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दूसरे ओबीसी अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में राजेंद्र प्रसाद सिंह ने कहा– ‘ओबीसी छायावादी शब्द नहीं’

अंतर्राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग अनुसंधान केंद्र, नेपाल के अध्यक्ष वीर बहादुर महतो ने इस मौके पर एक अपडेट देते हुए कहा कि नेपाल सरकार द्वारा गठित समावेशी आयोग ने दो महीने पहले ही अपनी रपट में नेपाल की 44 जातियों को ओबीसी में शामिल करने का प्रस्ताव दिया है। पढ़ें, यह खबर

गत 13 जुलाई, 2023 को दूसरे अंतर्राष्ट्रीय ओबीसी साहित्य सम्मेलन का आयोजन दिल्ली विश्वविद्यालय के दयाल सिंह कॉलेज, नई दिल्ली के सभागार में किया गया। इस सम्मेलन में भारत के अलावा नेपाल और मारीशस के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस मौके पर अंतर्राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग अनुसंधान केंद्र, जनकपुर (नेपाल) के अध्यक्ष वीर बहादुर महतो ने अपने संबोधन में जहां एक ओर नेपाल में ओबीसी समुदाय की गतिविधियों का ब्यौरा दिया ताे दूसरी ओर ओबीसी साहित्य के विस्तार की आवश्यकता पर जोर दिया। इसके पहले उद्घाटन सत्र, जिसका विषय ‘ओबीसी साहित्य विमर्श’ था, को ऑनलाइन संबोधित करते हुए प्रसिद्ध भाषाविद् प्रो. राजेंद्र प्रसाद सिंह ने कहा कि ओबीसी छायावादी शब्द नहीं है। यह एक संवैधानिक शब्द है और इसमें जातियों को शामिल करने की प्रक्रिया अवैज्ञानिक नहीं थी।

आगे प्रो. सिंह ने कहा कि दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष बी.पी. मंडल ने 11 मानदंड बनाया था, जिसके आधार पर ओबीसी में जातियों को शामिल किया गया। इनमें पहला मानदंड यह था कि वे सभी जातियां जो श्रम करके अर्जन करती हैं, वे ही ओबीसी में शामिल होंगी। उन्होंने कहा कि ओबीसी का विस्तार इतना बड़ा है कि इसमें अब थर्ड जेंडर भी शामिल कर लिए गए हैं। इसके अलावा इस वर्ग में धर्म की सीमाएं भी नहीं हैं। इसमें हिंदू भी हैं और मुसलमान व सिक्ख भी। इस लिहाज से देखें तो ओबीसी की बात करना मतलब जाति की बात करना नहीं है। उन्होंने कहा कि ओबीसी यानी अन्य पिछड़ा वर्ग एक वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है। 

प्रो. सिंह ने कहा कि आज देश में आदिवसी साहित्य है, स्त्री साहित्य, दलित साहित्य और आप देखें कि इस देश में ब्राह्मण साहित्य भी रहा है। ऐसे में ओबीसी साहित्य भी है। लेकिन कुछ लोग इसे खारिज करते हैं, जबकि उनके पास खारिज करने का कोई आधार नहीं है। उन्होंने इसका दुष्परिणाम बताते हुए कहा कि फणीश्वरनाथ रेणु और राजेंद्र यादव जैसे साहित्यकार ओबीसी वर्ग से हुए, लेकिन किसी भी सरकार ने उन्हें सम्मानित नहीं किया। किसी को साहित्य अकादमी का पुरस्कार नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि ओबीसी चेतना का विस्तार तभी संभव है जब ओबीसी साहित्य का विस्तार होगा। यही ब्राह्मणवाद को चुनौती देगा।

उन्होंने कबीर का उदाहरण देते हुए कहा कि ओबीसी साहित्य कोई आज का साहित्य नहीं है। यह बहुत पहले कबीर ने रेखांकित कर दिया था। उन्होंने कहा कि कबीर पहले साहित्यकार रहे जिन्होंने ईश्वर की उपमा के लिए रंगरेज और कुम्हार आदि का उपयोग किया। उनके बाद पलटू साहब जो कि भड़भूंजा जाति के थे, दूसरे कबीर कहलाए। उनके विचाराें के कारण उनकी हत्या कर दी गई। लेकिन आप देखें कि कहीं भी उनका साहित्य नहीं है। प्रो. सिंह ने कहा कि अर्जक संघ द्वारा एक पत्रिका का प्रकाशन किया गया। इस पत्रिका में अनेकानेक लोगों की कविताएं, कहानियां आदि प्रकाशित हुईं। वह सब ओबीसी साहित्य था। 

सम्मेलन के दौरान मंचासीन गणमान्य

प्रो. सिंह ने कहा कि जो लोग ओबीसी साहित्य का विरोध करते हैं, उन्हें यह बताना चाहिए कि जोतीराव फुले के साहित्य को वे कहां किस श्रेणी में रखेंगे। दलित साहित्य उन्हें अपना नहीं मानता। आदिवासी साहित्य में उनके लिए कोई जगह नहीं है। ब्राह्मण साहित्य में भी उनके लिए कोई जगह नहीं है। यह बात केवल फुले के लिए ही लागू नहीं होती, बल्कि अनेक साहित्यकारों के लिए भी लागू होती है।  

वहीं अपने अध्यक्षीय संबोधन में वीर बहादुर महतो ने बताया कि नेपाल के जनकपुर में पहली बार मार्च, 2022 में ओबीसी अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन किया गया। दूसरी बार यहां दिल्ली और अगले साल मारीशस में आयोजन पर विचार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि नेपाल में करीब 35 साल पहले प्रजातंत्र की स्थापना के साथ ही भरत महतो के नेतृत्व में ओबीसी संघ की स्थापना हुई थी। बाद में इसे नेपाल ओबीसी महासंघ में तब्दील कर दिया गया। उन्होंने कहा कि यह संघ लगातार सक्रिय रहा है। उन्होंने कहा कि उनके अपने देश में संविधान बन चुका है और संविधान में ओबीसी सहित तमाम वंचित समुदायों के लिए भारत के जैसे ही प्रतिनिधित्व देने का प्रावधान किया गया है। हालांकि अभी नियमावली नहीं बनी है, इसलिए आरक्षण का लाभ नहीं मिल रहा। एक अपडेट देते हुए वीर बहादुर महतो ने कहा कि नेपाल सरकार द्वारा गठित समावेशी आयोग ने दो महीने पहले ही अपनी रपट में नेपाल की 44 जातियों को ओबीसी में शामिल करने का प्रस्ताव दिया है।

सम्मेलन को दिल्ली विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. केदार कुमार मंडल, डॉ. रामा शंकर कुशवाहा, वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र यादव, प्रो. शेफालिका शेखर आदि के अलावा नेपाल में मधेस सरकार के पूर्व मंत्री व विधायक भरत प्रसाद साह, पूर्व मंत्री डॉ. केशव मान्य शाक्य, नेपाल के ही साहित्यकारगण डॉ. सत्य नारायण आलोक, डॉ. नरेश वीर शाक्य, डॉ. बालकेश्वर ठाकुर, डॉ. रामलाल सुतिहार और मारीशस के साहित्यकार डॉ. कोमल चंद राधा किशन आदि ने संबोधित किया। वहीं दूसरे सत्र, जिसका विषय ‘सामाजिक न्याय और आरक्षण’ था, को नेपाल के पूर्व मंत्री डॉ. केशव मान्य शाक्य, सुप्रीम कोर्ट, नई दिल्ली की अधिवक्ता डॉ. सीमा समृद्धि और नेपाल के साहित्यकार डॉ. नरेश वीर शाक्य ने संबोधित किया।

(संपादन : राजन/अनिल)


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लेखक के बारे में

नवल किशोर कुमार

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस के संपादक (हिन्दी) हैं।

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