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मणिपुर में सामान्य स्थिति बहाल नहीं करने के पीछे सरकार का ‘हिडेन पॉलिसी’ : नबा कुमार सराणिया

अभी जो केंद्र सरकार का रवैया है, उससे लगता नहीं है कि वह वास्तव में इस हालात को नियंत्रित करने के मूड में है। बल्कि वे तो इसे और बढ़ावा दे रहे हैं। अभी यह मिजोरम तक फैल गई है और असम में भी इसी तरह की बातें हो रही हैं। पढ़ें, कोकराझार, असम के निर्दलीय सांसद नबा कुमार सराणिया से यह साक्षात्कार

[असम के कोकराझार लोकसभा क्षेत्र से निर्दलीय सांसद नबा कुमार सराणिया पूर्वोत्तर और आदिवासियों के सवालों को लेकर मुखर रहे हैं। चाहे वह आदिवासियों के लिए पृथक धार्मिक कोड का मसला हो या फिर मणिपुर में पिछले तीन महीने से जारी हिंसा का सवाल। फारवर्ड प्रेस के प्रधान संपादक अनिल वर्गीज और उप-संपादक (हिंदी) राजन कुमार ने गत 25 जुलाई को दिल्ली में नबा कुमार सराणिया से उनके आवास पर विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत बातचीत काे हिंदी भाषी पाठकों के लिए आंशिक तौर पर संपादित किया गया है।] 

मणिपुर धधक रहा है और वहां से भयावह खबरें आ रही हैं। क्या आपने अपने जीवन में इस तरह का घटनाक्रम पहले कभी देखा-सुना है? 

मणिपुर में जो पिछले करीब तीन महीने से हो रहा है, अत्यंत ही दुखद और शर्मनाक है तथा इसकी निंदा करने के लिए मेरे पास कोई शब्द नहीं हैं। मैंने पहले ही कहा है कि उधर हिंसा करने के लिए जो जिम्मेदार हैं, उनसे कहीं ज्यादा ज़िम्मेदार हमारी केंद्र सरकार है, क्योंकि वहां केंद्र सरकार ही सबकुछ है और मणिपुर में भी उसी पार्टी की सरकार है, जिसकी सत्ता केंद्र में है। उन्हें उपयुक्त कदम उठाना चाहिए था। इसलिए अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को कम-से-कम इसकी नैतिक रूप से जिम्मेदारी लेकर अपने-अपने पदों से इस्तीफा देना चाहिए। 

यह तो हुई पहली बात। दूसरी बात यह कि मणिपुर में जो हमारा कुकी, नागा, मैतेई समुदाय है, उनके बीच पहले से थोड़ा बहुत तनाव था। लेकिन वहां कुछ विद्रोही ग्रुप थे, जिन्होंने पहले तो हथियार डाल दिए थे। लेकिन अब मणिपुर की मजबूरी ऐसी है कि महिलाएं और बच्चे भी बंदूक उठाने पर मजबूर हो गए हैं। उनका सरकार और सिस्टम से भरोसा उठ गया है और अभी जो हो रहा है, वह बिलकुल भी अच्छा नहीं है। इसलिए केंद्र सरकार को कार्रवाई करनी चाहिए और यदि वह नहीं कर सकती, तो मणिपुर की जिम्मेदारी हम जैसे लोगों को दे, हम पूरे सिविल सोसाइटी की मदद से मणिपुर को जरूर कंट्रोल कर लेंगे। अभी तो वह [राज्य सरकार] किसी को वहां जाने भी नहीं दे रही है। तो मैं इसलिए कहता हूं कि यदि कम-से-कम लोगों को वहां जाने तो दो। फिर चाहे वह राजनीतिक दलों के सदस्य हों, सामाजिक कार्यकर्ता हों या फिर बुद्धिजीवी हों। यदि सबको वहां जाने देगें तो मणिपुर के बारे में सब कुछ पता चल सकेगा। हां, मणिपुर की घटना से भारत की बदनामी तो हुई है, लेकिन वहां सबके जाने से अच्छा यह होगा कि यदि वे वहां के लोगों को समझा पाएंगे, तो हो सकता है कि वे हिंसा रोकने को तैयार हो जाएं। वर्ना अभी तो वहां उन्हें समझाने वाला भी कोई नहीं है। 

मणिपुर तो अभी संभवत: गोल्डन ट्रायंगल [अफीम उत्पादन के लिए जाना जाने वाला क्षेत्र, जिसमें म्यांमार, थाईलैंड और लाओस शामिल हैं] में भी सम्मिलित हो गया है। इसलिए वहां थोड़ा विदेशी प्रभाव भी है। बहुत सारे मैतेई और नागा केवल भारत में ही नहीं, म्यांमार में भी हैं। स्वतंत्रता के समय वे हमसे अलग हो गए थे। लोग बोल रहे हैं कि अभी सब एक्सपोज हो रहे हैं, उधर जो ड्रग्स का बिजनेस करता है, कोई हथियारबंद दस्ता चलाता है, उसमें सीएम के लोग भी शामिल हैं। ऐसी बहुत सारी बातें सामने आई हैं। तो मुझे लगता है कि इन सबके लिए प्राथमिक तौर पर जिम्मेदार केंद्र सरकार है, क्योंकि वह अभी स्थिति को संभाल नहीं पाई है। जो दो दिनों के अंदर में संभाल लेना चाहिए था, वह अब खींचते-खींचते तीन महीने तक हो गया।  

तो आपको क्या लगता है कि हाल में पूर्वोत्तर में ऐसा क्या बुनियादी बदलाव हुआ है कि मणिपुर में ऐसी स्थितियां बन गईं?

देखिये, मौलिक बदलाव ऐसा हुआ है कि पूर्वोत्तर के लोग पहले अपने मामले खुद ही सुलझा लेते थे। लेकिन 1950 में मणिपुर भारत का हिस्सा बनने के बाद अबतक जो वहां हुआ है, वह ठीक नहीं हुआ है। यदि मणिपुर के भारत का हिस्सा बनने के बाद वहां अच्छा होता तो अच्छी बात होती, लेकिन वहां समस्या अभी भी जस-की-तस हैं, क्योंकि उधर जो समस्याएं हैं, वे अकेले मणिपुर की नहीं हैं, बल्कि दूसरे राज्यों के भी हैं। आदिवासी के रूप में मान्यता देने के मसले पर हमने भी संसद में कहा है कि कोई भी इंडीजीनस [मूलवासी] लोग आदिवासी बन सकता है, यदि वह आदिवासियत के लिए निर्धारित कसौटियों को पूरा करता हो। तो इसको केंद्र सरकार को सुलझाना पडे़गा कि किसको आदिवासी का दर्जा देने से किसको फायदा होगा और किसको नुकसान। और यह भी कि इससे जिस समुदाय को नुकसान होगा, उसके नुकसान की भरपाई आप कैसे करेंगे, यह देखना होगा। मुझे लगता है कि यह ऐसी कोई समस्या नहीं है, जिसका हल नहीं निकल सकता, लेकिन अभी जो केंद्र सरकार का रवैया है, उससे लगता नहीं है कि वह वास्तव में इस हालात को नियंत्रित करने के मूड में है। बल्कि वे तो इसे और बढ़ावा दे रहे हैं। अभी यह मिजोरम तक फैल गई है और असम में भी इसी तरह की बातें हो रही हैं, क्योंकि मिज़ो वाला भी तो कुकी डायनेस्टी [वंश] से संबंधित हैं। तो हालात अभी नियंत्रण के बाहर हैं। जबकि भारत में शामिल होने के बाद मणिपुर का हाल अच्छा होना चाहिए था, लेकिन हालात बदतर होते गए। अब मणिपुर के लोग अवैध नागरिक नहीं, भारत का हिस्सा हैं। तो जो कुछ भी होगा उसके लिए भारत सरकार की जिम्मेदारी होगी। मणिपुर बार्डर एरिया [सीमावर्ती] और ‘गोल्डन ट्रायंगल’ का भाग होने के नाते यह अंतर्राष्ट्रीय मामला बन गया है। मैंने पहले कहा है कि जो व्यक्ति हमारे समाज के अनुसार नहीं है, गुस्से में चर्च-मंदिर-मस्जिद तोड़ेगा, या कोई ऐसा लोग जो किसी खास धर्म या जाति से मैनीपुलेटेड है, वहीं यह सब कर सकता है। इसीलिए इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और अन्यों का भी नाम आ रहा है। मुझे लगता है कि इसके पीछे कोई ऐसी चीज या हिडेन कॉज [अदृश्य कारण] हो सकता है, जो मणिपुर में आगजनी और हिंसा की कोशिश कर रहा है।

तो क्या इसमें बहुत सारी चीजें एक साथ काम कर रही हैं – जैसे कि सरकार की नीतियां, अर्थव्यवस्था की स्थिति और म्यांमार का घटनाक्रम? आप क्या सोचते हैं? 

पूर्वोत्तर में एक समस्या उग्रवाद की भी है, क्योंकि अभी मणिपुर में हों, या नागालैंड में हों, या असम में हों या फिर अन्य किसी राज्य में हाें, सब लोग कुछ युद्धविराम में और अन्य समझौते में शांत हैं। लेकिन मूल बात यह कि कोई हल नहीं निकला है। समाधान नहीं हुआ है। केंद्र सरकार सिर्फ युद्धविराम करा लेने से चुप बैठ जाएगी तब समस्या का कोई समाधान नहीं होगा। जबकि इनकी समस्या तो गंभीर समस्या है और इनका समाधान बाकी रह गया है। केंद्र सरकार इसका समाधान कर सकती है यदि वह करना चाहे तो। यह भी पूर्वोत्तर का एक बड़ा मुद्दा है। दूसरा मुद्दा है पूर्वोत्तर के बहुत सारे लोग बाहर में हैं और ठेका श्रमिक, मजदूर रूप में काम कर रहे हैं। वे कोई भी अच्छे पदों पर नहीं हैं। पूर्वोत्तर में ऐसा कोई पहल नहीं किया गया है कि उद्योग-धंधे और व्यापार का विकास हो। जब कोई सिचुएशन ऐसा आता है तो बेचारे वे लोग लड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं। मैंने तो कश्मीर में भी देखा है कि अनुच्छेद 370 (हटाए जाने) के बाद से वहां के लोगों की सुनने वाली कोई सरकार भी नहीं है, क्योंकि जम्मू-कश्मीर अब केंद्र शासित प्रदेश हो गया है। तो ऐसे में वे अपनी समस्याएं बताएं तो किसको बताएं? सभी प्रकार के विकास कार्यक्रम बंद पड़े हैं। वहां से भी बहुत सारे नौजवान निकल कर आ रहे हैं। कुछ करना चाहते हैं, लेकिन उनके पास कौई मौका नहीं है। पूर्वोत्तर का भी यही हाल है। हमारे इधर भी सिस्टम [सरकार की व्यवस्था] तो पूरी तरह फेल हो गई तो हमें आना पड़ा। अभी तो हम कोकराझार में बैठें है, इसलिए वहां शांति है। 

लेकिन जो अभी सिस्टम [सरकार की व्यवस्था] है, वह चीजों को बिगाड़ने में मदद करती है। सुधारने का प्रयास नहीं करती है। इसलिए मैंने 27 जुलाई, 2023 को सबको जंतर-मंतर पर आने के लिए कहा है। वहां बैठकर हमलोग सलाह-मशविरा करेंगे कि सरकार को कैसा संदेश देना है, क्योंकि आदिवासी पहचान का भी एक मुद्दा आ गया है। यह इसलिए कि कुकी आदिवासी हैं और नागा भी आदिवासी हैं, लेकिन मैतेई तो आदिवासी नहीं है, लेकिन वे इंडीजीनस [मूलवासी] हैं। तो बहुत सारे लोग यह सोच रहे हैं कि हमारे आदिवासी भाई आपस में लड़ रहे हैं और देश पूरे विश्व में बदनाम हो गया है तो यह ठीक नहीं है। सबको लगता है कि यह सरकार कुछ नहीं कर रही है। कुछ लोगों को लगता है कि सरकार ही यह सब कर [हिंसा में शामिल समूहों को भड़का] रही है। तो यह सब ठीक नहीं है। 

नबा कुमार सराणिया, सांसद, कोकराझार (असम)

यहां से देखने पर ऐसा लगता है कि ध्रुवीकरण की राजनीति भारत के मध्य-उत्तर क्षेत्र से पूर्वोत्तर में गई है। आपको क्या लगता है?  

देखिये, मणिपुर में अभी जो हालात हैं, उसकी वजह से पूर्वोत्तर में भाजपा का ग्राफ काफी नीचे चला गया है, क्योंकि यह सिर्फ मणिपुर में हुआ है, लेकिन यह सिर्फ मणिपुर का मुद्दा नहीं है। यह एक राष्ट्रीय भी नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है। चाहे वह कोई भी जाति का हो, अपनी मां-बहन, भारत की मां-बहन है, उसके ऊपर इतना जोर-जुल्म और अत्याचार होगा तो सारा समाज, जो भी इस गणतंत्र और संविधान को मानने वाले लोग हैं, सबलोग अपनी मां-बहन की इज्जत करतें हैं, तो यदि उसके साथ ऐसा हो गया तो यह लोगों की बर्दाश्त के बाहर है। यह बहुत दुख की बात है। मणिपुर में हिंसा अंतर्राष्ट्रीय खबर बन गई है। यह नहीं होना चाहिए था। पहले से ही कदम उठाना चाहिए था। इसे दो दिनों में नियंत्रित कर लिया जाना था… लेकिन किसी को लगता है कि वहां कोई हिंसा भड़काने से उन्हें लाभ होगा या देश को फायदा होगा, तो मुझे लगता है कि यह गलत सोच है। इसलिए मैं कहता हूं कि इसके पीछे कोई गुप्त एजेंडा है, जिसका पर्दाफाश होना चाहिए। अभी तो सिर्फ मानवाधिकार आयोग ही नहीं, बल्कि भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति बनाई जानी चाहिए, संसद की एक संयुक्त समिति बनाई चाहिए। वहां जाकर इस हिंसा की तीन-चार कोणों से पड़ताल की जाएगी तो सच्चाई निकलकर सामने आएगी। 

मणिपुर के लिए आगे का रास्ता क्या होना चाहिए? 

वहां के लोग कहां जाएंगे? उनकी मातृभूमि वहीं है। आज के समय में कोई भी राज्य या राज्य के लोग किसी भी बाहरी को पनाह देने को तैयार नहीं हैं। राष्ट्रीय स्तर पर एक नीति बनाई जानी चाहिए। सबसे पहले तो यह कि लोगों को वहां [मणिपुर] जाने की इज़ाज़त देनी चाहिए ताकि जो-जो घटनाएं वहां हुईं हैं, वे सामने आएं। तो वहां परदे के पीछे से काम कर रहे लोग भाग जाएंगे, जब सच सामने आ जाएगा। सच्चाई सामने आने के बाद वहां मेल-मिलाप की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। नेल्सन मंडेला ने काला और गोरा भेदभाव के खिलाफ जो आंदोलन किया था तो न जाने कितने साल वह जेल में रहे। फिर भी उन्होंने मेल-मिलाप की प्रक्रिया शुरू की। अब आप दक्षिण अफ्रीका में ऐसा भेदभाव के बारे में नहीं सुनते। हालांकि यदि भेदभाव वाले कुछ वहां हैं भी तो भूमिगत हैं। तो कुकी और मैतेई के बीच आज से नहीं, बल्कि एक सदी पहले से तनाव है। यदि आप उनको भड़काएंगे, एक-दूसरे से लड़ाएंगे तो वे आपस में लड़ेगे। अगर आप उन्हें प्यार से समझाएंगे – जैसा कि मैंने पूर्वोत्तर वालों से कहा कि है आपस में नहीं लड़ना है, बल्कि सत्ता में आओ और दिल्ली पर राज करो, क्योंकि सत्ता अभी आपस में लड़ने से नहीं मिलेगी। अभी सत्ता में जो लोग बैठे हैं, वे औजार के जैसा हमारा इस्तेमाल कर रहे हैं। हो सकता है कि उनके लिए मणिपुर वाले एक औजार हो एक-दूसरे से लड़ाने के लिए। लेकिन मणिपुर के लोग इंसान हैं और हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं तथा मानवता के नाते उनको वह सभी सुविधाएं मिलनी चाहिए, जो दूसरों को मिलती हैं। इसलिए मैंने कहा कि आप वहां क्यों लड़ रहे हो? अगर कोई समस्या है तो उसे दिल्ली में लेकर आओ। हम सब मिलकर यहां [दिल्ली, संसद] में लड़ेंगे। आज नहीं तो कल हम सत्ता में ज़रूर भागीदार बनेंगे। मैंने वहां – जितने विद्रोही समूह या फिर शांति सेना या अन्य ग्रुप हैं – सभी लोगों से बोला है कि आप लोग हीरा भाई के [मेरे साथ] साथ आइए। कम से कम हम 20-25 सांसद भी निर्वाचित होंगे तो सरकार को अपने लिए नीति बनाने पर मजबूर कर पाएंगे। हम सरकार से कह सकेंगे कि जो अपने वायदे किए हैं, उन्हें निभाइए, नहीं तो हम आपको गद्दी से उतार देंगे। हमारी तो कोशिश यही है कि कम से कम मेरी गण सुरक्षा पार्टी और हमारे अन्य 18 संगठनों के गठबंधन से 100 सांसद चुनकर लाना है। यदि 100 नहीं तो 50 सांसद भी हमारे पास निर्वाचित हो गए तो हमलोग नीतिगत निर्णयों में हस्तक्षेप कर पाएंगे, सरकार का हिस्सा बन सकते हैं। मैंने तो नागालैंड, मिजोरम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और असम के अपने सभी आदिवासी भाइयों को कहा है। अभी हमारी जितनी राष्ट्रीय पार्टियां हैं या राज्य स्तर की पार्टियां हैं, उन्होंने अभी तक क्या हासिल कर लिया हमारे लिए? कुछ भी तो नहीं। अभी हमारे जितने सांसद हैं, जितने विधायक हैं, वे भी तो कुछ नहीं कर पा रहे हैं। 

हां, हम भी आपसे यही पूछनेवाले थे कि आप लोग, जैसे पूर्वोत्तर के सभी आदिवासी सांसद मिलकर क्या एक प्लेटफार्म तैयार कर सकते हैं, ताकि साझा रूप से प्रतिरोध की शुरुआत कर सकें?  

मैंने पूर्वोत्तर के सांसदों के फोरम के अध्यक्ष किरेन रिजीजू को लिखा है कि जल्द से जल्द पूर्वोत्तर के सांसदों को बुलाएं कि सांसदों की एक टीम मणिपुर का दौरा करे। यदि कोई सांसद नहीं जाता है तो हम जाएंगे, क्योंकि हम भी एक सांसद हैं, और एक जिम्मेदार नागरिक भी। हम समाज में रहते हैं। सरकार अनुमति नहीं देगी, तब भी हम जाएंगे। हालांकि सरकार की भी मजबूरी बन जाएगी, क्योंकि जबतक सांसदों को [मणिपुर] जाने नहीं दिया जाता, तबतक अन्य नागरिकों को नहीं जाने दिया जाएगा। मैंने सुना है कि केंद्र सरकार ने राहत शिविरों में राहत कार्यों के लिए 100 करोड़ रुपए मंज़ूर किया है, लेकिन ऐसे अनेक इलाके हैं, जहां अभी तक कोई मदद नहीं पहुंची है। लोग इसलिए भी नाराज हैं, क्योंकि मुख्यमंत्री [एन. वीरेन सिंह] सिर्फ मैतेई लोगों के मुख्यमंत्री नहीं हैं, वह पूरे राज्य के मुख्यमंत्री हैं। तो वहां ऐसा कोई व्यक्ति चाहिए, जो सबको एक समान देखे और जब स्थिति सामान्य हो जाए तो एक विशेष समिति बनाई जाए तथा यदि मैतेई लोग एसटी दर्जे की मांग करते हैं, यदि नागा लोग यह मांग करते हैं कि उनका क्षेत्र दूसरों के हाथ में न जाए और कुकी लोग सुरक्षा की मांग करते हैं तो समिति इन सभी के ऊपर विचार करे। मुझे नहीं लगता है कि यह सब मुश्किल होगा। समिति के माध्यम से हम उन्हें समझाकर समस्या का निराकरण कर सकते हैं। लेकिन पहली प्राथमिकता हालात को सामान्य बनाना है और इसके लिए केंद्र सरकार को पहल करनी होगी। अगर वह सामान्य स्थिति बहाल नहीं कर सकती है तो उसे इस्तीफा देना चाहिए। हमने उन्हें कहा है कि अगर वे हमें 48 घंटे के लिए पावर दे दें तो हम स्थिति को नियंत्रण कर लेंगे। हम यह कैसे करेंगे, यह हमारी जिम्मेदारी है। मणिपुर सहित पूरे पूर्वोत्तर के लोग हमारे साथ हैं, क्योंकि वे लोग केंद्र सरकार पर भी संदेह कर रहे हैं, क्योंकि केंद्र सरकार उनके साथ दोहरा रवैया अपना रही है और वहां के मुख्यमंत्री पर तो कर ही रहे हैं।

तो क्या आप वहां जाने पर विचार कर रहे हैं?

पहले तो हमने पूर्वोत्तर के सांसदों के फोरम को लिखा है और वहां के स्थानीय सांसदों को भी लिखा है। हमने लोकसभा में भी उन सांसदों से कहा कि हमें लोकसभा अध्यक्ष से बात करनी चाहिए कि हम लोग मणिपुर जाएंगे। इस संबंध में हमने वहां कई लोगों से बात की है। अब देखिए, संसद सत्र के दौरान भी हम लोग वहां जा सकते हैं। 

प्रस्तावित समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर पूर्वोत्तर में काफी विरोध देखने को मिल रहा है। यहां दो बातें हैं। एक तो यह कि पूर्वोत्तर के चार राज्यों में संविधान की छठी अनुसूची लागू है, और उधर के अन्य राज्यों में भी संविधान के विशेष प्रावधान जैसे अनुच्छेद 371 (ए), (बी), (सी), (जी) और (एच) लागू हैं। ऐसे में यूसीसी कितना प्रासंगिक होगा? साथ यह भी कि इन विशेष प्रावधानों के तहत इन राज्यों को स्वायत्तता दी गई है। वहां स्वायत्तशासी परिषदें भी अस्तित्व में हैं। फिर भी वहां के अधिकांश लोग काम की तलाश में बाहर जाते हैं। आखिर ये विशेष कानून कारगर क्यों नहीं हो सके हैं? 

यूसीसी का जो मामला है, उससे संबंधित कोई विधेयक अभी तक संसद में प्रस्तुत नहीं हुआ है। अभी इसपर सरकार सलाह-मशविरा ले रही है। लेकिन हम तो खुलेआम बोलेंगे कि जहां छठी अनुसूची लागू है, 371 ए, बी, सी इत्यादि विशेष कानून लागू हैं, वहां यूसीसी लागू ही नहीं होगी। लेकिन ध्यान में रखना चाहिए कि देश कि कुल आदिवासी आबादी का 10 प्रतिशत भी पूर्वोत्तर में नहीं रहता है। करीब 90 प्रतिशत आदिवासी तो देश के दूसरे हिस्सों में रहते हैं। अगर आदिवासियों को यूसीसी से बाहर रखना है तो सभी आदिवासियों को रखना होगा। हम तो यह भी मांग करते हैं कि जहां पांचवीं अनुसूची लागू है, वहां छठी अनुसूची लागू किया जाना चाहिए। लेकिन एक शर्त है। इन क्षेत्रों में जो गैर-आदिवासी बहुत पहले से रह रहे हैं – फिर चाहे वे दो प्रतिशत हों, या दस प्रतिशत – उन्हें भी वही सुविधाएं दी जानी चाहिए, जो आदिवासियों को मिल रही हैं, क्योंकि वे वहां सबसे अंतिम वर्ग में आ जाएंगे। दूसरी बात यह है कि भारत इतनी विविधताओं वाला देश है कि आप यहां यूसीसी जैसा कोई कानून लागू नहीं कर सकते। बहुत सारे जानकार लोग भी कह रहे हैं कि हिंदुओं में भी प्राब्लम है, जैनियों को भी हिंदुओं से अलग रखना पड़ेगा। सरकार या नीति निर्माता, जो यूसीसी के बारे में बोल रहे हैं, उनसे हमारे लोग कहते हैं कि पहले हिंदुओं में समानता लाकर दिखाएं। पहले आदिवासियों को अलग धर्मकोड दीजिए, क्योंकि अगर वे खुद को हिंदू या ईसाई कहेंगे तो आप कहेंगे कि वे आदिवासी नहीं हैं। लेकिन आदिवासियों को तो आपने कोई पृथक धार्मिक पहचान दिया ही नहीं हैं। इसीलिए मैंने संसद में आदिवासी धर्म का मुद्दा उठाया कि पहले आदिवासियों को अलग से धर्मकोड देना चाहिए। और यह धर्मकोड ‘आदिवासी’ हो गया तो इसके अंदर श्रेणियां बनानी पड़ेंगीं, जैसे सरना, बाथौ, गोंडी आदि। दूसरा, आदिवासियों की बहुत सारी भाषाएं जैसे गोंडी, कुड़ुख, भीली आदि को अभी तक मान्यता नहीं मिली है, तो इनको मान्यता देना भी जरूरी है। तीसरा, आदिवासी के जल, जंगल, ज़मीन, खनिज और स्वायत्तता का मसला तो कुछ हद तक छठी अनुसूची से समाधान हो सकता है। जब छत्तीसगढ़ राज्य बना तब आदिवासियों को लगा कि उनका अपना एक अलग राज्य बन गया, लेकिन छत्तीसगढ़ केवल आदिवासियों का तो नहीं है, वह तो सबका है। वैसे ही जब बिहार से अलग होकर झारखंड बना, तो सबने सोचा था कि झारखंड भी आदिवासियों का होगा, लेकिन वह भी तो सबका है। तो इसलिए यह सब गलतफहमी है। अभी ऐसा माहौल नहीं है कि अलग राज्य के लिए संघर्ष करें। हमारे क्षेत्र में भी अलग राज्य के लिए लड़ाई लड़ी गई थी, जिसमें 50,000 लोग मारे गए। काफी दंगा हुआ था। तो हमें इस तरह की हिंसा बिलकुल नहीं चाहिए। आज के समय में कोई भी नागरिक, हमारा गणतंत्र और संविधान इस तरह की हिंसा नहीं चाहता। तो आप जो कर सकते हैं, वह यह कि इन क्षेत्रों में छठी अनुसूची लागू कर सकते हैं। लेकिन उसमें एक बात यह है कि गैर-आदिवासियों की आशंकाओं का समाधान भी करना पड़ेगा। मेरी सभी आदिवासी भाइयों से यही अपील है कि हम सभी एक मंच पर एक ही झंडे के नीचे आएं। अगर अलग-अलग पार्टियां भी हैं, तो थोड़ा समझौता करके ‘एक विजन – एक मिशन’ के तहत चलना पड़ेगा। इसलिए हमारी भी तैयारी है कि कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर तक और मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, ओडिशा, बिहार और उत्तर प्रदेश तक – सभी आदिवासियों को एकजुट करें। और इस दिशा में हमलोग काफी आगे बढ़ गए हैं। सोच के स्तर पर सब एक हो भी गए हैं। कुछ व्यावहारिक समस्याओं को सुलझाया जाना बाकी है। सबसे सलाह-मशविरा चल रही है। हमारे आदिवासी लोगों के पास एक ही कमी है– राष्ट्रीय स्तर का कोई गठबंधन या राष्ट्रीय नेतृत्व का अभाव। हमारी तैयारी चल रही है, और मुझे विश्वास है कि आने वाले दिनों में हम आदिवासी एक झंडे नहीं तो ‘एक विजन – एक मिशन’ के तहत जरूर एक जगह आएंगे और दूसरे लोग भी हमारा साथ देंगे। समाज में बहुत से दबे-कुचले समुदाय हैं, जिनका कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। कोई ओबीसी में आता है, लेकिन उसे ओबीसी का लाभ नहीं मिलता है। इसी तरह ईबीसी (अत्यंत पिछड़ा वर्ग) और एससी (अनुसूचित जातियां) समुदाय भी हैं। कई ऐसे सामान्य श्रेणी में भी रखे गए हैं, जिन्हें कोई  लाभ नहीं मिलता। अगर ये सभी लोग एक साथ आ जाते हैं तो इसका देश के लिए सकारात्मक परिणाम निकलकर आएगा तथा बदलाव का एक दौर शुरू होगा।

मणिपुर ही नहीं, अभी मिजोरम, मेघालय; या पहले भी पूर्वोत्तर में संघर्ष और टकराव की खबरें आती रही हैं। तो आप इसके लिए किसे दोषी मानते हैं – केंद्र सरकार को, राज्य सरकारों को या उद्योगपतियों की कोई भूमिका हो इसमें? 

पहला तो आज की नकारात्मक राजनीति इसके लिए ज़िम्मेदार है। जो भी सत्ता में आता है – चाहे वो कांग्रेस हो या भाजपा या क्षेत्रीय पार्टियां भी, सबके राज में मैंने यही देखा है कि राजनेताओं की यही सोच होती है कि यदि वह एक समस्या सुलझाएगा तो दस और समस्याएं खड़ी हो जाएंगीं। हम कहते हैं कि हम भारतीय हैं। अगर भारतीय होते हुए भी हम मिज़ोरम, मणिपुर या नागालैंड को एक दूसरे से लड़वाते हैं तो यह ठीक नहीं है। तो हमारे पास सकारात्मक नीति बनाने का सही प्लेटफार्म होना चाहिए। तो हम यही करने जा रहे हैं। सिर्फ चिल्लाने और विरोध करने से कुछ होने वाला नहीं है। 

आने वाले दिनों में, क्योंकि अभी सबकुछ आपके सामने है और हमारे सभी जो राज्य हैं– मिज़ोरम, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में चुनाव होने वाले हैं। यदि इन राज्यों में हम एक ताकत के रूप में उभरेंगे तो हम 2024 के आम चुनाव में भी एक बड़ी ताकत बनकर दिखाएंगे। और हमें तीसरी ताकत के रूप में आना होगा, जिससे चाहे ‘इंडिया’ हो या एनडीए, दोनों पर लगाम कस सकें ताकि वे तानाशाह न बन सकें। अन्यथा वे अपनी नीतियों को लागू करेंगे। देश में कई ओबीसी मुख्यमंत्री और मंत्री हैं, पर इससे निम्न ओबीसी समुदायों को कोई लाभ नहीं हुआ है। तो मेरे आदिवासी होने के नाते सभी लोग मुझपर भरोसा करते हैं। कम-से-कम हम जो बोलते हैं, वे करते हैं। इसलिए हमने सभी को यह खुला निमंत्रण दिया है कि आनेवाले दिनों में ये लोग मिलकर चलेंगे तो यह जो हमारी नकारात्मक परिस्थितियां हैं, उनको हम लोग जरूर कंट्रोल कर पाएंगे। हमारे पास दूसरा कोई रास्ता नहीं है।  

जैसे मध्य भारत के आदिवासी क्षेत्रों में, आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन, खनिज सभी संसाधनों पर उद्योगपति काबिज हो गए हैं…. 

देखिये, मेरी तो नीति एकदम साफ़ है। झारखंड में हमने देखा कि पिछली भाजपा सरकार ने क्या किया? उसने आदिवासी क्षेत्रों को खाली कराकर अपने चहेतों और कुछ उद्योगपतियों को आदिवासियों की ज़मीन दे दी। आदिवासियों ने तीर-धनुष के साथ इसका विरोध किया। तीर-धनुष तो प्रतीकात्मक है, लड़ाई के लिए नहीं है, लेकिन हौसला बढ़ाने के लिए, एकजुटता के लिए वे तीर-धनुष का इस्तेमाल करते हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि सरकार को उनकी ज़मीनें वापस करनी पड़ीं। तो इसलिए हम कहना चाहते हैं कि आदिवासियों की सभी ज़मीनों को मत बेचो। आप कहीं एक विशेष आर्थिक क्षेत्र या विशेष औद्योगिक क्षेत्र बना सकते हैं। लेकिन आप आदिवासियों की सारी जमीनें ले लेना चाहते हैं, जिसका उचित भाव भी नहीं दिया जाता है। जो ठीक नहीं है। आने वाले दिनों में हम ऐसा संगठन बना रहे हैं कि अगर सरकार – चाहे एनडीए की हो या ‘इंडिया’ की – अगर वह आदिवासियों को उनकी ज़मीन से बेदखल करने का दुस्साहस करेगी तो हम सरकार को सत्ता से उखाड़कर फेंक देंगे। तो जो हम अभी कर रहे हैं, उसमें हमें सुधार करना है और आने वाले समय के लिए हम एक नई नीति के साथ आगे बढ़ेंगे।   

हमने मध्य भारत के कुछ आदिवासी नेताओं से भी बात की है। वे लोग बता रहे थे कि जिस तरह मध्य भारत में बाहरी लोगों को आदिवासी क्षेत्रों में बसाया गया और संसाधनों को उद्योगपतियों को सौंप दिया गया। उनका यह भी कहना है कि पूर्वोत्तर को भी अशांत करके आपस में लड़ाकर ऐसी कोशिशें की जा रही हैं। जैसे विकास के नाम पर हाईवे बनाये जा रहे हैं, पर उसके पीछे गुप्त एजेंडा है। आदिवासी क्षेत्रों तक बाहरी लोगों और उद्योगपतियों की पहुंच को बनाना। आप इसे किस रूप में देखते हैं?

सरकार की ‘लुक ईस्ट’ नीति केवल कागजों पर है। सरकार की अभी ऐसी कोई नीति नहीं है कि वह पूर्वोत्तर में विकास को या उद्योग-धंधे को बढ़ावा दे। हम आदिवासी न तो व्यापार-व्यवसाय के विरोधी हैं और ना ही उद्योगों के। लेकिन उस पर सिर्फ बाहरी लोगों का कब्जा नहीं होना चाहिए। बल्कि आदिवासियों में उद्यमिता का विकास करने पर फोकस करना होगा। अगर आदिवासी सरकार का हिस्सा बन पाते हैं तो हम विकास को बढ़ावा देंगे, लेकिन पहले अपने को सुरक्षित करके। हो सकता इसके लिए हम अपनी ज़मीन का एक हिस्सा दे दें, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हम अपनी सारी ज़मीनें दे देंगे। हम यह इस तरह से कर सकते हैं कि उसका आदिवासियों पर प्रभाव न पड़े। ये क्या कर रहे हैं, मैंने यह मध्य प्रदेश में देखा है। आदिवासी क्षेत्र में परमाणु उर्जा संयत्र बना दिया है। पहले आदिवासियों को बांध बनाने के लिए विस्थापित किया, मंडला-जबलपुर में। फिर जिस भूमि पर उनका पुनर्वास किया गया, वहां उन्होंने न्यूक्लियर प्लांट [परमाणु संयंत्र] बना दिया, जबकि भारत में काफी सारा रेगिस्तान है। अब देखिए, यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध चल रहा है तो जहां-जहां परमाणु संयंत्र है, सबको डर लग रहा है। अगर मान लीजिये कि भारत के चीन या पाकिस्तान के साथ युद्ध होता है और जबलपुर के इस परमाणु संयंत्र को निशाना बनाया जाता है, तो सिर्फ जबलपुर नहीं, पूरा छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश को साफ कर देगा। तो यहां तो आदिवासी ज्यादा है, और साथ में कुछ गैर-आदिवासी भी इसके शिकार होंगे। तो इसलिए हम ऐसा विकास चाहते हैं जो लोगों के अनुकूल हो। हम ऐसा सरकार चाहते हैं जो लोगों की भलाई के अनुसार कार्य करे। देश के विकास में हमारा कोई विरोध नहीं है, लेकिन हमने लोकसभा में सवाल पूछा है कि जो परमाणु संयत्र आदिवासियों की भूमि पर बना है, उसको कहीं अन्य स्थानांतरित किया जा सकता है या नहीं? जब मैंने वहां का दौरा किया तो मैंने पाया कि आदिवासियों को धोखा देकर उनके बैंक खातों का ब्यौरा उनसे मांगा गया, और कहा गया कि मोदी उनके खातों में 15 लाख रुपये भेजेंगे पर धोखे से ली गई उनकी जमीन का उन्हें केवल 3.5 लाख रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से मुआवजा उस खाता भेज दिया। लेकिन अब हमने उनसे कहा है कि आदिवासियों के साथ ऐसी धोखाधड़ी हम बर्दाश्त नहीं करेंगे। कोई नहीं है तो मैं आपका हीरा भाई आपके साथ है। आपकी इस लड़ाई को हम संसद तक लेकर जाएंगे। और सबको बोला है कि एकजुट होकर चुनाव में निर्वाचित होकर संसद में आइए, मिलकर लड़ेंगे। लेकिन किसी भाजपा या कांग्रेस के गुलाम को संसद में मत भेजिए। हमारे पास कई सामाजिक कार्यकर्ता हैं जो समाज के लिए काम करते हैं। वे आगे आएं और चुनाव लड़ें, हम उन्हें मदद करेंगे। उन्हें संसद में आना है या विधानसभा में। हम उनके साथ खड़े रहेंगे।

(संपादन : अमरीश हरदेनिया/नवल)

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