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प्रेमचंद का ‘हल्कू’

प्रेमचंद कहानी के संक्षिप्त संवाद कहानी दृश्यों को जीवंत उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं। हाव-भाव के माध्यम से उनकी मनःस्थिति को प्रकट किया गया है जो उनके अनूठे कला कौशल और कुशल कहानीकार होने का परिचय है। लेकिन एक झटके में कहानी में सवाल भी उठते हैं। बता रही हैं डॉ. राजकुमारी

साहित्यकार प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘पूस की रात’ एक आंचलिक परिप्रेक्ष्य की कथा है। भारतीय किसान के जीवन की जटिल समस्याओं, नियति, निष्क्रियता के परिणामों की कहानी है। किसान जीवन उत्पीड़न, विडंबनाओं से परिपूर्ण है। लाख कोशिशों के बावजूद भी वह अपने अनुकूल वातावरण और परिस्थितियों में परिवर्तन करने में सक्षम नहीं है। आंचलिक क्षेत्र में जन्मा हल्कू आर्थिक रूप से गरीब भारतीय किसान का प्रतिनिधित्व करता प्रतीत होता है। 

प्रेमचंद ने 9-10 अप्रैल, 1936 को आयोजित प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन में अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा था– “भाषा साधन है, साध्य नहीं। अब हमारी भाषा ने वह रूप प्राप्त कर लिया है कि हम भाषा से आगे बढ़ कर भाव की ओर ध्यान दें”। वे अपने कथन और लेखन में इस बात को स्थापित और प्रमाणित करते हैं। कहानी का आरंभ हल्कू और उनकी पत्नी मुन्नी के बीच नाटकीय संवाद से होता है, जिसमें कर्ज़ की रकम अदा करने का ज़िक्र होता है। नायिका चिंतावश कड़क पूस की सर्दी भरी रात को गुजारने के लिए कंबल के मूल प्रश्न को उठाती है। लेकिन वह मन ही मन घुड़कियों, गालियों और लेनदार के व्यवहार की कल्पना से जमापूंजी देने के निर्णय पर मोहर लगाती है और कंबल की समस्या को पुनर्विचार के लिए छोड़ देती है। दरअसल, महाजनी कर्ज के शिकंजे में फंसे इस दंपत्ति के दुख का आलम यह है कि वर्षों से चुकाने के बाद भी वह कर्ज खत्म होने का नाम ही नहीं लेता है। एक किसान की कमाई उसके खेत की फ़सल है। लेकिन ऋण की राशि को देखते हुए नायिका खेती छोड़ने की बात करती है और मज़दूरी का विकल्प सामने रखती है, जिसे हल्कू नकार देता है। 

नायिका फटे कंबल के बदले नया कंबल लाने के लिए जमापूंजी अपने पति को दे देती है। लेकिन हल्कू उस पैसों से कर्ज़ उतार देता है। कंबल के तीन रुपए जाने की टीस और पति की वेदना से वाकिफ मुन्नी हालातों को बदल देना चाहती थी। कहानी प्रवाह में बहने लगती हैं और धीरे-धीरे आगे बढ़ती है। अपने भविष्य के सुनहरे स्वप्न संजोकर नायक खेतों की रखवाली के लिए सजग प्रहरी-सा खड़ा हो जाता है। यहां प्रेमचंद ने एक किसान के जीवन का बहुत सजीव वर्णन किया है। इस जीवन में वह अकेला नहीं है। उसके साथ उसका कुत्ता भी है। मनुष्य और अबोले पशु के बीच के रिश्ते को प्रेमचंद एक नई ऊंचाई प्रदान करते हैं–

“पूस की अंधेरी रात! आकाश पर तारे ठिठुरते हुए मालूम होते थे। हल्कू खेत के किनारे ऊंख के पत्तों की छतरी के नीचे बांस के खटोले पर अपनी पुरानी चादर ओढ़े कांप रहा था। खाट के नीचे उसका संगी कुत्ता जबरा पेट में मुंह डाले सर्दी से कूँ कूँ कर रहा था। दोनों में से एक को भी नींद न आ रही थीं। हल्कू ने घुटनियों को गर्दन में चिपकाते हुए कहा – ‘क्यों जबरा, जाड़ा लगता है? कहता तो था, घर पर पुआल पर लेटा रह, तो यहां क्या लेने आये थे? अब खाओ ठंड। मैं क्या करूं? जानते थे, मैं हलुवा पुरी खाने जा रहा हूं, दौड़े-दौड़े, आगे-आगे चले आए। अब रोओ नानी के नाम को।’” 

प्रेमचंद (31 जुलाई, 1880 – 8 अक्टूबर, 1936)

प्रेमचंद दो सशक्त बिंब सामने रखते हैं– जबरा एक जानवर और दूसरा हल्कू एक इंसान। दोनों की मन:स्थिति एक समान है। हल्कू द्वारा अपनी गोद में जबरा को बैठाकर उसे गर्माहट देकर सर्दी से सुरक्षित रखने का दृश्य अनुपम है। संवेदनशीलता, आत्मरक्षा, सहनशीलता नायक के सामान्य गुण हैं। दुर्गंध से भरा कुत्ते का शरीर बे-असर है। हल्कू के लिए जबरा की जान सर्वोपरि है। जबरा भी मालिक के लिए अपनी कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी का परिचय देता है। हल्कू जहां, पत्तों से गर्माहट पाने की जुगत में लगा है वहीं, जबरा जानवरों की आहट से चौकन्ना होकर खेतों के इधर-उधर सजगता से मालिक के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को निभाता है।

सर्दी से बचने के लिए हल्कू उपले जलाकर तापता है और अपनी मधुर आवाज़ में सर्द रात में गीत गाता है। वह आनंद में झूमता नींद की बांहपाश में कैद हो जाता है और उसकी पकी हुई फ़सल को जानवर तहस-नहस कर देते हैं।

यहां सवाल यह उठता है कि क्या ऐसा संभव था कि जानवरों ने चुपचाप ही फ़सल उजाड़ दी होगी? या लेखक यह साबित करना चाहते है कि गरीब व्यक्ति निक्कमे और कामचोर होते हैं? आखिर क्या कारण था मुख्य पात्र को निष्क्रिय गढ़ देने का? इसी कहानी में वह लिखते हैं–

“जबरा जोर से भूंककर खेत की ओर भागा। हल्कू को ऐसा मालूम हुआ कि जानवरों का एक झुंड खेत में आया है। शायद नीलगायों का झुंड था। उनके कूदने-दौड़ने की आवाज़ें साफ़ कान में आ रही थीं। फिर ऐसा मालूम हुआ कि खेत में चर रही हैं। उनके चबाने की आवाज़ चर-चर सुनाई देने लगी।

उसने दिल में कहा, “नहीं, जबरा के होते कोई जानवर खेत में नहीं आ सकता। नोंच ही डाले। मुझे भ्रम हो रहा है। कहां! अब तो कुछ नहीं सुनाई देता। मुझे भी कैसा धोखा हुआ!”

उसने ज़ोर से आवाज़ लगाई, “जबरा, जबरा।”

जबरा भूंकता रहा। उसके पास न आया।

फिर खेत के चरे जाने की आहट मिली। अब वह अपने को धोखा न दे सका। उसे अपनी जगह से हिलना ज़हर लग रहा था। कैसा दंदाया हुआ था। इस जाड़े-पाले में खेत में जाना, जानवरों के पीछे दौड़ना असह्य जान पड़ा। वह अपनी जगह से न हिला।

उसने ज़ोर से आवाज़ लगाई, “लिहो-लिहो! लिहो!”

जबरा फिर भूंक उठा। जानवर खेत चर रहे थे। फसल तैयार है। कैसी अच्छी खेती थी, पर ये दुष्ट जानवर उसका सर्वनाश किए डालते हैं।

हल्कू पक्का इरादा करके उठा और दो-तीन क़दम चला, पर एकाएक हवा का ऐसा ठंडा, चुभने वाला, बिच्छू के डंक-सा झोंका लगा कि वह फिर बुझते हुए अलाव के पास आ बैठा और राख को कुरेदकर अपनी ठंडी देह को गर्माने लगा।

जबरा अपना गला फाड़ डालता था, नीलगायें खेत का सफाया किए डालती थीं और हल्कू गर्म राख के पास शांत बैठा हुआ था।

कहानी का मर्म यह है कि जानलेवा सर्दी में खेत में पकी फ़सल को बचाने का सामर्थ्य अब नायक में शेष नहीं है। यह ज्ञात होते हुए भी की यह फ़सल ही भविष्य में आशा, खुशहाली लाएगी। लेकिन उसकी अकर्मण्य दशा एक बदलाव की ओर इंगित करती है। 

किसानी से मोहभंग की स्थिति और चुनौतियों से साहसपूर्वक लड़ना अंतर्मन में बस गया है। घटित घटना पर उसका प्रतिउत्तर यही साबित करता है कि कम से कम खेत में उसे फ़सल की रखवाली अब नहीं करनी पड़ेगी। चौपट हुई तैयार फ़सल का दुख व्यक्त करने की क्षमता अब उसमें और जबरा, दोनों में ही नहीं रही। दोनों ही संघर्ष करके थक चुके हैं। कठोर हृदय होकर पत्नी के जगाने पर वह कहता है– “रात की ठंड में वहां सोना तो नहीं पड़ेगा।” विवशता और लाचारी ने उसे बहुत साहसी व्यक्ति बना दिया और निडरतापूर्वक नियति से लड़ने की ताकत दी। सर्दी से मुकाबला करने की तमाम कोशिशें नाकामयाब हो गई। पकी फ़सल के नष्ट हो जाने पर वह सब चीज़ों से हाथ धो बैठता है। 

इसके बाद भी कथाकार ने कोई मलाल न दिखाकर पात्र को कटघरे में खड़ा कर दिया। अब निर्द्वंद्व भाव से जीवन बिताना चाहता है। किसान से मज़दूर बनने की यात्रा तय करती यह कहानी आंचलिक क्षेत्रों के वास्तविक जीवन का दर्पण है। खेतों को अंगूठा लगवाकर अपने नाम करवा लेना, ऋण के चलते किसान से मज़दूर हो जाने तक तो बात समझ में आती है, लेकिन कोई किसान महिला इतनी हिम्मत कहां से ला सकती है कि पति को खेत छोड़कर मजदूरी करने को कहे? जमींदार के खेत छोड़ने की हिम्मत गरीब किसान कर ही नहीं सकता। पत्नी के द्वारा दिए गए मजदूरी प्रस्ताव को भी अंत में मंजूरी मिल ही गई।

प्रेमचंद कहानी के संक्षिप्त संवाद कहानी दृश्यों को जीवंत उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं। हाव-भाव के माध्यम से उनकी मनःस्थिति को प्रकट किया गया है जो उनके अनूठे कला कौशल और कुशल कहानीकार होने का परिचय है। लेकिन एक झटके में कहानी में सवाल भी उठते हैं। मसलन, इसका मुख्य पात्र किसान है या मज़दूर?

यदि वह किसान था तो उसकी गुदड़ी इतनी तो होती कि वह अपना गुज़र-बसर कर ही लेता और पत्नी मज़दूरी के तीन रुपए बचाने की जिद्द न करती। यहां हल्कू मज़दूर नहीं है क्योंकि उसकी पत्नी उसे मजदूरी करने की सलाह दे रही है। वह किसान तो बिल्कुल भी नहीं है क्योंकि फ़सल आंखों के सामने कोई भी कठिन परिश्रमी किसान उजड़ने नहीं दे सकता। यह मामला उस समय का हो सकता है जब दलित वर्ग को जमीनें दी गई थी, जिसका ध्येय उनका भला करना नहीं था, बल्कि उनसे लगान वसूलना था। इसके अलावा परती और बंजर जमीनें आर्थिक और सामाजिक रूप से कमज़ोर वर्ग के लोगों को सजा के तौर पर दी जाती रही। इस खाली और बंजर ज़मीन पर लगान का अतिरिक्त बोझ डाल कर सदा के लिए उन्हें मज़दूर, निर्धन, गुलाम और कर्ज़दार बना दिया जाता था। लगान उन्हें हर हाल में देना ही पड़ता था। सोचिए, जिनके जीवन में निवालों तक के लाले पड़े थे वो इसबंजर ज़मीन का क्या करते? कहां से बीज, खाद जुटाते होंगे? हल लाते होंगे और फ़िर फ़सल कैसे उगाते होंगे? इस स्थिति में उनके समक्ष दो ही विकल्प थे– बनिये और जमींदार, जिनसे उन्होंने कर्ज़ तो लिए लेकिन उतरे कभी नहीं। सारी उम्र बासी रोटी आधे पेट खाकर या भूखे पेट रहकर व्यतीत किया। कांधे पर हल रखने के गहरे अमिट स्याह निशान इस बात के गवाह हैं। इस बात को कहना इसलिए जरूरी था कि प्रेमचंद की कहानी ‘पूस की रात’ का हल्कू भी ऐसे ही जबरदस्ती मिली जमीन का मालिक प्रतीत होता है, क्योंकि इसमें बहुत-से कारण ठीक ऐसे ही हैं। 

यदि हल्कू जमीन का मालिक था तो उसे पैसे वाला होना चाहिए था। उसे क्या ज़रूरत थी कंबल के पैसे महाजन को देने की? अपनी ही उगाई फ़सल को अपनी आंखों के सामने उजड़ते देखने की? और यदि खेत जमींदार का होता तो हल्कू में हिम्मत ही नहीं होती कि वह चद्दर ताने सोता। कहानी की तमाम घटनाएं इस ओर संकेत करती हैं कि ये जमीन भी लगान वसूलने के उद्देश्य से दी गई होगी। मुन्नी का कथन भी इसी बात की पुष्टि करता है। ज़मीन का कोई भी लाभ उन्हें नहीं होता था। 

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

डॉ. राजकुमारी

डॉ. राजकुमारी दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन कॉलेज (सांध्य) में असिस्टेंट प्रोफेसर व दलित लेखक संघ की अध्यक्ष हैं। इनकी प्रकाशित कृतियों में ‘जल टूटता हुआ : एक विवेचन’, ‘रामदरश मिश्र के कथा साहित्य में गांव’, ‘रामदरश मिश्र के उपन्यास एवं आधुनिक परिप्रेक्ष्य’, ‘स्मृतियों के पंख’ (कविता संग्रह), ‘दर्द ए लफ्ज़’ (शायरी) व ‘द डार्केस्ट डेस्टिनी’ (हिंदी उपन्यास) शामिल हैं।

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