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शाब्दिक आधार पर सर्वाधिक समृद्ध थे जयशंकर प्रसाद : सुचिता वर्मा व कमलेश वर्मा

हमने महसूस किया था कि आधुनिक कविता की आलोचना तो मिलती है, मगर उसके पाठ को ध्यान में रखकर जितनी बातें होनी चाहिए, उतनी हो नहीं पाती हैं। छायावादी कविता लगभग एक शताब्दी पुरानी हो चुकी कविता है। पढ़ें, सुचिता वर्मा व कमलेश वर्मा से यह साक्षात्कार

[छायावादी कवियों जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा की रचनाओं पर आधारित काव्य-कोशों की रचना के लिए डॉ. सुचिता वर्मा और डॉ. कमलेश वर्मा को संयुक्त रूप से प्रतिष्ठित 14वां अयोध्या प्रसाद खत्री सम्मान दिया गया है। इस दंपत्ति ने साहित्य समालोचना के क्षेत्र में अहम मुकाम हासिल किया है। डॉ. सुचिता वर्मा राजकीय महिला महाविद्यालय, औराई, भदोही (उत्तर प्रदेश) में हिंदी विभाग की अध्यक्ष हैं। वहीं डॉ. कमलेश वर्मा राजकीय महिला महाविद्यालय, सेवापुरी, वाराणसी में हिंदी विभाग के अध्यक्ष हैं। 

डॉ. सुचिता वर्मा की प्रकाशित पुस्तकों में ‘नवरोमानियत और यथार्थ’ शामिल है। वहीं डॉ. कमलेश वर्मा की कृतियों में ‘निराला काव्य कोश’, ‘काव्य भाषा और नागार्जुन की कविता’ तथा ‘जाति के प्रश्न पर कबीर’। दोनों की संयुक्त कृतियों में ‘दूसरी परम्परा का शुक्ल-पक्ष’, ‘प्रसाद काव्य-कोश’, व ‘छायावादी काव्य-कोश’ शामिल हैं। फारवर्ड प्रेस के हिंदी संपादक नवल किशोर कुमार ने दोनों से ईमेल के जरिए यह साक्षात्कार किया।]

आप दोनों को इस सम्मान के लिए बधाई! प्रथम दृष्टि में कहूं तो यह एक बड़ा काम किया है आप दोनों ने। यह विचार सबसे पहले कब और क्यों आया कि छायावादी कविताएं, जो कि अपेक्षाकृत अधिक जटिल मानी जाती हैं, उन्हें बोधगम्य बनाया जाय?

धन्यवाद! हमने काव्य-कोश के निर्माण की शुरुआत 2003 से की। सबसे पहले ‘निराला काव्य-कोश’ पर काम किया गया, फिर ‘प्रसाद काव्य-कोश’ पर और अंततः 2019 में ‘छायावादी काव्य-कोश’ पूरा हो सका। लगभग 16-17 वर्षों तक हमलोग इस काम को करते रहे। हमने महसूस किया था कि आधुनिक कविता की आलोचना तो मिलती है, मगर उसके पाठ को ध्यान में रखकर जितनी बातें होनी चाहिए, उतनी हो नहीं पाती हैं। छायावादी कविता लगभग एक शताब्दी पुरानी हो चुकी कविता है। उसकी काव्य-भाषा धीरे-धीरे पुरानी होती जा रही है और क्लासिक स्वभाव के कारण अर्थ की सघनता से वह भरी हुई तो है ही! ऐसी स्थिति में इस तरह के कोश की ज़रूरत हमने महसूस की।

छायावाद के बाद लगभग 25 वर्षों तक निराला ने कविताएं लिखी थीं। ‘निराला काव्य-कोश’ में उनके पूरे काव्य-लेखन को शामिल किया गया है। इसी तरह से जयशंकर प्रसाद छायावाद के पहले से कविताएं लिख रहे थे। उन्होंने ब्रजभाषा में भी कविताएं लिखी थीं। प्रसाद के नाटकों में 250 से अधिक कविताओं का इस्तेमाल हुआ है। इन सबको ‘प्रसाद काव्य-कोश’ में शामिल किया गया है। इस तरह ये तीनों काव्य-कोश छायावाद के कुछ पहले और काफी बाद तक की कविताओं के अध्ययन के लिए, इन कवियों के माध्यम से, शब्द-आधारित सामग्री उपलब्ध कराते हैं। 

संभवत: ‘निराला काव्य-कोश’ का सृजन आप दोनों ने पहले किया और बाद में जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा और सुमित्रानंदन पंत का काव्य कोश। यह पूरा करने में कितना समय लगा और कृपया यह भी बताएं कि ये चारों कवि, जो कि हिंदी साहित्य जगत में लब्ध प्रतिष्ठित रहे, के बीच साम्यताएं कितनी रहीं? खासकर शब्दों के उपयोग व विषयों की बात करें तो।

जी, यह सही है कि हमने निराला से इस काम का प्रारंभ किया था। बाद में प्रसाद पर काम हुआ। महादेवी वर्मा के पांच काव्य-संग्रह ‘छायावादी काव्य-कोश’ में सम्मिलित हैं, इसलिए उनका अलग से काव्य-कोश हमने नहीं बनाया। इन पांच संग्रहों के अलावा महादेवी की जो कविताएं उपलब्ध हैं, उनका साहित्यिक महत्त्व प्रायः नहीं माना जाता है। पंत ने छायावाद के बाद विपुल मात्रा में कविताएं लिखी थीं। उनकी सभी कविताओं को शामिल करके यदि कोश तैयार किया जाए तो वह आकार में बहुत बड़ा होगा! पंत जी की बाद की कविताएं अपना महत्त्व स्थापित नहीं कर पायीं। यही सब समझकर हमने पंत पर अलग से काम नहीं किया।

इन चारों कवियों के बीच छायावादी प्रवृत्तियों की समानता-असमानता तो मुख्यतः आलोचना का विषय है। इनके द्वारा छायावादी समय-सीमा में लिखी गयी कविताओं में प्रयुक्त शब्दों के आधार पर कहा जा सकता है कि सर्वाधिक समृद्ध जयशंकर प्रसाद थे। उनकी कविताओं से सबसे ज्यादा प्रविष्टियां प्राप्त हुई हैं। मगर शब्द-प्रयोग की भिन्नता के मामले में सबसे आगे निराला हैं। ‘छायावादी काव्य-कोश’ की हमने लंबी भूमिका लिखी है। उस भूमिका में इन कवियों के शब्द-प्रयोगों की विस्तृत तुलनात्मक व्याख्या की गई है। उसमें कई तरह की सूचियां दी गई हैं। चारों कवियों के द्वारा प्रयुक्त शब्द, तीन कवियों के द्वारा प्रयुक्त शब्द, दो कवियों के द्वारा प्रयुक्त शब्द और केवल एक कवि के द्वारा प्रयुक्त शब्दों की सूची को पढ़कर इनके बीच तुलना करने के कई आधार प्राप्त होते हैं। शब्दों के आधार पर छायावादी कवियों के बीच अध्ययन की जो कोशिशें आज तक हुई थीं, वे सीमित कविताओं को ध्यान में रखकर हुई थीं। मगर इस कोश की सहायता से सभी कविताओं से प्राप्त शब्द-प्रयोगों को आधार बनाकर यह अध्ययन किया जा सकता है। कोश-निर्माण के क्रम में हमने पाया कि नामवर सिंह और रामविलास शर्मा ने शब्दों के मामले में जो निष्कर्ष निकाले थे, उनमें कुछ गलतियां मिलती हैं। इस तरह की गलती का कारण यही था कि इस तरह का कोई कोश उस समय तक बन नहीं पाया था। हमने इन सब की चर्चा भूमिका में की है। 

डॉ. सुचिता वर्मा व डॉ. कमलेश वर्मा

इन चारों कवियों में किन्हें आप दलित-बहुजन समाज की वैचारिकी के सबसे करीब पाते हैं और क्यों?

छायावाद के इन चारों कवियों की कविताओं को ध्यान में रखें तो दलित-बहुजन शब्द की उपस्थिति को ठीक से समझने के लिए इसके अर्थ से जुड़े कुछ अन्य शब्दों पर भी ध्यान देना होगा, जैसे– अछूत, अस्पृश्य, जाति, वर्ण, पददलित, वर्ग, वर्ण-संकर, वर्णाधम, शूद्र। उदाहरण के लिए इन चारों कवियों की कुछ पंक्तियों को रखना चाहेंगे–

  1. अछूत ‘जग पीड़ित छूतों से प्रभूत, छू अमृत स्पर्श से, हे अछूत!’ : जिसकी महानता को कोई छू भी न पाए ऐसे महात्मा गांधी पं.ग्रं.-2/24, बापू के प्रति/युगपथ
  2. चार वर्ण‘चार वर्ण बन गये बंटा श्रम उनका अपना’ : सारस्वत प्रदेश में – चार वर्ण श्रम के अनुसार मनु ने बनाए – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र प्र.ग्रं.-2/203, संघर्ष/कामायनी
  3. छूतों‘जग पीड़ित छूतों से प्रभूत, छू अमृत स्पर्श से, हे अछूत!’ : गैर दलित जातियां पं.ग्रं.-2/24, बापू के प्रति/युगपथ
  4. जाति क्षय‘बहु भेद विग्रहों में खोयी ली जीर्ण जाति क्षय से उबार’ : समुदाय का पतन पं.ग्रं.-2/25, बापू के प्रति/युगपथ
  5. जाति सेवा – ‘जाति सेवा की उज्ज्वल भोर’ : देश की सेवा, समुदाय/कौम की सेवा पं.ग्रं.-1/115, इस विस्तृत हॉस्टल में/वीणा
  6. जाति– जाति की आशा का संचार’ : भारतवासी, समुदाय पं.ग्रं.-1/110, तिलक! हा! भाल-तिलक!/वीणा
  7. जाति-कुल-वर्ण-पर्ण ‘झरें जाति-कुल-वर्ण-पर्ण घन’ : जाति, वंश, वर्ण आधारित भेद और उनसे उत्पन्न अनेक पंक्तियां, जन्म-आधारित भेद-भाव पं.ग्रं.-2/7, द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र/युगपथ
  8. जातिगत ‘व्यक्ति का खिंचाव यदि जातिगत हो जाय’ : राष्ट्रीय, सामाजिक, देशी और विदेशी का अंतर समझना नि.र.-1/169, महाराज शिवाजी का पत्र
  9. जातियों –‘जातियों का, उत्थान-पतन, आंधियां, झड़ी प्रचंड समीर’ : जन्म-आधारित पहचान से बने समूह प्र.ग्रं.-4/139 पंचम अंक/स्कंदगुप्त
  10. जाति-वर्ण-विवर‘लुप्त जाति-वर्ण-विवर’ : जाति और वर्ण की संकीर्णताएं पं.ग्रं.-1/329, तीन/ज्योत्स्ना
  11. जातीय क्षेत्र –‘जातीय क्षेत्र में अयश बीज बोते हो’ : जन्म-आधारित पहचान से जुड़ा क्षेत्र प्र.ग्रं.-3/406 तृतीय अंक/जन्मेजय का नाग-यज्ञ
  12. जातीय मान –‘जातीय मान के शव पर क्यों रोते हो’ : जन्म-आधारित पहचान से जुड़ा मान-सम्मान का भाव प्र.ग्रं.-3/406 तृतीय अंक/जन्मेजय का नाग-यज्ञ
  13. जातीयता विकास –‘सुना है वह दधीचि का त्याग हमारा जातीयता विकास’ : आर्यावर्त की राष्ट्रीयता की यश-वृद्धि प्र.ग्रं.-4/138 पंचम अंक/स्कंदगुप्त
  14. दलित‘दलित भारत की ही विधवा है’ : पीड़ित, उपेक्षित नि.र.-1/72, विधवा
  15. दारिद्र्य दलित बिलखाती‘दारिद्र्य दलित बिलखाती हो यह शस्य श्यामला प्रकृति रमा’ : दरिद्रता से दबी-कुचली और विलाप करती हुई (प्रकृति) प्र.ग्रं.-2/176, इड़ा/कामायनी
  16. दीन-दलित‘वह टूटे तरु की छुटी लता-सी दीन — / दलित भारत की ही विधवा है’ : बेचारी और बेसहारा (शोषित) नि.र.-1/72, विधवा
  17. देश जाति ‘रच देश जाति की भित्ति अमर!’ : देश और जाति के बंधन, स्थान और जन्म के बंधन पं.ग्रं.-2/11, वे डूब गये/युगपथ
  18. पदतल ‘यहां भूख से विकल दलित को पदतल में फिर-फिर गिरवाती’ : पैरों के नीचे दबा हुआ प्र.ग्रं.-2/259, रहस्य/कामायनी
  19. पद-दलित‘पद-दलित धरा तल’ : पैरों से कुचला हुआ पं.ग्रं.-1/225, परिवर्तन/पल्लव
  20. बंटा श्रम ‘चार वर्ण बन गए बंटा श्रम उनका अपना’ : सारस्वत प्रदेश में – श्रम-विभाजन किया गया और चार वर्ण बनाए गए प्र.ग्रं.-2/203, संघर्ष/कामायनी
  21. बहु-जाति‘बहु-जाति, क्यारियों के पुष्प-पत्र-दल-भरे’ : अनेक जातियां नि.र.-1/156, महाराज शिवाजी का पत्र
  22. भिन्न-जाति‘दोनों हम भिन्न-वर्ण/भिन्न जाति, भिन्न रूप/भिन्न धर्मभाव, पर/केवल अपनाव से, प्राणों से एक थे’ : अलग जाति नि.र.-1/328, प्रेयसी
  23. भीलनी – ‘भीलनी का जूठा उपहार’ : भील जाति की स्त्री, शबरी ने राम को जूठे बेर खिलाए थे पं.ग्रं.-1/113, हृदय के बंदी तार/वीणा
  24. मेरे जाति ‘मेरे साथ मेरे विचार– /मेरे जाति– /मेरे पददलित–’ : जन्मे नि.र.-1/132, स्वाधीनता पर (2)
  25. वर्ग बनाया‘मैंने ही श्रम-भाग किया फिर वर्ग बनाया’ : चार वर्ग बनाया – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र प्र.ग्रं.-2/206, संघर्ष/कामायनी
  26. वर्ण-संकर‘दूर हो तम-भेद यह जो वेद बनकर वर्ण-संकर’ : जातिवाद, भेद-भाव नि.र.-1/245, बुझे तृष्णाशा-विषानल झरे
  27. वर्णाधम ‘वे वर्णाधम, रे द्विज उत्तम’ : वर्ण की दृष्टि से अधम, शूद्र नि.र.-1/288, तुलसीदास
  28. वर्णों ‘द्वयता में लगी निरंतर ही वर्णों की करती रहे वृष्टि’ : चार वर्णों में बंटा समाज – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र प्र.ग्रं.-2/176, इड़ा/कामायनी
  29. विकल दलित ‘यहां भूख से विकल दलित को पदतल में फिर-फिर गिरवाती’ : व्याकुल और शोषित-पीड़ित प्र.ग्रं.-2/259, रहस्य/कामायनी
  30. विग्रहों‘बहु भेद विग्रहों में खोई ली जीर्ण जाति क्षय से उबार’ : आपसी बिखराव पं.ग्रं.-2/25, बापू के प्रति/युगपथ
  31. शूद्रगण ‘शूद्रगण क्षुद्र-जीवन-संबल, पुर-पुर में’ : शूद्र वर्ण की जातियां नि.र.-1/287, तुलसीदास

महादेवी वर्मा की रचनाओं में अक्सर यह देखा जाता है कि उनके बिंब स्त्री विमर्श पर केंद्रित और अपेक्षाकृत कम संस्कृतनिष्ठ होते हैं, जबकि अन्य तीनों कवियों की रचनाओं में ऐसा नहीं देखा जाता। अब चूंकि आप दोनों ने एक काव्यकोश का निर्माण कर दिया है तो आपकी राय क्या है?

महादेवी की काव्य-भाषा और कविता की संरचना अपनी जटिलता में निराला के बाद रखी जा सकती हैं। वे शब्दों के चयन में क्लिष्ट नहीं हैं, मगर उनकी कविता के सुसंगत अर्थ तक पहुंचने में श्रम करना पड़ता है। उनके स्त्री बिंबों की जटिलता के बारे में आप इसी से अंदाज़ लगा सकते हैं कि उन्होंने अपनी कविताओं में एक बार भी ‘स्त्री’ या ‘नारी’ शब्द का प्रयोग नहीं किया है, मगर उनकी कविताएं स्त्री-संसार का सच्चा प्रतिनिधित्व करती हैं। उनकी कविताओं में आयी हुई प्रेम-भावना स्त्री-पुरुष के सामान्य प्रेम की भाषा में व्यक्त नहीं हुई है, उसे जेंडर-मुक्त भाषा के रूप में पढ़ते हुए स्त्री के पक्ष में महसूस किया जा सकता है।

आगे आप दोनों की क्या योजनाएं हैं?

आजकल हम दोनों ‘रामचंद्र शुक्ल कोश’ के लिए काम कर रहे हैं। जिन पदों और पदबंधों के सहारे शुक्ल जी की आलोचना निर्मित हुई है, उन्हें कोश-बद्ध करने का इसमें प्रयास किया जा रहा है। शुक्ल जी और छायावाद का समय लगभग एक ही है। प्रायः दोनों के बीच के विरोध को रेखांकित किया जाता रहा है। मगर, कोश की प्रविष्टियों के आधार अनेक शब्द-प्रयोगों की समानता को हमने महसूस किया है। उदाहरण के लिए ‘हृदय’ शब्द से बनी हुई प्रविष्टियों की समानता और बहुतायतता को देखा जाना चाहिए। एक ही दौर के विरुद्ध समझे जानेवाले महान लेखन में कुछ आंतरिक समानताओं का मिलना सुखद आश्चर्य लगता है।

‘छायावादी काव्य-कोश’ में ‘हृदय’ से संबंधित प्रविष्टियां इस प्रकार हैं– ‘हृतंत्री की लय’, ‘हृत्कंपन’, ‘हृत् तंत्री’, ‘हृत्तंत्री’, ‘हृत्तल’, ‘हृत्पथ में धूल’, ‘हृदय-कंप’, ‘हृदय का कुसुम’, ‘हृदय का राजस्व’, ‘हृदय का स्वाधिकार’, ‘हृदय की अनुकृति’, ‘हृदय की चिर खोज’, ‘हृदय की तृप्ति’, ‘हृदय की परवशता’, ‘हृदय की सौंदर्य-प्रतिमा’, ‘हृदय-कुसुम’, ‘हृदय के हास’, ‘हृदय-क्षत’, ‘हृदय दो’, ‘हृदय-नभ-तारा’, ‘हृदय-निःस्वन’, ‘हृदय-निकष’, ‘हृदयपयोधि’, ‘हृदय-पुलिन’, ‘हृदय भेदिनी दृष्टि’, ‘हृदय मरुस्थल’, ‘हृदय मूर्च्छना’, ‘हृदय-रत्न-निधि’ ‘हृदय रुद्र कपाट’, ‘हृदय विपिन की कलिका’, ‘हृदय-सर’, ‘हृदय-हर, ‘हृदय-हार’, ‘हृदय है पास’, ‘हृदयाधिकारी’, ‘हृदयाब्धि’, ‘हृदयालंकार’, ‘हृदयों की शिशुता’, ‘हृद्धाम’, ‘हीरे-सा हृदय’।

अभी तक मैंने रामचंद्र शुक्ल की केवल चार पुस्तकों से प्रविष्टियां ली हैं। वे पुस्तकें हैं – ‘मलिक मुहम्मद जायसी’, ‘गोस्वामी तुलसीदास’, ‘सूरदास’ और ‘रसमीमांसा’। इन चारों पुस्तकों से ली गई प्रविष्टियां इस प्रकार हैं– ‘हृत्कमल’, ‘हृदय’, ‘हृदय का बंधन खुलना’, ‘हृदय का भीतरी मूल देश’, ‘हृदय की प्रकृत दशा, ‘हृदय की मुक्त दशा, ‘हृदय की मुक्तावस्था, ‘हृदय की मुक्ति की साधना, ‘हृदय की वह कोमलता’, ‘हृदय की विशालता’, ‘हृदय की वृत्तियां’, ‘हृदय की सामान्य वृत्ति’, ‘हृदय को अधिक स्पर्श करनेवाला’, ‘हृदय पक्ष और बुद्धि पक्ष’, ‘हृदय प्रसार का स्मारक स्तंभ’, ‘हृदयग्राह्य पक्ष का प्रत्यक्षीकरण’, ‘हृदयपक्ष तथा स्वानुभूति पक्ष’, ‘हृदयसाम्य का अनुभव’, ‘हृदयहारिणी और व्यापकत्वविधायिनी पद्धति’।

मेरी जानकारी में इस तरह की आलोचना-प्रक्रिया को अपनाकर हिंदी में कोई काम नहीं हुआ है। कोश आने के बाद, शब्द-प्रयोग को आधार बनाकर, कुछ आलोचनात्मक लेख तैयार करने का हम प्रयास करेंगे।

(संपादन : राजन/अनिल)


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लेखक के बारे में

नवल किशोर कुमार

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस के संपादक (हिन्दी) हैं।

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