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‘मामन्नान’ : जाति की सच्चाई और उससे निपटने का तरीका बताती फिल्म

मामन्नान को अक्सर पहाड़ की चोटी पर दिखाया जाता है। साधारण व्यक्ति से विधायक और फिर विधानसभा अध्यक्ष बनने की उसकी यात्रा का यह लाक्षणिक चित्रण है। यह फिल्म मनुष्यों के बीच समानता की स्थापना और जाति-व्यवस्था को उसके सर पर खड़ा करने के संघर्ष का प्रभावी प्रस्तुतीकरण है

‘मामन्नान’ (हिंदी में सम्राट) 2023 में रिलीज़ हुई तमिल फिल्म है। मारी सेल्वाराज द्वारा निर्देशित यह राजनीतिक ड्रामा जाति, राजनीति, मनुष्यों और पशुओं के रिश्तों और पीढ़ियों के बीच संघर्ष की पड़ताल करती है। फिल्म में वदीवेलु, उदयनिधि स्टॅलिन, फहद फासिल और कीर्ति सुरेश आदि ने मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं। 

फिल्म का मुख्य किरदार मामन्नान (वर्दीवेलु) एक दलित विधायक है, जो एक आरक्षित विधानसभा क्षेत्र से चुना गया है। मामन्नान मृदुभाषी और विनम्र है, लेकिन वह लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने के प्रति पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध है। उसका बेटा अदिवीरन उर्फ़ वीरन (उदयनिधि स्टालिन) दो चीज़ों का दीवाना है – पहला मार्शल आर्ट्स और दूसरा सूअर। अदिवीरन भी जातिगत भेदभाव का कट्टर विरोधी है। उसके और उसके पिता के बीच अक्सर जतिगत भेदभाव से निपटने के तरीके को लेकर भिडंत होती रहती है। अदिवीरन और उसके पिता के चरित्र के ज़रिए यह दिखाया गया है कि जाति प्रथा के उन्मूलन के लिए लिए चुनावी और गैर-चुनावी, दोनों तरीके अपनाने होंगे तथा यह भी कि उनके बीच संतुलन कायम करना भी महत्वपूर्ण है।

टकराव तब शुरू होता है जब ऊंची जाति के लोगों का एक समूह अदिवीरन के कुछ दोस्तों का केवल इसलिए बेरहमी से क़त्ल कर देता है, क्योंकि वे गांव के सार्वजनिक कुएं पर नहा रहे थे। अदिवीरन भी उस समय अपने मित्रों के साथ था, लेकिन वह वहां से भाग निकलने में कामयाब हो जाता है। अदिवीरन के पिता मामन्नानम अपनी पार्टी “समुथुवा समूगानीथी मक्कल कषघम” (एसएसएमके – समानता और सामाजिक न्याय लोक महासंघ) के नेता और सरकार में मंत्री सालेम सुंदरम (अज़गम पेरूमल) से मिलते हैं। मंत्री सालेम सुंदरम, रथनवेलु (फहद फासिल) और शनमुगवेल के पिता हैं। मामन्नान चाहते हैं कि मामले का निष्पक्ष निपटारा हो, लेकिन मंत्री सालेम सुंदरम उन्हें समझाते हैं कि इस मामले में फूंक-फूंक कर चलना ज़रूरी है और वे समाज में शांति और सद्भाव बनाये रखने की ज़रूरत पर जोर देते हैं। वे कहते हैं कि आरोपियों के खिलाफ तुरंत कोई कार्रवाई करना ठीक नहीं होगा। अदिवीरन अपने दोस्तों के लिए न्याय चाहता है और चुप बैठने को तैयार नहीं है। यहां तक कि वह अपने पिता से बात करना भी बंद कर देता है, क्योंकि उसके पिता मंत्री की इस सलाह से सहमत हैं कि हत्यारों पर तुरंत कोई कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। 

फिर अगले पंद्रह साल के दौरान अदिवीरन अपनी कॉलेज सहपाठी लीला (कीर्ति सुरेश) से प्रेम करने लगता है। कॉलेज की पढ़ाई ख़त्म होने के बाद लीला वंचित वर्गों के बच्चों के लिए एक नि:शुल्क कोचिंग संस्थान शुरू करती है। लेकिन निजी कोचिंग संस्थानों के मालिकों, जिनमें रथनवेलु का भाई भी शामिल है, के विरोध के कारण उसे अपना कोचिंग संस्थान दूसरे स्थान पर ले जाना पड़ता है। वह अदिवीरन से मदद नहीं मांगना चाहती, लेकिन अपने दोस्तों के बार-बार कहने पर वह सकुचाते हुए अदिवीरन को पूरी बात बताती है। वे दोनों मिलकर एक नया कोचिंग सेंटर खोलते हैं, जिससे हाशियाकृत परिवारों के बच्चों की शिक्षा पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इससे नाराज़ रथनवेलु, लीला के कोचिंग सेंटर में तोड़-फोड़ करने के लिए गुंडे भेजता है। जवाब में अदिवीरन और उसके साथी भी दूसरे पक्ष के कोचिंग सेंटर पर हमला करते हैं। 

फिल्म ‘मामन्नान’ का एक दृश्य, जो जातिगत पदानुक्रम के उलटने का प्रतीक है

इसके बाद रथनवेलु इस विवाद पर बातचीत करने के लिए अदिवीरन और उसके पिता मामन्नान को अपने घर बुलवाता हैं। अदिवीरन को पता है कि उसके पिता कभी रथनवेलु की मौजूदगी में कुर्सी पर नहीं बैठते। उसे यह ठीक नहीं लगता। वह तय कर लेता है कि वह अपने पिता को कुर्सी पर बैठा कर ही रहेगा। उसकी निगाह में कुर्सी पर बैठना आत्मसम्मान का प्रतीक है। दूसरी ओर रथनवेलु को मामन्नान का कुर्सी पर बैठना अपना अपमान लगता है। रथनवेलु के प्रति अपना सम्मान प्रदर्शित करने के लिए कुर्सी खाली रहने पर भी मामन्नान रथनवेलु के सामने खड़े ही रहते हैं।

अदिवीरन इस सामाजिक आचार को निभाने को तैयार नहीं है और अपने आत्मसम्मान की रक्षा करने के के लिए प्रतिबद्ध है। अदिवीरन के ऐसे प्रतिरोध के चलते रथनवेलु अपनी पार्टी को छोड़कर विपक्ष में शामिल हो जाता है। उसका मकसद है– अदिवीरन और मामन्नान को सबक सिखा और उन्हें उनकी सामाजिक हैसियत का अहसास कराना। लेकिन राजनीतिक मुकाबले में रथनवेलु पर मामन्नान भारी पड़ता है। अपनी हार से बौखला कर रथनवेलु अपने जंगली कुत्तों को अदिवीरन के सूअरों पर छोड़ देता है।

मामन्नान मन पर गहरी छाप छोड़ने वाली फिल्म है। फिल्म में जातिगत भेदभाव का चित्रण अत्यंत प्रभावी बन पड़ी है। फिल्म बताती है कि किस प्रकार दलित समुदायों को आज भी अलग-अलग स्वरूपों में दमन और हिंसा का सामना करना पड़ता है। राजनीति भी जातिगत पदानुक्रम पर आधारित है और निम्न जातियों का राजनीति में भी दमन और अपमान होता है। यह फिल्म पशुओं और मनुष्यों की बीच के जटिल रिश्तों की भी पड़ताल करती है और दिखाती है कि पशु भी प्रतिरोध और आशा के शक्तिशाली प्रतीक हो सकते हैं। उदाहरण के लिए अदिवीरन द्वारा सूअर पालना, जाति प्रथा के प्रति उसके प्रतिरोध और ‘अछूत’ के प्रति उसके प्रेम का प्रतीक है। ऊंची जातियों के हिंदू सूअर को गंदा जानवर मानते हैं, लेकिन अदिवीरन के लिए वे शक्ति और कठिनाइयों से लड़ने की क्षमता का प्रतीक हैं। यह जाति प्रथा की पाशविकता को भी रेखांकित करता है, जो मनुष्यों को पशु बना देती है। यह प्रतीकात्मकता गहरे अर्थ लिए हुए है और हमारे सामने कई चुनौतियां पेश करती है। फिल्म यह रेखांकित करती है कि पालतू जानवरों या मवेशियों के कई निहितार्थ हो सकते हैं। 

फहद फासिल खलनायक के अपने पात्र रथनवेलु के रूप में जातिगत हिंसा के दिल दहलाने वाले किरदार का सफलतापूर्वक चित्रण करते हैं। रथनवेलु अपने कुत्तों को हिंसक बनाए रखता है, जो उसकी स्वयं की क्रूरता को, जातिगत श्रेष्ठताभाव को रेखांकित करता है। वह अपनी कुंठाएं उन पर उतारता है और दमित लोगों की जान लेने में विफल रहने पर उन्हें मार देता है। जाहिर है कि रथनवेलु यह मानता है कि दलित मनुष्येत्तर प्राणी हैं, जो केवल उसके जैसे लोगों की सेवा करने के लिए हैं। उसके लिए दलितों और उसके पालतू कुत्तों में कोई फर्क नहीं है। दोनों से ही यह अपेक्षा की जाती है कि वे बिना कोई प्रश्न उठाए आज्ञा का पालन करें।   

फिल्म का संगीत पक्ष भी मजबूत है। ए.आर. रहमान का गीत मनभावन तो है ही, मन को विचलित करने वाला भी है। संगीत, फिल्म के केंद्रीय संदेश के भावनात्मक मूड को प्रतिबिंबित करता है। फिल्म में मुख्यतः हाथ में पकड़े जाने वाले कैमरे का इस्तेमाल किया गया है। कैमरा यथार्थ के भाव को पुष्ट करता है। विभिन्न भावों को दिखाने के लिए फिल्म में क्लोजअप और लॉन्ग शॉट्स के मिश्रण का उपयोग किया गया है। जैसे, क्लोजअप्स का इस्तेमाल मामन्नान एवं अदिवीरन और अदिवीरन एवं लीला के बीच के नजदीकी रिश्तों को दिखाने के लिए किया गया है। दूसरी ओर, लॉन्ग शॉट्स के द्वारा यह दिखाया गया है कि जाति प्रथा से जनित दमन का कैनवास विस्तृत है। फिल्म की सिनेमेटोग्राफी अनूठी है और दृश्यों को हमारे मन में लंबे समय तक जीवंत रखने में मददगार है। अलग-अलग भावों और वातावरण को दिखाने के लिए फिल्म में प्राकृतिक प्रकाश और फिल्टर्स का प्रयोग किया गया है। फिल्म सूअरों के आर्तनाद का उपयोग भय को दर्शाने के लिए और ढोल (विशेषकर पराई ढोल) का प्रयोग रोमांचकता और किसी लक्ष्य को हासिल करने की दृढ इच्छा को दर्शाने के लिए करती है। 

अपनी पहले की फिल्मों की तरह मारी सेल्वाराज बुद्ध, आंबेडकर और पेरियार जैसे नायकों का उपयोग जाति प्रथा के अपने विरोध को रेखांकित करने के लिए करते हैं। वे चे ग्वेरा के चित्र और लीला की टीशर्ट पर लिखे नारे ‘पॉवर टू द पीपुल’ के ज़रिए मार्क्सवादी सबाल्टर्न राजनीति को भी प्रतीकात्मक रूप में दिखाते हैं। अदिवीरन पंख वाले सूअर के छोटे-से बच्चे का चित्र बनाता है। यह फिल्म में प्रतिरोध की कला को दर्शाता है। यह चित्र सूअरों को गंदगी से जोड़ने की सामान्य धारणा को चुनौती देता है और दमनकारी अवधारणाओं की मुखालिफत करता है। पंख, जाति प्रथा के दमन से मुक्ति पाने की उत्कंठा का प्रतीक हैं। 

फिल्म में पंख और पर्वत एक गहरा अर्थ लिए हुए हैं। वे मिलकर यह संदेश दे रहे हैं कि जाति प्रथा एक अवरोध तो है, लेकिन उसे पार करना असंभव नहीं है। मामन्नान को अक्सर पहाड़ की चोटी पर दिखाया जाता है। साधारण व्यक्ति से विधायक और फिर विधानसभा अध्यक्ष बनने की उसकी यात्रा का यह लाक्षणिक चित्रण है। यह फिल्म मनुष्यों के बीच समानता की स्थापना और जाति व्यवस्था को पलटने के संघर्ष का प्रभावी प्रस्तुतीकरण है।

चुनाव में मामन्नान की जीत पर जब रथनवेलु उससे हाथ मिलाकर बधाई देता है तब उसे ऊपर की ओर देखना पड़ता है क्योंकि मामन्नान सीढ़ी पर उससे ऊंचे पायदान पर खड़ा है। यह दृश्य राजनीतिक आरक्षण और अन्य कानूनी प्रावधानों के चलते पारंपरिक पदक्रम के पलट जाने का प्रतीक है और एक प्रभावी संदेश देता है। 

(मूल अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

नीरज बुनकर

लेखक नाटिंघम ट्रेंट यूनिवर्सिटी, नॉटिंघम, यूनाईटेड किंगडम के अंग्रेजी, भाषा और दर्शनशास्त्र विभाग के डॉक्टोरल शोधार्थी हैं। इनकी पसंदीदा विषयों में औपनिवेशिक दौर के बाद के साहित्य, दलित साहित्य, जाति उन्मूलन, मौखिक इतिहास व सिनेमा आदि शामिल हैं

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