिक भवन के सामने उनकी मूर्ति स्थापित हुई।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

रिंकु यादव

रिंकु यादव सामाजिक न्याय आंदोलन, बिहार के संयोजक हैं

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